265 करोड़ से सेक्टरों की सड़कें जल्द होंगी चकाचक


हिसार के सेक्टरों की सड़कों के लिए 13.55 करोड़ रुपये मिले


हिसार : सेक्टरों में बदहाल सडकों के दिन जल्द बहुरेंगे। हिसार के सेक्टरों की सड़कें 13.55 करोड़ रुपये की लागत से चकाचक होंगी. उपायुक्त अशोक कुमार मीणा ने बताया कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने 20 शहरों के 163 सेक्टरों की विभिन्न सड़कों के स्पेशल रिपेयर के लिए 265 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है। जल्द ही विभागीय टेंडर प्रक्रिया होने के बाद इस सडकों की स्पेशल रिपेयर कराकर लोगों को राहत दिलाई जाएगी।
उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा हिसार में सेक्टरों की सड़कों के नवीनीकरण हेतु 13.55 करोड़ मंजूर किए गए हैं। इसके तहत सेक्टर 14, सेक्टर-13, सेक्टर 16-17, पीएलए, सेक्टर-15 व मेला ग्राउंड सहित अन्य सेक्टरों की सड़कें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हिसार के अलावा हांसी में 2 सेक्टरों की सड़कों की मरम्मत के लिए भी 4 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं जो यहां की जर्जर सड़कों के सुधार पर खर्च किए जाएंगे।
उन्होंने बताया कि लंबे अरसे से सेक्टरों की सड़कों के उचित रखरखाव के अभाव में इनकी हालत जर्जर हो गई थी। शहरी निकाय मंत्री कविता जैन के अनुरोध तथा वाहन चालकों व आमजन की परेशानियों के मद्देनजर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने सभी शहरों के ऐसे स्पेशल रिपेयर वाली सड़कों के एस्टीमेट मांगे थे। अब मुख्यमंत्री ने 20 शहरों के 163 सेक्टरों की सड़कों के सुधार के लिए 265 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है।


देश व प्रदेश के व्यापारी व उद्योगपति नुकसान में : बजरंग दास गर्ग


श्री गर्ग ने कहा की गेहू खरीद को शुरू हुए हरियाणा में 15 दिन बितने के बावजूद भी गेहू खरीद के लिए सरकारी अधिकारी अपने निजी स्वार्थ के लिए किसान व आढ़तियों को नाजायज तंग करते है अगर किसी अधिकारी ने अपने निजी स्वार्थ के लिए गेहू खरीद में देरी की तो मंडी बंद करके उस अधिकारी के खिलाफ व्यापार मंडल मोर्चा खोल देगा। प्रांतीय अध्यक्ष ने कहा कि प्रदेश में गेहू उठान के ठेके सरकारी अधिकारियों द्धारा अपने निजी स्वार्थ के लिए अपने चहेतो को अनाप शनाप रेटों में दे कर हरियाणा सरकार को करोड़ो रूपए का चुना लगाने का काम किया है।


नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग किसी टेरेरिस्ट से कम नहीं : साहा


साजिश के तहत पब्लिक सेक्टर बैंकों को खत्म करना चाहती है सरकार

हिसार 14 अप्रैल : वर्तमान सरकार एक साजिश के तहत पब्लिक सेक्टर बैंकों को खत्म करना चाहती है। बैंकिंग सेक्टर के लिए पिछले चार सालों में किये गये बदलावों के चलते बैंकिंग सेक्टर आज ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि सरकार खराब स्थिति होने पर बैंकों को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में ले जाएगी और प्राइवेट प्लेयर बोली लगाकर उसे खरीद सकेगा। वर्तमान सरकार में आरबीआई ने बैंकों के लोन रिस्ट्रक्चर के लिए लागू की गयी सभी योजनाओं को बंद कर दिया है, जिसमें सीडीआर, एसडीआर, जेएलएफ आदि योजनाएं हैं। ये कहना है आल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फ्रडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आल इंडिया पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन (एआईपीएनबीओए) के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दिलीप साहा का। वह हिसार में एआईपीएनबीओए हिसार सर्कल की त्रिवार्षिक कान्फ्रेंस में मुख्य अतिथि के तौर पर भाग लेने आये हुए थे। इस कान्फ्रेंस में लगभग 300 बैंक अधिकारियों ने भाग लिया।
यहां पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि देशभर में कुल 10 लाख करोड़ रुपये का एनपीए है और इनमें से 40 उद्यौगिक घरानों के ही 4.5 लाख करोड़ रुपये एनपीए है। सरकार को एक ऐसा क्रिमिनल कानून बनाना चाहिए जिसमें विलफुल डिफाल्डर्स के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो। उन पर एफआईआर दर्ज करके गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार विलफुल डिफाल्टर को बचा रही है तो उन्होंने कहा कि यदि सरकार उन्हें बचा नहीं रही तो कोई सख्ता काननू भी नहीं बना रही।
नीरव मोदी स्कैम के बारे में कामरेड साहा ने कहा कि नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग आर्थिक अपराध कर रहे हैं वो किसी टेरेरिस्ट से कम नहीं हैं। ऐसे इकोनोमिक्स टेरेरिस्ट को ढूंढकर उन्हें सजा दी जानी चाहिए ताकि दूसरों को सीख मिले। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी से पहले ही ऐसे लोगों का देश से बाहर भाग जाना संयोग नहीं हो सकता। साहा ने कहा कि इस स्कैम में यदि बैंक का कोई अधिकारी शामिल रहा है तो ये काफी शर्मनाक है और उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए। 


चेयरमैन की दुकान में अवैध निर्माण पर आखिर प्रशासन क्यों है मौन


फेस-3 में अवैध निर्माण के सम्बंध में मुख्यमंत्री से मिलेगी बाबा विश्वकर्मा समिति 

हिसार। बाबा विश्वकर्मा समिति के पदाधिकारियों की बैठक समिति कार्यालय में हुई जिसमें व्यापार एवं व्यवसाय कुंज फेस-3 की मुख्य ज्वलंत समस्याओं पर चर्चा हुई और विशेषकर फेस-3 में फुटपाथ तोड़कर उसके नीचे बनाई बेसमेंट पर चर्चा हुई। समिति के पदाधिकारियों ने प्रशासन के लचीले रवैये पर रोष प्रकट किया। आरोप लगाया गया कि यह दुकान भाजपा से जुड़े नेता एवं चेयरमैन की है और इसी दबाव में प्रशासन ने अब तक कोई कार्यवाही न करके उक्त नेता को खुली छूट दी हुई है। सरकारी जमीन पर कब्जे के बाद भी उक्त नेता की न तो दुकान का अवैध निर्माण सील किया गया है और न ही उक्त नेता के खिलाफ कोई कार्यवाही की गई है। समिति के प्रधान ओमपाल सिंह ने कहा कि इस संदर्भ में बाबा विश्वकर्मा समिति ने आरटीआई के माध्यम से नगर निगम से जानकारी मांगी है कि उक्त नेता ने फुटपाथ के नीचे बनी दीवार हटाई है या नहीं, फुटपाथ का कब्जा छोड़ा है या नहीं, प्रशासन कोई कार्यवाही उक्त नेता के खिलाफ करेगा या नहीं, फुटपाथ खोदकर जो मिट्टी का प्रयोग किया गया, उसकी भरपाई उक्त नेता से की जाएगी या नहीं, भाजपा नेता के विरुद्ध अवैध निर्माण करने पर क्या कार्यवाही बनती है। आरटीआई के माध्यम से यह जानकारी मांगी गई है। 
समिति की बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अगर प्रशासन इस अवैध निर्माण को सील नहीं करता तो समिति का एक शिष्टमंडल मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मिलकर उक्त नेता की कारगुजारी उनके सम्मुख रखेगा। उक्त नेता के खिलाफ कार्यवाही की मांग करेगा। जब तक सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण को सील नहीं किया जाता तब तक बाबा विश्वकर्मा समिति चुप नहीं बैठेगी।


जब भाजपा का उपवास..., उपहास सा लगने लगा


अधिकतर पदाधिकारी रहे दूर, आए वो कुछ देर में चलते बने, कुछ पहुंचे मात्र औपचारिकता निभाने


हिसार। कांग्रेस पर संसद न चलने देने का आरोप लगाते हुए देशभर में भाजपा के आह्वान पर किये गए उपवास का भाजपाइयों ने ही मजाक बना डाला। उपवास कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे वहीं अधिकतर नेता मौके
पर आकर औपचारिकता निभाकर जाते रहे। यही नहीं, जिले में विभिन्न विभागों, बोर्डों व निगमों के सात चेयरमैनों में से केवल एक चेयरमैन ही उपवास में नजर आए वहीं अन्य बड़े नेता भी कन्नी काटते नजर आए।
भाजपा के राष्ट्रीय आह्वान पर उपवास कार्यक्रम रखा गया था। हिसार में अग्रसेन चौक के उसी पार्क को भाजपा ने उपवास स्थल चुना, जिसमें कांग्रेसियों ने उपवास किया था। भाजपाइयों का उपवास कार्यक्रम भी कांग्रेसियों से कम नहीं रहा। जिस तरह कांग्रेसियों का उपवास कार्यक्रम मजाक बनकर रह गया वहीं भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। भाजपा के अधिकतर पदाधिकारी ही इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, एक प्रदेशस्तरीय नेता लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उक्त नेता के बारे में प्रसिद्ध है कि वह हर कार्यक्रम में देरी से पहुंचकर केवल बैठने के लिए सीट हथियाने के प्रयास में रहता है। बताया जाता है कि उक्त नेताजी को उपवास कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं थी और उन्हें अपने मीडिया प्रभारी के माध्यम से उपवास कार्यक्रम की जानकारी मिली थी। हुआ यूं कि उक्त नेताजी के मीडिया प्रभारी किसी तरह पत्रकारों को मिल गये और जब पत्रकारों ने उससे पूछा की नेताजी उपवास में हैं क्या, तो मीडिया प्रभारी का कहना था कि किस बात का उपवास, आज पार्टी का कोई कार्यक्रम है क्या? इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से पूरी जानकारी लेकर अपने आका को फोन किया और उपवास कार्यक्रम में जाने की सलाह दी, जिस पर उक्त नेताजी लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी हाजिरी लगवाई। 
पार्टी के इस उपवास कार्यक्रम से कुछेक को छोड़कर अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे। पार्टी आए दिन नई नियुक्तियों की घोषणा करती है लेकिन नई नियुक्तियों वाले तो दूर, पुराने पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी पार्टी जुटा नहीं पाई और हालत यह हो गई कि निर्धारित पार्क भरना तो दूर, चौथाई हिस्से में बैठकर सत्तारूढ़ भाजपाइयों को कांग्रेस पर हमले करने पड़े।


कागजों में ही दौड़ कर लाखों का डीजल पी गई उपायुक्त की कार


3 वर्षों तक सिर्फ कागजों में दौड़ती रही डीसी साहब की इनोवा
हिसार (राजेश्वर बैनीवाल)। प्रदेश की मनोहर सरकार भले ही सिस्टम को भ्रष्टाचार मुक्त करने के दावे करती नहीं थकती, लेकिन उसी सरकार के सिस्टम को सरकार के ही अधिकारी
भ्रष्टाचार से खोखला करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा मामला फतेहाबाद की जिला आईटी सोसाइटी का है। जिला आईटी सोसाइटी (डीआईटीएस) का काम जिले के बीपीएल परिवारों और पंचायतों को डिजीटल साक्षर करने का था, लेकिन वो अपने भारी-भरकम फंड को इधर-उधर एडजस्ट करने में ही लगी रही। जिला आईटी सोसाइटी की पिछले तीन साल की आडिट रिपोर्ट में तो यही खुलासा हुआ है। मुख्यमंत्री तक शिकायत जाने के बाद मामले की जांच विजीलेंस को सौंपी गई है।
आडिट रिपोर्ट की मानें तो फतेहाबाद जिले में तीन वित्त वर्ष 2014-15, 2015-16 और 2016-17 तक जितने भी डीसी आए, वो लगातार तीन वर्षों तक रोजाना 120 किलोमीटर इनोवा गाड़ी में घूमते रहे। इतना ही नहीं इन तीन वर्षों में आए सरकारी अवकाश और उनके निजी अवकाशों के दौरान भी ये इनोवा गाड़ी सड़कों पर दौड़ती रही। हां, ये बात अलग है कि जिले के किसी भी डीसी को स्थानीय लोगों या अधिकारियों ने इनोवा गाड़ी में निरीक्षण आदि पर जाते नहीं देखा। इसका सीधा सा मतलब है कि उनके लिए डीआईटीएस की इनोवा गाड़ी कागजों में ही दौड़ती रही और तीन साल में डीजल बिल की आड़ में सात लाख रुपए को ठिकाने लगा दिया गया।
हैरानी तो इस बात की है कि पिछले तीन साल में लगातार वित्तीय अनियमितताएं सामने आने के बावजूद इस गड़बड़झाले को रोकने का किसी ने प्रयास तक नहीं किया। और तो और आडिट रिपोर्ट में भी इन अनियमितताओं को अनदेखा किया जाता रहा। पिछले तीन साल की ऑडिट रिपोर्ट में जो सामने आया है, उसकी जानकारी देते हुए आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट सुशील बिश्नोई ने बताया कि वित्त वर्ष 2014 से लेकर 2017 तक डीसी की इनोवा गाड़ी पर सात लाख का डीजल एवं रिपेयरिंग खर्च आया है। हैरानी की बात तो ये है कि पिछले एक साल में जिला आईटी सोसाइटी ने एक भी पंचायत को डिजीटल साक्षर करने के लिए एक कैंप तक नहीं लगाया।
जानकारी के अनुसार फतेहाबाद जिले में दो-तीन साल में अलग-अलग उपायुक्त कार्यरत रहे लेकिन एनके सोलंकी ही इन तीन सालों में अधिकतर समय फतेहाबाद के उपायुक्त पद पर रहे। मीडिया ने जब पूर्व डीसी सोलंकी से इस संदर्भ में बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया और फोन काट दिया। हालांकि जिला आईटी सोसाइटी के पिछले तीन साल के आडिट रिपोर्ट की एक प्रति भी है। ये इनोवा गाड़ी फिलहाल डीसी फतेहाबाद के निवास पर बने गैराज में बंद शटर के पार खड़ी है।
विजीलेंस को दी जांच : सुशील
एडवोकेट सुशील बिश्नोई के अनुसार उन्होंने पूरे गड़बड़झाले की शिकायत मुख्यमंत्री मनोहर लाल को की थी। मुख्यमंत्री ने शिकायत का अध्ययन करवाकर मामले की जांच का आश्वासन दिया था। अब उन्हें पता चला है कि मामले की जांच विजीलेंस को दे दी गई है। उन्होंने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसी जा सके।


सबको दे दो आरक्षण


हरियाणा: आज एक बार फिर हरियाणा आरक्षण की आग में जलने को तैयार है. जाट समुदाय के लोग पिछले आन्दोलन के दौरान बनाये गए मुक़दमे वापिस लेने के साथ-साथ आरक्षण की मांग को लेकर धरने पर है. ऐसे में जहाँ उन्होंने कई जगह रेलवे ट्रैक व् सड़क मार्ग जाम कर दिए है वहीँ प्रशासन भी किसी अनहोनी के अंदेशे के मद्देनजर मुस्तैद नजर आ रहा है. इसलिए जहाँ अब हिसार से दिल्ली दूर नजर आने लगा है वहीँ कई ऐसे सड़क मार्ग है जो अब दोगुनी समय सीमा में तय हो रहे है. बावजूद इसके जाट समुदाय का कहना है की एक ओर जब तक उनके ऊपर बनाये गए मुक़दमे वापिस नहीं लिए जाते वहीँ दूसरी ओर आरक्षण नहीं मिलने तक अब वो मानने वाले नहीं है.
यही कारण है की आज गुफ्तगू हो रही है की आरक्षण का शोर तो आज हर ओर सुनाई दे रहा है. जबकि मांगने वाले को पता ही नहीं की वो आरक्षण मांग ही क्यों रहा है. बस एक नेता की आवाज पर हो लिए उसके पीछे-पीछे. अब उनसे कोई पूछने वाला हो की क्या आरक्षण मांगने से पहले उनके घर में चूल्हा नहीं जल रहा था या उनको कोई परेशानी आ रही थी अपने बच्चो के लालन-पालन में. लेकिन नहीं इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है. तो क्या इसका मतलब यह है की क्या हम लकीर पीट रहे है या भेड़चाल की माफिक चल रहे है.
अब देखो ना पहले तो सिर्फ अनुसूचित जातिया - जनजातियाँ ही आरक्षण की मांग किया करती थी लेकिन यह शायद मेरे देश का या यह कहें की संविधान का दुर्भाग्य ही है की आज जिसे देखो आरक्षण की मांग पर मांग किये जा रहा है. दुःख इस बात का नहीं की आरक्षण की मांग क्यों हो रही है दुःख तो इस बात का है की भारत की एकता के लिए जो " हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई, हम सभी है भाई-भाई" का नारा दिया जाता था उसके तो आज मायेने ही बदल गए है. आज धर्म की बात तो कोई करता ही नहीं है.

जो हिन्दू धर्म कभी 36 बिरादरियो की एकता का दम भरता था उसमे आज जात की बात होने लगी है. इससे ज्यादा दुःख की बात और क्या होगी की हिन्दुस्तान में आज कोई हिन्दू होने की बात नहीं करता. आज बात होती है तो सिर्फ मै बाल्मीकि, मै धानक, मै जाट, मै गुर्जर व् मै चमार की. गुफ्तगू का पहलु यह है की आज हर कोई आरक्षण के लिए झंडा उठाये हुए है. जबकि देश की किसी को कोई खबर नहीं है. आज आरक्षण से सिर्फ बचे है तो पंजाबी, ब्रह्मण व् अग्रवाल समुदाय.

लगता यह है की आज आरक्षण जनता की नहीं अपितु राजनीति की जरुरत बन कर रह गया है. आरक्षण मुद्दे पर सरकार कभी अपने को पाक-साफ़ दिखाना चाहती है तो कभी गेंद केंद्र के पाले में डाल देती है. जबकि विपक्ष अपनी अलग ही दाल गलाता नजर आता है. संविधान निर्माण के समय सिर्फ 10 साल के लिए किये आरक्षण पर आज किसी की भूमिका सकारात्मक नहीं है. कोई नहीं चाहता की देश से आरक्षण ख़त्म हो जाये और ना ही आज तक किसी ने प्रयास किया की इसका कोई हल निकला जाये.
पिसना तो आम आदमी को है
जाट समुदाय को आरक्षण मांगते महीनो हो गए. कभी वो तोड़-फोड़ करते है तो कभी सड़क मार्ग जाम कर देते है. आज हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के रेलवे ट्रैक सुने पड़े है. सरकार से लेकर उच्च व् सर्वोच्च न्यायालय तक की सभी अपील अब तक कोई रंग नहीं दिखा पाई. घर व् काम-धंधे छोड़ कर रेल पटरी पर बैठे लोगो के कानों पर कोई जूं तक नहीं रेंग रही. अब तो यहीं लगता है की इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पिसना तो आम आदमी को ही है.
तो फिर सबको दे दो आरक्षण
अगर अब जाट समुदाय को भी आरक्षण दे दिया गया तो बचा कौन. सिर्फ अग्रवाल, पंजाबी व् ब्रह्मण. जबकि अब हरियाणा में ये तीनो समुदाय भी आरक्षण के लिए एकजुट होकर बैठके आयोजित कर रहे है. अगर जाट समुदाय का मामला शांत होने के पश्चात फिर से इन तीनो समुदाय के लिए आरक्षण की मांग उठी और ऐसे ही धरना-प्रदर्शन होना है तो आज ही क्यों नहीं सभी को आरक्षण दे दिया जाएँ.


हमाम में सभी नंगे है


राष्ट्रीय: अक्सर सुनने में आता था की राजनीति गंदी हो चुकी है. यह सुन मैं अचरज में पड़ जाता की आखिर राजनीति गंदी कैसे हो सकती है. क्योंकि राजनीति में आने वाला हर नेता तो सफ़ेद कुर्ता-पजामा पहनता है. यहाँ तक की सफ़ेद टोपी भी उसके सिर पर होती है. अगर राजनीति गंदी होती तो नेता सफ़ेद कुर्ता-पजामा नहीं पहनते, जबकि नेता तो अपने परिधान पर दाग तक नहीं लगने देते. फिर मैं यह सोच कर चुप हो जाता की शायद सभी मजाक कर रहे है. समय गुजरता गया और पता चलता गया की कभी वोटों के नाम पर तो कभी नोटों के नाम पर, कभी कुर्सी के लिए तो कभी सत्ता सुख के लिए नेता-राजनेता राजनीति को गंदा किये रखते है.
आज समय यह है की एक बार वोट क्या मिले की नेताओं को नोट दिखने लगते है और एक बार कुर्सी क्या मिली की सत्ता सुख का सभी आनंद लेना चाहता है. और जब सत्ता सुख मिल ही गया तो फिर भला उनके कुर्ता-पजामा पर दाग लगे या राजनीति गंदी हो किसी को क्या परवाह. फिर किसी नेता को अपना जमीर बेचना पड़े या जनता की आशाओं को दरकिनार. बस सब कुछ राजनीतिक सा लगने लगता है. अब हाल ही में हुए सैक्स स्कैंडलों को ही देख लो. इन स्कैंडलों के कारण राजनीति में जो भूचाल आया उस पर राजनीति करने से ना भाजपा बाज आ रही है और ना ही कांग्रेस पीछे हटने का नाम ले रही है.
बावजूद इसके आज कांग्रेस दावा करती है की देश में विकास उन्ही की सरकार करवा रही है तो भाजपा कहती है स्वच्छ छवि की सरकार वो ही दे सकती है. जबकि आज यह कहना बड़ा मुश्किल सा लगता है की विकास कौन करवा रहा है और स्वच्छ कौन है. क्योंकि राजस्थान की कांग्रेस सरकार के मंत्री मदेरणा के कारण जहाँ भंवरी देवी को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा वहीँ कर्नाटक विधानसभा में भाजपा विधयाकों द्वारा ब्लू फिल्म देखना भी भाजपा की स्वच्छता को दर्शाता है. इन दोनों ही प्रकरण की मजेदार बात यह है की दोनों ही राजनीतिक दल अपनी-अपनी करतूत भूल कर आज एक-दूसरे की टांग खिंच रहे है. 
अभी बात हो रही थी राजनीति के गंदा होने की. लेकिन लगता है की आज इसकी भी परिभाषा भी बदल चुकी है. क्योंकि जिस तरह से एक के बाद एक राजनीतिक दल व् नेता कभी धन को लेकर तो कभी भ्रष्टाचार को लेकर, कभी बाहुबल को लेकर तो कभी सैक्स स्कैंडल को लेकर लपेटे में आ रहे है उसे देख तो यही लगने लगा है की आज ना सिर्फ राजनीति गंदी हो चुकी है बल्कि इस हमाम में सभी नंगे है. बावजूद इसके आज गुफ्तगू यह हो रही है की कर्नाटक विधानसभा में हुए प्रकरण पर जो कांग्रेस आज शोर मचा रही है उसी कांग्रेस शासित राजस्थान में तो एक मंत्री से लेकर कितनों ने ही एक महिला को....


कुर्सी के लिए खुले आम रिश्वत


देश: बीते वर्ष में जनता देश में फैले भ्रष्टाचार को ख़त्म करने व् विदेशों में जमा हमारा अरबों-खरबों रुपया वापिस लाने के लिए लड़ती रही. जन लोकपाल बिल के लिए तरसती रही. लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला. भला मिलता भी कैसे. क्योंकि जिस देश में कुर्सी के लिए ही रिश्वत चलती हो वहां भला जनता की कौन सुनेगा. भारत के नेताओं को तो बस कुर्सी चाहिए फिर चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े, कुछ ही कहना पड़े. बात चल रही थी कुर्सी के लिए रिश्वत की. तो जैसा की सभी जानते है की आगामी महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है. इसके लिए सभी राजनीतिक दल कमर कस चुके है.
कोई वादों की झड़ी लगा रहा है तो कोई सब्जबाग दिखा कर जनता का वोट हथियाना चाहता है. जिनको इतने भर से भी जीत की उम्मीद नहीं है वो तो जनता को खुलेआम रिश्वत देने तक पर उतर आया है. रिश्वत भी थोड़ी बहुत नहीं अपितु पूरे एक लैपटाप की. अब देखो न उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने जीतने के पश्चात जनता को फ्री में लैपटाप देने का वादा किया है तो पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर बादल ने भी जीत की ख़ुशी में जनता को फ्री लैपटाप देने की हामी भर दी है. ऐसे में गुफ्तगू होना लाजमी था की अब तो कुर्सी के लिए भी खुलेआम रिश्वत चलने लगी है.


पुलिस सही... या अभिभावक गलत ?


हरियाणा: किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था की एक सुबह जब वो सो कर उठेंगे तो उन्हें एक ऐसा ह्रदय विदारक समाचार सुनने को मिलेगा की ना सिर्फ उनकी आँखे फटी की फटी रह जाएगी बल्कि हरियाणा सरकार की नींद भी खुल जाएगी. फिर भले ही वो अम्बाला में हुए सड़क हादसे में मारे गए स्कूली बच्चों का मामला हो या हिसार में एक ऑटो के पलटने से स्कूली बच्चे की मौत की घटना हो. इसके साथ ही कभी बड़े वाहन की चपेट में आने से किसी साइकिल सवार छात्र-छात्रा की मौत सुनने में आती है तो कभी तेज रफ़्तार से दुपहिया वाहन चलाने वाले स्कूली बच्चे की सड़क दुर्घटना का समाचार.
जबकि हाल ही में अम्बाला और हिसार में हुए सड़क हादसों में हुई स्कूली बच्चों की मौत ने सभी को हिला कर रख दिया. दोनों ही मामले इतने दर्दनाक थे की शासन के साथ-साथ प्रशासन ने भी सख्ती दिखाई और योजनाबद्ध तरीके से एक के बाद एक कई नियम बना दिए. प्रशासन का डंडा कभी ऑटो चालको पर पड़ा तो कभी वह स्कूली वाहन पर भारी पड़ता दिखाई दिया. स्कूल संचालक भी प्रशासन के इस डंडे से नहीं बच पाए. स्कूली वाहनों को दुरुस्त करने के लिए जहाँ प्रशासन ने कमर कस ली वहीँ नए साल का आगाज होते ही प्रशासन ने सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने का भी मन बनाया.
एक दौर शुरू हुआ प्रशासन के आदेशों का. दुर्घटनाओं से निपटने के लिए ऑटो में 6 सवारियों से अधिक नहीं बैठाने को लेकर ऑटो चालकों और प्रशासन के बीच लम्बी लड़ाई चली तो कभी अधिकारियों ने फूल देकर स्कूली ऑटो को समझाने का प्रयास किया. कभी स्कूलों से स्वयं का वाहन खरीदने का आह्वान किया गया तो कभी भेड़ बकरियों की तरह बच्चों को ठूसे स्कूली वैन के चालान किये गए. यहाँ तक की प्रशासन ने स्कूल संचालको की बैठके आयोजित कर निर्देश दिए गए की स्कूली बच्चों को लाने-ले जाने के लिए एक योजना तैयार करे जिससे बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके.
प्रदेश भर के हर जिले में स्कूली बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं से निपटने के लिए प्रशासन द्वारा देरी से उठाया गया यह कदम नए साल के आगाज के लिए तो अच्छा है लेकिन इसके परिणाम आने अभी बाकी है. क्योंकि आज भी प्रतिदिन किसी न किसी स्कूली वाहन का चालान किया जा रहा है तो कभी ऑटो स्कूली बच्चों से खचाखच भरे दिखाई देते है. बावजूद इसके आज पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही यह कार्यवाही तो सभी को रास आ रही है लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही की जब पुलिस इतना कर रही है तो आखिर अभिभावक अभी तक क्या कर रहे है.
स्कूल भेजने की आपाधापी में जहाँ आज भी अभिभावक अपने लाडलों को खचाखच भरे ऑटो से स्कूल भेजने में नहीं हिचकिचा रहे वहीँ भेड़ बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर भरी गई स्कूल वैन में अपने बच्चों को भेजने से उनको कोई परहेज नहीं है. इसके साथ ही किसी दुर्घटना की परवाह किये बिना कभी स्कूल तो कभी ट्युसन के नाम पर कम उम्र के बच्चों को दुपहिया वाहन थमा दिया जाता है. अभिभावकों के इस कदम से और पुलिस प्रशासन की इस कार्यवाही से यह गुफ्तगू अब आम हो गई है की आज जो हो रहा है उसमे पुलिस सही है या अभिभावक गलत है ? सोचना आपको है और करना भी आपको.


योजनाएं तो बनती ही खाने के लिए है



राष्ट्रीय : राजीव गाँधी जी अक्सर अपनी जनसभाओ में एक बात पुरजोर से कहते थे की सरकार द्वारा शुरू की गई किसी भी योजना का 25 प्रतिशत हिस्सा ही जनता तक पहुँच पाता है जबकि बाकी का पैसा तो बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाता है. शायद सही ही कहते थे वो. आज देश के लगभग हर प्रदेश में यही हो रहा है. बात करे केंद्र सरकार की तो वो भी राजीव गाँधी जी के इस कथन से अछूती नहीं है. आज केंद्र सरकार द्वारा भी शुरू की गई किसी भी योजना का पूरा-पूरा लाभ जनता तक नहीं पहुँच पा रहा है.
कामनवेल्थ गेम्स हो या आदर्श सोसाईटी घोटाला या फिर हो 2 जी स्पेक्ट्रम मामला. सभी को पता है की इन सभी योजनाओं का कितना पैसा जनता के हित में खर्च हुआ और कितना ही पैसा बीच रास्ते में ही लुटा दिया गया. नेताओं व् भ्रष्ट  अधिकारियों के लिए यह कोई पहला मौका था की उन्हें योजनाओं के तहत पैसा खाने का अवसर मिला है. लेकिन इतना जरुर है की बीते वर्ष में जितनी तादात में पैसा खाया गया उसे देख अब यह गुफ्तगू आम हो गई है की आज योजनायें बनती ही पैसा खाने के लिए है.
सड़क निर्माण हो या स्ट्रीट लाईट या हो सीवरेज व्यवस्था का रख-रखाव. सरकार या प्रशासन द्वारा चलाई गई हर योजना को शुरू करने से पहले यह हिसाब लगाया जाता है की इस योजना से कितना पैसा खाना है. हरियाणा सरकार की कन्यादान योजना के तहत मिलने वाले 31000 रूपए हो या मकान अनुदान योजना के तहत मिलने वाले 50000 रूपए या हो बुढ़ापा पेंशन वितरण, जनता तक कोई भी रकम भी पूरी नहीं पहुँच रही. कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालें की आग में जहाँ दिल्ली की मुख्यमंत्री शिला दीक्षित के हाथ भी जल चुके है वहीँ बिहार के विकास के पुरोधा नितीश कुमार की सरकार भी विवादों के घेरे में आ चुकी है.
प्रदेश की गरीब लड़कियों को साइकिल बांटने की योजना का फैसला तो एक अच्छा कदम था लेकिन भ्रष्ट अधिकारीयों को मौका मिल गया पैसा खाने का. ऐसे  में देश का आगे क्या होगा यह तो समय के गर्भ में है लेकिन इतना जरुर है की सभी को यह अवश्य पता चल गया है की आज सरकारी योजनायें तो बनती ही पैसा खाने के लिए है.


रणनीति में भविष्य या भविष्य की रणनीति


हर वर्ष की भांति साल 2011 भी गुजर गया. जिस तरह हम सभी ने इस वर्ष के आने की ख़ुशी मनाई थी उसी तरह इसके जाने की भी उतनी ही ख़ुशी मनाई. मेरे ऐसा कहने के कारण बहुत से रहे लेकिन मुख्य कारण रहा की पूरा वर्ष जहाँ एक के बाद एक भ्रष्टाचार की परते खुलती रही वहीँ पूरा साल हमने भ्रष्टाचार से लड़ने में गुजार दिया. इतना जरुर है की 2011 में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जनता एक मत होकर सड़को पर अवश्य उतरी. इसी कारण रहा की कभी हमने बाबा रामदेव के काले धन को वापसी लाने की आवाज को बुलंद किया तो कभी स्वामी अग्निवेश की भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में हम शामिल हुए. जबकि लोकपाल बिल के समर्थन में समाजसेवी अन्ना हजारे के अनशन को देश के राजनीतिज्ञ और जनता अभी तक भूले नहीं है.
देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करने व् लोकपाल बिल को लागू करवाने के लिए कुछ जाने-माने लोगों ने एक रणनीति के तहत काम किया. यह इस रणनीति का ही कमाल ही था की जनता को अपना भविष्य उज्जवल दिखाई देने लगा. फिर भले ही वो अनशन का मौका हो या फिर कैंडल मार्च या हो बाजार बंद का आयोजन. लोकपाल बिल के समर्थन में पूरे देश ने अपनी आहुति डाली. एक बारगी तो आम जनता ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम की रणनीति से भविष्य के सपने संजोने आरम्भ कर दिए थे. ऐसा लगने लगा था की या तो अब देश में भ्रष्टाचार कुछ ही दिनों का महमान है या फिर यह भ्रष्ट सरकारे. हर एक आयोजन से जहाँ सरकार की खूब किरकिरी हुई वहीँ राजनीति में भी उहापोह की स्थिति बनी रही.
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला आरम्भ हुआ तो राजनीति और भ्रष्टाचार के गढ़े मुर्दे भी उखड़ने लगे. कभी बाबा रामदेव पर राजनीतिक प्रहार हुए तो कभी अरविन्द केजरीवाल व् किरण बेदी पर सरकारी खजाने को नुक्सान पहुँचाने के आरोप. कभी प्रशांत भूषण पर हमला तो कभी अनशन को लेकर हंगामा हुआ. राजनीतिक दल बाहर तो एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे लेकिन भ्रष्टाचार व् लोकपाल बिल पर संसद में सभी भाई-बहन की तरह बैठे दिखाई दिए. हर किसी ने भ्रष्टाचार के विरोध में हर एक मुहीम की काट की जुगत बैठानी आरम्भ कर दी थी. इसी का नतीजा था की भ्रष्टाचार व् लोकपाल बिल पर काम कम और बात ज्यादा होने लगी. रणनीति एक मुद्दा बन गई और लोग इस से उबने लगे.
चुनावों के दौरान कांग्रेस की खिलाफत करने की रणनीति हो या मुंबई में अनशन. जनता अन्ना हजारे से किनारा करने लगी. संसद की कार्यवाही के दौरान जनता समझने लगी थी की जिस रणनीति में वो अपना भविष्य संजो रही है वो कामयाब होने वाली नहीं है. नेता चाहते ही नहीं की उनके ऊपर कोई लोकपाल व् कानून बने. जब करना ही इन नेताओं को है तो समय खराब करने से क्या फायेदा. ऐसा नहीं है की जनता चाहती नहीं की देश में लोकपाल बिल आये लेकिन वो आज एक बार फिर टीम अन्ना की ओर एक आशा भरी नजरों से देखने लगी है. भले ही संसद के इस सत्र में लोकपाल बिल पास ना हुआ हो लेकिन मजबूत लोकपाल बिल लाने के लिए आज जरुरत है तो भविष्य की रणनीति बनाने की.


20 रूपए में फिर से अन्ना बनने की तैयारी


कुछ दिनों से सुन रहा था की अन्ना हजारे संसद में सख्त जन लोकपाल बिल को पास करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने हेतु 11 दिसंबर को जंतर-मंतर पर एक दिन का सांकेतिक उपवास करने की तैयारी कर रहे है. इसके खिलाफ सरकार की ओर से भी वाकयुद्ध शुरू हो गया है तो दिल्ली पुलिस भी इस उपवास को विफल करने के लिए कई तरह के पैतरे आजमाने लगी है. इस अनशन से क्या होगा व् क्या होना चाहिए जैसे पहलू
पर कुछ लिखता इससे पहले ही आज के समाचारपत्रों में एक समाचार और आया की जानी-मानी समाचार पत्रिका टाइम्स ने अन्ना के आन्दोलन को 2011 की दस बड़ी ख़बरों में शामिल किया है. सुन-पढ़ कर अच्छा लगा की भारतवाशियों के एक साहसी और अच्छे काम को पत्रिका में समाचार के रूप में शामिल किया गया है.
इस समाचार का शीर्षक दिया गया अन्ना के अनशन ने भारत को हिलाया. बिलकुल सही लिखा है. यह शायद अन्ना हजारे के अनशन का ही कमाल था की सदियों से सोई जनता की नींद खुली और अधिकारी, मंत्री-संतरी से सरकार तक की आँखे भी खुल गई. पत्रिका में यह भी सही लिखा है कि इस साल दुनिया भर में जितने भी विरोध-प्रदर्शन हुये हैं, उसमें आम जनता के असंतोष का सबसे प्रभावी प्रदर्शन भारत में अन्ना हजारे के आंदोलन में हुआ. लेकिन गुफ्तगू का विषय यह है की आखिर जिस प्रदर्शन को नई क्रांति, जन आन्दोलन, एक और स्वतंत्रता संग्राम व् भारत की आजादी जैसे नारों से गुंजायमान किया गया आज उस आन्दोलन का हश्र क्या हो रहा है. किसी ने सोचा की आज भ्रष्ठाचार कितना समाप्त हुआ और आगे कैसे कम होगा.
नहीं यह सोचने की किसी के पास फुर्सत ही कहा है. तो क्या हम यह मान लें की आज अधिकारियों ने रिश्वत लेनी बंद कर दी है, या जनता ने इस आन्दोलन के पश्चात किसी भी काम के लिए रिश्वत नहीं दी. शायद ऐसा कुछ भी नहीं है. गुफ्तगू तो यहाँ तक हो रही है की अन्ना के आन्दोलन के बाद तो रिश्वत कम होने के स्थान पर बढ़ी है. साथ ही साथ अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है की इस काम के इतने पैसे लगेंगे वरना अपने अन्ना को ले आओ. बावजूद इसके जहाँ अन्ना उपवास करने का मन बना चुके है वहीँ जनता भी एक बार दोबारा मैं अन्ना हूँ, अन्ना तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है व् अन्ना नहीं वो आंधी है, देश का दूसरा गांधी है जैसे नारों से अन्ना हजारे को हौंसला देंगी. जनता भ्रष्टाचार का खात्मा तो चाहती है लेकिन करने को कुछ भी नहीं.
अब यह सोचना थोडा मुश्किल सा लगता है की अगर सारी जनता जन लोकपाल बिल के लिए लड़ाई लड़ेगी तो भ्रष्टाचार समाप्त करने रूपी हवन में आहुति कौन देगा. माना यह जा रहा था की अन्ना के आन्दोलन में उमड़ा जन सैलाब भ्रष्टाचार व् भ्रष्टाचारियों के खिलाफ था ना की जन लोकपाल बिल को लागू करवाने के लिए. सख्त जनलोक बिल को संसद में पास करवाने की लड़ाई तो अन्ना भी लड़ लेंगे लेकिन अगर हम वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका साथ देना चाहते है तो आपको 11 दिसंबर को अन्ना के सांकेतिक उपवास के दौरान मात्र 20 रूपए की टोपी पहन कर अन्ना बनने की अपनी तैयारी पर लगाम लगानी होगी. हमको रिश्वत देना बंद करना होगा. अगर कोई रिश्वत मांगता है तो उसके खिलाफ आवाज उठा कर अन्ना बनना होगा.


जिंदगी के कुछ अच्छे पल


हिसार लोकसभा उपचुनाव की गहमागहमी हुए भले ही महीनों बीत गए हो लेकिन अब कहीं जाकर जनता को पता लगने लगा है की हां चुनाव आ गया है. सिर्फ इसलिए नहीं की मतदान की तिथि समीप आ गई है या चुनाव का शोर बढ़ गया है बल्कि इसलिए की चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जिसकी भरी गर्मी में बिजली नहीं होने से सांस फूली हुई थी. चोरी का आलम यह था की व्यापारियों को नहीं पता था की जो प्रतिष्ठान वो ठीक से बंद कर के जा रहा है वो सुबह स्वयं आकर खोलेगा या शटर के ताले चटके हुए मिलेंगे. बीते कुछ समय में नगर हुई हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ ने आम आदमी की नींद तक उचाट दी थी. पुलिस की हर कोशिश को नाकाम करते हुए चैन स्नेचर आये दिन महिलाओं की या तो चैन तोड़ कर रफूचक्कर हो जाते रहे है या फिर उनका पर्स उड़ा कर भाग जाते थे. 
मगर जनता आज खुश है. उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करना है सिर्फ इसलिए नहीं, बल्कि उनकी ख़ुशी का मुख्य कारण है की आज शहर सहित जिले में जहाँ ना कोई अपराधिक वारदात हो रही है वहीँ महिलायें भी त्यौहार के दिनों में सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन कर पा रही है. लोगो में गुफ्तगू हो रही है की जिन अपराधियों ने जनता का जीना दूभर कर दिया था आखिर आज वो किसके कहने मात्र से अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे रहे. एकाएक कहाँ गए सभी अपराधी. क्या उनको चुनाव के दिनों में कुछ और काम दे दिया गया है. ऐसा भी हो सकता है की हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्नोई व् अनेक भाजपा नेता जो की पिछले दो सप्ताह से हिसार जिले में डेरा डाले हुए है उनके डर व् पुलिस की सक्रियता के चलते सभी अपराधी खामोश हो गए है. 
अभी कुछ दिनों पूर्व जब मई रात को अपनी गली में घुसा तो गली का नजारा कुछ बदला-बदला सा नजर आया. टाक-झांक करने पर पता लगा की जिस गली की स्ट्रीट लाईट कई साल से बंद पड़ी थी आज वो जगमगा रही थी. दीवाली का समय है शायद इसलिए नगर निगम द्वारा ठीक करवा दी गई होगी यह सोच मैं घर के अन्दर चला गया. सुबह जैसे ही गली से गुजर रहा था तो गली की सड़क का वह हिस्सा मुझे खुदा हुआ मिला जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी की यह जल्दी से बनवा दिया जायेगा. आस-पड़ोस वालों ने खुश होते हुए बताया की रात को जेसीबी मशीन से इसको खोदा गया है और यहाँ सीमेंट की सड़क बनवाई जाएगी. अभी कुछ आगे ही चला था की ऐसा ही एक और नजारा देख मैं हतप्रद था. मुख्य सड़क पर आया तो कहीं रंग पुताई का कार्य चल रहा था तो कहीं-कहीं मरम्मत का काम जोर-शोर से जारी था. 
इसका जिक्र मैंने अपने कुछ साथियों से किया. उन्होंने कहाँ की तुम पत्रकारों की यहीं कमी है. कोई काम हो रहा है तो होने दो, क्यों बात को बढाते हो. अब कहीं जाकर तो कुछ विकास के काम हो रहे है उसको भी क्या बंद करवा दोगे. जो मैं सोच रहा था उसने स्पष्ट कह दिया की जो काम बहुत पहले होने चाहिए थे वो आज चुनाव के दिनों में हो रहे है. इसका अर्थ यह हुआ की ऐसा नहीं है की शासन-प्रशासन को पता नहीं होता की कहा क्या कमी है, बस कमी है तो काम को अंजाम तक पहुंचाने की. जो काम आज हो रहे है अगर वो समय पर हो जाये तो सत्ता में रहते हुए ना मुख्यमंत्री को जिले में डेरा डालना पड़े और ना ही पूर्व मुख्यमंत्री को विकास की याद दिलानी पड़े. कुछ भी हो जनता खुश है और चाह रही है चुनाव पांच वर्ष में नहीं अपितु वर्ष में एक बार होने चाहिए, जिससे चुनाव की आड़ में वो जिंदगी के कुछ अच्छे पल गुजार सके.


अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...


- संयम जैन - स्वतंत्र पत्रकार
भारत देश तमाशबीनों का देश है। यहां जनता तमाशे देखना बहुत पसंद करती है। पिछले दिनों देश का सबसे बड़ा तमाशा जनता ने देखा और उसमें भागीदारी भी की। 16 अगस्त से अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल लाने की मांग पर अनशन पर बैठे। भ्रष्टाचार को मिटाने की उनकी मुहिम को बहुत से लोगों ने गंभीरता से लिया, लेकिन अधिकतर जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे यह एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया। 24 घंटे टीवी पर दर्जनों न्यूज चैनल्स पर लाइव कवरेज किसी बहुत बड़े तमाशे के समान थी। अन्ना व उनकी टीम ने तो इसे आंदोलन की तरह चलाया लेकिन जनता ने इसे तमाशे की तरह लिया। सरकार ने आंदोलन खत्म कराने के लिए अन्ना हजारे की मांगों को मानने का आश्वासन दिया और उनका अनशन खत्म हो गया। अन्ना का अनशन खत्म होते ही जनता के लिए तमाशा खत्म हो गया। अब अन्ना के आंदोलन के साथ जुडऩे वाले लोग कम नजर आते हैं। राजनीतिक पार्टियां अपनी राजनीतिक फायदे के लिए जनता के साथ इस तमाशे में शामिल हुई। तमाशा खत्म होते ही सब अपने-अपने काम पर लग गए। कहीं कोई बदलाव नजर नहीं आया। अन्ना के आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचारियों ने कुछ हद तक जनता को तंग नहीं किया लेकिन आंदोलन खत्म होते ही रिश्वत लेने व देने का खेल फिर से पहले की तरफ चल पड़ा। 
जनता यदि इस आंदोलन को तमाशा नहीं समझती तो इस आंदोलन को अप्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ाया जाता। क्यों जनता सरकारी दफ्तरों में चल रहे भ्रष्टाचार को सामने नहीं लाती, क्यों रिश्वत मांगने का विरोध नहीं कर पाती। क्यों इस आंदोलन में कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी शामिल नहीं हुआ। अन्ना के आंदोलन को जनता ने तमाशा ही समझा और 12 दिन तक चले इस तमाशे के बाद सभी ने तालियां बजाई, जश्न मनाया और अपने-अपने रास्ते हो लिए। इस देश में अगर भ्रष्टाचार को मिटाना है और बदलाव लाना है तो इस आंदोलन को आंदोलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए और आगे बढ़ाना चाहिए, न कि तमाशा समझ कर भुला दिया जाना चाहिए।


वाह रे वाह मंत्री जी


हर रोज की तरह शुक्रवार को भी मैं एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक समाचार पत्र पढ़ रहा था. मुख्य पृष्ठ पर कुछ देश-विदेश के समाचारों के साथ-साथ हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की फोटो के साथ छपे एक समाचार ने बरबस ही मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया. समाचार पर ध्यान जाना भी लाजमी था. भ्रष्टाचार के इस दौर में अगर मुख्यमंत्री का यह ब्यान छपा हो की हरियाणा प्रदेश में ऊपर से निचे तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कृतसंकल्प है तो समाचार पढना भी जरुरी था. साथ ही मुख्यमंत्री का कहना था की प्रदेश से भ्रष्टाचार समाप्त करना उनकी प्राथमिकता है. जिसके लिए प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्तियां की गई है. भ्रष्टाचार की किसी भी शिकायत पर तुरंत कार्यवाही की जाएगी. 
दिल को एक तसल्ली सी मिली की शायद मेरा यह छोटा सा प्रदेश जल्द ही भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनने वाला है. लेकिन यह क्या अभी यह समाचार पढ़ें कुछ समय ही हुआ था की मुझे एक परिचित मिला. हालचाल जानने के बाद मैंने उनसे पूछ ही लिया की आज कल कहाँ हो. उन्होंने तपाक से जवाब दिया की कुछ मत पूछ यार, धक्के खा रहा हूँ. मैंने पूछा की भाई ऐसी क्या बात हो गई. अच्छी भली सरकारी नौकरी है, परेशानी क्या है. उसने कहा की कुछ नहीं यार हिसार से तबादला हो गया था उसे रुकवा कर आया हूँ. प्रदेश के जन स्वास्थ्य विभाग में 450 जे. ई. कार्यरत्त है, जिनमे से 250 के तबादले एक महीने के अन्दर कर दिए गए. ऐसा नहीं है की ऐसा सिर्फ जे. ई. के साथ किया गया हो. एस.डी.ओ. के साथ भी ऐसा ही हुआ है. 
मैंने अचरज भरे लहजे में कह ही दिया की इसमें क्या बात है यार, तबादले तो होते ही रहते है. अरे नहीं यार ऐसा नहीं जो तुम सोच रहे हो. यह कोई आई.ए.एस. या आई.पी.एस. के तबादले थोड़े ही है जो प्रदेश की प्रशासनिक व् सुरक्षा व्यवस्था सुचारू बनाने के लिए किये गए हो. सब पैसे खाने का चक्कर है. अब कोई तबादला रुकवाने के लिए पैसे देगा तो कोई मनपसंद स्थान पर तबादला करवाने के नाम पर. बस इन तबादलों के पीछे मकसद एक ही होता है की पैसा एकत्रित करना है. जितने ज्यादा तबादले उतना ज्यादा धन. अब तुम ही बताओ की 450 जे.ई. में से एक साथ 250 के तबादले करना क्या मामूली बात लगती है. ऐसा कौन सा काम रुका पड़ा था जो तबादले करने से शुरू हो जायेगा. 
बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी. लेकिन साथ ही मुख्यमंत्री का ब्यान भी दिमाग की चक्करी काट रहा था. लग रहा था की यार तबादले से सहम कर ऐसा कह रहा है तो दिल कह रहा था की जब सरकारी मंत्री ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे तो मुख्यमंत्री क्या कर सकते है. दिमाग की बत्ती जली और समझ में आया की आखिर आदेश जारी तो मंत्री जी ने ही किये है, और तबादला रोकने के आदेश भी मंत्री जी को ही करने है. इसका मतलब कुछ न कुछ तो मकसद है, इन तबादलों के पीछे. कहीं ऐसा तो नहीं की तबादले के नाम पर निचे से ऊपर तक पैसा खाया जाना हो. जिसकी जहा तक पहुँच है वो वहीँ से अपना तबादला रुकवाने की कोशिश करेगा या फिर मनपसंद स्थान पर करवाने की. बस फिर क्या था दिल से बरबस ही आवाज निकल पड़ी की वाह रे वाह मंत्री जी.


केंद्र सरकार की कब्र खोद रही है कांग्रेस


अपने पहले कार्यकाल में यूपीए सरकार ने कोई ढंग का काम किया होगा, तब ही जनता ने यूपीए को दूसरा मौका दिया। लगता है इसी बात से कांग्रेस का दिमाग खराब हो गया और दूसरे कार्यकाल में सरकार ने अनाप-शनाप काम करने शुरू कर दिए। भ्रष्टाचार और महंगाई से मुक्ति दिलाने में नाकाम केंद्र सरकार ने अन्ना के आंदोलन को दबाने का प्रयास करके अपनी सत्ता के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। कांग्रेस इस वक्त केंद्र सरकार की कब्र खोदने का काम कर रही है।
यूपीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में रोजगार की गारंटी कानून लागू किया। खूब वाहवाही लूटी। दोबारा सरकार बनी। मगर, दूसरा कार्यकाल तो जैसे यूपीए सरकार के लिए मुसीबतों का टोकरा लिए हुए बैठा था। इस टोकरे में से कभी कॉमनवेल्थ घोटाला, कभी 2जी घोटाला, कभी मुम्बई में आदर्श सोसायटी घोटाला तो कभी काले धन का मामला या फिर महंगाई की रोकथाम में नाकामयाबी के बम निकलकर सरकार के ऊपर फूटते रहे। सरकार ने इन बमों से बचने के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन सरकार इन बमों के फटने से हुए गहरे गड्ढों में गिरती चली गई।
जनता महंगाई से पहले ही परेशान थी, भ्रष्टाचार मामलों ने जनता में आक्रोष फैला दिया। तब अन्ना हजारे के रूप में जनता को महात्मा गांधी की झलक नजर आई और अप्रैल में जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर हुए आंदोलन में आम जनता जी-जान से जुड़ गई। अन्ना के आंदोलन से जनता की अदालत में खुद को हारा महसूस कर रही तिलमिलाई यूपीए सरकार ने काला धन वापस लाने की शांतिपूर्वक ढंग से मांग कर रहे बाबा रामदेव पर भी लाठियां बरसाने में परहेज नहीं किया।
अब अन्ना के आंदोलन की दूसरी कड़ी में सरकार ने अन्ना को गिरफ्तार करके अपनी तिलमिलाहट का एक और उदाहरण पेश किया। कांग्रेस के कुछ वजीर व प्यादे बचकाने ब्यान देकर अपनी झल्लाहट पहले ही दिखा चुके हैं। अब अन्ना हजारे को अनशन के लिए दिल्ली प्रशासन से अनुमति लेने के लिए आवेदन करना पड़ा और फिर भी अनुमति नहीं मिली। पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया। इसका मतलब ये हुआ कि छोटे-मोटे अनशन या धरने-प्रदेशन को तो सरकार कुछ समझती ही नहीं थी। पूरे देश की जनता अन्ना के साथ जुडऩे लगी तो कांग्रेस को कानून याद आ गया। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भट्टा पारसौल गए तो कांग्रेस ने कानून को किसी कोने में सडऩे के लिए छोड़ दिया। उस वक्त कहां थी अंबिका सोनी या कहां था अरुण तिवारी।
अब कांग्रेस से जनता जवाब मांग रही है। अन्ना को एक इंसान समझकर कांग्रेस ने बड़ी भूल की है। अन्ना तो एक विचार है, जो धीरे-धीरे जनता के दिल-ओ-दिमाग में घर करता जा रहा है। जिस दिन देश का सब्र का बांध टूट गया तो यह विचार एक तूफान बनकर आएगा और कांग्रेस सरकार का सफाया कर देगा। बात सिर्फ कांग्रेस सरकार की भी नहीं है, ये विचार सही ढंग से सफर करता रहा तो हर आने वाली सरकार को इस विचार से सावधान रहते हुए ईमानदारी से काम करना पड़ेगा।


किसी के ख्यालों में


मैं जब
किसी के ख्यालों में
डूब जाता हूँ
उतरने लगती है
कवितायें
कागज पर आपने आप.

हॉकी शर्म से झुकी
देश डूबा है
विश्व विजेता बनने की ख़ुशी में
खिलाडियों ने रन बनाये
सरकारों ने बरसाया धन.
ऐसा लगता है
जैसे देश की सारी समस्याएं
हो गई छूमंतर.
पर ख्याल आता है
कुछ दिन पहले जीती
हॉकी प्रतियोगिता का.
कौन लौटा
कौन से घर
किसी को कुछ पता नहीं
हॉकी आज
राष्ट्रीय खेल होकर भी
शर्म से घर में झुकी पड़ी है
किसी कोने में.


वैलडन आफिसर.....................


दो महीनों में किया एक साल का काम, कुर्सी से उठकर काम करने में ही मिलती है सफलता
महात्मा गांधी यदि यूँ ही घर बैठ जाते तो शायद हम अंग्रेजों को अपने देश से कभी निकाल ही नहीं पाते | शहीदे-आजम भगत सिंह यदि अपनी जवानी के बारे में सोच लेते तो शायद आजादी की मशाल जल ही नहीं पाती | शुक्र है आज भी देश में कुछ अन्ना हजारे ऐसे हैं जो देश के लोगों के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तरह आमरण अनशन अपना कर बिना कुछ बवाल और हिंसा किये सरकार को झुकाने में सक्षम हैं | आज देश ही नहीं बल्कि प्रत्येक प्रदेशों में भी ऐसे चंद आफिसरों की जरूरत है जिनके बलबूते पर ना केवल भ्रष्टाचार का खात्मा किया जा सकता है बल्कि जुर्म की दुनिया को नेस्तानाबूद कर उन्हें सही रास्ते पर लाया भी जा सकता है लेकिन इसकी पहल कौन करेगा | यह सोच का विषय है | 
आप जानकार हैरान होंगे क़ि आज भी हमारे देश में प्रतिभाओं क़ी कमी नहीं है | आज भी प्रदेश में ऐसे आफिसर मौजूद हैं, जो इमानदारी और लगन के साथ अपना काम करते हैं लेकिन क्या ऐसे अधिकारियों को सरकार भी कुछ इनाम देगी, इस पर तो भले ही सवालिया निशान लग जाए लेकिन आपको बता दें क़ि पिछले दो महीनों में करनाल जिले में बतौर ऐ.एस.प़ी तैनात हुए आई.प़ी.एस आफिसर हामिद अख्तर ने उन कारनामों का खुलासा किया है जिनका खुलासा पूरे देश में नहीं हो पाया | वर्ल्ड कप में भले ही सटोरिये छाए रहे हों लेकिन उत्तर भारत में इस अधिकारी ने अकेले अपने बलबूते पर चार ऐसे सट्टेबाजों का खुलासा किया जो वर्ल्ड कप में लाखों करोड़ों का सट्टा लगा रहे थे | 
अधिकारी क़ि इस कारवाई ने एक बात साफ़ तौर पर जाहिर कर दी थी क़ि सफलता कुर्सी पर बैठे नहीं मिलती बल्कि सफलता को हासिल करने के लिए नीचे के कर्मचारियों  के सहारे ही नहीं बल्कि खुद भी समस्या से दौ-चार होना पड़ता है | हामिद अख्तर करनाल क़ि पुलिस लौबी में एक ऐसी शख्शियत बनकर उभरे हैं जिस पर आई.जी. वी. कामराजा को भी नाज होना चाहिए और हो भी क्यों ना , खुद आई.जी. सडकों पर निकल कर जनता क़ी बात सुनते हैं और मौक़ा मिलने पर उन भ्रष्ट और काम चोर पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कारवाई करने से गुरेज नहीं करते , जो पुलिस का नाम केवल मिटटी में मिलाना जानते हैं | लगता है कि हामिद अख्तर आई.जी. वी. कामराजा से विशेष ट्रेनिंग ले कर आये हैं | 
करनाल में आते ही उन्होंने वर्ल्ड कप के सट्टेबाजों का खुलासा तो किया ही किया साथ ही साथ ऐसे कईं गिरोह का पर्दा भी फाश कर दिया , जिन पर हाथ डालने के लिए पहले के आई.प़ी.एस. अधिकारी न केवल गुरेज कर रहे थे बल्कि डर भी रहे थे लेकिन काम और ईमान के पक्के हामिद अख्तर ने कोई समझौता नहीं किया | यह बात हालांकि उन अधिकारियों को पच नहीं पा रही जो पूर्व में एक दिन के मुख्यमंत्री की तरह अख्तर के पास जिला हवाले कर गए थे | लेकिन दो ही महीनों में इस आई.प़ी.एस अधिकारी ने उन कार्यों को अंजाम दे दिया जो शायद जिले की पुलिस साल भर में नहीं कर पाती | जरा इस डिटेल पर नज़र डालिए |
शाबाशी मिलेगी या होगी दुर्गति
हामिद अख्तर ने बतौर आई.प़ी.एस अधिकारी होने का जो फर्ज निभाया है , उनका यह फर्ज अकेले भी नहीं था | उनके साथ उनकी पूरी टीम साथ थी | अब देखना यह होगा क़ि क्या उनके द्वारा किये गये कार्यों क़ी प्रशंशा क़ी जाती है या फिर उन अधिकारियों व कर्मचारियों को तबादले के रूप में दंड दिया जाता है जो हामिद अख्तर जैसे आई.प़ी.एस अधिकारी का साथ दे रहे थे | यूँ तो आई.जी. वी. कामराज अपने नाम से ही नहीं बल्कि अपने काम से जाने जाते हैं | शायद हामिद अख्तर ने भी उन कदम चिन्हों पर चलने का प्रयास किया है | देखने वाली बात होगी क़ि क्या ऐसे अधिकारी को दोबारा किसी जिले का कप्तान बनाकर जुर्म को कम करने के लिए मौक़ा दिया जा सकता है या फिर उन्हें इस मौके से हटा दिया जाता है | यह भले ही सरकार के हाथ में हो लेकिन प्रदेश क़ि जनता इस फैसले का इन्तजार जरुर करेगी | 
करनाल से अनिल लाम्बा की गुफ्तगू


आरक्षण जरुरी की बेटिया


मेरे शहर हिसार सहित देश-प्रदेश में हर और आरक्षण का शोर कभी भी और कहीं भी सुन सकते है. आज हर कोई आरक्षण की अंधी दौड़ में भागा चला जा रहा है. आरक्षण की मांग करने वालो से आम जनता को कोई सरोकार नहीं होता बावजूद इसके उनकी आत्मा हर समय यही दुआ करती है की कोई अनहोनी ना हो जाये. हिसार सहित जहां पूरा हरियाणा जात आरक्षण की आग में झुलसा वहीँ राजस्थान में भी गुर्जर आन्दोलन का धुँआ शांत नहीं हुआ है. हरियाणा में जाट आरक्षण व् राजस्थान में गुर्जर आन्दोलन के कारण पूरा शहर रुका सा नजर आ रहा था. 
अब लोकसभा में महिला आरक्षण को ही देख लो. लम्बे अरसे से हर सरकार पर एक ही दबाव था की महिला आरक्षण बिल पारित किया जाये. शुक्र है भगवान् का की बिल तो पारित हो गया लेकिन इतना जरुर है की यह बिल पारित होने से एकाएक राजनीति जरुर गरमा गई थी. ठीक भी है भाई, नेता है तो राजनीति चमकाने के लिए शोरगुल तो करेंगे ही. उन्हें इस बात से क्या लेना देना की जिन महिलाओ को पुरुषो के बराबर का दर्जा दिलाने की वो बात कर रहे है वही महिलाये आज कन्या भ्रूण हत्या जैसी फैली बीमारी के कारण पेट में ही मारी जा रही है.
शोरगुल करने वाला नेता इस महामारी पर लगाम लगाने में जहाँ नाकाम है वही सरकारे भी लचीला कानून होने के कारण कुछ कर पाने में असमर्थ है. बावजूद इसके आज पैसे के लालच में एक डाक्टर इतना अँधा हो चुका है की वो इस धंधे को बंद ही नहीं करना चाहता. और सिर्फ डाक्टरों को ही क्यों दोष दिया जाये. भले ही हिन्दू, मुस्लिम, सिख हो या चाहे इसाई, हर वर्ग और जाति के लोगो के घरो में कन्या भ्रूण हत्या होती रहती है. खुद गर्भवती महिलाये भी नहीं चाहती की उसके घर में पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा हो तो कुछ घरो में वंश बढ़ाने के लिए लड़का जरुरी है कह कर गर्भपात करवा दिया जाता है.
फिर महिला आरक्षण बिल पारित होने पर हिसार सहित पूरे देश की महिलाओ को जो ख़ुशी है कहीं वो ख़ुशी सिर्फ राजनितिक तो नहीं है. अगर ऐसा नहीं है तो बुढ़ापे की लाठी सोच कर जिन पुत्रो को जनने के लिए आज हमारा समाज बेताब क्यों हो रहा है उनके स्थान पर अगर बेटियों को पैदा करने के लिए सरकार आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा प्रदान करे तो शायद देश में बेटिया बचाई जा सकती है. और इसके लिए महिलाओ को आरक्षण नहीं बराबर का दर्जा देना होगा.
वरना आने वाले समय में बेटिया यही कहेंगी की पहले मुझे बचाते फिर आरक्षण पाते.


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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