नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग किसी टेरेरिस्ट से कम नहीं : साहा


साजिश के तहत पब्लिक सेक्टर बैंकों को खत्म करना चाहती है सरकार

हिसार 14 अप्रैल : वर्तमान सरकार एक साजिश के तहत पब्लिक सेक्टर बैंकों को खत्म करना चाहती है। बैंकिंग सेक्टर के लिए पिछले चार सालों में किये गये बदलावों के चलते बैंकिंग सेक्टर आज ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि सरकार खराब स्थिति होने पर बैंकों को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में ले जाएगी और प्राइवेट प्लेयर बोली लगाकर उसे खरीद सकेगा। वर्तमान सरकार में आरबीआई ने बैंकों के लोन रिस्ट्रक्चर के लिए लागू की गयी सभी योजनाओं को बंद कर दिया है, जिसमें सीडीआर, एसडीआर, जेएलएफ आदि योजनाएं हैं। ये कहना है आल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फ्रडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आल इंडिया पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन (एआईपीएनबीओए) के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दिलीप साहा का। वह हिसार में एआईपीएनबीओए हिसार सर्कल की त्रिवार्षिक कान्फ्रेंस में मुख्य अतिथि के तौर पर भाग लेने आये हुए थे। इस कान्फ्रेंस में लगभग 300 बैंक अधिकारियों ने भाग लिया।
यहां पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि देशभर में कुल 10 लाख करोड़ रुपये का एनपीए है और इनमें से 40 उद्यौगिक घरानों के ही 4.5 लाख करोड़ रुपये एनपीए है। सरकार को एक ऐसा क्रिमिनल कानून बनाना चाहिए जिसमें विलफुल डिफाल्डर्स के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो। उन पर एफआईआर दर्ज करके गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार विलफुल डिफाल्टर को बचा रही है तो उन्होंने कहा कि यदि सरकार उन्हें बचा नहीं रही तो कोई सख्ता काननू भी नहीं बना रही।
नीरव मोदी स्कैम के बारे में कामरेड साहा ने कहा कि नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे लोग आर्थिक अपराध कर रहे हैं वो किसी टेरेरिस्ट से कम नहीं हैं। ऐसे इकोनोमिक्स टेरेरिस्ट को ढूंढकर उन्हें सजा दी जानी चाहिए ताकि दूसरों को सीख मिले। उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी से पहले ही ऐसे लोगों का देश से बाहर भाग जाना संयोग नहीं हो सकता। साहा ने कहा कि इस स्कैम में यदि बैंक का कोई अधिकारी शामिल रहा है तो ये काफी शर्मनाक है और उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही होनी चाहिए। 


कागजों में ही दौड़ कर लाखों का डीजल पी गई उपायुक्त की कार


3 वर्षों तक सिर्फ कागजों में दौड़ती रही डीसी साहब की इनोवा
हिसार (राजेश्वर बैनीवाल)। प्रदेश की मनोहर सरकार भले ही सिस्टम को भ्रष्टाचार मुक्त करने के दावे करती नहीं थकती, लेकिन उसी सरकार के सिस्टम को सरकार के ही अधिकारी
भ्रष्टाचार से खोखला करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा मामला फतेहाबाद की जिला आईटी सोसाइटी का है। जिला आईटी सोसाइटी (डीआईटीएस) का काम जिले के बीपीएल परिवारों और पंचायतों को डिजीटल साक्षर करने का था, लेकिन वो अपने भारी-भरकम फंड को इधर-उधर एडजस्ट करने में ही लगी रही। जिला आईटी सोसाइटी की पिछले तीन साल की आडिट रिपोर्ट में तो यही खुलासा हुआ है। मुख्यमंत्री तक शिकायत जाने के बाद मामले की जांच विजीलेंस को सौंपी गई है।
आडिट रिपोर्ट की मानें तो फतेहाबाद जिले में तीन वित्त वर्ष 2014-15, 2015-16 और 2016-17 तक जितने भी डीसी आए, वो लगातार तीन वर्षों तक रोजाना 120 किलोमीटर इनोवा गाड़ी में घूमते रहे। इतना ही नहीं इन तीन वर्षों में आए सरकारी अवकाश और उनके निजी अवकाशों के दौरान भी ये इनोवा गाड़ी सड़कों पर दौड़ती रही। हां, ये बात अलग है कि जिले के किसी भी डीसी को स्थानीय लोगों या अधिकारियों ने इनोवा गाड़ी में निरीक्षण आदि पर जाते नहीं देखा। इसका सीधा सा मतलब है कि उनके लिए डीआईटीएस की इनोवा गाड़ी कागजों में ही दौड़ती रही और तीन साल में डीजल बिल की आड़ में सात लाख रुपए को ठिकाने लगा दिया गया।
हैरानी तो इस बात की है कि पिछले तीन साल में लगातार वित्तीय अनियमितताएं सामने आने के बावजूद इस गड़बड़झाले को रोकने का किसी ने प्रयास तक नहीं किया। और तो और आडिट रिपोर्ट में भी इन अनियमितताओं को अनदेखा किया जाता रहा। पिछले तीन साल की ऑडिट रिपोर्ट में जो सामने आया है, उसकी जानकारी देते हुए आरटीआई कार्यकर्ता एडवोकेट सुशील बिश्नोई ने बताया कि वित्त वर्ष 2014 से लेकर 2017 तक डीसी की इनोवा गाड़ी पर सात लाख का डीजल एवं रिपेयरिंग खर्च आया है। हैरानी की बात तो ये है कि पिछले एक साल में जिला आईटी सोसाइटी ने एक भी पंचायत को डिजीटल साक्षर करने के लिए एक कैंप तक नहीं लगाया।
जानकारी के अनुसार फतेहाबाद जिले में दो-तीन साल में अलग-अलग उपायुक्त कार्यरत रहे लेकिन एनके सोलंकी ही इन तीन सालों में अधिकतर समय फतेहाबाद के उपायुक्त पद पर रहे। मीडिया ने जब पूर्व डीसी सोलंकी से इस संदर्भ में बात करने का प्रयास किया तो उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया और फोन काट दिया। हालांकि जिला आईटी सोसाइटी के पिछले तीन साल के आडिट रिपोर्ट की एक प्रति भी है। ये इनोवा गाड़ी फिलहाल डीसी फतेहाबाद के निवास पर बने गैराज में बंद शटर के पार खड़ी है।
विजीलेंस को दी जांच : सुशील
एडवोकेट सुशील बिश्नोई के अनुसार उन्होंने पूरे गड़बड़झाले की शिकायत मुख्यमंत्री मनोहर लाल को की थी। मुख्यमंत्री ने शिकायत का अध्ययन करवाकर मामले की जांच का आश्वासन दिया था। अब उन्हें पता चला है कि मामले की जांच विजीलेंस को दे दी गई है। उन्होंने कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसी जा सके।


प्रशासन सही या दुकानदार गलत


हिसार: दिन-प्रतिदिन बढ़ते ट्रफिक के जाम से आखिरकार नागोरी गेट के दुकानदारों ने निजात पा ही ली. बाजार में किसी भी तरह का चौपहिया वाहन नहीं आये इसके लिए बाजार के दोनों ओर पाइप गाड़ दिए गए है. ऐसा करने से बाजार में गाडियों का प्रवेश बंद हो गया है वहीँ सारा दिन वाहनों से खचाखच रहने वाला यह बाजार अब खाली-खाली सा लगता है. दुकानदार भी खुश है की उनकी मेहनत रंग लाई लेकिन शायद किसी भी दुकानदार ने यह नहीं सोचा की बाजार वालों की वन-वे करने की मांग पर पाइप लगाना ठीक है या गलत. यहीं कारण है की अब गुफ्तगू हो रही है की इस बाजार में जाम की स्थिति निपटने के लिए की गई कार्यवाही पर प्रशासन सही है या इस जाम को खुद ही बढ़ावा देने के लिए दुकानदार गलत.
क्योंकि नागोरी गेट के जाम व् वन-वे के खिलाफ आवाज उठाने वाले किसी भी दुकानदार ने कभी चाहा ही नहीं की बाजार से ट्रफिक कम हो. ऐसा नहीं है की दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाम के लिए पुलिस प्रशासन दूध का धुला है लेकिन दुकानदार भी बराबर के दोषी है. सही मायने में तो इस बाजार के हाल के लिए पुलिस व् दुकानदार के साथ-साथ वह जनता भी कसूरवार है जो बाजार में खरीददारी करने के लिए आती है. यह सही है की दुकानदार से लेकर आम आदमी तक नागोरी गेट में लगने वाले जाम से परेशान है. यह भी सही है की पुलिस प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है. लेकिन फिर भी कोई कुछ नहीं कर रहा. पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है तो दुकानदार अपनी दूकान में कम और सड़क पर ज्यादा बैठा दिखाई देता है.
नागोरी गेट के दुकानदारों का आलम यह है की वो दो फुट से पांच-पांच फुट तक सड़क पर बैठे दिखाई देते है. उस पर दूकान के बोर्ड और सामान सड़क पर रख दिया जाता है वह अलग से. खरीददारी के लिए आने वाली जनता भी कुछ कम नहीं है. अक्सर ऐसा होता है की वाहन चलते कम और दुकानों के बहार खड़े ज्यादा दिखाई देते है. बावजूद इसके दुकानदारों ने मंत्री-संतरी से लेकर अधिकारियों तक को ज्ञापन देकर नागोरी गेट को वन-वे करने की मांग की. लेकिन एक बार जब पुलिस प्रशासन द्वारा नागोरी गेट को वन-वे किया गया था तो दुकानदारों ने काम कम होने की दुहाई दी थी तो आज प्रशासन ने ही वन-वे की मांग के अनुरूप अपनी ड्यूटी का ढीकरा जनता के सिर फोड़ने का काम किया है.
वैसे तो पुलिस प्रशासन समय-समय पर विभाग में पुलिसकर्मी कम होने का रोना रोता रहा है लेकिन ऐसा बहुत कम ही हुआ है की इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा हो. लेकिन हाल फिलहाल पुलिस प्रशासन ने जो कारनामा किया है उससे जनता को आज नहीं तो कल फिर से प्रशासन को ही कोसना पड़ेगा. हर किसी को सोचना पड़ेगा की कौन गलत कर रहा है और कौन सही. तभी सिर्फ नागोरी गेट ही नहीं बल्कि हर शहर, प्रदेश व् देश से जाम की स्थिति से निपटा जा सकता है.


मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है


संयम जैन, स्वतंत्र पत्रकार
हिसार: सही कहा है कि मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है। चाहे वह नेता हो, अफसर हो, चोर हो या फिर शहर के रेहड़ी, ऑटो व चाय वाले। शहर के महावीर स्टेडियम में इन दिनों सेना की भर्ती चल रही है। रोजाना हजारों बेरोजगार युवा अपना भाग्य आजमाने शहर में आ रहे हैं। सुनने में आया कि शहर में आने वाले इन हजारों युवाओं से रेहड़ी, ऑटोरिक्शा, चायवाले, रिक्शा वाले सामान्य से कई गुणा अधिक वसूली कर रहे हैं। 5 रुपए की चाय को 10 रुपए में बेचा जा रहा है। 10 रुपए की जगह ऑटो का किराया 30 रुपए तक लिया जा रहा है। फलों के दाम भी बढ़ा दिये गए हैं। सुनकर बहुत दुख हुआ। जब नेता निर्दलीय या एक पार्टी की टिकट पर चुनाव लडक़र मौके का फायदा उठाते हुए अपने समर्थकों को धोखा दे सकता है तो फिर ये गरीब लोग क्यों पीछे रहें। नेता तो करोड़ों में अपना ईमान और अपने समर्थकों की भावनाओं को बेचता है। इन गरीब रिक्शा या रेहड़ी वालों ने तो कुछ रुपए ज्यादा ही वसूले हैं। अफसर तो मौका देखकर रिश्वत लेता है फिर इन गरीबों का थोड़ा अधिक मुनाफा कमाना क्यों गलत है।
    यह बात अलग है कि रेहड़ी, ऑटो व चाय वालों की इस हरकत से शहर का नाम दूसरे जिलों में बदनाम होगा, मगर जिला अधिकारियों को क्या फर्क पड़ता है। जब नगर निगम अधिकारियों को शहर में चल रहे अवैध निर्माण नजर नहीं आ रहे हैं तो फिर बिना अनुमति रेहड़ी लगाकर ग्राहकों से अधिक वसूली कैसे नजर आएगी। जब यातायात पुलिस शहर की यातायात व्यवस्था को बिगाडऩे में मुख्य कारण बने ऑटो रिक्शा वालों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है तो अधिक किराया वसूली पुलिस कैसे रोक सकती है।
बचपन में सुनी एक पुरानी कहानी याद आती है, जिसके अनुसार एक भारतीय नेता जापान घूमने जाता है। वहां रेलवे स्टेशन पर उसे कहीं फल नहीं मिलते। वह अपने साथियों से कहता है कि जापान में तो कहीं फल ही नहीं मिलते। एक जापानी यह सुनकर कहीं से फलों का टोकरा भरकर लाता है और उस नेता को दे देता है। नेता उसे रुपए देना चाहता है मगर वह जापानी रुपए लेने से इंकार कर देता है और कहता है कि यह बात दोबारा मत कहना कि जापान में फल नहीं मिलते।
अब इन बेचारे रेहड़ी, रिक्शा, ऑटो या चाय वालों को ऐसी देशभक्ति से क्या मतलब। लगातार बढ़ती महंगाई के इस दौर में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो जाये तो यही बहुत है। रसोई गैस सिलैंडर की कीमतों में 250 रुपए तक बढऩे की खबर सुनने के बाद तो गरीब क्या अमीर भी अपने धंधे में मुनाफे की दर बढ़ाना चाहेगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद तेल दामों में वृद्धि की भी खबर है। ऐसे में ऑटो रिक्शा वालों ने अभी से ज्यादा किराया लेना शुरू कर दिया तो क्या खास बात है।
सेना की भर्ती तो बस एक मौका है। मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है। ए. राजा को केंद्रीय मंत्री बनने का मौका मिला तो उसने 1 लाख 70 हजार करोड़ का 2जी स्कैम कर डाला। सुरेश कलमाड़ी को कॉमनवेल्थ समिति का प्रमुख बनने का मौका मिला तो उसने 70 हजार करोड़ का घोटाला कर दिया। देशभक्त अन्ना हजारे को भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने का मौका मिला तो उन्होंने देश को जोड़ा। मगर, यूपीए सरकार को मौका मिला तो उसने अन्ना हजारे के आंदोलन को ही दबा दिया। ये तो मौके की बात है। मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है, फिर इन बेचारे गरीब रेहड़ी, चाय या ऑटो वालों ने कौन सा गुनाह कर डाला।


पुलिस सही... या अभिभावक गलत ?


हरियाणा: किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था की एक सुबह जब वो सो कर उठेंगे तो उन्हें एक ऐसा ह्रदय विदारक समाचार सुनने को मिलेगा की ना सिर्फ उनकी आँखे फटी की फटी रह जाएगी बल्कि हरियाणा सरकार की नींद भी खुल जाएगी. फिर भले ही वो अम्बाला में हुए सड़क हादसे में मारे गए स्कूली बच्चों का मामला हो या हिसार में एक ऑटो के पलटने से स्कूली बच्चे की मौत की घटना हो. इसके साथ ही कभी बड़े वाहन की चपेट में आने से किसी साइकिल सवार छात्र-छात्रा की मौत सुनने में आती है तो कभी तेज रफ़्तार से दुपहिया वाहन चलाने वाले स्कूली बच्चे की सड़क दुर्घटना का समाचार.
जबकि हाल ही में अम्बाला और हिसार में हुए सड़क हादसों में हुई स्कूली बच्चों की मौत ने सभी को हिला कर रख दिया. दोनों ही मामले इतने दर्दनाक थे की शासन के साथ-साथ प्रशासन ने भी सख्ती दिखाई और योजनाबद्ध तरीके से एक के बाद एक कई नियम बना दिए. प्रशासन का डंडा कभी ऑटो चालको पर पड़ा तो कभी वह स्कूली वाहन पर भारी पड़ता दिखाई दिया. स्कूल संचालक भी प्रशासन के इस डंडे से नहीं बच पाए. स्कूली वाहनों को दुरुस्त करने के लिए जहाँ प्रशासन ने कमर कस ली वहीँ नए साल का आगाज होते ही प्रशासन ने सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने का भी मन बनाया.
एक दौर शुरू हुआ प्रशासन के आदेशों का. दुर्घटनाओं से निपटने के लिए ऑटो में 6 सवारियों से अधिक नहीं बैठाने को लेकर ऑटो चालकों और प्रशासन के बीच लम्बी लड़ाई चली तो कभी अधिकारियों ने फूल देकर स्कूली ऑटो को समझाने का प्रयास किया. कभी स्कूलों से स्वयं का वाहन खरीदने का आह्वान किया गया तो कभी भेड़ बकरियों की तरह बच्चों को ठूसे स्कूली वैन के चालान किये गए. यहाँ तक की प्रशासन ने स्कूल संचालको की बैठके आयोजित कर निर्देश दिए गए की स्कूली बच्चों को लाने-ले जाने के लिए एक योजना तैयार करे जिससे बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके.
प्रदेश भर के हर जिले में स्कूली बच्चों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं से निपटने के लिए प्रशासन द्वारा देरी से उठाया गया यह कदम नए साल के आगाज के लिए तो अच्छा है लेकिन इसके परिणाम आने अभी बाकी है. क्योंकि आज भी प्रतिदिन किसी न किसी स्कूली वाहन का चालान किया जा रहा है तो कभी ऑटो स्कूली बच्चों से खचाखच भरे दिखाई देते है. बावजूद इसके आज पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही यह कार्यवाही तो सभी को रास आ रही है लेकिन यह बात किसी के गले नहीं उतर रही की जब पुलिस इतना कर रही है तो आखिर अभिभावक अभी तक क्या कर रहे है.
स्कूल भेजने की आपाधापी में जहाँ आज भी अभिभावक अपने लाडलों को खचाखच भरे ऑटो से स्कूल भेजने में नहीं हिचकिचा रहे वहीँ भेड़ बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर भरी गई स्कूल वैन में अपने बच्चों को भेजने से उनको कोई परहेज नहीं है. इसके साथ ही किसी दुर्घटना की परवाह किये बिना कभी स्कूल तो कभी ट्युसन के नाम पर कम उम्र के बच्चों को दुपहिया वाहन थमा दिया जाता है. अभिभावकों के इस कदम से और पुलिस प्रशासन की इस कार्यवाही से यह गुफ्तगू अब आम हो गई है की आज जो हो रहा है उसमे पुलिस सही है या अभिभावक गलत है ? सोचना आपको है और करना भी आपको.


योजनाएं तो बनती ही खाने के लिए है



राष्ट्रीय : राजीव गाँधी जी अक्सर अपनी जनसभाओ में एक बात पुरजोर से कहते थे की सरकार द्वारा शुरू की गई किसी भी योजना का 25 प्रतिशत हिस्सा ही जनता तक पहुँच पाता है जबकि बाकी का पैसा तो बीच रास्ते में ही ख़त्म कर दिया जाता है. शायद सही ही कहते थे वो. आज देश के लगभग हर प्रदेश में यही हो रहा है. बात करे केंद्र सरकार की तो वो भी राजीव गाँधी जी के इस कथन से अछूती नहीं है. आज केंद्र सरकार द्वारा भी शुरू की गई किसी भी योजना का पूरा-पूरा लाभ जनता तक नहीं पहुँच पा रहा है.
कामनवेल्थ गेम्स हो या आदर्श सोसाईटी घोटाला या फिर हो 2 जी स्पेक्ट्रम मामला. सभी को पता है की इन सभी योजनाओं का कितना पैसा जनता के हित में खर्च हुआ और कितना ही पैसा बीच रास्ते में ही लुटा दिया गया. नेताओं व् भ्रष्ट  अधिकारियों के लिए यह कोई पहला मौका था की उन्हें योजनाओं के तहत पैसा खाने का अवसर मिला है. लेकिन इतना जरुर है की बीते वर्ष में जितनी तादात में पैसा खाया गया उसे देख अब यह गुफ्तगू आम हो गई है की आज योजनायें बनती ही पैसा खाने के लिए है.
सड़क निर्माण हो या स्ट्रीट लाईट या हो सीवरेज व्यवस्था का रख-रखाव. सरकार या प्रशासन द्वारा चलाई गई हर योजना को शुरू करने से पहले यह हिसाब लगाया जाता है की इस योजना से कितना पैसा खाना है. हरियाणा सरकार की कन्यादान योजना के तहत मिलने वाले 31000 रूपए हो या मकान अनुदान योजना के तहत मिलने वाले 50000 रूपए या हो बुढ़ापा पेंशन वितरण, जनता तक कोई भी रकम भी पूरी नहीं पहुँच रही. कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालें की आग में जहाँ दिल्ली की मुख्यमंत्री शिला दीक्षित के हाथ भी जल चुके है वहीँ बिहार के विकास के पुरोधा नितीश कुमार की सरकार भी विवादों के घेरे में आ चुकी है.
प्रदेश की गरीब लड़कियों को साइकिल बांटने की योजना का फैसला तो एक अच्छा कदम था लेकिन भ्रष्ट अधिकारीयों को मौका मिल गया पैसा खाने का. ऐसे  में देश का आगे क्या होगा यह तो समय के गर्भ में है लेकिन इतना जरुर है की सभी को यह अवश्य पता चल गया है की आज सरकारी योजनायें तो बनती ही पैसा खाने के लिए है.


2011 - शर्मसार कर गया हमको


खट्टी - मीठी यादों के साथ साल 2011 हमको अलविदा कह गया. बहुत सी यादें छोड़ गया तो बहुत कुछ करने को सपने दे गया. लेकिन जाते-जाते यह हिसारवासियों को शर्मसार कर गया. शर्मसार सिर्फ इसलिए नहीं की हिसार ए फिरोजा की धरती पर साल गुजरते-गुजरते गुंडागर्दी के साथ-साथ जम कर तोड़-फोड़ हुई बल्कि यह दूसरा मौका था जब देश की "ए" ग्रेड यूनिवर्सिटी में "सी" ग्रेड काम हुआ. 31 दिसंबर की रात से पहले कुछ माह पूर्व जब गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय में कुछ गैर शिक्षक कर्मचारियों ने शिक्षकों को पीटा, उसे देख यह गुफ्तगू आम थी की कौन कह सकता है की यह तकनीकी विश्वविद्यालय "ए" ग्रेड विश्वविद्यालय की श्रेणी में आता है. जबकि 31 दिसंबर की रात 11:59 पर गुजवि में जो कुछ हुआ वो वाकई शर्मसार करने वाला था.
देश के कोने-कोने से गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय में पढने आये छात्रों को उनके परिजनों ने मात्र इसलिए भेजा था की हिसार ए फिरोजा की धरती पर जाकर उनके बच्चे अच्छे संस्कारों के साथ अपने उज्जवल भविष्य का आइना देखेंगे, लेकिन उन्हें क्या पता था की शराब के नशे में धुत उनके बच्चे 50 से अधिक कमरों के शीशे, दरवाजे तोड़ देंगे. इस दौरान आरोपी युवकों ने ना सिर्फ होस्टल वार्डन के कमरे, स्नानघर, कैंटीन सहित सभी जगह के बिजली उपकरणों सहित सारे सामान की तोड़ फोड़ की बल्कि बाद में टूटे सामान को होस्टल के बाहर ले जाकर उसे जला दिया. होस्टल नंबर 1 में नव वर्ष के आगमन पर हास्टल में रहने वाले और बाहर से आए युवकों ने खूब गुंडागर्दी  और दहशतगर्दी फैलाई.
हास्टल में गुंडागर्दी और दहशत फैलाने वाले युवकों को जो सामान सामने दिखा उसे तोड़ते चले गए. उनकी जुबान से एक ही बात निकल रही थी कि यहां के हम हैं डॉन, और नए साल का जश्न डॉन ऐसे ही मनाते हैं. यह घटना जितनी शर्मनाक है उससे भी ज्यादा शर्म की बात तो यह है की गुजवि प्रशासन ने विश्वविद्यालय में पढने वाले हजारों बच्चो की परवाह किये बिना अज्ञात युवकों के खिलाफ मामला दर्ज करवा दिया. हालांकि जिस हास्टल में यह वारदात हुई उस हास्टल के सैकड़ो बच्चे इस घटना के गवाह है. इतना ही नहीं इस वारदात के प्रत्यक्षदर्शी वो सुरक्षा कर्मी भी है जो रात को डयूटी पर तैनात थे. मजेदार बात तो यह है की प्रशासन ने यह जानने का प्रयास तक नहीं किया की तोड़-फोड़ और गुंडागर्दी करने वाले युवक आखिर कौन थे.


20 रूपए में फिर से अन्ना बनने की तैयारी


कुछ दिनों से सुन रहा था की अन्ना हजारे संसद में सख्त जन लोकपाल बिल को पास करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने हेतु 11 दिसंबर को जंतर-मंतर पर एक दिन का सांकेतिक उपवास करने की तैयारी कर रहे है. इसके खिलाफ सरकार की ओर से भी वाकयुद्ध शुरू हो गया है तो दिल्ली पुलिस भी इस उपवास को विफल करने के लिए कई तरह के पैतरे आजमाने लगी है. इस अनशन से क्या होगा व् क्या होना चाहिए जैसे पहलू
पर कुछ लिखता इससे पहले ही आज के समाचारपत्रों में एक समाचार और आया की जानी-मानी समाचार पत्रिका टाइम्स ने अन्ना के आन्दोलन को 2011 की दस बड़ी ख़बरों में शामिल किया है. सुन-पढ़ कर अच्छा लगा की भारतवाशियों के एक साहसी और अच्छे काम को पत्रिका में समाचार के रूप में शामिल किया गया है.
इस समाचार का शीर्षक दिया गया अन्ना के अनशन ने भारत को हिलाया. बिलकुल सही लिखा है. यह शायद अन्ना हजारे के अनशन का ही कमाल था की सदियों से सोई जनता की नींद खुली और अधिकारी, मंत्री-संतरी से सरकार तक की आँखे भी खुल गई. पत्रिका में यह भी सही लिखा है कि इस साल दुनिया भर में जितने भी विरोध-प्रदर्शन हुये हैं, उसमें आम जनता के असंतोष का सबसे प्रभावी प्रदर्शन भारत में अन्ना हजारे के आंदोलन में हुआ. लेकिन गुफ्तगू का विषय यह है की आखिर जिस प्रदर्शन को नई क्रांति, जन आन्दोलन, एक और स्वतंत्रता संग्राम व् भारत की आजादी जैसे नारों से गुंजायमान किया गया आज उस आन्दोलन का हश्र क्या हो रहा है. किसी ने सोचा की आज भ्रष्ठाचार कितना समाप्त हुआ और आगे कैसे कम होगा.
नहीं यह सोचने की किसी के पास फुर्सत ही कहा है. तो क्या हम यह मान लें की आज अधिकारियों ने रिश्वत लेनी बंद कर दी है, या जनता ने इस आन्दोलन के पश्चात किसी भी काम के लिए रिश्वत नहीं दी. शायद ऐसा कुछ भी नहीं है. गुफ्तगू तो यहाँ तक हो रही है की अन्ना के आन्दोलन के बाद तो रिश्वत कम होने के स्थान पर बढ़ी है. साथ ही साथ अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है की इस काम के इतने पैसे लगेंगे वरना अपने अन्ना को ले आओ. बावजूद इसके जहाँ अन्ना उपवास करने का मन बना चुके है वहीँ जनता भी एक बार दोबारा मैं अन्ना हूँ, अन्ना तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है व् अन्ना नहीं वो आंधी है, देश का दूसरा गांधी है जैसे नारों से अन्ना हजारे को हौंसला देंगी. जनता भ्रष्टाचार का खात्मा तो चाहती है लेकिन करने को कुछ भी नहीं.
अब यह सोचना थोडा मुश्किल सा लगता है की अगर सारी जनता जन लोकपाल बिल के लिए लड़ाई लड़ेगी तो भ्रष्टाचार समाप्त करने रूपी हवन में आहुति कौन देगा. माना यह जा रहा था की अन्ना के आन्दोलन में उमड़ा जन सैलाब भ्रष्टाचार व् भ्रष्टाचारियों के खिलाफ था ना की जन लोकपाल बिल को लागू करवाने के लिए. सख्त जनलोक बिल को संसद में पास करवाने की लड़ाई तो अन्ना भी लड़ लेंगे लेकिन अगर हम वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका साथ देना चाहते है तो आपको 11 दिसंबर को अन्ना के सांकेतिक उपवास के दौरान मात्र 20 रूपए की टोपी पहन कर अन्ना बनने की अपनी तैयारी पर लगाम लगानी होगी. हमको रिश्वत देना बंद करना होगा. अगर कोई रिश्वत मांगता है तो उसके खिलाफ आवाज उठा कर अन्ना बनना होगा.


हमने मनाई राजनीतिक दीवाली


गुफ्तगू की ओर से सभी पाठकों, नियमित पाठकों, समर्थकों व् मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं. 


भले ही हिसार उपचुनाव संपन्न हो चुका हो. चुनाव परिणाम भी आ चुका है. मुद्दा यह नहीं की इस चुनाव में कौन जीता कौन हारा. लेकिन इतना जरुर है की सब कुछ होने के पश्चात भी जनता है की हिसार उपचुनाव को भुला नहीं पा रही है. शायद यही कारण रहा की चुनाव के पश्चात वोटों की गिनती और उसके बाद दिवाली के कारण आज बहुत दिनों बाद आपसे गुफ्तगू कर रहा हूँ. क्या करूँ मैं भी आपकी ही तरह दीपों का पर्व दिवाली मनाने में व्यस्त था, तो साथ ही साथ इस बात पर भी मेरा विशेष ध्यान था की अभी कुछ दिनों पहले तक उपचुनाव को लेकर नेताओं द्वारा जो वादे जनता से किये जा रहे थे वो आज कहा काफूर हो गए. 
अब देखो ना आप ख़ुशी-ख़ुशी दीवाली मना रहे थे और मैं और मेरे शहर की जनता राजनीतिक दिवाली मनाने पर मजबूर थे. हमारा राजनीतिक दीवाली मनाने का मुख्य कारण था हिसार लोकसभा उपचुनाव के पश्चात हिसार में एकाएक हुई अपराधिक वारदाते. दिवाली के अवसर पर भी रह-रह कर वो हसीन पल याद आ रहे थे जो हमने चुनाव के दिनों में बिताये थे. चुनाव के दिनों में ना सिर्फ जनता को पूरा दिन बिजली मिली वहीँ कोई अपराधिक घटना होना तो दूर की बात है अपराधी भी ढूंढे से भी नहीं मिल रहे थे. मानो उन्हें या तो कोई काम मिल गया है या फिर जनता के वोट हथियाने की खातिर कोई और काम दे दिया गया है.
एक दिन वो थे जब हिसार के लिए ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब अपराधी कोई भी दिन ऐसा छोड़ते हो जिस दिन वो अपने मंसूबो को अंजाम नहीं देते हो. महिलाओं के लिए चैन स्नेचिंग जहाँ सिरदर्द बनी हुई थी वहीँ व्यापारियों के लिए आये दिन प्रतिष्ठानों के ताले टूटना जी का जंजाल बना हुआ था. हत्या, हत्या प्रयास, चोरी व् धमकी जहाँ आम बात हो गई थी वहीँ बिजली की आँख मिचौली से जनता परेशान थी. नेताओं द्वारा चुनाव के दिनों में दिखाए गए हसीन सपने लिए जैसे ही जनता दिवाली की खुमारी में अभी खोई ही थी की अपराधियों ने हिसार को फिर से अपने आगोश में ले लिया. 
चैन स्नेचिंग का मामला प्रकाश में आया तो एक युवक की हत्या कर दी गई. पुलिस अभी इस मामले को सुलझा पाती की दीवाली से एक दिन पूर्व एक जूते के शोरुम पर गोली चला बदमाश फिरौती की मांग कर गए. अभी दिवाली गई ही थी की शनिवार को आदमपुर के समीप एक युवक का पहले गला रेता फिर उस पर गोलियां दाग कर हत्या कर दी गई. चुनाव के दिनों में हर चौराहे पर दिखने वाली पुलिस भी अपराधियों का कोई सुराग नहीं लगा पा रही है. हद तो उस समय हो गई जब इतना सब कुछ होने के पश्चात भी चुनाव के दिनों में गली-गली दिखने वाला कोई नेता जनता के बीच नजर नहीं आया. कहीं-कहीं नजर आये तो सिर्फ उनके प्रतिनिधि.


जिंदगी के कुछ अच्छे पल


हिसार लोकसभा उपचुनाव की गहमागहमी हुए भले ही महीनों बीत गए हो लेकिन अब कहीं जाकर जनता को पता लगने लगा है की हां चुनाव आ गया है. सिर्फ इसलिए नहीं की मतदान की तिथि समीप आ गई है या चुनाव का शोर बढ़ गया है बल्कि इसलिए की चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जिसकी भरी गर्मी में बिजली नहीं होने से सांस फूली हुई थी. चोरी का आलम यह था की व्यापारियों को नहीं पता था की जो प्रतिष्ठान वो ठीक से बंद कर के जा रहा है वो सुबह स्वयं आकर खोलेगा या शटर के ताले चटके हुए मिलेंगे. बीते कुछ समय में नगर हुई हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ ने आम आदमी की नींद तक उचाट दी थी. पुलिस की हर कोशिश को नाकाम करते हुए चैन स्नेचर आये दिन महिलाओं की या तो चैन तोड़ कर रफूचक्कर हो जाते रहे है या फिर उनका पर्स उड़ा कर भाग जाते थे. 
मगर जनता आज खुश है. उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करना है सिर्फ इसलिए नहीं, बल्कि उनकी ख़ुशी का मुख्य कारण है की आज शहर सहित जिले में जहाँ ना कोई अपराधिक वारदात हो रही है वहीँ महिलायें भी त्यौहार के दिनों में सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन कर पा रही है. लोगो में गुफ्तगू हो रही है की जिन अपराधियों ने जनता का जीना दूभर कर दिया था आखिर आज वो किसके कहने मात्र से अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे रहे. एकाएक कहाँ गए सभी अपराधी. क्या उनको चुनाव के दिनों में कुछ और काम दे दिया गया है. ऐसा भी हो सकता है की हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्नोई व् अनेक भाजपा नेता जो की पिछले दो सप्ताह से हिसार जिले में डेरा डाले हुए है उनके डर व् पुलिस की सक्रियता के चलते सभी अपराधी खामोश हो गए है. 
अभी कुछ दिनों पूर्व जब मई रात को अपनी गली में घुसा तो गली का नजारा कुछ बदला-बदला सा नजर आया. टाक-झांक करने पर पता लगा की जिस गली की स्ट्रीट लाईट कई साल से बंद पड़ी थी आज वो जगमगा रही थी. दीवाली का समय है शायद इसलिए नगर निगम द्वारा ठीक करवा दी गई होगी यह सोच मैं घर के अन्दर चला गया. सुबह जैसे ही गली से गुजर रहा था तो गली की सड़क का वह हिस्सा मुझे खुदा हुआ मिला जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी की यह जल्दी से बनवा दिया जायेगा. आस-पड़ोस वालों ने खुश होते हुए बताया की रात को जेसीबी मशीन से इसको खोदा गया है और यहाँ सीमेंट की सड़क बनवाई जाएगी. अभी कुछ आगे ही चला था की ऐसा ही एक और नजारा देख मैं हतप्रद था. मुख्य सड़क पर आया तो कहीं रंग पुताई का कार्य चल रहा था तो कहीं-कहीं मरम्मत का काम जोर-शोर से जारी था. 
इसका जिक्र मैंने अपने कुछ साथियों से किया. उन्होंने कहाँ की तुम पत्रकारों की यहीं कमी है. कोई काम हो रहा है तो होने दो, क्यों बात को बढाते हो. अब कहीं जाकर तो कुछ विकास के काम हो रहे है उसको भी क्या बंद करवा दोगे. जो मैं सोच रहा था उसने स्पष्ट कह दिया की जो काम बहुत पहले होने चाहिए थे वो आज चुनाव के दिनों में हो रहे है. इसका अर्थ यह हुआ की ऐसा नहीं है की शासन-प्रशासन को पता नहीं होता की कहा क्या कमी है, बस कमी है तो काम को अंजाम तक पहुंचाने की. जो काम आज हो रहे है अगर वो समय पर हो जाये तो सत्ता में रहते हुए ना मुख्यमंत्री को जिले में डेरा डालना पड़े और ना ही पूर्व मुख्यमंत्री को विकास की याद दिलानी पड़े. कुछ भी हो जनता खुश है और चाह रही है चुनाव पांच वर्ष में नहीं अपितु वर्ष में एक बार होने चाहिए, जिससे चुनाव की आड़ में वो जिंदगी के कुछ अच्छे पल गुजार सके.


इतने अन्ना कहाँ से आयेंगे


एक अन्ना, एक सरकार और एक ही कानून को बनाने की कवायद. 12 दिन के अनशन व् एक लम्बी जद्दोजहद के पश्चात् बात कुछ आगे बढ़ी और विपक्ष सहित सरकार जन लोकपाल बिल पर बहस हो तैयार हो गई. विपक्ष हो या भले ही सरकार या यूँ कहे की सम्पूर्ण राजनितिक दलों के इसी घाल-मेल का हम जश्न तो मना चुके है लेकिन कामयाब कब होंगे यह अभी तक किसी को पता नहीं है. लेकिन जनता की एकजुटता ने यह अवश्य दिखा दिया की किस कदर भ्रष्टाचार रूपी दानव से वो परेशान है. जनता का परेशान होना भी लाजमी है और भ्रष्टाचार विरोधी हवन में आहुति डालना भी जरुरी है. लेकिन क्या देश में सिर्फ भ्रष्टाचार ही एक ऐसी बिमारी है जो हमको खोखला किये जा रही है.
अगर आप भी ऐसा सोच रहे है तो आप गलत है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे जी ने आवाज क्या उठाई सभी को भ्रष्टाचार दिखाई देने लगा. मानो इस से पहले किसी को पता ही नहीं था की आखिर यह भ्रष्टाचार भला किस बला का नाम है. जैसे-जैसे अन्ना जी का कारवाँ आगे बढ़ा वैसे-वैसे हम अपनी अन्य परेशानियों को भूलते चले गए. हम भूल गए की जिस तरह हमको भ्रष्टाचार से दो-चार होना पड़ता है उसी तरह हमारे जीवन की रोजमर्रा की ऐसी बहुत सी चीजें है जिनसे हमको जूझना पड़ता है. फर्क मात्र इतना है की हम उन चीजों के लिए आपस में गुफ्तगू तो करते है लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर हुए आन्दोलन के बाद अब इन्तजार कर रहे है की कौन इन चीजों के लिए हमारे लिए आवाज उठाएगा. 
अगर अपनी परेशानियों को लेकर रोज होने वाली उन गुफ्तगू का मैं यहाँ कुछ जिक्र करूँ तो सबसे पहले बात आती है महंगाई की. इसके साथ-साथ लुप्त होती भारतीय संस्कृति, सुरक्षा व्यवस्था, कानून व्यवस्था, ट्रैफिक व्यवस्था, आज की युवा पीढ़ी व् बदन दिखाती युवतियाँ भी शामिल है. ये सभी वो समस्याएं है जिनको हमें भ्रष्टाचार की तरह कभी-कभी नहीं अपितु प्रतिदिन झेलना पड़ता है. लेकिन मजे की बात यह है की इन सभी के खिलाफ हमने आज तक कुछ नहीं किया और ना ही कर सकते है. तो इसका मतलब अगर हम जन लोकपाल बिल के बारे में भी ऐसा सोच लेते तो क्या सरकार संसद में बहस को तैयार हो पाती. अगर आप ऐसा सोच रहे है तो फिर यही कहूँगा की आप गलत है. 
अब समझा मैं की आप अब तक चुप क्यों है. क्योंकि आप यहीं सोच रहे है अब फिर कोई अन्ना बन कर आपकी जिंदगी में आये और आपकी इन समस्याओं के लिए लड़े. एक आन्दोलन खड़ा हो और आप गर्व से कह सके की अन्ना तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है. जैसे आपने तो ठान लिया है की कभी खुद कुछ नहीं करना. छी, शर्म आती है मुझे आपकी यह सोच देख कर. फिर क्यों एक खद्दर की टोपी पहन कर जिस पर लिखा था की मैं अन्ना हूँ कुछ दिन पहले तक आप अपने को अन्ना बता रहे थे. अगर आपकी हर समस्या के समाधान के लिए आपको अन्ना चाहिए तो इतना ही कहूँगा की इतने अन्ना कहा से आयेंगे. अब उठो, जागो और आगे बढ़ो जिससे आपको भी अन्ना हजारे की तरह एक भारतीय कहलाने में गर्व महसूस हो.


वाह रे वाह मंत्री जी


हर रोज की तरह शुक्रवार को भी मैं एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक समाचार पत्र पढ़ रहा था. मुख्य पृष्ठ पर कुछ देश-विदेश के समाचारों के साथ-साथ हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा की फोटो के साथ छपे एक समाचार ने बरबस ही मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया. समाचार पर ध्यान जाना भी लाजमी था. भ्रष्टाचार के इस दौर में अगर मुख्यमंत्री का यह ब्यान छपा हो की हरियाणा प्रदेश में ऊपर से निचे तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कृतसंकल्प है तो समाचार पढना भी जरुरी था. साथ ही मुख्यमंत्री का कहना था की प्रदेश से भ्रष्टाचार समाप्त करना उनकी प्राथमिकता है. जिसके लिए प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्तियां की गई है. भ्रष्टाचार की किसी भी शिकायत पर तुरंत कार्यवाही की जाएगी. 
दिल को एक तसल्ली सी मिली की शायद मेरा यह छोटा सा प्रदेश जल्द ही भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनने वाला है. लेकिन यह क्या अभी यह समाचार पढ़ें कुछ समय ही हुआ था की मुझे एक परिचित मिला. हालचाल जानने के बाद मैंने उनसे पूछ ही लिया की आज कल कहाँ हो. उन्होंने तपाक से जवाब दिया की कुछ मत पूछ यार, धक्के खा रहा हूँ. मैंने पूछा की भाई ऐसी क्या बात हो गई. अच्छी भली सरकारी नौकरी है, परेशानी क्या है. उसने कहा की कुछ नहीं यार हिसार से तबादला हो गया था उसे रुकवा कर आया हूँ. प्रदेश के जन स्वास्थ्य विभाग में 450 जे. ई. कार्यरत्त है, जिनमे से 250 के तबादले एक महीने के अन्दर कर दिए गए. ऐसा नहीं है की ऐसा सिर्फ जे. ई. के साथ किया गया हो. एस.डी.ओ. के साथ भी ऐसा ही हुआ है. 
मैंने अचरज भरे लहजे में कह ही दिया की इसमें क्या बात है यार, तबादले तो होते ही रहते है. अरे नहीं यार ऐसा नहीं जो तुम सोच रहे हो. यह कोई आई.ए.एस. या आई.पी.एस. के तबादले थोड़े ही है जो प्रदेश की प्रशासनिक व् सुरक्षा व्यवस्था सुचारू बनाने के लिए किये गए हो. सब पैसे खाने का चक्कर है. अब कोई तबादला रुकवाने के लिए पैसे देगा तो कोई मनपसंद स्थान पर तबादला करवाने के नाम पर. बस इन तबादलों के पीछे मकसद एक ही होता है की पैसा एकत्रित करना है. जितने ज्यादा तबादले उतना ज्यादा धन. अब तुम ही बताओ की 450 जे.ई. में से एक साथ 250 के तबादले करना क्या मामूली बात लगती है. ऐसा कौन सा काम रुका पड़ा था जो तबादले करने से शुरू हो जायेगा. 
बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी. लेकिन साथ ही मुख्यमंत्री का ब्यान भी दिमाग की चक्करी काट रहा था. लग रहा था की यार तबादले से सहम कर ऐसा कह रहा है तो दिल कह रहा था की जब सरकारी मंत्री ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देंगे तो मुख्यमंत्री क्या कर सकते है. दिमाग की बत्ती जली और समझ में आया की आखिर आदेश जारी तो मंत्री जी ने ही किये है, और तबादला रोकने के आदेश भी मंत्री जी को ही करने है. इसका मतलब कुछ न कुछ तो मकसद है, इन तबादलों के पीछे. कहीं ऐसा तो नहीं की तबादले के नाम पर निचे से ऊपर तक पैसा खाया जाना हो. जिसकी जहा तक पहुँच है वो वहीँ से अपना तबादला रुकवाने की कोशिश करेगा या फिर मनपसंद स्थान पर करवाने की. बस फिर क्या था दिल से बरबस ही आवाज निकल पड़ी की वाह रे वाह मंत्री जी.


आग पश्चिम की, धुँआ भारत का


मंगलवार को विश्व तम्बाकू दिवस था. बहुत से साथियों ने तम्बाकू पर बहुत कुछ लिखा और कुछ मेरे जैसे भी थे जो लिखने से रह गए. लेकिन कहते है की देर आये दरुस्त आयें. कुछ इसी सोच के साथ आज लिखने बैठ गया. लेकिन आज एक अजब सा इतिफाक हुआ. जहाँ आज मैं यह सोच रहा था की भारत में सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करने पर रोक लगी हुई है वहीँ पुलिस अभिनेता सलमान को सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करने के दोष में पकड़ने पहुँच गई. गुफ्तगू हुई की आखिर पुलिस सलमान खान को ही पकड़ने क्यों गई जबकि आज हम प्रतिदिन सैकड़ों लोगो को धुम्रपान करते देख लेते है. तो पता लगा की सलमान को मिडिया वालों ने फिल्म की शूटिंग के दौरान धुम्रपान करते दिखाया था. समाचार का पहलु यह है की सड़क पर चलते, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सरकारी कार्यालय व् अस्पतालों सहित विभिन्न सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान करते लोग आज प्रशासन को नजर नहीं आते लेकिन समाचारों में सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करते सलमान खान अधिकारियों को जरुर दिखाई दे गए.
अब आप ही देख लो की आज जिन पर हमें गर्व है, जिन्होंने भारत का नाम दुनिया में रोशन किया है उन मुट्ठीभर भारतीय युवक-युवतियों को छोड़ दीजिए, लेकिन भारत की सडक़ों पर, पब में, वाइन शॉप में, सिनेमा हॉल में, धार्मिक उत्सवों में और साइबर कैफे  में जिन युवाओं की जमात देखने को मिल रही है उस पर कतई गर्व नहीं किया जा सकता। क्योंकि इस तरह के युवा ना सिर्फ पथ भ्रष्ट हो चुके है बल्कि देश की संस्कृति के लिए सबसे खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। ये हमारे समाज का कल्चर और देश का माहौल बदल रहे हैं। इनकी सोच न तो भारतीय है और न ही इन्होंने खुद की कोई मौलिक सोच डेवलप की है। ना ही उसे किसी विदेशी संस्कृति में ढाला है। ये सभी एक शहरी कोलाहल और पश्चिमी चकाचौंध के बीच अँधी दौड़ के अनुसरणकर्ता हैं।
इन्हें देख यहीं लगता है की यह आग तो पश्चिम की है लेकिन फर्क मात्र इतना है की उस आग का धुंआ जरुर भारत से निकल रहा है. क्या आप जानते है की आखिर आज के युवाओं का ये मूढ क्या गुल खिला रहा है. शायद इसमें इनका कोई दोष भी नहीं है। नकलचियों की ये जमात वर्तमान युग की कई खोखली चीजों से प्रभावित होती है। पहली ब्लयू फिल्मों से, दूसरी पब संस्कृति से और तीसरी इंटरनेट से। इन तीनों का ही कल्चर कुछ इस तरह का है कि ये युवाओं में एक नई सोच के बजाय एक घातक सोच को विकसित कर रहे हैं।
मोबाइल और इंटरनेट:- इंटरनेट की दुनिया में जितनी जानकारियों का संग्रह है, उतना जंजाल भी है। युवा इंटरनेट से ज्ञानवर्धक सामग्री ये ज्यादा कुछ ऐसी बातें खोजते हैं, जो उनके नैतिक पतन का रास्ता तैयार करती है। जैसे कि वेब पोर्टलों पर सुरक्षित यौन संबंध के उपाय क्या-क्या हैं, हार्ड कोर पोर्न साइट, वीडियो, ब्लॉग पर यौन स्टोरिज ऐसे कई टॉपिक हैं, जिन्हें युवा इंटरनेट पर देखने/पढऩे के लिए हर समय बेताव रहते हैं। इंटरनेट पर सोशलनेटवर्किंग साइट्स के जरिए नए दोस्त बनाना बेहद आसान है और फिर इन दोस्तों के साथ सारी हदे पार करने की सीख और प्रोत्साहन भी इंटरनेट से ही मिलता है।
पब कल्चर का प्यार:- बड़े शहरों में बढ़ते पब कल्चर ने लडक़ों-लड़कियों का काम और भी आसान कर दिया है। डिस्को और काम करके खिसको के कल्चर ने सब लचर-पचर कर दिया है। पब ने लडक़ों के साथ लड़कियों को भी नशे में झूमने की सुविधा उपलब्ध करा दी है। यह सब चलता है एडवांस एज और मॉर्डनसिटी के नाम पर। सुनने में यहाँ तक आ रहा है कि कुछ कामकाजी लड़कियों के अलावा नाइट कॉलेज की लड़कियाँ, काल सेंटर या ग्लैरम से जुड़ी लड़कियाँ और माँ-बाप द्वारा खुली छोड़ दी गई लड़कियाँ शराब के अलावा गालियाँ बकना भी सीख गई हैं और देर रात तक घर आना तो अब आम चलन हो चला है।
विज्ञान की मेहरबानी:- विज्ञान की मेहरबानी से अब कुछ ऐसे साधन भी हैं जैसे गर्भनिरोधक गोलियां और बाजार में उपलब्ध दूसरी तरह के गर्भनिरोधक साधनों जिन्होंने अब काम और भी आसान कर दिया है।
आफत में ऑफिस :- काल सेंटर, फैशन, एड, ग्लैमर वर्ल्ड, बैंकिंग, आई-टी सेक्टर या फिर कोई भी प्राईवेट कंपनियों में अब लडक़े और लड़कियों का अनुपात लगभग समान हो चला है। इसमें से कुछ नवविवाहित हैं तो कुछ नहीं भी, लेकिन हैं सभी युवा। सभी उस कल्चर का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जहाँ काम से ज्यादा लोग चापलूसी, दिखावा, रणनीति और प्रेम संबंधों में ज्यादा रत रहते हैं और इनकी आड़ में अपना-अपना मतलब साधने की फिराक में रहते हैं।
शीशा लाऊँज:- इस शीशा लाऊँज से दम मारो दम की तर्ज पर ग्रुप में मजा लिया जाता है। यह धुआँ सिगरेट और अन्य नशे से ज्यादा घातक है क्योंकि पानी के जरिए पहुँचा निकोटिन फेफड़ों में स्थाई रुप से जम जाता है। उससे कहीं  अधिक घातक लगता है किसी भी शीशा लाऊँज का वह माहौल जिसमें लडक़े-लड़कियाँ बेसुध से नशीली हालत में एक-दूसरे को घुरते रहते हैं।
आखिर क्यों अखरता है:- खुली संस्कृति की वकालत करने वाले और इसकी मुखालिफत करने वाले दोनों ही उस तूफान में बह रहे हैं जोकि पश्चिम से उठा है। पश्चिम तो उस तूफान से निजात पाने के तरीके ढूँढ रहा है, लेकिन भारत को अभी तूफान का मजा चखना है। पाश्चात्य कल्चर की वकालत करने वाले कह सकते हैं कि आखिर आपको अखरता क्यों हैं, हमारी मर्जी चाहे हम निर्वस्त्र नाचें।
दिशाहीन युवा:- पश्चिम को मालूम है कि हम कहाँ जा रहे हैं और हमें कहाँ जाना है। चीन जानता है कि उसकी दिशा क्या है। लेकिन भारत के युवा किसी चौराहें पर खड़े नजर आते हैं। उक्त बातों के खिलाफ लोग हाथ खड़े कर सकते हैं- लेकिन बहुसंस्कृति, बहुधर्मी और दुष्ट राजनीतिज्ञों के इस देश में वही होता है जो विदेशी चाहते हैं.


वैलडन आफिसर.....................


दो महीनों में किया एक साल का काम, कुर्सी से उठकर काम करने में ही मिलती है सफलता
महात्मा गांधी यदि यूँ ही घर बैठ जाते तो शायद हम अंग्रेजों को अपने देश से कभी निकाल ही नहीं पाते | शहीदे-आजम भगत सिंह यदि अपनी जवानी के बारे में सोच लेते तो शायद आजादी की मशाल जल ही नहीं पाती | शुक्र है आज भी देश में कुछ अन्ना हजारे ऐसे हैं जो देश के लोगों के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तरह आमरण अनशन अपना कर बिना कुछ बवाल और हिंसा किये सरकार को झुकाने में सक्षम हैं | आज देश ही नहीं बल्कि प्रत्येक प्रदेशों में भी ऐसे चंद आफिसरों की जरूरत है जिनके बलबूते पर ना केवल भ्रष्टाचार का खात्मा किया जा सकता है बल्कि जुर्म की दुनिया को नेस्तानाबूद कर उन्हें सही रास्ते पर लाया भी जा सकता है लेकिन इसकी पहल कौन करेगा | यह सोच का विषय है | 
आप जानकार हैरान होंगे क़ि आज भी हमारे देश में प्रतिभाओं क़ी कमी नहीं है | आज भी प्रदेश में ऐसे आफिसर मौजूद हैं, जो इमानदारी और लगन के साथ अपना काम करते हैं लेकिन क्या ऐसे अधिकारियों को सरकार भी कुछ इनाम देगी, इस पर तो भले ही सवालिया निशान लग जाए लेकिन आपको बता दें क़ि पिछले दो महीनों में करनाल जिले में बतौर ऐ.एस.प़ी तैनात हुए आई.प़ी.एस आफिसर हामिद अख्तर ने उन कारनामों का खुलासा किया है जिनका खुलासा पूरे देश में नहीं हो पाया | वर्ल्ड कप में भले ही सटोरिये छाए रहे हों लेकिन उत्तर भारत में इस अधिकारी ने अकेले अपने बलबूते पर चार ऐसे सट्टेबाजों का खुलासा किया जो वर्ल्ड कप में लाखों करोड़ों का सट्टा लगा रहे थे | 
अधिकारी क़ि इस कारवाई ने एक बात साफ़ तौर पर जाहिर कर दी थी क़ि सफलता कुर्सी पर बैठे नहीं मिलती बल्कि सफलता को हासिल करने के लिए नीचे के कर्मचारियों  के सहारे ही नहीं बल्कि खुद भी समस्या से दौ-चार होना पड़ता है | हामिद अख्तर करनाल क़ि पुलिस लौबी में एक ऐसी शख्शियत बनकर उभरे हैं जिस पर आई.जी. वी. कामराजा को भी नाज होना चाहिए और हो भी क्यों ना , खुद आई.जी. सडकों पर निकल कर जनता क़ी बात सुनते हैं और मौक़ा मिलने पर उन भ्रष्ट और काम चोर पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कारवाई करने से गुरेज नहीं करते , जो पुलिस का नाम केवल मिटटी में मिलाना जानते हैं | लगता है कि हामिद अख्तर आई.जी. वी. कामराजा से विशेष ट्रेनिंग ले कर आये हैं | 
करनाल में आते ही उन्होंने वर्ल्ड कप के सट्टेबाजों का खुलासा तो किया ही किया साथ ही साथ ऐसे कईं गिरोह का पर्दा भी फाश कर दिया , जिन पर हाथ डालने के लिए पहले के आई.प़ी.एस. अधिकारी न केवल गुरेज कर रहे थे बल्कि डर भी रहे थे लेकिन काम और ईमान के पक्के हामिद अख्तर ने कोई समझौता नहीं किया | यह बात हालांकि उन अधिकारियों को पच नहीं पा रही जो पूर्व में एक दिन के मुख्यमंत्री की तरह अख्तर के पास जिला हवाले कर गए थे | लेकिन दो ही महीनों में इस आई.प़ी.एस अधिकारी ने उन कार्यों को अंजाम दे दिया जो शायद जिले की पुलिस साल भर में नहीं कर पाती | जरा इस डिटेल पर नज़र डालिए |
शाबाशी मिलेगी या होगी दुर्गति
हामिद अख्तर ने बतौर आई.प़ी.एस अधिकारी होने का जो फर्ज निभाया है , उनका यह फर्ज अकेले भी नहीं था | उनके साथ उनकी पूरी टीम साथ थी | अब देखना यह होगा क़ि क्या उनके द्वारा किये गये कार्यों क़ी प्रशंशा क़ी जाती है या फिर उन अधिकारियों व कर्मचारियों को तबादले के रूप में दंड दिया जाता है जो हामिद अख्तर जैसे आई.प़ी.एस अधिकारी का साथ दे रहे थे | यूँ तो आई.जी. वी. कामराज अपने नाम से ही नहीं बल्कि अपने काम से जाने जाते हैं | शायद हामिद अख्तर ने भी उन कदम चिन्हों पर चलने का प्रयास किया है | देखने वाली बात होगी क़ि क्या ऐसे अधिकारी को दोबारा किसी जिले का कप्तान बनाकर जुर्म को कम करने के लिए मौक़ा दिया जा सकता है या फिर उन्हें इस मौके से हटा दिया जाता है | यह भले ही सरकार के हाथ में हो लेकिन प्रदेश क़ि जनता इस फैसले का इन्तजार जरुर करेगी | 
करनाल से अनिल लाम्बा की गुफ्तगू


रसोई गैस- सिर्फ एक धंधा


जन सरोकार और जन साधारण के लिए बनी रसोई गैस से आज आम आदमी ही वंचित रह जाता है. गर्मी हो या सर्दी रसोई गैस के लिए हमेशा ही मारामारी रहती है. इसकी मारामारी के पीछे सब के अपने-अपने तथ्य है. जबकि सच्चाई यह है की आज रसोई गैस सभी के लिए एक धंधा बन कर रह गई है. एजेंसी मालिक है तो इसको ब्लैक में बेच कर दो पैसे ज्यादा कमाने के चक्कर में रहता है तो एक कार स्वामी भी कम खर्चे में अपनी कार रसोई गैस से ही चलाना चाहता है. जबकि कोई हलवाई हो या चाय की रेहड़ी लगाने वाला सब को रसोई गैस का घरेलु सिलेंडर ही चाहिए. शादियों और अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठानों में उपयोग अभी अलग रह जाता है. अब अगर इस तरह गैरकानूनी रूप से रसोई गैस का उपयोग करने वालो को ही अगर कल को गैस नहीं मिलती है तो धरना-प्रदर्शन और नारेबाजी करने से यह लोग गुरेज नहीं करते.
ऐसा नहीं है की यह सिर्फ हम ही कह रहे है. हिसार में पिछले कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ उसको देख कर तो ऐसा ही लगता है. अब देखो ना पिछले एक महीने से गैस नहीं मिलने के कारण हिसार निवासी सुबह से लाइन लगाये खड़े थे. उनको इंतजार करते एक घंटे से भी ऊपर हो चुका था की गैस नहीं मिल रही थी. एजेंसी द्वारा बार-बार यही कहा जा रहा था की अभी ट्रक आने वाला है, सभी को गैस मिल जाएँगी. कहते है की इंतजार का फल मीठा होता है तो लोगो को दूर से ट्रक आता दिखाई दिया. लेकिन यह क्या ट्रक आते ही उसमे से गैस उतार कर कहीं ओर जाने लगी. यह देख लोगो के सब्र का बाँध टूट गया और वहीँ पर नारेबाजी शुरू कर जाम लगा दिया. वही दूसरी तरफ हाल ही में शहर थाना के करीब गाड़ियों के ए.सी. में गैस भरने की एक दुकान में सिलेंडर फटने से आसपास हाहाकार मच गया. दुकान धूं- धूं कर जलने लगी. बड़ी मशक्कत के पश्चात जब आग पर काबू पाया गया तो देखा की दुकान में रसोई गैस के चार सिलेंडर रखे हुए थे जो की आग लगने का कारण बने.
ऐसा नहीं है की सब गलती यही लोग ही करते है. गैस सिलेंडर की कमी के पीछे एजेंसी मालिको का भी पूरा हाथ रहता है. जब कभी पीछे से ही गैस की सप्लाई 10 प्रतिशत कम होती है तो एजेंसी के संचालक 20 से 30 प्रतिशत की कमी दिखा कर जनता को गुमराह करते है. इसके पश्चात बची हुई गैस का एक बहुत मोटा हिस्सा व्यावसायिक उपयोग के लिए निकल जाता है. इन सबके पश्चात् जो गैस बचती है वही जनता तक पहुँच पाती है. ऐसे में होता यह है की एक उपभोगता को एक गैस सिलेंडर मिलने के बाद दोबारा जो सिलेंडर 15 - 20 दिन में मिलना चाहिए वो एक महीना बीतने पर भी नहीं मिलता. फिर भले ही वो एजेंसी में फोन मिलाता रहे या उसके चक्कर काटता रहे. मजबूरन जनता को या तो समय-समय पर नारेबाजी करनी पड़ती है या फिर सडको पर उतरना पड़ता है. अक्सर ऐसा होता है की इसका गुस्सा एजेंसी पर ही उतारा जाता है.
जिला प्रशासन भी रसोई गैस की किल्लत के पीछे बराबर का दोषी होता है. एक तो जहां समय-समय पर एजेंसी का रिकार्ड चैक नहीं किया जाता वहीँ शिकायत मिलने पर तुरंत कार्यवाही नहीं होने से एजेंसी मालिको के हौंसले बुलंद रहते है. एजेंसी में कब कितने सिलेंडर आये और कितने जनता को पर्ची पर बांटे गए इसका कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता है. होता यह है की किसी की पर्ची पर किसी को सिलेंडर दे दिया जाता है तो किसी को किसी की पर्ची पर. पूछने पर कहाँ जाता है की सिलेंडर मिल रहा है ना नाम किसी का भी हो. अक्सर एजेंसी की शिकायत रहती है की सर्दियों में कम्पनियाँ कम सप्लाई देती है. हिसार जिले की बात की जाए तो यहाँ दो लाख उपभोगताओ के लिए 21 गैस एजेंसियां है. अगर एक उपभोगता को प्रतिमाह एक सिलेंडर दिया जाएँ  तो आंकड़ो के हिसाब से इन्हें प्रतिदिन 300 सिलेंडर की जरुरत है, जबकि कंपनी की तरफ से एजेंसियों को सिर्फ 175 सिलेंडर ही मिल पाते है.
गैस एजेंसी एसोसिएशन के प्रधान सतेन्द्र सिंह का कहना है की कंपनी से आपूर्ति नहीं मिलने के कारण वो समय पर जनता को गैस उपलब्ध नहीं करवा पाते जबकि जनता सारा गुस्सा उन्हीं पर उतारती है. इसके विपरीत एजेंसी संचालको और गैस कंपनियों के अधिकारी एक मत नहीं है. इंडियन आयल कारपोरेशन का कहना है की त्यौहारों के दिनों को छोड़ कर गैस की कमी कम ही रहती है. कारपोरेशन के सेल्स मैनेजर ओमप्रकाश कहते है की एजेंसियों का यह कहना की पिछले काफी समय से गैस की सप्लाई कम हो रही है ऐसा कुछ नहीं है. महीने की जितनी डिमांड आती है उसके अनुसार ही सप्लाई की जा रही है. त्यौहारों में हुई छुट्टियों के कारण एजेंसयों तक गैस नहीं पहुँच पाई थी. इस बीच रसोई गैस एजेंसी एसोसिएशन ने उपायुक्त और पुलिस कप्तान से मिल कर उपभोगताओं द्वारा किये जाने वाले झगड़ो से बचने के लिए उन्हें सुरक्षा देने की मांग की है.  
तीन सालो में नहीं खोज पायें एक भी फर्जी उपभोगता
हिसार जिले में 70 हजार फर्जी गैस उपभोगता है. अगर इन पर काबू पा लिया जाए तो गैस की कमी से बचा जा सकता है. यह कहना था 2007 में हिसार में नियुक्त जिला खाद्य एवं आपूर्ति नियंत्रक का. जिले के आलाधिकारियो के साथ एक बैठक के दौरान उन्होंने तत्कालीन उपयुक्त को बताया था की जिले में 70 हजार फर्जी गैस कैनेक्शन है. तुरत-फुरत में इसकी जांच भी करवाई गई. जांच में पाया गया की यह आंकड़ा 50 हजार का है. इन फर्जी उपभोगताओ को पकडऩे के लिए 21 कमेटियां बनाई गई जिनमे हर वर्ग के 63 लोग शामिल थे. मजेदार बात तो यह है की आज तीन साल बीत जाने के पश्चात भी जिला प्रशासन एक भी फर्जी उपभोगता नहीं पकड़ पाया. अब सवाल यह उठता है की क्या यह 50 हजार फर्जी कैनेक्शन रातों रात गायब हो गए या आज भी यह किसी की शह पर गैस की मारामारी को बरकऱार रखे हुए है.
काटे कितने पता नहीं लेकिन 800 जब्त जरुर हुए
 हिसार स्थित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के एक जागरूक नागरिक विजय गुप्ता ने जब सुचना के अधिकार के तहत जब खाद्य आपूर्ति विभाग से यह जानकारी मांगी गई की उन 50 हजार फर्जी गैस कैनेक्शन का क्या किया गया तो विभाग का जवाब भी चौकाने वाला था. विभाग ने श्री गुप्ता को बताया की इन 50 हजार फर्जी गैस कैनेक्शन की एवज में कितने काटे गए यह तो पता नहीं लेकिन विभाग ने 800 फर्जी सिलेंडर जरुर जब्त किये है.


यह कैसा व्यापारी सम्मलेन



ना व्यापारी और ना ही व्यापारियों का संबोधन. और हो गया व्यापारी सम्मलेन. ना किसी व्यापारी को बुलाया गया और ना ही किसी को बोलने का मौका दिया गया. तो क्या यह सिर्फ प्रचार पाने के लिए व्यापारी सम्मलेन था. समाचार पत्रों में कई दिनों से समाचार छप रहे थे की व्यापारियों की समस्याओं को समझने और सुनने व् व्यापारी सम्मलेन को संबोधित करने के लिए राज्यसभा सांसद अमर सिंह और लोकसभा सांसद जयाप्रदा हिसार आ रहे है. हिसार में हत्या, लूटपाट, अपहरण और फिरौती से भय का माहौल व्यापत है. जनता और व्यापारियों को लगा था की शायद इस सम्मलेन के जरिये उनकी आवाज ऊपर तक जाएगी. लेकिन आयोजको ने किसी व्यापारी को बुलाना तो दूर जो कुछ एक व्यापारी सम्मलेन स्थल पर पहुंचे भी थे उनको भी बोलने का मौका नहीं दिया गया. किसी समस्या को उठाने और सुनने की बात तो दूर की लगती है.
रही सही कसर उस समय पूरी हो गई जब सिने तारिका और लोकसभा सांसद जयाप्रदा कुछ देरी से ही सही लेकिन सम्मलेन में पहुंची तो सही लेकिन अमर सिंह नदारद नजर आये. इस पर जयाप्रदा ने कहा की तबियत खराब होने के कारण अमर सिंह नहीं आ सके लेकिन उनका सन्देश वो अपने साथ लाई है. कुछ समय के पश्चात जब अमर सिंह की कमी खलने लगी तो अमर सिंह ने फोन पर ही जनता को संबोधित किया. अमर सिंह ने कहा की वो हिसार आना चाहते थे लेकिन डा. ने कहा की उन्हें
अस्पताल में रहना होगा. लेकिन मजेदार बात यह रही की जब तक वो संबोधित कर रहे थे तब तक पीछे से सायरन की आवाज आ रही थी. मानो या तो सायरन उनके कमरे में रखा गया था या फिर वो किसी गाडी में चल रहे थे. जनता और व्यापारी जिस नई दीवाली के बारे में सोच रहे थे उनका यह पटाखा भी फूस ही निकला.
राजपूत विकास मंच की और से आयोजित की गई व्यापार गोष्ठी के मौके पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए जयाप्रदा ने कहा की आज हम ( अमर सिंह और जयाप्रदा ) आजाद है और जनहित के लिए खुल कर काम कर सकते है. सांसद ने कहा की सपा प्रमुख ने उन्हें बेआबरू कर पार्टी से निकाला.उन्होंने कहा की ऐसा नहीं है राजनितिक पार्टिया फ़िल्मी हस्तियों का सिर्फ उपयोग करती है. स्वयं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा की वो जनता की सुख-दुःख की साथी रही है इसलिए 3 बार सांसद बनी है. अमर सिंह के लोकमंच का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा की अभी तक यह एक गैर राजनितिक मंच है लेकिन जनता का सहयोग ऐसे ही मिलता रहा था तो जल्दी ही यह राजनितिक दल भी बन सकता है. साथ ही उन्होंने कहा की बिहार में सरकार बनाने में लोकमंच की अहम् भूमिका रहेगी.
आज की मेरी यह गुफ्तगू नई दीवाली पर तो नहीं है लेकिन उसका हिस्सा मात्र है.ऐसा इसलिए की यह सम्मलेन किसी भी तरीके सेव्यापारी सम्मलेन नहीं लगा. शुरू से अंत तक जहा इस मंच से राजनीति की बाते होती रही वही जयाप्रदा भी कुछ खास व्यापारियों के लिए नहीं बोल पाई. उन्होंने या तो अमर सिंह का राग अलापा या जो सम्मलेन के संयोजक वेदपाल तंवर उन्हें जो बता रहे थे. इससे पूर्व वो हरियाणा पेट्रोल पम्प एसोसियेशन के अध्यक्ष दिनेश गोयल के आवास पर भी गई लेकिन सैकड़ो की संख्या में व्यापारी वहा पर होने के बावजूद वो वहा 5 मिनट से ज्यादा नहीं ठहरी. इसके पीछे मुख्य भूमिका वेदपाल तंवर की रही. ऐसे में जो व्यापारी इस सम्मलेन से नई दीवाली की आस लगाये बैठे थे वो अपना मन मसोस कर रह गए.


और अब जाट आरक्षण


राजस्थान, दिल्ली और उत्तरप्रदेश में जाटों को मिले आरक्षण के पश्चात हरियाणा में भी जाटों ने आरक्षण की मांग क्या रखी की हिसार सहित पूरे प्रदेश में मानो जैसे चिंगारी ने भयानक आग का रूप ले लिया हो. प्रदेश का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जहा इस आग का धुँआ ना उठा हो. अगर यहाँ बात हिसार की करे तो आग का फैलाव हिसार से ही शुरू हुआ. वैसे तो जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने 13 सितम्बर को प्रदेश के कई स्थानों पर सम्मलेन आयोजित किये थे. हिसार के मय्यड गाँव में हजारो की संख्या में किसानो ने इस सम्मलेन में भाग लिया. किसी भी अनहोनी को टालने के लिए जिला प्रशासन ने पुलिस के पुख्ता इंतजाम किये थे. लेकिन कहते है की अनहोनी को कौन टाल पाया है. इसी कहावत को चरितार्थ करते हुए जिला पुलिस कप्तान सुभाष यादव व् ग्रामीणों के बीच कहा-सूनी क्या हुई ग्रामीणों ने उग्र रूप धारण कर लिया. इसी का नतीजा था की हिसार-दिल्ली जैसे मुख्य राजमार्ग पर लगभग सात घंटे तक अराजकता का आलम रहा. इस दौरान वो सब कुछ घटित हुआ जिसकी कल्पना कोई आम शांतिप्रिय नागरिक नहीं कर सकता.
आखिरकार वही हुआ जिसका मौके पर मौजूद सभी को खतरा था. जैसे ही आन्दोलन की आग भड़की वैसे ही पुलिस ने आंसू गैस के गोले सहित लाठी चार्ज कर दिया. मामला बिगड़ता देख पुलिस अधीक्षक को फायरिंग के आदेश देने पड़े. इसी बीच एक छात्र सहित अनेको लोग गोली लगने से घायल हो गए जिनमे से दो ने बाद में दम तोड़ दिया. घायल होने वालो में पुलिस कर्मी भी थे. एक बारगी तो ऐसा लगने लगा था की यहाँ शासन और प्रशासन नाम की कोई चीज बाकी नहीं बची है. यही कारण था की पुलिस अधीक्षक से मारपीट सहित उनके कपडे फाड़ना, सड़क पर खड़े वाहनों में आग, दमकल गाडियों को जलाना, पेट्रोल पम्पो को फूंकना, रेलवे ट्रैक को नुक्सान पहुँचाना, प्रशासनिक कर्मचारियों व् महिला पुलिस कर्मियों को बंधक बनाना सहित वो सब कुछ हुआ जो क्षेत्र में फैली अराजकता की दुहाई देने के लिए काफी था. हद तो उस समय हो गई जब प्रदर्शनकारियों ने तेल से भरे खड़े ट्रक, बैंको, ए.टी.एम., सरकारी व् निजी बसों सहित निजी इमारतो को भी अपना निशाना बनाया.
तू-तू मै-मै से भड़का विवाद
जाट आरक्षण संघर्ष समिति के बैनर तले ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से सम्मलेन आयोजित कर जब राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाने के लिए एकत्रित हो थे उस समय पुलिस अधीक्षक के साथ उनकी कहासुनी हो गई. अभी कहासूनी चल ही रही थी की भीड़ में से निकल कर एक महिला ने पुलिस अधीक्षक को तमाचा दे मारा और उनकी वर्दी फाड़ दी. बात तू-तू मै-मै तक बढ गई और कोई नतीजा नहीं निकलने पर पुलिस और ग्रामीणों में जम कर संघर्ष हुआ.
अफवाहों का बाजार रहा गर्म 
वैसे तो जाट समुदाय का यह सम्मलेन पूर्व निर्धारित था लेकिन सोमवार को जो कुछ हुआ वो कल्पना से परे था. यही कारण था की इस दौरान अफवाहों का बाजार पूरे दिन गर्म रहा. इसी के चलते ग्रामीण एक के बाद एक चीज को स्वाह करते चले गए. कुछ समय के पश्चात आगजनी और मौत की अफवाहे जंगल की आग की तरह फैलती चली गई. गोली लगने से घायल हुए छात्र सुनील श्योरान सहित कभी दो तो कभी चार लोगो की की मृत्यु की खबर जैसे ही ग्रामीणों को मिली तो माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया और ग्रामीणों ने अपनी हिंसात्मक कार्यवाही को और अधिक बढ़ा दिया.


आजादी, महंगाई और कांग्रेस


पूरे देश ने स्वतंत्रता दिवस बड़े धूमधाम से मनाया. सभी प्रदेशो, जिलो, तहसील, उपमंडल और यहाँ तक स्कूल-कालेजो में तिरंगा फहरा कर देशवाशियो ने अपनी आजादी का जश्न मनाया. दिल्ली में प्रधानमन्त्री ने अपना भाषण दिया तो कही पर प्रदेशो के मुख्यमंत्रियों ने. यहाँ तक की मंत्री-संतरी से लेकर विभिन्न पार्टियों के नेताओ ने जनता को आजादी कैसे मिली यह पाठ तो जरुर पढाया लेकिन आज देश जिस स्थिति में आजादी झेल रहा है उस पर किसी ने प्रकाश नहीं डाला. शाम होते-होते मिडिया को जरुर याद आई की आज हम जिस आजादी की बात कर रहे है सही मायेने में वो आजादी नहीं है. शाम को मैं एक खबरिया चैनल देख रहा था तो उसमे बताया गया की प्रधानमंत्री किस तरह देश के मुख्य मुद्दों पर चुप्पी साधे रहे. जबकि महंगाई और आतंकवाद पर वो खुल कर बोले. इस चैनल ने दिखाया की आज देश के सामने जो पांच मुख्य समस्याए है उनके रहते हम नहीं कह सकते की आज हम आजाद है. मैं यहाँ जरुर बताना चाहूँगा की उन समस्याओ का जिक्र मैंने कल दोपहर को ही कर दिया था. जिस आजाद भारत की तरक्की की बात की जा रही है सही मायेने में वो तरक्की नहीं है.
मेरी यह पोस्ट पढने के लिए क्लिक करे. आजाद भारत की आजाद तरक्की
अब आज की गुफ्तगू. तो मैं बता रहा था की कल मैंने भी लिखा था और यह चैनल भी बता रहा था की किस तरह आज देश की एक बड़ी आबादी आनाज के बिना भूखी सो रही है और देश का हजारो टन आनाज बरसात में सड़ रहा है. जिसकी और सरकार या प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है. दो दिन पूर्व मैंने कॉमनवेल्थ गेम्स पर भी लिखा था की जहा बड़े अधिकारी अपनी जेबे भरने में लगे है वही इन खेलो को लेकर भारत की आन-बान-शान खतरे में है.
इस पोस्ट को पढने के लिए क्लिक करे. आजाद भारत के.....
इन दोनों पोस्टो के साथ ही मैंने एक और पोस्ट लिखी थी क्लिक करे अब एक और स्वतंत्रता दिवस. यह सब पोस्ट लिखने के बाद मुझे लगाता है की भारत की आजादी और उसकी तरक्की को लेकर बहुत कुछ लिख दिया. लेकिन 15 अगस्त को प्रधानमन्त्री का भाषण जिस मुद्दे पर अटका रहा वो मुद्दा था महंगाई का. जिसका जिक्र मैं कल नहीं कर पाया. लेकिन कल शाम को जब मैंने यह भाषण सुना तो मेरे मोबाइल पर आया एक एसएमएस मेरे दिलो-दिमाग पर घुमने लगा. लगा की इस एसएमएस में जो लिखा है वो सही सन्देश दे रहा है.
एक बार की बात है की जब एक गरीब को कही भी खाने के लिए अनाज नहीं मिला तो वो एक नदी किनारे जा बैठा. खाने के बारे में सोचते-सोचते उसने एक मछली पकड़ ली और घर ले आया. बड़ी ख़ुशी से उसने वो मछली अपनी पत्नी को दिखाई और कहा की आज इस से ही पेट भरना पड़ेगा. लेकिन गरीब की ख़ुशी कुछ ही देर में काफूर हो गई जब उसकी पत्नी ने कहा की:-
घर में ना गैस है, ना बिजली है, ना तेल है और ना ही पैसा है. 
गरीब मरता क्या ना करता. वो वापिस नदी पर गया और मछली को पानी में छोड़ दिया. मछली ख़ुशी-ख़ुशी चिल्लाने लगी:- कांग्रेस जिंदाबाद, कांग्रेस जिंदाबाद. 


आजाद भारत के आजाद......


पूरा देश आजादी की 63वी वर्षगाठ मनाने के लिए तैयारियों में जुटा हुआ है.कहीं कलाकार दिन रात एक कर अपनी कला का लोहा मनवाने का प्रयास कर रहे है तो कहीं समारोह में किसी तरह की कोई कोर-कसर ना रह जाये इसके लिए प्रशासन और राजनितिक दलों की और से कमेटिया गठित की जा रही है. इतना भी अवश्य है की जिला व् प्रदेश स्तर पर गठित की गई यह कमेटिया स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों को सफल बना देगी.
आज कल संसद में उठ रही महंगाई की गूंज दूर तक सुनाई दे रही है. कोई नेता इसके पीछे किसी अन्य नेता को दोषी बता रहा है तो कोई महंगाई के लिए सरकार को कोस रहा है. बात आजादी की चल रही थी तो कहने का अर्थ यह है की आजाद भारत की आजाद छवि इन दिनों संसद में खूब देखने को मिल रही है. नेता नेता नहीं लग रहा तो सरकार किसी भी मुद्दे पर चूं तक नहीं कर रही. बात बात में केंद्रीय रेल मंत्री ममता बेनर्जी भी नक्सलवाद से घिरी नजर आ रही है.
जिस तरह हमारी आजादी के दिन बढ़ते जा रहे है ठीक उसी तरह देश में भ्रष्टाचार भी दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. रही भ्रष्टाचारियो की बात तो आज वो प्रत्येक विभाग में घुसे बैठे है. मानो उनका एक ही मकसद है की वो एक कलाकार की भांति यह दिखाने का प्रयास कर रहे हो की वो अपनी कला में कितने माहिर है. यही कारण है की राष्ट्रमंडल खेलो के आयोजको से लेकर हिसार के थर्मल प्लांट में हुए तेल घोटालो में सिर्फ कर्मचारी ही नहीं अधिकारी तक ने देश का सिर झुकाने का प्रयास किया है.
वैसे तो बहुत पहले से ही राष्ट्रमंडल खेलो को लेकर दिल्ली सरकार और इससे जुड़े अधिकारियो पर उंगली उठने लगी थी लेकिन आखिर वो दिन आ ही गया जब सभी को यह पता लगा की इन खेलो को लेकर किस कदर भ्रष्टाचार फैला हुआ था. जो कुछ हो रहा है उससे देख ऐसा लगता है की यहाँ तो अंधेर नगरी चोपट राजा वाली बात है. उधर हिसार स्थित खेदड़ पावर प्लांट से जनता को अभी बिजली मिलनी तो शुरू नहीं हुई लेकिन कर्मचारियो और अधिकारियो की जरुर पौ-बराह हो गई. उन्हें प्लांट से कहीं और से कुछ खाने को नहीं मिला तो प्लांट में आने वाले डीजल में ही घोटाला कर दिया.
फिलहाल पुलिस उनके पीछे है और वो आगे-आगे. अभी तक पुलिस तेल घोटाले के 13 आरोपियों को पकड़ चुकी है जबकि अभी कुछ पुलिस पकड़ से बाहर है. मजेदार घटनाक्रम तो उस समय हुआ जब इस तेल घोटाले में प्लांट का डीजीएम भी दोषी पाया गया. उधर राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के मौजूदा अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी और पूर्व अध्यक्ष टीएस दरबारी के बीच शुरू हुआ वाकयुद्ध आजादी को शर्मसार करता नजर आएगा वही भोपाल गैस त्रासदी को लेकर जो कुछ चल रहा है उससे भी आजादी की ख़ुशी काफूर होती नजर आ रही है.


ड्रामा, ड्रामा और बस ड्रामा


लगता है की भारत अब ड्रामो का देश बन कर रह गया है. यही कारण है की यहाँ प्रतिदिन किसी ना किसी रूप में ड्रामे होते है और समय के साथ ड्रामे का दी एंड भी हो जाता है. उसके बाद किसी को याद नहीं रहता की अभी कुछ समय पहले जो ड्रामा हुआ था उसमे क्या हुआ था और उसमे किस किरदार ने क्या भूमिका अदा की थी. बस याद रहता है तो यह की अब अगला ड्रामा कब और कहा होगा. कुछ इसी याद के साथ हम अगले दिन की शुरुआत करते है.
अब देखो ना अभी कुछ समय पहले एक इच्छाधारी बाबा को यह कहते हुए गिरफ्तार किया गया था की वह देह व्यापार का एक बहुत बड़ा रैकेट चलाता है. उसका नेटवर्क भारत सहित अनेको देशो में फैला है. अरबो रूपए की अवैध संपत्ति होने का भी हवाला दिया गया. और तो और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
a
 

gooftgu : latest news headlines, hindi news, india news, news in hindi Copyright © 2010 LKart Theme is Designed by Lasantha