कागजों में ही दौड़ कर लाखों का डीजल पी गई उपायुक्त की कार


3 वर्षों तक सिर्फ कागजों में दौड़ती रही डीसी साहब की इनोवा
हिसार (राजेश्वर बैनीवाल)। प्रदेश की मनोहर सरकार भले ही सिस्टम को भ्रष्टाचार मुक्त करने के दावे करती नहीं थकती, लेकिन उसी सरकार के सिस्टम को सरकार के ही अधिकारी
भ्रष्टाचार से खोखला करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा मामला फतेहाबाद की जिला आईटी सोसाइटी का है। जिला आईटी सोसाइटी (डीआईटीएस) का काम जिले के बीपीएल परिवारों और पंचायतों को डिजीटल साक्षर करने का था, लेकिन वो अपने भारी-भरकम फंड को इधर-उधर एडजस्ट करने में ही लगी रही। जिला आईटी सोसाइटी की पिछले तीन साल की आडिट रिपोर्ट में तो यही खुलासा हुआ है। मुख्यमंत्री तक शिकायत जाने के बाद मामले की जांच विजीलेंस को सौंपी गई है।
आडिट रिपोर्ट की मानें तो फतेहाबाद जिले में तीन वित्त वर्ष 2014-15, 2015-16 और 2016-17 तक जितने भी डीसी आए, वो लगातार तीन वर्षों तक रोजाना 120 किलोमीटर इनोवा गाड़ी में घूमते रहे। इतना ही नहीं इन तीन वर्षों में आए सरकारी अवकाश और उनके निजी अवकाशों के दौरान भी ये इनोवा गाड़ी सड़कों पर दौड़ती रही। हां, ये बात अलग है कि जिले के किसी भी डीसी को स्थानीय लोगों या अधिकारियों ने इनोवा गाड़ी में निरीक्षण आदि पर जाते नहीं देखा। इसका सीधा सा मतलब है कि उनके लिए डीआईटीएस की इनोवा गाड़ी कागजों में ही दौड़ती रही और तीन साल में डीजल बिल की आड़ में सात लाख रुपए को ठिकाने लगा दिया गया।
हैरानी तो इस बात की है कि पिछले तीन साल में लगातार वित्तीय अनियमितताएं सामने आने के बावजूद इस गड़बड़झाले को रोकने का किसी ने प्रयास तक नहीं किया। और तो और आडिट रिपोर्ट में भी इन अनियमितताओं को अनदेखा किया जाता रहा। पिछले तीन साल की ऑडिट रिपोर्ट में जो सामने आया है, उसकी जानकारी देते हुए आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट सुशील बिश्नोई ने बताया कि वित्त वर्ष 2014 से लेकर 2017 तक डीसी की इनोवा गाड़ी पर सात लाख का डीजल एवं रिपेयरिंग खर्च आया है। हैरानी की बात तो ये है कि पिछले एक साल में जिला आईटी सोसाइटी ने एक भी पंचायत को डिजीटल साक्षर करने के लिए एक कैंप तक नहीं लगाया।
जानकारी के अनुसार फतेहाबाद जिले में दो-तीन साल में अलग-अलग उपायुक्त कार्यरत रहे लेकिन एनके सोलंकी ही इन तीन सालों में अधिकतर समय फतेहाबाद के उपायुक्त पद पर रहे। मीडिया ने जब पूर्व डीसी सोलंकी से इस संदर्भ में बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया और फोन काट दिया। हालांकि जिला आईटी सोसाइटी के पिछले तीन साल के आडिट रिपोर्ट की एक प्रति भी है। ये इनोवा गाड़ी फिलहाल डीसी फतेहाबाद के निवास पर बने गैराज में बंद शटर के पार खड़ी है।
विजीलेंस को दी जांच : सुशील
एडवोकेट सुशील बिश्नोई के अनुसार उन्होंने पूरे गड़बड़झाले की शिकायत मुख्यमंत्री मनोहर लाल को की थी। मुख्यमंत्री ने शिकायत का अध्ययन करवाकर मामले की जांच का आश्वासन दिया था। अब उन्हें पता चला है कि मामले की जांच विजीलेंस को दे दी गई है। उन्होंने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसी जा सके।


गुमशुदा की तलाश


व्यापारी एकता जिंदाबाद, हरियाणा सरकार मुर्दाबाद, जिला प्रशासन हाय-हाय. हिसार में होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना के समय सुनाई देने वाले यह नारे सुनना तो दूर आज इन नारों को लगाने वाले सबके प्रिय व्यापारी नेता जी का ही किसी को कोई अता-पता नहीं है. हिसार में एक के बाद एक होने वाली अपराधिक घटनाओं के पश्चात भी बजरंग दास गर्ग की अनुपस्थिति से अब उनकी तलाश ने जोर पकड़ लिया है. व्यापारी उनकी तलाश में ऐसे जुटे है जैसे किसी गुमशुदा की तलाश की जा रही हो. बावजूद इसके व्यापारियों के हाथ निराशा की लग रही है.
हरियाणा की कांग्रेसी हुड्डा सरकार से पूर्व हरियाणा प्रदेश व्यापर मंडल के अध्यक्ष पूर्व की सरकारों में एक व्यापारी की छोटी सी दुःख-तकलीफ में धरना-प्रदर्शन, नारेबाजी व् हिसार बंद से भी गुरेज नहीं करते थे. आजकल वही व्यापारी नेता नगर के व्यापारियों के लिए ईद का चाँद बने हुए है. ऐसा नहीं है की हिसार से अपराध और अपराधी दोनों ख़त्म हो गए है, या फिर हिसार के व्यापारियों पर दुःख-तकलीफ नहीं आ रही. बस नजर नहीं आ रहे तो वो है सिर्फ नेता. भले ही वो नेता विधायक हो सांसद हो या फिर व्यापारी. फर्क मात्र इतना है की हिसार के विधायक हिसार में रहते नहीं और व्यापारी नेता आजकल सरकारी हो गए है. हिसार में आज ऐसा कोई दिन नहीं जाता होगा जब अपराधी अपनी मंशा पर खरे नहीं उतारते हो. फिर भले ही वो चैन स्नेचिंग हो या मारपीट. जबकि एक व्यापारी की आज हत्या प्रयास से लेकर हत्या तक हो रही है.
बीते दिनों एक ही दिन में छह स्थानों पर फायरिंग, एक लस्सी विक्रेता पर जानलेवा हमला, एक जूस विक्रेता की हत्या, एक अन्य लस्सी विक्रेता की हत्या, शहर के गुजरी महल में एक युवक की लाश का मिलना, बस स्टैंड पर सरेआम चाक़ू मार कर एक युवक की हत्या से नगरवासी सहमे हुए है. जनता को फिर वही पुराने दिन याद आने लगे है जब छोटी-छोटी बातो पर बजरंग दास गर्ग जनता की आवाज बुलंद करने बाजार में आ जाते थे. आज उनकी गैरमौजूदगी से गुफ्तगू शुरू हो चुकी है की अब तो इस व्यापारी नेता की तलाश ही शुरू करनी पड़ेगी.
आलम यह है की आज बजरंग दास गर्ग व्यापारी हित में नहीं अपितु सरकारी हित में जनता के समक्ष खड़े दिखाई देते है. आज उनको सरकार के सभी फैसले सही दिखाई देते है तो हरियाणा प्रदेश में बढ़ने वाला अपराधिक ग्राफ विपक्ष का किया धरा लगता है. आज अगर वो दिखाई देते है तो सिर्फ मुख्यमंत्री के साथ और बोलते है तो सिर्फ सरकार के पक्ष में. ऐसे में व्यापारी और जनता की सुनने वाला आज कोई नजर ही नहीं आता. रही बात घटना के पश्चात की तो जनता और व्यापारी आज अपना गुस्सा जनता पर ही निकालने को मजबूर है. बीते दिनों विक्की लस्सी वाले की हत्या के पश्चात हिसार में हुई तोड़फोड़ और लूटपाट इसी की परिणिति है.


युवराज को शर्म आ रही है


अगर आपको भारतीय होने पर शर्म नहीं आ रही तो आप भी अपनी आँखे बंद कर लो क्योंकि युवराज को शर्म आ रही है. शर्म इसलिए नहीं की घोटालेंबाज नेता व् अधिकारी कांग्रेस के राज में देश की जनता का अरबों-खरबों रुपया हजम कर गए और डकार भी नहीं ली बल्कि मात्र इसलिए की एक गैर कांग्रेसी सरकार में किसानो पर लाठी चार्ज किया गया. यह दुःख का विषय है की इस घटना में दो किसानो की मौत हो गई लेकिन यहाँ गुफ्तगू का विषय इतना सा है की भले ही दिल्ली, पश्चिम बंगाल, हरियाणा या फिर महाराष्ट्र में आरक्षण, भूमि अधिग्रहण, सीलिंग व् कानून व्यवस्था के नाम पर कुछ भी होता रहे युवराज को कुछ भी फर्क नहीं पड़ता. अगर उनका यह ब्यान राजनीति से प्रेरित है तो यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है.
 मैंने अपनी पिछली गुफ्तगू मुद्दा तो बस एक बहाना है में भी लिखा था की मुद्दे की बात करने वाले राजनेता सिर्फ मुद्दे को भुनाने के लिए ईद के चाँद की तरह ही नजर आते है. जबकि आज तक किसी ने भी किसी भी मुद्दे के लिए कोई ठोस प्रयास किया ही नहीं है. इसीलिए आज देश की समस्याएं जस की तस खड़ी है.क्योंकि कोई नेता चाहता ही नहीं की समस्यायों का समाधान हो. क्योंकि अगर समस्याएं ही ख़त्म हो गई तो वो राजनीति कैसे करेंगे. अब कहते है की नेता कपडे कम बदलते है और ब्यान ज्यादा. इसीलिए हर जगह इनके ब्यान अलग-अलग होते है, भले ही मामला एक जैसा ही क्यों ना हो. इनको तो सिर्फ राजनीति करनी है.
अब देखो ना उत्तरप्रदेश में भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानो पर लाठियां बरसाई गई. मामले ने इतना तूल पकड़ा की राहुल गाँधी सुबह-सुबह ही एक कार्यकर्ता की बाइक लेकर पहुँच गए उत्तरप्रदेश के उस गाँव में, जिस गाँव के किसान की पुलिस लाठीचार्ज में मौत हुई थी. अब राहुल बाबा मौके पर स्वयं गए है तो ब्यान देना भी जरुरी था. आपाधापी में कह बैठे की जिस तरीके से लाठीचार्ज में किसानो की मौत हुई है उसे देख उन्हें भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही है. क्या वाकई उन्हें भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही है.
अगर ऐसा है तो मैं यहाँ बात हरियाणा की ही करूँ तो पिछले काफी सालो से भूमि अधिग्रहण को लेकर किसान आन्दोलन कर रहे है. तो आज तक राहुल गांधी को संसद में भूमि अधिग्रहण बिल लाने की जरुरत महसूस क्यों नहीं हुई. जब दिल्ली में मेट्रो के लिए आम जनता की जमीन ली जा रही थी और जनता सड़को पर थी उस समय उन्हें इस बिल की याद क्यों नहीं आई. क्यों उस समय उन्हें शर्म महसूस नहीं हुई जब दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने वाले एक छोटे से व्यापारी की दूकान महज इसलिए बंद करवा दी गई क्योंकि वह सीलिंग के तहत आ रही थी. शायद वो इसलिए चुप रहे क्योंकि दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस की सरकारे थी.
हरियाणा के मिर्चपुर में एक बिरादरी के लोगो ने दूसरी बिरादरी के एक परिवार के मुखिया को जहाँ मार दिया वहीँ उसके घर को आग लगा दी, जिसमे जल कर उसकी एक अपाहिज बेटी मर गई. इस घटना के पश्चात भी आन्दोलन ने इतना उग्र रूप धारण कर लिया था की यहाँ भी राहुल गाँधी को गुपचुप तरीके से आना पड़ा. लेकिन यहाँ आकर उन्हें शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भारतीय होने पर शर्म महसूस नहीं हुई. उनके इस ब्यान में किसानो के प्रति कितना दर्द छुपा है यह तो आने वाला वक्त ही बतायेंगा लेकिन इतना जरुर है की फिलहाल राहुल गाँधी को उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार होने व् अगले वर्ष विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अवश्य भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही है.


280 लाख करोड़ का सवाल है ...


अन्ना हजारे जी लोकपाल बिल विधेयक के लिए अनशन पर क्या बैठे की हर तरफ एक ही चर्चा थी की यह बिल आने से देश में भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा. जनता तो उनके साथ थी ही लेकिन सरकार को भी उनके समक्ष झुकना पड़ा. किसी ने भी यह नहीं सोचा की आखिर जब तक हम कुछ नहीं करेंगे तब तक देश से भ्रष्टाचार समाप्त कैसे हो सकता है. यह बिल कोई मच्छर मारने की दवा थोड़े ही है की स्प्रे किया और भ्रष्टाचार ख़त्म. यहाँ सवाल लाख-दो लाख का नहीं अपितु पूरे 280 लाख करोड़ का है की जब तक हम किसी भ्रष्ट नेता या अधिकारी की शिकायत नहीं करेंगे तब तक ना तो यह बिल कुछ कर सकता है और न ही देश से भ्रष्टाचार समाप्त होगा.
अगर आपको किसी भी काम के लिए नेता या अधिकारी के पास जाना पड़ा तो उनकी जेब तो गर्म करनी ही पड़ेगी. भले ही वो काम कितना ही छोटा हो या कितना ही बड़ा. अब आप बताओ की आपके लिए आपका काम जरुरी है या उस भ्रष्ट की शिकायत करना. अब जब आप ही किसी भ्रष्ट नेता या अधिकारी की शिकायत नहीं करेंगे तो भला यह विधेयक किस काम का. कहने का तात्पर्य यह है की हम सिर्फ शोर मचा सकते है.
अब देखो ना भारतीय गरीब है लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा". ये कहना है स्विस बैंक के डाइरेक्टर का. स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280लाख करोड़ रुपये (280 ,00 ,000 ,000 ,000) उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम इतनी है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है. या यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. यूँ भी कह सकते है कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है. ऐसा भी कह सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा सकते है. ये रकम इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर महीने भी दिए जाये तो 60 साल तक ख़त्म ना हो.
यानी भारत को किसी वर्ल्ड बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत नहीं है. जरा सोचिये ... हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और ये लूट का सिलसिला अभी 2011 तक जारी है. इस सिलसिले को अब रोकना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज करके करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे भ्रष्ट नेताओं ने 280 लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64 सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा करवाई गई है. भारत को किसी वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है.
सोचो की कितना पैसा हमारे भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ है. हमे भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार है.हाल ही में हुए घोटालों का आप सभी को पता ही है. CWG घोटाला, 2 जी स्पेक्ट्रुम घोटाला, आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले अभी उजागर होने वाले है. आज समय यह नहीं है की अगर अन्ना हजारे जी भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे है तो उनके साथ फोटो खिंचवाने, उनके साथ बैठने या समाचार पत्रों में नाम छपवाने के लिए उनके समर्थन में प्रेसनोट जारी करने से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा. आज जरुरत है की हमको खुद को रिश्वत देने से बचना होगा. जागना होगा, जगाना होगा और आगे बढ़ कर शिकायत भी करनी होगी. तभी हम अन्ना हजारे जी के यज्ञ में असली आहुति देंगे.
........आप लोग जोक्स फॉरवर्ड करते ही हो. इसे भी इतना फॉरवर्ड करो की पूरा भारत इसे पड़े . अब तो जागो....


मुदृदा तो बस एक बहाना है


मुद्दा तो बस एक बहाना है, लक्ष्य तो राजनीति चमकाना है. आज के नेताओ की यहीं सोच जनता के गले की हड्डी बनी हुई है. किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा की क्या तो वो खुद करें और और क्या उनके लिए नेता कर रहे है. क्योंकि राजनितिक पार्टियां और उनके नेता जनहित की बात कर जो भी मुद्दे उठाते है वो जनहित के कम और राजनीती करने के लिए ज्यादा नजर आते है. अगर यहाँ बात देश-प्रदेश की करें तो ऐसे बहुत से मुद्दे नजर आयेंगे जिनको लेकर राजनितिक पार्टियों और नेताओ ने हो-हल्ला तो बहुत किया लेकिन नतीजा शुन्य मात्र ही रहा. इनमे से ही एक मुद्दा है परमाणु उर्जा संयंत्र का. इन दिनों यह मुद्दा सभी राजनीतक दल उठाये हुए है. फर्क मात्र इतना है की जिस प्रदेश में जो दल सत्ता में है सिर्फ वो चुप है बाकि सभी परमाणु उर्जा संयंत्र के लगाने का विरोध कर रहे है. इन दिनों देश में बहस छिड़ी हुई है कि यह ऊर्जा विकासकारी है या विनाशकारी। जापान में आए भूकंप व सूनामी के बाद फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में मची तबाही ने इस बहस को तेज कर दिया है। जहां-जहां परमाणु संयंत्र लगने प्रस्तावित हैं, वहां पर परमाणु ऊर्जा का विरोध करने वाले पहले से अधिक सक्रिय हो चुके हैं और ऐसे ही राजनीतिक पार्टियां भी इस अवसर को भूनाने से पीछे नहीं हैं। अगर जनता है तो धरना-प्रदर्शन व् नेता है तो पत्रकारवार्ता कर अपना विरोध जाता रहे है. ऐसी राजनीतिक पार्टियां इस वक्त परमाणु ऊर्जा का विरोध तो कर रही हैं, लेकिन सत्ता में आने पर परमाणु संयंत्र हटाने की बात करने या संसद में परमाणु ऊर्जा के खिलाफ आवाज उठाने की बात पर केवल विचार कर रही हैं।
ऐसा ही एक वाक्या पिछले दिनों हिसार में हुआ। हिसार के पड़ोसी जिले फतेहाबाद में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र का प्रदेश में सभी पार्टियां विरोध कर रही हैं। विरोध कर रहे किसानों का साथ देने में भला भारतीय जनता पार्टी कैसे पीछे रह सकती थी। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव कैप्टन अभिमन्यु ने पिछले पखवाड़े हिसार में अपने निवास पर पत्रकारवार्ता आयोजित की. पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने जोरशोर से परमाणु संयंत्र का विरोध किया। मगर, जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी परमाणु संयंत्र स्थापित करने के खिलाफ संसंद में आवाज उठाएगी तो पहले उन्होंने कहा कि वह सांसद नहीं हैं, जो संसद में आवाज उठाएं। फिर जब उनसे पूछा गया कि यहां बात उनकी नहीं बल्कि उनकी पार्टी की हो रही है तो उन्होंने कहा कि विचार किया जाएगा। एक अन्य पत्रकार ने पूछा कि क्या उनकी पार्टी केंद्र की सत्ता में आने पर परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद कर देगी, तो इस पर भी वह कुछ खास नहीं कह पाए और कहा कि पार्टी विचार करेगी।
अब ऐसे राजनीतिक नेताओं से कोई ये पूछे कि क्या ये पार्टियां केवल राजनीतिक फायदा लेने के लिए ही किसी मुद्दे का विरोध या समर्थन करती हैं। जब उनकी पार्टी फतेहाबाद में लगने वाले परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध कर रही है और परमाणु ऊर्जा को मानवता के लिए खतरा मानती है तो उनकी पार्टी को यह मुद्दा संसद में उठाने या सरकार आने पर परमाणु संयंत्र बंद करने के लिए विचार करने की जरूरत क्यों है। जब केवल बातें या धरने-प्रदर्शन न करके व्यावहारिक कदम उठाने की बात आती है तो क्यों पार्टी विचार करने की बात कहती है। क्यों इस मुद्दे का विरोध कर रही राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि ईद के चांद की तरह संयंत्र का विरोध कर रहे किसानों के समर्थन में कभी-कभार ही नजर आते हैं।


गांधीवाद की नहीं गांधी की है जरुरत



अन्ना हजारे जी अनशन पर क्या बैठे, पूरे देश का जनमानस उनके पीछे हो लिया. जैसे देश की आधी आबादी इसी ताक में बैठी थी की कब अन्ना जी भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे और कब उनको भी इस मुहीम में अपनी आवाज बुलंद करने का मौका मिले. आम आदमी तो आदमी, नेता-राजनेता के साथ-साथ साधू-संत भी उनको समर्थन में जुड़ने लगे. आज स्थिति यह है की अनशन पर हजारे के साथ फोटो खिंचवाने के लिए हजारो बैठे है लेकिन फोटो तो हजारे जी की ही लग रही है. यह हाल सिर्फ दिल्ली का ही नहीं है अपितु पूरे देश में ही फोटो खिंचवाने के लिए ऐसा हो रहा है. लेकिन सोचने का विषय यह है की भ्रष्टाचार में विश्व में पांचवे स्थान पर आने वाले भारत से भ्रष्टाचार ख़त्म हो पायेगा. इसमें कोई दोराय नहीं की अन्ना जी अपनी
मुहीम में जरुर कामयाब होंगे लोकपाल विधेयक लाने में, लेकिन मेरा पहलू यह है की क्या ऐसे में भ्रष्टाचार जड़ से ख़त्म हो पायेगा. तो मेरा मानना तो यही है की अगर फोटो खिंचवाने से भ्रष्टाचार ख़त्म होता तो आज कभी का हो लिया होता. रही बात अन्ना जी के अनशन की तो आज गांधीवाद की नहीं अपितु देश को गांधी की जरुरत है.
अब देखो न लगभग 6 वर्ष पूर्व जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार आई थी तो कहा गया था की भाजपा को तो महंगाई मार गई. क्योंकि अगर आप नहीं भूले हो तो उस समय पहली बार प्याज की कालाबाजारी के चलते प्याज की कीमतें आसमान छू गई थी. जबकि आज सिर्फ प्याज, टमाटर व् दालें ही नहीं अपितु आम जरुरत की प्रत्येक वस्तु के भाव आम आदमी की पहुँच से बाहर हो चुके है. मिडिया सहित आम आदमी से लेकर विपक्ष ने खूब हो-हल्ला किया लेकिन सरकार के कानो पर जूं तक नहीं रेंगी. लोकसभा के चुनावो के दौरान जनता को बरगलाने के लिए सरकार ने महंगाई दर शून्य के करीब तक दिखने का प्रयास किया. एक बारगी तो ऐसे लगा जैसे सामान फ्री के भाव में बिक रहा है. भला हो कांग्रेस का की चुनावों के दौरान वो फिर से सत्ता पर काबिज हो गई. लगा की इस बार सरकार चौकन्ना होकर जनहित में काम करेंगी. लेकिन इस बार सरकार व् सरकार के नुमाइंदो  ने चौकन्ना होकर काम तो किया लेकिन जनहित में नहीं स्वयं हित में. यही कारण था की हमारे सामने एक के बाद एक भ्रष्टाचार के कारनामे खुलते चले गए. और हम सिर्फ देखते-सुनते रहे.
जनता और मिडिया का क्या है. वर्ल्ड कप से फुर्सत मिली तो अन्ना जी के साथ हो ली. कल को आईपीएल होंगे तो फिर से दोनों अपने-अपने काम में जुट जायेंगे. दोनो को अपने-अपने काम से मतलब है, बस खाली नहीं बैठना चाहिए. रही बात देश की तो उसकी किसको पड़ी. क्योंकि अब तो मौका भी है और दस्तूर भी. कवरेज हो रही है और कवरेज मिल रही है.अन्ना जी का क्या है, कोई साथ नहीं भी आता तो जग भलाई के लिए अपने मकसद में कामयाब तो हो ही जायेंगे. कल को कामयाब हो भी जाते है तो मेरी इस गुफ्तगू का पहलू वहीँ का वहीँ खड़ा है की कानून तो बनते बिगड़ते रहते है लेकिन इस देश को चलाने और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए गांधी कहाँ से लाओगे.


यह गलत बात है


ख़ुशी तो हमको एक खास मौके पर ही मिलती लेकिन कहते है की परेशानी कभी भी और कहीं भी हमारी जिंदगी में दस्तक दे सकती है. अब देखो न सुबह घर से निकलने से लेकर रात होने तक हम बहुत से ऐसे नज़ारे देखते है जो हमारे साथ-साथ अन्यो को भी परेशानी में डाल देते है. इसके साथ ही आम होने वाली घटना कभी-कभी हमारे दिलो-दिमाग पर इतना असर छोड़ जाती है की हम ना तो कुछ कर पाते है और ना ही किसी को कुछ कह पाते है, लेकिन बाद में किसी न किसी से जिक्र जरुर करते है. अब क्या कहूँ की किसी बात का जिक्र होगा तो गुफ्तगू भी होगी. 
ऐसी ही आम होने वाली घटनाओं, परेशानियों और गुफ्तगू को आप तक पहुँचाने के लिए मैंने यह कालम शुरू किया है. इस कालम में शहर, प्रदेश व् देश में होने वाली उन घटनाओं पर गुफ्तगू की जायेगी जिसे देखते ही हमको लगता है की यह गलत बात है. कहते है की इंसान गलती का पुतला है लेकिन अगर यह कालम उन गलतियों को सुधारने में ना सही लेकिन उनको समझाने तक में कामयाब हुआ तो मै समझूंगा की इस कालम में गुफ्तगू करना कारगर साबित हुआ. इस कालम को नाम दिया गया है " यह गलत बात है ". सबसे पहले हम बात करते है अनाधिकृत रूप से चलने वाली जीपों की.

आज हर शहर में निजी जीप वालो का अपना अलग ही आतंक छाया हुआ है. आम आदमी तो इसमें सफ़र करना तो दूर इसके नजदीक भी जाना पसंद नहीं करता. फिर भी इनकी पौ-बाराह मात्र इसीलिए है की यह अन्य साधनों से ज्यादा तेजी से चलती है और सवारी को उसके गंतव्य तक बहुत जल्दी पहुंचा देती है. बस यही जनता के लिए परेशानी का सबब है. इतना ही नहीं किसी-किसी नगर में तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा है की चौपहिया वाहन तो क्या दूपहिया वाहन को चलने तक की जगह नहीं मिलती. यह हर चौक पर आपको जाम लगाये मिलेगी.
जनता की परेशानी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. इसके अतिरिक्त अपनी रफ़्तार पर आने के बाद यह इतनी आड़ी-तिरछी चलती है की इसके नजदीक से गुजरने वाले की साँसे तब तक अटकी रहती है जब तक वो इसको पार न कर दे. साथ ही साथ इसमें बैठने वालो की संख्या इतनी अधिक होती है की जीप में भी जहाँ 12 से 15 सवारी होती है वहीँ 5 से 7 सवारी बाहर लटकी होती है. सवारियों के लिए दुआ की जा सकती है की कोई दुर्घटना का शिकार न हो जाये. सरकार या प्रशासन भी इन पर रोक लगाने में अभी तक नाकामयाब हुए है. यहीं कारण है की इनको देखने के बाद यहीं विचार आता है यह गलत बात है.


आखिर हमारी गलती क्या है


इन दिनों भूमि अधिग्रहण को लेकर हरियाणा में हंगामा बरपा हुआ है. जब देखो भूमि अधिग्रहण मामले पर सरकार अपनी सफाई  देती नजर आती है तो मौका मिलते ही विपक्ष हमला बोल देता है. कहने का अर्थ यह है की सरकार कभी कोई सेक्टर, कभी एसइजेड तो कभी कोई सरकारी उपक्रम लगाने के लिए भूमि पर भूमि अधिग्रहण किये जा रही है और विपक्ष शोर मचाये जा रहा है. जबकि हल है की कुछ भी निकल कर सामने नहीं आ रहा है. या यह भी कह सकते है की अभी इस मामले में अपनी-अपनी रोटियाँ सेंक रहे है. इस मामले का कोई हल नहीं निकलता देख अब तो किसान भी पूछने लगा है की आप सब बुद्धिजीवी एक बात बताओ आखिर हमारी गलती क्या है. 
अब देखो ना गोरखपुर गाँव के किसान वही सब कह रहे हैं जो सरकार कहती है. सरकार कहती है कि किसी भी इंडस्ट्री के लिए उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा, किसान भी तो यही कह रहें हैं कि उनकी भूमि बेहद उपजाऊ है. बुद्धिजीवी व वैज्ञानिक कहते हैं कि परमाणु बिजली संयंत्र घनी आबादी वाले क्षेत्र में नहीं लगाना चाहिए, वो भी तो यही कह रहे हैं कि उनका क्षेत्र (फतेहाबाद, हिसार, सिरसा जिले आदि) घनी आबादी वाला है. नेता-अफसर सब कहते हैं कि विरोध प्रदर्शन शांति पूर्वक (लोकतांत्रिक) तरीके से होना चाहिए, पिछले आठ महीनों से हम वही तो कर रहें हैं. 
फतेहाबाद डी सी ऑफिस के सामने किसान शांतिपूर्वक धरना दे रहे हैं. इस दौरान दो किसान (भागुराम व राम कुमार ) काल का ग्रास बन चुके है. मगर सरकार है कि सुनती ही नहीं है. जापान की त्रासदी के बाद तो परमाणु संयंत्र के खतरे से आम आदमी भी वाकिफ हो चुका है. अब आप ही बताओ की किसानो की गलती क्या है? ये लोग कब तक अपना कामकाज छोड़कर यहाँ धरने पर बैठे रहें. जनता इनका साथ नहीं दे रही और शासन-प्रशासन को कुछ सुनता नहीं. बावजूद इसके जब ये लोग भी जाट समुदाय की तर्ज पर रास्ते जाम करेंगे, रेलवे ट्रैक जाम करेंगे तो सभी इनको गलत बताएँगे.
ऐसे में इन किसानो का कहना है की इतना सब होने के बाद पुलिस मामले दर्ज करेगी और जेल में बंद कर देगी. हथियार उठाएंगे तो हमें नक्सली बताकर गोली मार दी जायेगी. हमारी जमीन, रोजी-रोटी कैसे बचे? आप ही कोई रास्ता सुझाएँ, आप फिर भी बुद्धिजीवी हैं.


कानून पर कानून - कानून पर कानून


मेरे देश में कानून बनाने का एक फैशन सा है. जब देखो, जिसे देखो कोई कानून बनाने की बात करता है तो कोई बिना सोचे-समझे कानून बना भी देता है. अब जब कानून बनाना फैशन ही है तो फैशन तो आता-जाता रहता है. शायद यहीं कारण है की कानून बनता बाद में है और उसको तोड़ने के रास्ते पहले निकाल लिए जाते है. कुछ इक्का-दुक्का कानून को छोड़ बमुश्किल ही कोई नया ऐसा कानून बना होगा जिसके प्रति न्यायालय से लेकर शासन-प्रशासन ने सख्त कदम उठाये हो. भले ही वो सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान ना करने का कानून हो या फिर कन्या भ्रूण हत्या निरोधक. भले ही वो सट्टा खाईवाली के खिलाफ कानून हो. क्योंकि सट्टा खाईवाली के खिलाफ भी कोई सख्त कानून नहीं है, जबकि कन्या भ्रूण हत्या के आरोपी आज पकडे ही कितने जाते है.
अब देखो ना हाल ही में भारत में एक ऐसा कानून बना दिया गया जिसका आम आदमी से सरोकार है. अब सोचने का विषय यह है की जो वस्तु आम आदमी से जुडी हो क्या उसके खिलाफ बने कानून को अमल में लाना आसान है. तो शायद आपका भी जवाब होगा नहीं. अब जब कानून को अमल में लाना इतना मुश्किल है तो ऐसा कानून बनाया ही क्यों गया. मै न्यायालय की नीति और नियत पर कोई सवाल खड़ा नहीं कर रहा लेकिन गुफ्तगू का विषय सिर्फ इतना है की जब आज तक सार्वजानिक स्थानों पर होने वाले धुम्रपान पर ही रोक नहीं लग सकी तो पॉलीथीन पर रोक कैसे लगेगी. वैसे न्यायालय ने सख्त निर्देश दिए है की पॉलीथीन निर्माण से लेकर बेचने व् उपयोग में लाने तक पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है.
प्रशासन की कार्यवाही
न्यायालय द्वारा पॉलीथीन पर प्रतिबन्ध लागू होने के साथ ही कानून भी अमल में आ चूका है. लेकिन सवाल यह है की आज इस कानून के प्रति शासन व् प्रशासन कितना सख्त है तो आपको जवाब मिलेगा की कुछ भी तो नहीं. इस कानून के प्रति प्रशासन की कार्यवाही मात्र इतनी ही है की जब मन में आया किसी बाजार में गए और वहां जाकर दुकानदारों को पॉलीथीन उपयोग में नहीं लाने के निर्देश दे दिए. अगर दिल किया तो कुछ दुकानों में जाकर पॉलीथीन जब्त कर लिए. इतने में अगर अन्य दुकानदारों को भनक लग गई तो वो अपने पॉलीथीन इधर-उधर कर देते है.
चाइना बाजार हुआ हावी
आज हर उत्पाद पर चीनी बाजार हावी है. भारत में प्रतिदिन और प्रति व्यक्ति उपयोग में आने वाला मुश्किल ही कोई ऐसा उत्पाद होगा जो चीन से नहीं आता हो. बीतो दिनों तो पॉलीथीन भी चीन से आने लगा था. महंगा होने की वजह से उसका उपयोग कम भले ही था लेकिन अब भारत में पॉलीथीन पर प्रतिबन्ध लगने से चीन को यह उम्मीद जरुर बंधी है की उसके यहाँ से आने वाले कपडे के बैग सस्ते होने की वजह से जिस कदर भारतीय बाजार पर छायें थे उसमे और अधिक तेजी आएँगी.
गुटके हुए महंगे
पॉली थीन पर प्रतिबन्ध के चलते तम्बाकू के शौकीन लोग अवश्य इन दिनों परेशान नजर आ रहे है. ज्ञात हो की अभी तक जितने भी गुटके आ रहे है वो सभी पॉली थीन के पाउच में आ रहे थे, लेकिन न्यायालय ने पॉली थीन पर प्रतिबन्ध लगाने के साथ सबसे पहले उन कंपनियों को निर्देश दिए थे जो अपने उत्पाद पॉली थीन में पैक कर बेचते है. ऐसे में गुटका कंपनियों ने जहाँ पॉली थीन का विकल्प खोजने के लिए अपना उत्पादन बंद कर दिया है वहीँ बाजार में गुटके के रेट आसमान छूने लगे है. इन दिनों गुटके के दामो में दोगुनी वृद्धि देखि जा रही है.
अधिकृत विक्रेता कूट रहे है चांदी
ऐसा नहीं है की तम्बाकू में यह तेजी पीछे से आई है. बल्कि गुटको के अधिकृत विक्रेताओं ने माल की कमी दिखा कर इनके रेटों में अनाप-शनाप तेजी ला दी है. हाल यह है की जो गुटका ज्यादा बिकता है वो आज दोगुने से भी ज्यादा दामो पर लोगो को खाना पड़ रहा है. जबकि जिनकी बिक्री कम है वो आज भी उसी दाम पर बिक रहा है.
भ्रष्टाचार को मिलेगा बढ़ावा
ऐसे कानूनों से भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलने के पूरे आसार होते है. ऐसा इसलिए की जब किसी अधिकारी व् कर्मचारी का दिल किया वो किसी प्रतिष्ठान पर जाकर इस कानून के तहत अपनी जेब गर्म कर सकता है. इसके लिए भी उच्च अधिकारियों को विशेष ध्यान देना होगा.


ठेका पूरे विभाग का, वेतन मात्र 6 रुपए 66 पैसे


आज महंगाई चरम सीमा पर है। सब्जी से लेकर दाल तक के रेट आसमान को छू रहे हैं। आटे का रेट भी इस समय 14 रुपए किलोग्राम हो चुका है परंतु इस सब के बाद भी सेवा के बदले में सरकार यदि किसी को मात्र 200 रुपए मासिक दे तो इसे सरकार की किस सोच का नमूना कहा जाए। एक दिन के केवल 6 रुपए 66 पैसे में इस महंगाई के जमाने में कैसे कोई अपनी सेवा दे सकता है।
यह विचार करने वाली बात है, परंतु प्रदेश में इतने ही पैसे में आशा वर्कर अपनी सेवाएं दे रही है। आशा वर्कर पर स्वास्थ्य विभाग की तमाम योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करने की जिम्मेवारी होती है। ग्रामीण स्तर पर आशा वर्कर लोगों के बीच स्वास्थ्य जागृति फैलाने में अहम भूमिका भी निभा रही है। स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य जांच करने से लेकर उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरुक  बनाने का कार्य भी आशा वर्कर करती आ रही है। इतना ही नहीं गर्भवती महिलाओं के पोषण एवं स्वास्थ्य की जांच का कार्य भी आशा वर्कर ग्राम स्तर पर बखूबी कर रही है। इतने सब करने के बाद भी उसे नसीब होता है एक अनपढ़ मजदूर से भी कई गुणा कम वेतन के रुप में एक दिन के 6 रुपए 66 पैसे। इतना मानदेय देना सरकार द्वारा नारी का अपमान नहीं है तो क्या हो सकता है। आज जब महिलाओं को आगे लाने की बातें की जाती और उन्हें हर स्तर पर 33 प्रतिशत तक का आरक्षण देने की बात कही जाती है तो ऐसे में आशा वर्करों के साथ ऐसा अन्याय किया जा रहा है।
सरकार द्वारा इस समय मनरेगा के मजदूरों को भी एक दिन में 179 रुपए दिए जाते हैं। इससे साफ हो जाता है कि सरकार आशा वर्करों के कार्य और योग्यता को लेकर कितनी गम्भीर है। सरकार द्वारा अपनाई जा रही इस नीति से क्या कोई आशा वर्कर पूरी ईमानदारी से काम कर पायेगी-ये सवाल शायद ही व्यवस्था बनाने वालो को समझ में आता हो। बहरहाल पूरे प्रदेश में जैसे-जैसे हजारों आशा वर्कर 200 रुपए महीनें में काम कर रही है-यह एक जमीनी हकीकत है।


वो बिजली-पानी का खेल


अक्सर देखने में आता है की बिजली और पानी दोनो ऐसी चीजे है जो राजनेताओ सहित राजनीति को भी अपने इर्द-गिर्द चक्कर काटने पर मजबूर रखती है. कहने का अर्थ यह है की आज देश का राजनेता बिजली और पानी की राजनीति में ही उलझ कर रह गया है या यह कहे की वो जनता को उलझाये रखता है. यही कारण है की आज देश का कोई भी प्रदेश हो बिजली और पानी जैसे मुद्दे सिर उठाये खड़े है. ऐसा नहीं है की इन मुद्दों को ख़त्म नहीं किया जा सकता लेकिन मुश्किल तो यह है की इन दोनों ही मुद्दों को राजनेता ख़त्म ही नहीं करना चाहते. कारण वही की करनी है तो सिर्फ राजनीति. फिर अगर इन्ही मुद्दों को सुलझा लिया गया तो उनके पास यह बताने के लिए कुछ मिलेगा ही नहीं की उनकी सरकार ने क्या किया और क्या करना अभी बाकी है. यही कारण है की लगभग दो दशक से सतलुज-यमुना लिंक नहर के पानी की हरियाणा का किसान अभी तक मुंह बाए बाट जोह रहा है. इतना जरुर है की किसान को पानी तो नहीं मिला लेकिन एसवाईएल को लेकर पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारे समय-समय पर अपनी राजनीति चमकाती रही है. मजेदार बात तो यह है की जब पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की सरकार थी तो हरियाणा में औमप्रकाश चौटाला की. उल्लेखनीय है की दोनों ही नेता अपने को पगड़ी बदल भाई कहते है. लेकिन ना तो बादल ने पानी देने की हां भरी तो ना चौटाला ने ही कहा की हरियाणा को उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए. उधर कांग्रेस हरियाणा में शोर मचाती रही की चौटाला एसवाईएल मुद्दे पर चुप बैठे है. इस मुद्दे को लेकर अभी दोनों ही प्रदेश की राजनीति अपने चरम पर थी की पंजाब व् हरियाणा में कांग्रेस की सरकारों ने गद्दी संभाल ली. लेकिन तब भी स्थिति जस की तस रही. आज फिर पंजाब में बादल सत्ता में है तो हरियाणा में कांग्रेस. लेकिन पानी है की मुद्दा बन कर ही रह गया है. ऐसा ही कुछ हाल बिजली का है. जहा तक मुझे याद आ रहा है की हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बंसीलाल अपने शासन के अंतिम समय में यही कह गए थे की अब हरियाणा को बिजली के लिए किसी अन्य राज्य पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा. उस समय उन्होंने पानीपत थर्मल प्लांट की नींव रखी थी. उसके बाद गर्मी बीती सर्दी का मौसम आया लेकिन कोई भी सरकार बिजली के मामले में जनता के इरादों पर खरा नहीं उतर सकी. जब भी किसी नेता से बात की गई तो उनका कहना था जनता की बिजली की जरुरत बढ़ गई है इसलिए बिजली की पूर्ति करना बहुत मुश्किल है. जब कभी राजनीति करने की जरुरत पड़ी तो फिर वही राग अलापा जाता की अब खेदड़ प्लांट शुरू होने को है अब हरियाणा में बिजली की कोई कमी नहीं होगी. लेकिन आज हिसार के खेदड़ प्लांट की इकाई भी शुरू हो चुकी है लेकिन बिजली समस्या है की ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. अब तो ऐसा लगने लगा है की भले ही जनता बिजली-पानी के लिए त्राहि-त्राहि करती रहे नेताओ को क्या फर्क पड़ता है. उन्हें तो सत्ता और सत्ता सुख से मतलब है.इसी सत्ता सुख के चलते आज बिजली और पानी नेताओं के लिए महज एक खेल बन कर रह गया है.


पूरा वर्ष हावी रहा जाट समुदाय


कहते है की हरियाणा जाटों का और जाट हरियाणा के. यहीं कारण है की हरियाणा प्रदेश के स्वरूप में आने के पश्चात से ही यहाँ जाट समुदाय का राज रहा है. आज नौकरी से लेकर कुर्सी तक हरियाणा में जाट समुदाय का अधिपत्य है. बावजूद इसके कभी आरक्षण तो कभी न्यालय के फैसले के खिलाफ जाट समुदाय पूरे वर्ष लामबंध नजर आया. खास बात यह रही की चाहे जाटों के आरक्षण की मांग रही हो या मिर्चपुर प्रकरण, दोनों ही मामलो का केंद्र बिंदु हिसार रहा. इन दोनों मामलो में ही हिसार व् यहाँ के लोगो ने वो सब कुछ देखा जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.
अगर बात मिर्चपुर काण्ड से शुरू की जाये तो 21 अप्रैल को शुरू हुआ यह मामला ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा है. मामले के शुरूआती दौर में जाट समुदाय दलितों पर हावी रहा तो कभी सरकार पर. हद तो उस समय हो गई जब इन्होने न्यायालय के फैसले को भी मानने से इनकार कर दिया. न्यायालय के फैसले के विरोध में एक और जहां जाट समुदाय के गिरफ्तार आरोपियों ने जेल में खाना छोड़ दिया वही सैकड़ो लोग गाँव में ही धरने पर बैठ गए. महापंचायत बुलाई गई और सरकार व् न्यायालय के खिलाफ उनकी मांगे नहीं मानने पर सडको पर उतर कर आर-पार की लड़ाई करने का बिगुल बजा दिया गया. साथ ही साथ सरकार को चेतावनी पर चेतावनी दिए जा रहा है. 21 अप्रैल को एक कुतिया के भौकने के बाद पुलिस प्रशासन से लेकर आम आदमी ने कभी सोचा भी नहीं था की भौकने वाली कुतिया को लात मरना इतना महंगा पड़ जायेगा की जाट समुदाय के 200 - 250 लोग गाँव की बाल्मीकि बस्ती को आग लगा देंगे. मामले ने यहीं से तूल पकड़ा और इस आग में एक परिवार का मुखिया ताराचंद और उसकी एक अपाहिज बेटी सुमन जिन्दा जल गए. जबकि अग्निकांड का सारा खेल नारनौंद थाना प्रभारी विनोद काजल की आँखों के आगे होता रहा और वो चुप चाप तमाशा देखते रहे. घटना के पश्चात हरकत में आई पुलिस ने तुरत-फुरत में नारनौंद थाना प्रभारी विनोद काजल व् पांच नाबालिग सहित 103 लोगो को गिरफ्तार किया.
अदालत के फैसले के बाद पांचो नाबालिगो को बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया, जबकि उप तहसीलदार जागी राम सहित 10 अन्य लोग निर्दोष साबित हुए. मामले की सुनवाई हिसार के सत्र न्यायालय में चल रही थी और सभी आरोपी भी हिसार जेल में बंद है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च नायालय ने सुनवाई के लिए दिल्ली की रोहणी अदालत में मामला स्थान्तरित करने के आदेश दिए. सर्वोच्च न्यायालय का यहीं आदेश आने से जाट समुदाय भड़क गया और जेल में बंद सभी आरोपियों ने खाना छोड़ने का ऐलान कर दिया. सुनवाई के दौरान दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने फैसला दिया की सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश किया जाये.उधर मिर्चपुर में आयोजित महापंचायत ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है की अगर मामले की सुनवाई हिसार में, मामले की जांच रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी से व् जिन आरोपियों के पक्ष में दलित समुदाय ने शपथ पत्र दिए है उन्हें बाहर नहीं निकाला तो जाट समुदाय सडको पर उतर कर संघर्ष करेगा. महापंचायत ने सरकार पर आरोप लगाया की जान बुझ कर इस मामले को लम्बा खिंच रही है. अखिल भारतीय जाट संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यशपाल मालिक ने महापंचायत को संबोधित करते हुए कहा की प्रदेश के कुछ नेता इस मामले को लेकर अपनी राजनीति चमकाने में जुटे है लेकिन खाप पंचायते ऐसा नहीं करने देगी. साथ ही फैसला लिया गया की ग्रामीणों का धरना जारी रहेगा.
आखिरकार 14  जनवरी को भारी सुरक्षा के बीच सभी 98 आरोपियों को हिसार जेल से दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ले जाया गया. सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील ने प्रार्थना कि की आरोपियों को हरियाणा कि जेल में ही रखा जाये, तो न्यायालय ने यह कह कर ठुकरा दिया की अदालत अतिशीघ्र इस मामले की सुनवाई करेगी. अदालत ने 21 जनवरी को सभी आरोपियों के विरुद्ध आरोप तय करने की घोषणा भी की. अदालत ने कहा है की यदि कोई निर्दोष पाया जाता है तो उसे जल्द ही रिहा कर दिया जायेगा. उल्लेखनीय है की 12 जनवरी को मिर्चपुर में हुई सर्वखाप पंचायत में निर्णय लिया गया था की अगर आरोपियों को दिल्ली जेल में रखा गया तो रेलवे व् सड़क यातायात जाम कर दिया जायेगा.
इसके अतिरिक्त जाट आरक्षण मामले में भी जाट समुदाय प्रदेश में हावी रहा. उसकी विस्तृत गुफ्तगू मुख्य पृष्ठ पर  जाट आरक्षण की आग में दी गई है.


जवान सिरफिरे और नेता...


कई दिनों से सोच रहा था की जिस 26/11 को भूल नेता सिर्फ अपनी जेबे भरने में लगे है मै भी उस पर कुछ लिखूं. लेकिन क्या लिखूं और क्यों लिखूं. क्या सिर्फ इसलिए की मै एक भारतीय हूँ या इसलिए की एक पत्रकार का कर्तव्य है की वो सच्चाई को लिख अपना धर्म निभाए.
बात सच्चाई की आती है तो डर भी लगने लगता है. डर इसलिए की सच्चाई बड़ी कडवी होती है. अब कडवा लिखूंगा तो दर्द भी होगा. तो सच्चाई यह है की आज 26/11 का दर्द किस के जहन में है. शायद उनके जिनके चिराग 26/11 के हमले में शहीद हो गए. जबकि आज आम जनता और नेताओ को तो याद भी न आये की 26/11 को देश में क्या हुआ था.
इसका मुख्य कारण यह है की आज नेता हो या राजनेता या भले ही हम हो. सब अपने काम में व्यस्त है. अब देश की इफाजत करने वाले जवान तो सिरफिरे होते है. उनका एक ही मकसद होता है की उनके देश की तरफ कोई बुरी नजर ना देखे. अगर कोई गलती से देख भी ले तो उनमे मादा होता है की वो या तो मर जायेंगे या मार देंगे.
ऐसे में अगर कुछ जवान शहीद भी होते है तो किसी को क्या फर्क पड़ता है. यही कारण रहा की समय निकलता गया और नेता या हम अपने रोजमर्रा के काम के लीन होते गए. लेकिन क्या कभी यह सोचा की इस दौरान क्या बदला. क्या कोई नीति बनी या कोई कार्यवाही ही हुई हो. तो जवाब मिलेगा की कुछ नहीं. तो ऐसी जिंदगी से क्या फायेदा.
तो क्या हम यह मान ले की हम सिर्फ अपने लिए जीते है और सीमा पर खड़ा जवान हम सभी के लिए. जबकि उसी जवान की खैर-खबर रखने वाले नेताओ को तो आज-कल घोटालो से ही फुर्सत नहीं है. कहने का भाव यह है की मुंबई पर हुए हमले के बाद से देश में कितने ही घोटाले हुए. कितने नेता इन घोटालो में संलिप्त है. क्या उनमे से कुछ को भी इस बात का मलाल है की देश रक्षा करते हुए शहीद हुए जवानो को दो मिनट के लिए तो श्रधांजलि दी जाये. नहीं ऐसा नहीं है. अगर ऐसा होता तो आज किसी की क्या हिम्मत की वो मेरे देश की तरफ आँख उठा कर भी देख ले. क्योंकि आज यही नहीं पता की :-
सरकार में घोटाले या घोटालो में सरकार


पहले दिल्ली सजा फिर दिल और अब....


अभी कल (शनिवार) की ही तो बात है. हम दो लोगो में गुफ्तगू चल रही थी की महात्मा गाँधी अहिंसावादी थे. वो कहते थे की अगर कोई आपके एक गाल पर एक तमाचा जड़ दें तो दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए. एक बालक के साथ ऐसा हो भी गया. किसी ने उसको एक तमाचा जड़ दिया तो उसने दूसरा गाल भी आगे कर दिया. सामने वाले ने दूसरे गाल पर भी तमाचा जड़ दिया. बालक सोचने लगा की अब क्या करें. वो भाग कर दीवार के पीछे गया और अपने पिता की बन्दुक निकाल कर लाया और तमाचा जड़ने वाले पर तान दी. यह देख वो सकपकाया और बोला की अभी तो तुम बोल रहे थे की तुम अहिंसावादी हो तो उसने तपाक से जवाब दिया की मैंने महात्मा गाँधी जी की पार्टी बदल ली है और अब मै सुभाष चन्द्र बोश की पार्टी का सदस्य हूँ. लेकिन पता नहीं क्यों आज भी मेरा देश अपनी पुरानी नीतियों पर ही चल रहा है. ना वो पार्टी बदल रहा है और ना ही कुछ कर रहा है. यहाँ यह गुफ्तगू इसलिए जरुरी थी की अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्र्पाती बराक ओबामा भारत यात्रा पर आये थे. भारत के लिए वो जैसे आये थे वैसे ही वापिस भी चल दिए, और भारत के हाथ कुछ नहीं लगा.
अमेरिका के राष्ट्रपति की यह कोई पहली भारत यात्रा नहीं थी. इससे पहले भी भारत को अमेरिका और पकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपतियों द्वारा तमाचे पड़ चुके है. लेकिन मेरे देश के नेता है की दोनों गाल पर खाने के पश्चात भी पार्टी नहीं बदल रहे है. अब देखो ना कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए पहले दिल्ली को सजाया गया. माना की यह देश की आन-बान-शान का सवाल था. भले ही नेताओ ने खेलो के आयोजन में जम कर चांदी कुटी हो लेकिन जैसे-तैसे कर कॉमनवेल्थ गेम्स का समापन कर दिया गया. दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाया गया. हर उस चीज को नया रूप दिया गया जिससे आज तक दिल्ली का आम आदमी महरूम था. दिल्ली की साज-सज्जा, आवभगत और खेलो के आयोजन से खुश हो कर विदेशी मेहमान हमसे रुखसत हो गए. लेकिन एक दर्द आज भी राजधानी वाशियों के दिल में है की अरबो रूपए खर्च कर जैसा दिल्ली को मेहमानों के लिए बनाया गया था क्या वैसा उनके लिए बना नहीं रह सकता. लेकिन यहाँ सब अपने और मेहमानों के लिए किया जाता है जनता की भलाई की किस को पड़ी है. दिल्ली के बाद बारी थी दिल सजने की.
अभी नेताओ ने कॉमनवेल्थ गेम्स समाप्त होने पर राहत की सांस ही ली थी की अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा का समय नजदीक आने लगा. इससे पहले भी बिल क्लिंटन और जार्ज बुश भारत यात्रा पर आ चुके है. जैसे ही यह समाचार देश के नेताओ को मिला वो भ्रष्टाचार और घोटालो से ऊपर उठ कर अपने दिल को सजाने में जुट गए. देश की संस्कृति के अनुरूप भारत में मेहमानों को भगवान् का दर्जा दिया जाता है कुछ उसी पद्धति पर चलते हुए पूर्व राष्ट्रपतियों की तरह बराक ओबामा का भी भव्य स्वागत किया गया. बराक ओबामा दो पार्टियों के सदस्य की भांति भारत में आये लेकिन भारतीय नेता सिर्फ उनके आगे-पीछे ही रहे. प्रधानमन्त्री, सोनिया गाँधी से लेकर विपक्ष तक सिर्फ उनकी बाते सुनने में मशगूल रहा वही ओबामा समय-समय पर अपनी रणनीति दिखाते रहे. एक बारगी ऐसा लगा जैसे वो एक व्यापारी की भांति भारत में आये और अपना काम साध कर वापिस हो लिए. कुल मिला कर भारतीय नेताओ ने भले ही अपने दिल को कितना ही सजाया हो लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा. पाकिस्तान पर जो थोडा बहुत वो बोले थे वापिस जाकर उस पर भी सफाई आ गई.
अब बारी फिर एक विदेशी मेहमान के भारत आने की थी. मिडिया से लेकर आम जनता फिर पलके बिछाए खड़ी हो गई. आखिर कार उनके हाथ क्या लगा. मिडिया वालो ने अपने कैमरे तुडवाये सो तुडवाये जनता ने पुलिस के डंडे खाए वो अलग से. शायद अब तक आप समझ गए होंगे की यहाँ किसकी बात हो रही है. जी हां आप सही समझ रहे है. पामेला एंडरसन की. लाखो रुपया देकर तो उनको भारत बुलाया गया उस पर भी देशवाशियो को उनकी एक झलक तक नहीं मिली. अब तो ऐसा लगने लगा है की हम सिर्फ सजने के लिए ही रह गए है. लेकिन यहाँ फिर एक बात याद आती है की सजती तो दुल्हन भी लेकिन उसकी जिंदगी में वो समय जरुर आता है जब उसका सजना साकार हो जाता है. तो क्या कभी हमारा सजना साकार होगा या फिर हम हमेशा ऐसे ही किन्नरों की तरह सजते रहेंगे.


फिर हमारे साथ ही अन्नाय क्यों


दो-तीन दिन पूर्व संसद में एक नजारा देखा. मैंने क्या सभी ने देखा. जो नहीं देख पाए उन्होंने पढ़ा और सूना. शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जिसने आम आदमी की बात संसद तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उठाने वाले इन नेताओ की यह नजारा देख तारीफ की होगी. वैसे तो नेताओ को वाह-वाही बहुत कम ही मिलती है लेकिन जो थोड़ी बहुत वाह-वाही करने वाले थे भी वो आज अपने को शर्मसार महसूस कर रहे होंगे. तो मुद्दा था सांसदों की वेतन वृद्धि का. बहुत लम्बे समय से उनकी यह मांग चलती आ रही थी लेकिन अब यह पास हो चुका है की सांसदों का वेतन 16 हजार से 50 हजार कर दिया जाये. बहुत ख़ुशी की बात थी की जो आदमी अपना घर छोड़ कर जनता के हक़ की बात रखने संसद तक जाता है उसको उसका हक़ मिलना भी चाहिए. लेकिन यह क्या अभी यह विधेयक रखा ही गया था की कुछ विपक्षी सांसदों ने 50 हजार को थोडा बताते हुए संसद में हो-हल्ला शुरू कर दिया.
यह वो समय था जब किसी को किसी की परवाह नहीं थी. सब शोर मचने और चिल्लाने में मशगुल थे. सब को अपनी-अपनी पड़ी थी. शोर मचने वाले सभी नेता जो चुनावो के समय आम आदमी का हक़ दिलाने की बात करते देखे जाते थे वो अब उन्ही के खून-पसीने की कमाई से अपनी जेबे भरने के प्रयास में जुटे हुए थे. कोई 50 हजार को कम बता रहा था तो कोई 80 हजार की मांग कर रहा था. मजेदार घटनाक्रम तो उस समय हुआ जब सरकार की दलील से नाराज कुछ सांसदों ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना प्रधानमन्त्री चुन लिया, तथा जल्द ही अपना मंत्रिमंडल बनाने की बात का स्वांग तक रच डाला. आखिरकार भाजपा व् अन्य सांसदों के बीच में आने के पश्चात् अब यह मुद्दा सुलझता नजर आ रहा है. उधर सरकार का भी कहना है की वह वेतन को 80 हजार किये जाने पर विचार करेगी. वेतन भले ही कुछ भी हो जाये लेकिन इतना जरुर है की आम जनता को इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
अब देखो ना उसी दिन सुबह के समाचार पत्र इस बात से अटे पड़े थे की न्यायलय के आदेश के बावजूद कृषि मंत्री शरद यादव ने सड़ रहा अनाज यह कहते हुए गरीबो में बांटने से इनकार कर दिया की भले ही अनाज सड़ जाए लेकिन यह बांटा नहीं जा सकता. इस बात से कुछ दिन पूर्व ही केंद्रीय रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने अपनी रैली में माओवादियों का समर्थन किया था. उधर दोबारा सत्ता में आने से पहले केंद्र सरकार ने विदेशो में जमा भारतीय नेताओ का काला धन वापिस लाने के बड़े-बड़े दावे किये थे. रही कामनवेल्थ गेम्स की बात तो उसमे हुआ घोटाला किसी से छुपा नहीं है. जबकि महंगाई ने देश में किस कदर तांडव रचा है यश भी सभी सांसदों को पता है. मुद्दा यह नहीं की यह सब बाते आपको या किसी को पता नहीं होगी. पहलू यह है की इतना सब कुछ होने के बाद भी वेतन बढाने की मांग कर रहे सांसदों की कान पर इन मुद्दों के लिए आज तक जूं क्यों नहीं रेंगी. क्या यह मुद्दे सिर्फ चर्चा के लिए थे.
तो जवाब होगा नहीं, ऐसा नहीं है. फर्क है तो मात्र इतना की यह मुद्दे आम जनता से जुड़े थे और वेतन सांसदों का बढना था. इसलिए किसी भी सांसद ने शरद पवार से यह नहीं पूछा की वो न्यायलय के आदेश के पश्चात् भी क्यों अनाज बांटने से माना कर रहे है. या ममता बेनर्जी का माओवादियों से क्या रिश्ता है. और तो और महंगाई मुद्दे पर राजनीति करते हुए विपक्षी पार्टियों ने भारत बंद तो किया लेकिन सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थो में की गई वृद्धि को वापिस लेने से माना करने के बावजूद क्यों संसद ठप्प नहीं की. जबकि कामनवेल्थ गेम्स के लिए हुए घोटाले में संसद में सिर्फ चर्चा ही की गई. जबकि आज जनता से लेकर नेता तक स्विस बैंक में जमा भारतीयों का काला धन वापिस लाने की बात भूल चुके है. क्या यह सरकार की वादाखिलाफी नहीं है. तो क्यों नहीं इन मुद्दों पर कभी संसद में हंगामा किया जाता. अगर यह संसद जनता से जुड़े मुद्दे संसद में नहीं उठा सकते तो इन्हें कोई हक़ नहीं है की यह वेतन वृद्धि की बात करे.


आजाद भारत की आजाद तरक्की


मेरी गुफ्तगू के सभी साथियो व् पाठको सहित पूरे देशवाशियों को स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाये. आओ आज के दिन हम सब मिल कर यह दुआ करे की हमारा देश दिन दोगुनी और रात चोगुनी तरक्की करे. अक्सर देखा और सूना जाता है की जब भी भारत और पकिस्तान की बात होती है तो अमेरिका या उसका कोई भी राष्ट्रपति दोहरी भूमिका अदा करता है लेकिन फिर भी मेरी भगवान् से प्रार्थना है की वो अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा की बात सच करे और मेरा भारत सदैव दुनिया भर के लिए उम्मीद की किरण बना रहे. 
लेकिन इन दिनों तरक्की के नाम पर जो कुछ देश में हो रहा है उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. अगर तरक्की इसी को कहते है तो मेरा देश ऐसा ही ठीक है. क्योंकि हर किसी को उम्मीद तो रहेगी की हम तरक्की करेंगे. लगता है अब कुछ तो मुझे कोसने लगे होंगे और कुछ के मेरी बात शायद समझ में नहीं आई होगी. जी हां मै उसी तरक्की की बात कर रहा हूँ जो कभी तो हमको अच्छी लगने लगती है और कभी अभिशाप. वही तरक्की जिसको हम प्रतिदिन देखते और मौजूदा जिंदगी में एहसास करते है. लेकिन फिर भी हम उसे अनसुना और अनदेखा कर देते है.
आज स्वतंत्रता दिवस है. सुबह से मोबाइल पर संदेशो का आवागमन शुरू हो गया था. कुछ में सिर्फ बधाई थी तो कुछ हट कर सन्देश दे रहे थे. उनमे से एक सन्देश ऐसा था की आप लोगो से गुफ्तगू करने का मन किया. इस सन्देश में वो सब कुछ था जिसका हम जिंदगी में निर्वहन करते है. लेकिन कभी उसका दूसरा पहलू नहीं समझ पाए. अब देखो ना आजाद भारत में आज हर कोई होम डिलीवरी देने की बात करता है. लेकिन फिर भी आम जनता किसी भी सरकारी काम की होम डिलीवरी से मरहूम है. बात हो रही थी देश की आजादी और तरक्की की. 
तो आज मेरे देश में पिजा व् बर्गर सहित अनेको सामान बेचने वाली गैर सरकारी कंपनिया एम्बुलेंस और पुलिस के मुकाबले जल्दी सर्विस दे रही है. जबकि देश का आजाद सरकारी तंत्र आज भी पुरानी लकीर पीट रहा है. 
आज मेरे देश में कार लेने वाले को 8 प्रतिशत पर लोन मिल रहा है जबकि साक्षरता की दुहाई दे रही सरकार आज भी शिक्षा के नाम पर 12 प्रतिशत पर लोन दे रही है. 
यह मेरे देश के लिए बड़े शर्म की बात है की देश का सारा मिडिया शोएब और सानिया मिर्जा की शादी की कवरेज करने में जुटा था और उधर 76 पुलिस कर्मी एक गरीब को मार रहे थे. तथा बाद में उसकी मौत हो गई. 
आज देश में अनाज के नाम पर एक गरीब को एक दाना तक नसीब नहीं हो रहा और कहीं किसी के नेता के गोदाम में तो कही सरकार की अनदेखी के कारण हजारो टन अनाज खराब हो रहा है. 
ऐसा मेरे देश में ही होता है की जहा दाल, चावल व् चीनी के भाव आसमान छु रहे है और मोबाइल कंपनिया सिम कार्ड फ्री में लुटा रही है. और उस समय हम इसको देश की तरक्की मान रहे होते है.
क्रिकेट तो आज पूरी दुनिया में खेला और देखा जाता है लेकिन ऐसा सिर्फ आजाद भारत में होता है की एक अरबपति कोई दान-धर्म ना करके अपना करोडो रुपया एक क्रिकेट टीम खरीदने में लगा देता है. 
देश को स्वतंत्रता दिलाने वाले ना जाने कितने ही वीर पूर्व सेनानियों का अनुसरण करते हुए देश को आजादी दिला गए लेकिन आज यहाँ हर कोई प्रसिद्धी तो पाना चाहता है लेकिन कोई प्रसिद्ध व्यक्तित्व का अनुसरण नहीं करना चाहता. 
मेरे देश में सुबह उठने के साथ ही अनेक मुद्दों पर विचार-विमर्श शुरू हो जाता है. कभी नेताओ पर तो कभी उनकी गन्दी राजनीति पर. यहाँ तक की अपराध और देश की तरककी पर भी बात कर ली जाती है. ऐसी ही एक सुबह बात हो रही थी बालश्रम पर. कुछ लोग सुबह की सैर के समय बात कर रहे थे की बालश्रम कराने वालो को तो फांसी पर लटका देना चाहिए. कुछ समय ऐसे ही बात करते-करते निकल गया. तभी उनमे से एक ने आवाज लगाईं, छोटू चार चाय ला.

अब तो ऐसा लगने लगा की वो समय आ गया है जब हम सबको अपने दिल पर हाथ रख कर अपनी अंतरात्मा से यह पूछना पड़ेगा की अब तू बता की क्या हम वाकई आजाद भारत में जी रहे है या हम कोई अविश्वसनीय सपना देख रहे है.


अब एक और स्वतंत्रता दिवस


कुछ दिनों से सोच रहा था की देश की आजादी पर कुछ लिखूं. लेकिन क्या! वह जो हम रोज देख-पढ़ रहे है या ऐसा कुछ जिसको पढ़ कर कुछ सोचा जाये. ऐसा ही कुछ मैंने अपनी इन पोस्टो में लिखा भी था.
शर्म आनी चाहिए नेता जी को
इन सबके बाद बहुत सोचने के पश्चात इस पोस्ट में इतना कुछ लिख पाया की हम यह सोच सके की आज हम आजाद है या वो नेता व् अधिकारी जो आज देश व् हमको चला रहे है. तत्पश्चात आज मुझे एक मेल मिली. पढ़ी व् पढ़ कर लगा की हरियाणा के रतिया निवासी चन्द्र शेखर मेहता द्वारा भेजी गई यह मेल आजादी के मायने पेश करने के लिए कुछ ख़ास है. इसलिए यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.
15 अगस्त 1947 का दिन! देश के इतिहास का एक नया अध्याय हमारी स्वतंत्रता। अंग्रेजों ने आज के दिन अपने चंगुल से हमारे देश को आजाद कर दिया। परंतु क्या वाकई उन्होंने हमें आजादी दी और क्या वाकई हम आजाद हैं? यह विचार करने का विषय है। केवल  उनके द्वारा हमारे देश को छोड़कर चले जाने को हम आजादी का नाम दे सकते है। पिछले 63 सालों से हम बड़ी धूमधाम से हर साल 15 अगस्त को जश्न-ए-आजादी मनाते हैं परंतु आखिर हमारी यह आजादी है क्या? आखिर इन 63 वर्षों में हमने ऐसा क्या पाया है, जो हम गर्व से कह सकते है की हाँ, हम आजाद हैं! देश पर राज करने वाले अंग्रेजों की जगह अब हमारे ही साथी नेताओं ने ले ली है। जो लगातार इतने वर्षों से भ्रष्टाचार की जड़े मजबूत करने में लगे हैं। इतनी मेहनत व इतने प्रयास करने के पश्चात् राजनीति के शिखर पर पहुंचने वाले व्यक्ति का एक ही लक्ष्य होता है खुद का विकास व अपनी आने वाली सभी पीढिय़ों के लिए उम्र भर का जुगाड़।
    देश की अधिकतर आबादी का एक हिस्सा है आम आदमी। क्या उसे पूरी आजादी से जीने का अधिकार है? मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाले एक अत्यंत गरीब व्यक्ति को यह भी सुनिश्चित नहीं है की आज उसे रोजगार मिलेगा या नहीं? पढ़े-लिखे युवा रोजगार प्राप्त कर्णवे के प्रयास में ही अपनी आयु बिता रहे हैं। अच्छा रोजगार प्राप्त करने की चाह में डिग्रियों पर डिग्रियां प्राप्त कर लेने पर न तो उन्हें योग्यतानुसार कार्य मिल रहा है और न ही वे अब अन्य छोटा-मोटा कार्य कर सकते हैं। बाल मजदूरी का दंश झेल रहे देश के करोडो बच्चे अपने भी दिन फिरने का लगातार इंतजार कर रहे हैं। आखिर उन्हें कब इन सबसे आजादी मिलेगी। लाखों बहुएं आज भी हमारे देश में दहेज नाम कुप्रथा की बलि चढ़ रही हैं। क्या उन्हें जीने की आजादी मिल पाई है।
एक आम नागरिक को अपना कोई सरकारी कार्य आदि करवाने के लिए न चाहते हुए भी 50 रुपए की सरकारी फीस की जगह 500 रुपए की रिश्वत देनी पड़ती है क्योंकी उसे पता है की अगर वह ऐसा नहीं करता तो इतने ही पैसे उसके कार्यालयों के चक्कर काटने में व्यर्थ हो जाएंगे और यह एक ऐसा सच है, जिसे आप, मैं, अधिकारी और बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ सब जानते हैं परंतु यह शब्द 'देश में भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता कह कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।
देश के प्रत्येक नागरिक को मत देने का अधिकार है और प्रत्येक व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है परंतु जब एक योग्य व्यक्ति चुनाव लड़कर कुछ प्रयास करना चाहता है तो आरक्षण नाम की बीमारी बीच में आ जाती है। जब एक योग्य व्यक्ति आरक्षण की वजह से अपने इलाके का चुनाव नहीं लड़ सकता तो उसके लिए आजादी कैसी? एक मतदाता अपने पसंद का उम्मीदवार नहीं खड़ा कर सकता तो उसके लिए आजादी के क्या मायने? समाचार का पहलू यह है की क्या कोई योग्य राजनीतिज्ञ या अधिकारी अपने प्रयासों से इन समस्याओं को मिटाना चाहते हैं तो उन्हें अपनी इच्छानुसार कार्य करने की आजादी नहीं है। उन्हें भी अपनी सीमाओं में रह कर कार्य करना पड़ता है।
यह सब लिखने के पीछे मकसद यह नहीं है की हमें अपनी आजादी का जश्न नहीं मनाना चाहिए। हमें यह दिन अवश्य मनाना चाहिए परंतु कुछ ऐसा करके, जिससे किसी जरूरतमंद की जरूरत पूरी हो, देश में फैली कुप्रथाओं व भ्रष्टाचार आदि पर लगाम लगाने के लिए प्रयास हो।
तो कैसा हो हमारा अगला स्वतंत्रता दिवस, इसके लिए आपके सुझावों और कोमेंट का इंतजार रहेगा.


बाढ़, सरकार और नेता


हरियाणा में जिसके पानी को राजनितिक दलों ने आज तक अपनी राजनितिक चमकाने के लिए सिर्फ मुद्दा बनाये रखा, उसी नहर के पानी ने आज फिर से राजनितिक दलों को मुद्दा दे दिया है. मुद्दा यह नहीं की उस नहर के पानी को हरियाणा का किसान कैसे उपयोग करेगा या कब से करेगा बल्कि मुद्दा यह है की उस नहर के पानी से हुई तबाही के लिए प्रदेश सरकार किसानो को 15 हजार करोड़ से अधिक का मुआवजा दे. जी हां हम यहाँ बात कर रहे है हर चुनाव में अपना रंग दिखाने वाली एसवाईएल नहर का. यह नहर हरियाणा के प्रत्येक चुनावों में मुद्दे का काम करती है. लेकिन पिछले एक सप्ताह से बाढ़ की स्थिति झेल रहे अम्बाला, कुरुक्षेत्र, कैथल और फतेहाबाद जैसे जिलो सहित देश-प्रदेश के अनेको नेताओ को बाढ़ और उससे हुए नुक्सान पर वाकयुद्ध करने के लिए इस नहर ने एक और मुद्दा दे दिया है.
मुद्दे के बावजूद 
वैसे तो पानी और बिजली ऐसे दो मुख्य मुद्दे है जिनका हरियाणा के साथ चोली-दामन का साथ है. पंचायत चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावो तक में इन दोनों ही मुद्दों की गूंज सुनी जा सकती है. बावजूद इसके आज तक ना तो हरियाणा के किसानो को एसवाईएल का पानी मिला और ना ही प्रदेश का किसान हांसी-बुटाना लिंक नहर के पानी का सही से इस्तेमाल कर पाया. दोनों ही नहरों के पानी को लेकर अपनी राजनीति चमकाने वाले हर नेता और दल के लिए मुख्य मुद्दा होने के बावजूद आज चार जिलो सहित प्रदेश की जनता पानी की पीड़ा पर भारी पड़ रही राजनीति को सहने को मजबूर है.
तबाही ही तबाही
आज तक के समाचारों को पढ़-सुन कर तो यही लगता है जहा भी बाढ़ का पानी पहुंचा है वह हर तरफ तबाही ही तबाही नजर आ रही है. खेतो में खड़ी फसले जहा नष्ट हो चुकी है वही कई लोग अब तक काल का ग्रास बन चुके है. इतना जरुर है की अनाज पर राजनीति करने वाले नेताओ की जुबान पर भी ताले लग चुके है. क्योंकि अब तक हजारो टन अनाज पानी लगने से खराब हो चुका है. उधर हजारो लोगो के बेघर होने का भी समाचार है. अभी पहले वाला पानी निकला नहीं और हर घंटे जहा वह अपना कहर बरपा रहा है वही मौसम विभाग ने चेतावनी दी है की एक-दो दिन में मानसून फिर से दिक्कत कर सकता है.
ऐसा तो सभी कर रहे है 
चुनाव हुए, नेता चुने गए और सरकार बन गई. नेताओ ने पांच साल तक क्या किया किसी को पता नहीं चलता. सरकार ने कितने विकास किये जनता पांच साल के उपरान्त भूल जाती है. लेकिन प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज काम कर रही है यह तो तभी पता चलता है जब ऐसी कोई त्रासदी से जनता को दो-चार होना पड़ता है. आज प्रदेश में जो कुछ हो रहा है उससे देख तो नहीं लगता की अभी तक प्रदेश में सरकार है. बाढ़ को आये एक सप्ताह होने को आया और अब तक विभिन्न पार्टियों के नेता जिनमे हजंका सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई शामिल है बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का हवाई सर्वेक्षण कर चुके है. उधर इनलो, भाजपा और हजंका सहित अनेक राजनितिक दलों के नेता मौके पर जाकर जनता का दुःख बाँट चुके है. 
ऐसा कुछ हो की लगे की सरकार है
अभी तक जो सभी ने किया है प्रदेश सरकार के मुखिया ने भी कुछ-कुछ वैसा ही किया है. भले ही उस काम की शुरुआत उन्होंने पहले की हो लेकिन हुड्डा जी ऐसा कुछ ख़ास अभी तक नहीं कर पाए की लगे की यह काम सरकार की तरफ से किया गया है. प्रदेश में कोई सरकार काम कर रही है या करती है इसका एहसास जनता को तभी होता है जब सरकार जनता की आशाओं पर खरा उतारे. लेकिन बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का हवाई दौरा करने और जनता का दर्द सुनने के अलावा मुख्यमंत्री हुड्डा व् केंद्र सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया की लगे की सरकारे काम कर रही है. अगर कुछ किया तो सिर्फ इतना की प्रदेश सरकार केंद्र से मदद के रूप में करोडो रूपए की मांग है.


नेता तो व्यापरी- हो गए सरकारी


हरियाणा में कोई भी सरकार आने से पहले सरकारी आकाओ को यह अंदेशा होता था की प्रदेश में एक व्यापारी नेता है जो व्यापारियों के लिए हाथो हाथ सड़क पर उतर जाता है. व्यापारियों के साथ कोई अनहोनी हुई नहीं की वो जिला प्रशासन मुर्दाबाद, हरियाणा सरकार हाय-हाय के नारे लगाते अक्सर दिखा करते. जब बात व्यापारी के जान-माल तक पहुँच जाती तो वो नगर बंद करवाने से भी नहीं चुकते थे. और अगर गलती से सरकार से कोई गलती हो जाती तो मान लो प्रदेश बंद. उनके लिए तो यहाँ तक कहा जाने लगा था की स्वयं के पास कोई व्यापार नहीं है इसलिए बजरंग दास गर्ग हर रोज सरकार के खिलाफ किसी ना किसी बात को लेकर आन्दोलन छेड़े रखते है. अब तो आप समझ ही गए होंगे की यहाँ बात हो रही है हरियाणा प्रदेश व्यापार मंडल के प्रदेशाध्यक्ष व् कान्फेड के चेयरमैन बजरंग दास गर्ग की. जीं हां वही बजरंग दास गर्ग जो कभी व्यापारियों के हितो के लिए जीं-जान लगा देने की बात करते थे. भले ही सरकार व्यापारियों के हितो के लिए कुछ करे या उनके खिलाफ लेकिन उनकी आवाज हमेशा सरकार के विपरीत ही रहती थी. लेकिन आजकल आवाज तो आवाज स्वयं बजरंग दास गर्ग व्यापारी नेता होते हुए सरकारी लगने लगे है. आज उन्हें सरकार के हर फैसले व्यापारी हित में दिखने लगे है तो दिन-प्रतिदिन प्रदेश में बिगड़ रही कानून व्यवस्था के लिए विपक्ष दोषी नजर आने लगा है.
भले ही प्रदेश सरकार कर में बढ़ोतरी करे या उनके गृह क्षेत्र हिसार सहित आसपास के क्षेत्रो में अपराधियों ने आतंक फैला रखा हो आज उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. प्रदेश सरकार द्वारा वैट चार प्रतिशत से बढ़ा कर पांच प्रतिशत और उस पर भी अधिशुल्क लगाना आज व्यापारी नेता को जनहित में दिखाई देता है तो हिसार जिले के हांसी में बढ़ रहे अपराध पर उनकी चुप्पी सरकारी नजर आती है.


वो रही कुर्सी झप लो


27 अप्रैल को विभिन्न राजनितिक दलों ने भारत बंद का एलान किया है. मुद्दा है महंगाई, बिजली, पानी और बिगडती कानून व्यबस्था. अगर आप व्यापारी है या आम नागरिक तो क्या आप को लगता है की इस बंद से यह सभी समस्याए ख़त्म हो जाएगी. चलो माना की ख़त्म नहीं हो सकती तो क्या केंद्र सरकार सहित सभी राज्यों में राज कर रही विभिन्न राजनितिक पार्टियों की सरकारों की नींद इस बंद से खुल जाएगी. तो मेरा मानना है की ऐसा कुछ नहीं होगा. क्योंकि इनमे से कुछ सरकारे ऐसी है जो कभी बंद करने वाले राजनितिक दलों के शासन के समय स्वयं बंद किया करती. जब उस समय वो इनकी नींद नहीं खोल पाई तो अब ऐसा क्या हो गया है की ये सरकारे जनता की भलाई की बात सोचेगी.
कोई नहीं सोचता जनता की भलाई के बारे में. अगर सोचता तो आज जनता ना इन मुद्दों को लेकर परेशान होती और ना ही इस बंद की नौबत आती. तो क्या हम यह मान ले की ये राजनितिक दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए बंद कर रहे है. या सब को कुर्सी दिख रही है. यहाँ आप को यह बता दे की इस बंद का समर्थन वो ही दल कर रहे है जिनको इन लोकसभा व् विधानसभा चुनावो में जनता ने घास नहीं डाली. इनमे से इनलो, सीपीएम, सीपीआई, समाजवादी पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी व् जनता दल यूनाईटीड मुख्य है. क्या यह कह ले की तीसरा मोर्चा इस बंद को समर्थन कर रहा है. इस बंद को लेकर इन राजनितिक दलों का क्या मकसद है यह समझना बहुत मुश्किल है.
लेकिन इतना समझ में आता है की इस बंद को सफल बनाने के लिए जिस तरह इन पार्टियों ने जोर लगा रखा है उससे यह साफ़ होता है की सभी अपनी-अपनी मजबूती दर्शा रहे है. मृतप्राय ये राजनितिक दल जहाँ अपने कार्यकर्ताओ में इस बंद के माध्यम से नया रक्त संचार करने की कोशिश करेंगे वही सफल बंद के पश्चात जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जायेगा की उन्होंने जनता की भलाई के लिए बंद किया जिसमे जनता ने उनका भरपूर साथ दिया. हो सकता है की 28 तारीख के समाचार पत्रों में जनता के नाम लम्बे-लम्बे बधाई सन्देश भी छपे हो. तो क्या यह मान लिया जाये की इस बंद को जनता की जरुरत समझ कर किया गया था या जनता के कहने पर.
हम सभी भली-भांति जानते है की ऐसा कुछ नहीं है. फिर जनता के साथ यह ढकोसला क्यों. क्या यह राजनितिक दल हमको बहकाने की कोशश कर रहे है या हम इनके बहकावे में आ रहे है. इनलो को लगता है इस बंद से हरियाणा की कुर्सी उसको मिल जाएगी तो सीपीआई और सीपीएम को लगता है की केंद्र सरकार दोबारा उससे समर्थन मांगेगी. जबकि लोकजनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी पुनः वजूद में आने के लिए जद्दोजहद कर रही है. जबकि सभी जानते है की ना तो पांच साल तक केंद्र सरकार हिलने वाली है और ना ही हरियाणा की हुड्डा सरकार. बावजूद इसके पता नहीं इन राजनितिक दलों को ऐसा क्यों लगता है की वो रही कुर्सी झप लो.
एक बार सोच कर देखो
धरने-प्रदर्शन व् हड़ताल करने वाले यह क्यों नहीं सोचते उनके ऐसा करने से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं है. आम आदमी चाहे वो व्यापारी हो, नौकरी पेशा हो या भले ही मजदूरी करता हो कोई नहीं चाहता की कोई ऐसा करे. फिर ये राजनितिक दल ऐसा कर क्यों काम-धंधा कर दो वक्त की रोटी कमाने वाले की रोटी छिनना चाहते है. बंद से किसको फर्क नहीं पड़ता. चाहे वो व्यापारी हो या नौकरी वाला. या फिर देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने वाला बैंक. सभी बंद से प्रभावित होते है. लेकिन राजनितिक दलों की तानाशाही के आगे सभी चुप रहते है. तो क्या इससे जनता की समस्याए ख़त्म हो जाएगी या इन राजनितिक दलों को कुर्सी मिल जाएगी.


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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