ताजा गुफ्तगू

Posted On Friday, March 09, 2012 30 आपकी गुफ्तगू

* जाट समुदाय का ऐलान, जल्द से जल्द छोड़े जाए उनके साथी, वरना भुगतने होंगे हिंसक परिणाम * हम कानून हो तोड़ते हुए तमाशा नहीं देख सकते, बातचीत के सभी द्वार खुले है: हरियाणा डी.जी.पी. * जाटों द्वारा ट्रैक रोकना गवारपन का नमूना है, जाटों ने बहादुरी की परिभाषा ही बदल कर रख दी: रंजीव दलाल * पुलिस व् जाट समुदाय के लोगो के बीच हुए संघर्ष में युवा संदीप की हुई मौत, ग्रामीण दाह संस्कार नहीं करने पर अड़े * संदीप की मौत के तीन दिन बाद भी शव रेलवे ट्रैक पर रख कर जारी है धरना * जाट आरक्षण को लेकर अफवाहों का बाजार रहने लगा गर्म तो जनता भी अपने आप को करने लगी है असुरक्षित महसूस * हिसार से चार घंटे की दूरी पर स्थित दिल्ली लगने लगी है दूर तो हरियाणा, पंजाब व् राजस्थान जाने के कई सड़क व् रेलवे मार्ग बंद * हिसार सहित पूरे हरियाणा में जाट आरक्षण विवाद नहीं ले रहा थमने का नाम * जाट समुदाय के लोगो ने आरक्षण के नाम पर कहीं सड़क मार्ग तो कहीं रेलवे ट्रैक किये हुए है जाम * आरक्षण व् केस ख़ारिज करने की मांग को लेकर जाट समुदाय का धरना जारी * रेलवे ट्रैक पर बैठे समुदाय के लोग, रेलगाड़ियों का आवागमन ठप, सरकारी बसों के भी बदले रूट * 


सबको दे दो आरक्षण

Posted On Thursday, February 23, 2012 0 आपकी गुफ्तगू

हरियाणा: आज एक बार फिर हरियाणा आरक्षण की आग में जलने को तैयार है. जाट समुदाय के लोग पिछले आन्दोलन के दौरान बनाये गए मुक़दमे वापिस लेने के साथ-साथ आरक्षण की मांग को लेकर धरने पर है. ऐसे में जहाँ उन्होंने कई जगह रेलवे ट्रैक व् सड़क मार्ग जाम कर दिए है वहीँ प्रशासन भी किसी अनहोनी के अंदेशे के मद्देनजर मुस्तैद नजर आ रहा है. इसलिए जहाँ अब हिसार से दिल्ली दूर नजर आने लगा है वहीँ कई ऐसे सड़क मार्ग है जो अब दोगुनी समय सीमा में तय हो रहे है. बावजूद इसके जाट समुदाय का कहना है की एक ओर जब तक उनके ऊपर बनाये गए मुक़दमे वापिस नहीं लिए जाते वहीँ दूसरी ओर आरक्षण नहीं मिलने तक अब वो मानने वाले नहीं है.
यही कारण है की आज गुफ्तगू हो रही है की आरक्षण का शोर तो आज हर ओर सुनाई दे रहा है. जबकि मांगने वाले को पता ही नहीं की वो आरक्षण मांग ही क्यों रहा है. बस एक नेता की आवाज पर हो लिए उसके पीछे-पीछे. अब उनसे कोई पूछने वाला हो की क्या आरक्षण मांगने से पहले उनके घर में चूल्हा नहीं जल रहा था या उनको कोई परेशानी आ रही थी अपने बच्चो के लालन-पालन में. लेकिन नहीं इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है. तो क्या इसका मतलब यह है की क्या हम लकीर पीट रहे है या भेड़चाल की माफिक चल रहे है.
अब देखो ना पहले तो सिर्फ अनुसूचित जातिया - जनजातियाँ ही आरक्षण की मांग किया करती थी लेकिन यह शायद मेरे देश का या यह कहें की संविधान का दुर्भाग्य ही है की आज जिसे देखो आरक्षण की मांग पर मांग किये जा रहा है. दुःख इस बात का नहीं की आरक्षण की मांग क्यों हो रही है दुःख तो इस बात का है की भारत की एकता के लिए जो " हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई, हम सभी है भाई-भाई" का नारा दिया जाता था उसके तो आज मायेने ही बदल गए है. आज धर्म की बात तो कोई करता ही नहीं है.

जो हिन्दू धर्म कभी 36 बिरादरियो की एकता का दम भरता था उसमे आज जात की बात होने लगी है. इससे ज्यादा दुःख की बात और क्या होगी की हिन्दुस्तान में आज कोई हिन्दू होने की बात नहीं करता. आज बात होती है तो सिर्फ मै बाल्मीकि, मै धानक, मै जाट, मै गुर्जर व् मै चमार की. गुफ्तगू का पहलु यह है की आज हर कोई आरक्षण के लिए झंडा उठाये हुए है. जबकि देश की किसी को कोई खबर नहीं है. आज आरक्षण से सिर्फ बचे है तो पंजाबी, ब्रह्मण व् अग्रवाल समुदाय.

लगता यह है की आज आरक्षण जनता की नहीं अपितु राजनीति की जरुरत बन कर रह गया है. आरक्षण मुद्दे पर सरकार कभी अपने को पाक-साफ़ दिखाना चाहती है तो कभी गेंद केंद्र के पाले में डाल देती है. जबकि विपक्ष अपनी अलग ही दाल गलाता नजर आता है. संविधान निर्माण के समय सिर्फ 10 साल के लिए किये आरक्षण पर आज किसी की भूमिका सकारात्मक नहीं है. कोई नहीं चाहता की देश से आरक्षण ख़त्म हो जाये और ना ही आज तक किसी ने प्रयास किया की इसका कोई हल निकला जाये.
पिसना तो आम आदमी को है
जाट समुदाय को आरक्षण मांगते महीनो हो गए. कभी वो तोड़-फोड़ करते है तो कभी सड़क मार्ग जाम कर देते है. आज हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के रेलवे ट्रैक सुने पड़े है. सरकार से लेकर उच्च व् सर्वोच्च न्यायालय तक की सभी अपील अब तक कोई रंग नहीं दिखा पाई. घर व् काम-धंधे छोड़ कर रेल पटरी पर बैठे लोगो के कानों पर कोई जूं तक नहीं रेंग रही. अब तो यहीं लगता है की इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पिसना तो आम आदमी को ही है.
तो फिर सबको दे दो आरक्षण
अगर अब जाट समुदाय को भी आरक्षण दे दिया गया तो बचा कौन. सिर्फ अग्रवाल, पंजाबी व् ब्रह्मण. जबकि अब हरियाणा में ये तीनो समुदाय भी आरक्षण के लिए एकजुट होकर बैठके आयोजित कर रहे है. अगर जाट समुदाय का मामला शांत होने के पश्चात फिर से इन तीनो समुदाय के लिए आरक्षण की मांग उठी और ऐसे ही धरना-प्रदर्शन होना है तो आज ही क्यों नहीं सभी को आरक्षण दे दिया जाएँ.


प्रशासन सही या दुकानदार गलत

Posted On Tuesday, February 21, 2012 1 आपकी गुफ्तगू

हिसार: दिन-प्रतिदिन बढ़ते ट्रफिक के जाम से आखिरकार नागोरी गेट के दुकानदारों ने निजात पा ही ली. बाजार में किसी भी तरह का चौपहिया वाहन नहीं आये इसके लिए बाजार के दोनों ओर पाइप गाड़ दिए गए है. ऐसा करने से बाजार में गाडियों का प्रवेश बंद हो गया है वहीँ सारा दिन वाहनों से खचाखच रहने वाला यह बाजार अब खाली-खाली सा लगता है. दुकानदार भी खुश है की उनकी मेहनत रंग लाई लेकिन शायद किसी भी दुकानदार ने यह नहीं सोचा की बाजार वालों की वन-वे करने की मांग पर पाइप लगाना ठीक है या गलत. यहीं कारण है की अब गुफ्तगू हो रही है की इस बाजार में जाम की स्थिति निपटने के लिए की गई कार्यवाही पर प्रशासन सही है या इस जाम को खुद ही बढ़ावा देने के लिए दुकानदार गलत.
क्योंकि नागोरी गेट के जाम व् वन-वे के खिलाफ आवाज उठाने वाले किसी भी दुकानदार ने कभी चाहा ही नहीं की बाजार से ट्रफिक कम हो. ऐसा नहीं है की दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाम के लिए पुलिस प्रशासन दूध का धुला है लेकिन दुकानदार भी बराबर के दोषी है. सही मायने में तो इस बाजार के हाल के लिए पुलिस व् दुकानदार के साथ-साथ वह जनता भी कसूरवार है जो बाजार में खरीददारी करने के लिए आती है. यह सही है की दुकानदार से लेकर आम आदमी तक नागोरी गेट में लगने वाले जाम से परेशान है. यह भी सही है की पुलिस प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है. लेकिन फिर भी कोई कुछ नहीं कर रहा. पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है तो दुकानदार अपनी दूकान में कम और सड़क पर ज्यादा बैठा दिखाई देता है.
नागोरी गेट के दुकानदारों का आलम यह है की वो दो फुट से पांच-पांच फुट तक सड़क पर बैठे दिखाई देते है. उस पर दूकान के बोर्ड और सामान सड़क पर रख दिया जाता है वह अलग से. खरीददारी के लिए आने वाली जनता भी कुछ कम नहीं है. अक्सर ऐसा होता है की वाहन चलते कम और दुकानों के बहार खड़े ज्यादा दिखाई देते है. बावजूद इसके दुकानदारों ने मंत्री-संतरी से लेकर अधिकारियों तक को ज्ञापन देकर नागोरी गेट को वन-वे करने की मांग की. लेकिन एक बार जब पुलिस प्रशासन द्वारा नागोरी गेट को वन-वे किया गया था तो दुकानदारों ने काम कम होने की दुहाई दी थी तो आज प्रशासन ने ही वन-वे की मांग के अनुरूप अपनी ड्यूटी का ढीकरा जनता के सिर फोड़ने का काम किया है.
वैसे तो पुलिस प्रशासन समय-समय पर विभाग में पुलिसकर्मी कम होने का रोना रोता रहा है लेकिन ऐसा बहुत कम ही हुआ है की इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा हो. लेकिन हाल फिलहाल पुलिस प्रशासन ने जो कारनामा किया है उससे जनता को आज नहीं तो कल फिर से प्रशासन को ही कोसना पड़ेगा. हर किसी को सोचना पड़ेगा की कौन गलत कर रहा है और कौन सही. तभी सिर्फ नागोरी गेट ही नहीं बल्कि हर शहर, प्रदेश व् देश से जाम की स्थिति से निपटा जा सकता है.


मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है

Posted On Friday, February 17, 2012 1 आपकी गुफ्तगू

संयम जैन, स्वतंत्र पत्रकार
हिसार: सही कहा है कि मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है। चाहे वह नेता हो, अफसर हो, चोर हो या फिर शहर के रेहड़ी, ऑटो व चाय वाले। शहर के महावीर स्टेडियम में इन दिनों सेना की भर्ती चल रही है। रोजाना हजारों बेरोजगार युवा अपना भाग्य आजमाने शहर में आ रहे हैं। सुनने में आया कि शहर में आने वाले इन हजारों युवाओं से रेहड़ी, ऑटोरिक्शा, चायवाले, रिक्शा वाले सामान्य से कई गुणा अधिक वसूली कर रहे हैं। 5 रुपए की चाय को 10 रुपए में बेचा जा रहा है। 10 रुपए की जगह ऑटो का किराया 30 रुपए तक लिया जा रहा है। फलों के दाम भी बढ़ा दिये गए हैं। सुनकर बहुत दुख हुआ। जब नेता निर्दलीय या एक पार्टी की टिकट पर चुनाव लडक़र मौके का फायदा उठाते हुए अपने समर्थकों को धोखा दे सकता है तो फिर ये गरीब लोग क्यों पीछे रहें। नेता तो करोड़ों में अपना ईमान और अपने समर्थकों की भावनाओं को बेचता है। इन गरीब रिक्शा या रेहड़ी वालों ने तो कुछ रुपए ज्यादा ही वसूले हैं। अफसर तो मौका देखकर रिश्वत लेता है फिर इन गरीबों का थोड़ा अधिक मुनाफा कमाना क्यों गलत है।
    यह बात अलग है कि रेहड़ी, ऑटो व चाय वालों की इस हरकत से शहर का नाम दूसरे जिलों में बदनाम होगा, मगर जिला अधिकारियों को क्या फर्क पड़ता है। जब नगर निगम अधिकारियों को शहर में चल रहे अवैध निर्माण नजर नहीं आ रहे हैं तो फिर बिना अनुमति रेहड़ी लगाकर ग्राहकों से अधिक वसूली कैसे नजर आएगी। जब यातायात पुलिस शहर की यातायात व्यवस्था को बिगाडऩे में मुख्य कारण बने ऑटो रिक्शा वालों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है तो अधिक किराया वसूली पुलिस कैसे रोक सकती है।
बचपन में सुनी एक पुरानी कहानी याद आती है, जिसके अनुसार एक भारतीय नेता जापान घूमने जाता है। वहां रेलवे स्टेशन पर उसे कहीं फल नहीं मिलते। वह अपने साथियों से कहता है कि जापान में तो कहीं फल ही नहीं मिलते। एक जापानी यह सुनकर कहीं से फलों का टोकरा भरकर लाता है और उस नेता को दे देता है। नेता उसे रुपए देना चाहता है मगर वह जापानी रुपए लेने से इंकार कर देता है और कहता है कि यह बात दोबारा मत कहना कि जापान में फल नहीं मिलते।
अब इन बेचारे रेहड़ी, रिक्शा, ऑटो या चाय वालों को ऐसी देशभक्ति से क्या मतलब। लगातार बढ़ती महंगाई के इस दौर में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो जाये तो यही बहुत है। रसोई गैस सिलैंडर की कीमतों में 250 रुपए तक बढऩे की खबर सुनने के बाद तो गरीब क्या अमीर भी अपने धंधे में मुनाफे की दर बढ़ाना चाहेगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद तेल दामों में वृद्धि की भी खबर है। ऐसे में ऑटो रिक्शा वालों ने अभी से ज्यादा किराया लेना शुरू कर दिया तो क्या खास बात है।
सेना की भर्ती तो बस एक मौका है। मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है। ए. राजा को केंद्रीय मंत्री बनने का मौका मिला तो उसने 1 लाख 70 हजार करोड़ का 2जी स्कैम कर डाला। सुरेश कलमाड़ी को कॉमनवेल्थ समिति का प्रमुख बनने का मौका मिला तो उसने 70 हजार करोड़ का घोटाला कर दिया। देशभक्त अन्ना हजारे को भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने का मौका मिला तो उन्होंने देश को जोड़ा। मगर, यूपीए सरकार को मौका मिला तो उसने अन्ना हजारे के आंदोलन को ही दबा दिया। ये तो मौके की बात है। मौके का फायदा तो हर कोई उठाता है, फिर इन बेचारे गरीब रेहड़ी, चाय या ऑटो वालों ने कौन सा गुनाह कर डाला।


फौज, फौजी और हरियाणा

Posted On Tuesday, February 14, 2012 0 आपकी गुफ्तगू

हरियाणा: यह शायद प्रदेश में हो रहे ओधौगिक विकास का ही असर है की एक ओर तो भारतीय सेना के उच्चाधिकारी सेना में भर्ती के लिए युवाओं की बाट जोह रहे है और दूसरी तरफ उनकी आशा के विपरीत मात्र 30 प्रतिशत प्रतिभागी ही भर्ती में हिस्सा लेने के लिए पहुँच रहे है. एक समय होता था जब भारतीय फौज में हरियाणा का दबदबा होता था. जाट लैंड के युवा फौजी बनने में गर्व महसूस करते थे. भारतीय फौज में हरियाणा का नाम जहाँ सबसे ऊपर होता था वहीँ युद्ध के समय हरियाणा के फौजी भी सबसे आगे होते थे. शायद ही ऐसा कोई युद्ध रहा हो जिसमे हरियाणा के वीरों ने अपना व् प्रदेश का नाम रोशन नहीं किया हो. लेकिन आज स्थिति यह है की हरियाणवी युवाओं में फौजी बनने को लेकर रुझान घट रहा है.
यहीं कारण है की सेना के आलाधिकारी जहाँ फतेहाबाद जिले से 6000 से अधिक प्रतिभागी आने की उम्मीद जता रहे थे वहीँ फतेहाबाद से मात्र 2300 प्रतिभागी ही सेना का भर्ती टेस्ट देने के लिए पहुंचे. इसमें भी मजेदार बात यह है की 2300 में से भी केवल 120 युवक ही सेना का फिजिकल टेस्ट का पहला चरण पूरा कर पाए. जो औसतन 0.5 प्रतिशत रहा. ऐसा ही कुछ हाल जींद जिले का भी रहा. भले ही जींद के युवा फतेहाबाद जिले के युवाओं से मोर्चा मार गए हो लेकिन सेनाधिकारियों की उम्मीदों पर खरा उतरने में वो भी नाकामयाब रहे. जींद से 4500 प्रतिभागी फौज में भर्ती होने के लिए हिसार पहुंचे थे लेकिन 400 युवा ही टेस्ट का पहला चरण पार कर पाए. जिसका औसतन लगभग 10 प्रतिशत रहा.
एक ओर जहाँ ओधौगिक व् व्यापारिक विकास के चलते पानीपत, करनाल, फरीदाबाद, गुडगाँव व् अम्बाला जिले के युवाओं का रुझान सेना के प्रति कम हो चुका है वहीँ सेना को हिसार, जींद, रोहतक, भिवानी व् फतेहाबाद जिले के युवाओं का सेना में भर्ती होने के लिए बेसब्री से इन्तजार रहता है. इस पर भी अगर कुल 0.5 या 10 फीसदी युवा ही फिजिकल टेस्ट पास कर पाएंगे तो वो दिन दूर नहीं जब हरियाणा के साथ वीरों की धरती का नाम जुड़ना बंद हो जायेगा. सेना में भर्ती के लिए युवाओं की घटती संख्या जहाँ दुःखदायी है वहीँ यह शायद हरियाणा का दुर्भाग्य ही है की बीते वर्ष सिरसा में हुए वायु सेना के भर्ती टेस्ट से वापिस लौट रहे युवाओं ने रेलगाड़ी में सफ़र कर रही एक लड़की के कपडे तक फाड़ दिए थे.


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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