अब हाथी पहनेगा चश्मा, गठबंधन की घोषणा


हरियाणा मे नये समीकरण : इनेलो ने बसपा से मिलाया हाथ


चंडीगढ़ : इनेलो-बसपा के गठबंधन की चर्चा कुछ महीनों से प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चल रही थी और इनेलो के नेता इस बारे में इशारा भी कर रहे थे। बीते महीने बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर अभय चौटाला ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर शुभकामनाएं दी थी जिसके बाद चर्चाएं और ज्यादा तेज हो गई थी। इस विषय पर पूछे गए एक सवाल पर अभय चौटाला ने कहा था कि बसपा संस्थापक कांशी राम जी के साथ चौधरी देवीलाल के घनिष्ठ संबंध थे और अगर वे गठबंधन करेंगे तो डंके की चोट पर घोषणा के साथ करेंगे।
शायद यही कारण रहा की प्रदेश की राजनीति में नये सियासी समीकरणों को हवा देते हुए प्रमुख विपक्षी दल इनेलो व बहुजन समाज पार्टी ने आगामी चुनावों के लिए हाथ मिलाया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला, बसपा उत्तर भारत प्रभारी डा. मेघराज एवं प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारतीय ने यहां आयोजित पत्रकार सम्मेलन में समझौते की घोषणा की। फिलहाल समझौते की घोषणा की गई है लेकिन कौन दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, यह बाद में दोनों दलों के नेता बैठक करके तय करेंगे।
अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद इनेलो बसपा की बैसाखी के सहारे लोकसभा चुनाव में उतरने जा रही है। अभय चौटाला ने इस गठबंधन को तीसरे मोर्चे की नई शुरुआत बताया। उन्होंने कहा इस गठबंधन का अर्थ है कि अब किसान, दलित, पिछड़े और कमेरे वर्ग मिलकर नई पहचान बनायेंगे। गठबंधन के ऐलान के साथ ही उन्होंने 'हरियाणा की बनायेंगे नई पहचान-अब समय बदलाव का' नारा दिया।
बसपा का इनेलो से दूसरी बार गठबंधन हुआ है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा में इनेलो व बसपा के बीच गठबंधन की बात कोई नई नहीं है। दोनों दलों के बीच 1998 में भी गठबंधन हुआ था और तब इनेलो-बसपा के बीच क्रमश: 6-4 लोकसभा सीटों पर समझौता हुआ था, यानि छह सीटों पर इनेलो व चार सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनेलो ने छह में से चार सीटें जीतीं थी, जबकि बसपा को चार में से सिर्फ एक सीट पर ही विजय हासिल हुई थी। इनेलो व बीजेपी में गठबंधन होने पर 1999 में इनेलो ने बीएसपी से किनारा कर लिया था।


चेयरमैन की दुकान में अवैध निर्माण पर आखिर प्रशासन क्यों है मौन


फेस-3 में अवैध निर्माण के सम्बंध में मुख्यमंत्री से मिलेगी बाबा विश्वकर्मा समिति 

हिसार। बाबा विश्वकर्मा समिति के पदाधिकारियों की बैठक समिति कार्यालय में हुई जिसमें व्यापार एवं व्यवसाय कुंज फेस-3 की मुख्य ज्वलंत समस्याओं पर चर्चा हुई और विशेषकर फेस-3 में फुटपाथ तोड़कर उसके नीचे बनाई बेसमेंट पर चर्चा हुई। समिति के पदाधिकारियों ने प्रशासन के लचीले रवैये पर रोष प्रकट किया। आरोप लगाया गया कि यह दुकान भाजपा से जुड़े नेता एवं चेयरमैन की है और इसी दबाव में प्रशासन ने अब तक कोई कार्यवाही न करके उक्त नेता को खुली छूट दी हुई है। सरकारी जमीन पर कब्जे के बाद भी उक्त नेता की न तो दुकान का अवैध निर्माण सील किया गया है और न ही उक्त नेता के खिलाफ कोई कार्यवाही की गई है। समिति के प्रधान ओमपाल सिंह ने कहा कि इस संदर्भ में बाबा विश्वकर्मा समिति ने आरटीआई के माध्यम से नगर निगम से जानकारी मांगी है कि उक्त नेता ने फुटपाथ के नीचे बनी दीवार हटाई है या नहीं, फुटपाथ का कब्जा छोड़ा है या नहीं, प्रशासन कोई कार्यवाही उक्त नेता के खिलाफ करेगा या नहीं, फुटपाथ खोदकर जो मिट्टी का प्रयोग किया गया, उसकी भरपाई उक्त नेता से की जाएगी या नहीं, भाजपा नेता के विरुद्ध अवैध निर्माण करने पर क्या कार्यवाही बनती है। आरटीआई के माध्यम से यह जानकारी मांगी गई है। 
समिति की बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अगर प्रशासन इस अवैध निर्माण को सील नहीं करता तो समिति का एक शिष्टमंडल मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मिलकर उक्त नेता की कारगुजारी उनके सम्मुख रखेगा। उक्त नेता के खिलाफ कार्यवाही की मांग करेगा। जब तक सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण को सील नहीं किया जाता तब तक बाबा विश्वकर्मा समिति चुप नहीं बैठेगी।


जब भाजपा का उपवास..., उपहास सा लगने लगा


अधिकतर पदाधिकारी रहे दूर, आए वो कुछ देर में चलते बने, कुछ पहुंचे मात्र औपचारिकता निभाने


हिसार। कांग्रेस पर संसद न चलने देने का आरोप लगाते हुए देशभर में भाजपा के आह्वान पर किये गए उपवास का भाजपाइयों ने ही मजाक बना डाला। उपवास कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे वहीं अधिकतर नेता मौके
पर आकर औपचारिकता निभाकर जाते रहे। यही नहीं, जिले में विभिन्न विभागों, बोर्डों व निगमों के सात चेयरमैनों में से केवल एक चेयरमैन ही उपवास में नजर आए वहीं अन्य बड़े नेता भी कन्नी काटते नजर आए।
भाजपा के राष्ट्रीय आह्वान पर उपवास कार्यक्रम रखा गया था। हिसार में अग्रसेन चौक के उसी पार्क को भाजपा ने उपवास स्थल चुना, जिसमें कांग्रेसियों ने उपवास किया था। भाजपाइयों का उपवास कार्यक्रम भी कांग्रेसियों से कम नहीं रहा। जिस तरह कांग्रेसियों का उपवास कार्यक्रम मजाक बनकर रह गया वहीं भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। भाजपा के अधिकतर पदाधिकारी ही इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, एक प्रदेशस्तरीय नेता लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उक्त नेता के बारे में प्रसिद्ध है कि वह हर कार्यक्रम में देरी से पहुंचकर केवल बैठने के लिए सीट हथियाने के प्रयास में रहता है। बताया जाता है कि उक्त नेताजी को उपवास कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं थी और उन्हें अपने मीडिया प्रभारी के माध्यम से उपवास कार्यक्रम की जानकारी मिली थी। हुआ यूं कि उक्त नेताजी के मीडिया प्रभारी किसी तरह पत्रकारों को मिल गये और जब पत्रकारों ने उससे पूछा की नेताजी उपवास में हैं क्या, तो मीडिया प्रभारी का कहना था कि किस बात का उपवास, आज पार्टी का कोई कार्यक्रम है क्या? इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से पूरी जानकारी लेकर अपने आका को फोन किया और उपवास कार्यक्रम में जाने की सलाह दी, जिस पर उक्त नेताजी लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी हाजिरी लगवाई। 
पार्टी के इस उपवास कार्यक्रम से कुछेक को छोड़कर अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे। पार्टी आए दिन नई नियुक्तियों की घोषणा करती है लेकिन नई नियुक्तियों वाले तो दूर, पुराने पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी पार्टी जुटा नहीं पाई और हालत यह हो गई कि निर्धारित पार्क भरना तो दूर, चौथाई हिस्से में बैठकर सत्तारूढ़ भाजपाइयों को कांग्रेस पर हमले करने पड़े।


सबको दे दो आरक्षण


हरियाणा: आज एक बार फिर हरियाणा आरक्षण की आग में जलने को तैयार है. जाट समुदाय के लोग पिछले आन्दोलन के दौरान बनाये गए मुक़दमे वापिस लेने के साथ-साथ आरक्षण की मांग को लेकर धरने पर है. ऐसे में जहाँ उन्होंने कई जगह रेलवे ट्रैक व् सड़क मार्ग जाम कर दिए है वहीँ प्रशासन भी किसी अनहोनी के अंदेशे के मद्देनजर मुस्तैद नजर आ रहा है. इसलिए जहाँ अब हिसार से दिल्ली दूर नजर आने लगा है वहीँ कई ऐसे सड़क मार्ग है जो अब दोगुनी समय सीमा में तय हो रहे है. बावजूद इसके जाट समुदाय का कहना है की एक ओर जब तक उनके ऊपर बनाये गए मुक़दमे वापिस नहीं लिए जाते वहीँ दूसरी ओर आरक्षण नहीं मिलने तक अब वो मानने वाले नहीं है.
यही कारण है की आज गुफ्तगू हो रही है की आरक्षण का शोर तो आज हर ओर सुनाई दे रहा है. जबकि मांगने वाले को पता ही नहीं की वो आरक्षण मांग ही क्यों रहा है. बस एक नेता की आवाज पर हो लिए उसके पीछे-पीछे. अब उनसे कोई पूछने वाला हो की क्या आरक्षण मांगने से पहले उनके घर में चूल्हा नहीं जल रहा था या उनको कोई परेशानी आ रही थी अपने बच्चो के लालन-पालन में. लेकिन नहीं इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है. तो क्या इसका मतलब यह है की क्या हम लकीर पीट रहे है या भेड़चाल की माफिक चल रहे है.
अब देखो ना पहले तो सिर्फ अनुसूचित जातिया - जनजातियाँ ही आरक्षण की मांग किया करती थी लेकिन यह शायद मेरे देश का या यह कहें की संविधान का दुर्भाग्य ही है की आज जिसे देखो आरक्षण की मांग पर मांग किये जा रहा है. दुःख इस बात का नहीं की आरक्षण की मांग क्यों हो रही है दुःख तो इस बात का है की भारत की एकता के लिए जो " हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई, हम सभी है भाई-भाई" का नारा दिया जाता था उसके तो आज मायेने ही बदल गए है. आज धर्म की बात तो कोई करता ही नहीं है.

जो हिन्दू धर्म कभी 36 बिरादरियो की एकता का दम भरता था उसमे आज जात की बात होने लगी है. इससे ज्यादा दुःख की बात और क्या होगी की हिन्दुस्तान में आज कोई हिन्दू होने की बात नहीं करता. आज बात होती है तो सिर्फ मै बाल्मीकि, मै धानक, मै जाट, मै गुर्जर व् मै चमार की. गुफ्तगू का पहलु यह है की आज हर कोई आरक्षण के लिए झंडा उठाये हुए है. जबकि देश की किसी को कोई खबर नहीं है. आज आरक्षण से सिर्फ बचे है तो पंजाबी, ब्रह्मण व् अग्रवाल समुदाय.

लगता यह है की आज आरक्षण जनता की नहीं अपितु राजनीति की जरुरत बन कर रह गया है. आरक्षण मुद्दे पर सरकार कभी अपने को पाक-साफ़ दिखाना चाहती है तो कभी गेंद केंद्र के पाले में डाल देती है. जबकि विपक्ष अपनी अलग ही दाल गलाता नजर आता है. संविधान निर्माण के समय सिर्फ 10 साल के लिए किये आरक्षण पर आज किसी की भूमिका सकारात्मक नहीं है. कोई नहीं चाहता की देश से आरक्षण ख़त्म हो जाये और ना ही आज तक किसी ने प्रयास किया की इसका कोई हल निकला जाये.
पिसना तो आम आदमी को है
जाट समुदाय को आरक्षण मांगते महीनो हो गए. कभी वो तोड़-फोड़ करते है तो कभी सड़क मार्ग जाम कर देते है. आज हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के रेलवे ट्रैक सुने पड़े है. सरकार से लेकर उच्च व् सर्वोच्च न्यायालय तक की सभी अपील अब तक कोई रंग नहीं दिखा पाई. घर व् काम-धंधे छोड़ कर रेल पटरी पर बैठे लोगो के कानों पर कोई जूं तक नहीं रेंग रही. अब तो यहीं लगता है की इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पिसना तो आम आदमी को ही है.
तो फिर सबको दे दो आरक्षण
अगर अब जाट समुदाय को भी आरक्षण दे दिया गया तो बचा कौन. सिर्फ अग्रवाल, पंजाबी व् ब्रह्मण. जबकि अब हरियाणा में ये तीनो समुदाय भी आरक्षण के लिए एकजुट होकर बैठके आयोजित कर रहे है. अगर जाट समुदाय का मामला शांत होने के पश्चात फिर से इन तीनो समुदाय के लिए आरक्षण की मांग उठी और ऐसे ही धरना-प्रदर्शन होना है तो आज ही क्यों नहीं सभी को आरक्षण दे दिया जाएँ.


रणनीति में भविष्य या भविष्य की रणनीति


हर वर्ष की भांति साल 2011 भी गुजर गया. जिस तरह हम सभी ने इस वर्ष के आने की ख़ुशी मनाई थी उसी तरह इसके जाने की भी उतनी ही ख़ुशी मनाई. मेरे ऐसा कहने के कारण बहुत से रहे लेकिन मुख्य कारण रहा की पूरा वर्ष जहाँ एक के बाद एक भ्रष्टाचार की परते खुलती रही वहीँ पूरा साल हमने भ्रष्टाचार से लड़ने में गुजार दिया. इतना जरुर है की 2011 में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जनता एक मत होकर सड़को पर अवश्य उतरी. इसी कारण रहा की कभी हमने बाबा रामदेव के काले धन को वापसी लाने की आवाज को बुलंद किया तो कभी स्वामी अग्निवेश की भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में हम शामिल हुए. जबकि लोकपाल बिल के समर्थन में समाजसेवी अन्ना हजारे के अनशन को देश के राजनीतिज्ञ और जनता अभी तक भूले नहीं है.
देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करने व् लोकपाल बिल को लागू करवाने के लिए कुछ जाने-माने लोगों ने एक रणनीति के तहत काम किया. यह इस रणनीति का ही कमाल ही था की जनता को अपना भविष्य उज्जवल दिखाई देने लगा. फिर भले ही वो अनशन का मौका हो या फिर कैंडल मार्च या हो बाजार बंद का आयोजन. लोकपाल बिल के समर्थन में पूरे देश ने अपनी आहुति डाली. एक बारगी तो आम जनता ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम की रणनीति से भविष्य के सपने संजोने आरम्भ कर दिए थे. ऐसा लगने लगा था की या तो अब देश में भ्रष्टाचार कुछ ही दिनों का महमान है या फिर यह भ्रष्ट सरकारे. हर एक आयोजन से जहाँ सरकार की खूब किरकिरी हुई वहीँ राजनीति में भी उहापोह की स्थिति बनी रही.
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला आरम्भ हुआ तो राजनीति और भ्रष्टाचार के गढ़े मुर्दे भी उखड़ने लगे. कभी बाबा रामदेव पर राजनीतिक प्रहार हुए तो कभी अरविन्द केजरीवाल व् किरण बेदी पर सरकारी खजाने को नुक्सान पहुँचाने के आरोप. कभी प्रशांत भूषण पर हमला तो कभी अनशन को लेकर हंगामा हुआ. राजनीतिक दल बाहर तो एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे लेकिन भ्रष्टाचार व् लोकपाल बिल पर संसद में सभी भाई-बहन की तरह बैठे दिखाई दिए. हर किसी ने भ्रष्टाचार के विरोध में हर एक मुहीम की काट की जुगत बैठानी आरम्भ कर दी थी. इसी का नतीजा था की भ्रष्टाचार व् लोकपाल बिल पर काम कम और बात ज्यादा होने लगी. रणनीति एक मुद्दा बन गई और लोग इस से उबने लगे.
चुनावों के दौरान कांग्रेस की खिलाफत करने की रणनीति हो या मुंबई में अनशन. जनता अन्ना हजारे से किनारा करने लगी. संसद की कार्यवाही के दौरान जनता समझने लगी थी की जिस रणनीति में वो अपना भविष्य संजो रही है वो कामयाब होने वाली नहीं है. नेता चाहते ही नहीं की उनके ऊपर कोई लोकपाल व् कानून बने. जब करना ही इन नेताओं को है तो समय खराब करने से क्या फायेदा. ऐसा नहीं है की जनता चाहती नहीं की देश में लोकपाल बिल आये लेकिन वो आज एक बार फिर टीम अन्ना की ओर एक आशा भरी नजरों से देखने लगी है. भले ही संसद के इस सत्र में लोकपाल बिल पास ना हुआ हो लेकिन मजबूत लोकपाल बिल लाने के लिए आज जरुरत है तो भविष्य की रणनीति बनाने की.


मुंह चिढाता परिवारवाद


आज राजनीति में बने रहने के लिए सबसे ज्यादा जरुरत पड़ती है तो मुद्दों की. अगर आज किसी पार्टी व् नेता के पास मुद्दा नहीं है तो समझो राजनीति ख़त्म. लेकिन लगता है की आज देश के किसी भी राजनितिक दल व् नेता के पास जनहित के लिए तो दूर जनता को बताने व् समझाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है. यही कारण है की कहीं ना कहीं जाकर जनसभाओ, चुनावी दौरों व् पत्रकारवार्ताओं में बिजली और पानी ही एक ऐसा मुद्दा बचा है जिस पर नेता खुल कर भाषण दे सकते है. इसके अतिरिक्त अगर जनता को आज कोई मुद्दा लुभा रहा है तो वो है भ्रष्टाचार. भले ही जनता राजनीति व् नेताओ को रात-दिन कोसती हो लेकिन भ्रष्टाचार का मुद्दा आते ही उसको वहीँ नेता अच्छा लगता है जो भ्रष्टाचार पर लम्बा-चौड़ा भाषण दे रहा है.
इतने से भी अगर नेताओ का पेट नहीं भरता और उसको लगता है की अन्य राजनितिक दल व् नेता पर कटाक्ष करना अभी बाकी है तो मुद्दा बचता है परिवारवाद का. ऐसे में वह यह बात भूल जाता है की उसकी पार्टी में या स्वयं उसने राजनीति में भले ही परिवारवाद को कितना ही बढ़ावा दिया हो उसका कोई जिक्र नहीं लेकिन दूसरों ने क्या किया इसका कोरा चिठठा खोलने से आज कोई भी नेता एक- दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहता. मजेदार बात तो यह है की आज हर राजनीतिक दल में परिवारवाद है और हर नेता इसको बढ़ावा देने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. फिर भले ही वह गांधी परिवार हो या हरियाणा की राजनीति के सरताज तीनो लाल परिवार. जबकि आज प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा भी इससे अछूते नहीं है.
जबकि देश के अन्य प्रदेशों की बात की जाए तो ऐसे नामों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने में अपना भरपूर सहयोग दिया है. फिर भले ही वो मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता या राजनेता ही क्यों ना हो. इसके पीछे सबके अपने-अपने तर्क भी हो सकते है. कोई कहेगा की बेटा बाप की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा है तो कोई कहेगा की जनता की भावना के अनुरूप किसी नेता के पुत्र-पुत्री व् पत्नी को चुनाव की टिकट दी गई है. जबकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की राजनीतिक दल किसी नेता की मृत्युपरांत उसके परिवार के किसी जन को चुनावी मैदान में उतर कर जनता के वोट पाना चाहता है. बावजूद इसके आज राजनीति में बढ़ता परिवारवाद नेताओं का मुंह चिढ़ा रहा है.
अब आदमपुर व् रतिया विधानसभा उपचुनाव को ही देख लो. दोनों ही चुनाव में परिवारवाद इस कदर हावी है की किसी भी नेता से कुछ बोलते नहीं बन रहा है. हिसार के सांसद व् पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मृत्युपरांत रिक्त हुई हिसार लोकसभा सिट के उपचुनाव में आदमपुर से उनके विधायक पुत्र कुलदीप बिश्नोई हिसार से सांसद बन गए. चलो वो तो राजनीति में पुराने है लेकिन ऐसे में आदमपुर उपचुनाव में जहाँ उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई को पहली बार चुनावी मैदान में उतरा गया है वहीँ रतिया से इनलो विधायक के मरणोपरांत उनकी पत्नी इनलो की टिकट पर चुनावी समर में है. जबकि कांग्रेस भी आदमपुर से इनलो की टिकट पर चुनाव लड़ चुके कांग्रेसी विधायक संपत सिंह के पुत्र को टिकट देना चाहती थी.
अगर देश की बात की जाएँ तो ऐसा कोई विरला ही राजनीतिक दल मिलेगा जिसने परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया हो. कश्मीर से कन्याकुमारी व् महाराष्ट्र से आसाम तक प्रत्येक मुख्यमंत्री परिवारवाद को बढाने का गुनहगार है. ऐसे में मुद्दों की तलाश में रहने वाले राजनीतिक दल व् नेताओं को परिवादवाद पर भाषण देना भारतीय राजनीति में मुंह चिढाने के सामान लगता है.


सब कुछ चुनावी-चुनावी


सभी जानते हैं कि मेरे देश की राजनीति सुबहान अल्ला है। आम कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष राजनेता तक राजनीति में इस कदर डूब गया है कि उसे देश दुनिया से कोई सरोकार नहीं है। अब अगर बात चुनाव की, की जाए तो नेता तो नेता आमआदमी भी चुनावी रंग में रंगा नजर आता है। यही कारण है कि आजकल चहुंओर चुनावी माहौल सा नजर आ रहा है। जिसके चलते हर आम-खास की जुबान चुनावी गुफ्तगु कर रही है तो नेताओं के क्रियाकलाप भी चुनावी-चुनावी से नजर आ रहे हैं। जनता की सोच आज चुनाव तक सिमित लग रही है तो नेताओं के भाषणों में भी चुनावी रस टपक रहा है।
बात देश के पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की हो या आदमपुर व रतिया विधानसभा उपचुनाव की। सभी चुनावों ने देश के माहौल को चुनावी सा कर दिया है. वहीँ हरियाणा के आदमपुर व् रतिया के दोनों उपचुनावों में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला व भविष्य में मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए कुलदीप बिश्रोई एवं कैप्टन अभिमन्यु चुनाव जीतने हेतू रावण के जमाने के प्रसिद्ध फार्मूले साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करने से गूरेज नहीं कर रहे हैं। कहने का भाव सिर्फ इतना सा है की जनता से लेकर नेता तक सब चुनावी हो गए है.
इस गुफ्तगू को उस समय और हवा मिली जब उत्तर प्रदेश  के विकास का दावा करने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तरप्रदेश के ही चार टुकड़े करने का मन बना लिया। परिणामस्वरूप एक प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेज दिया गया। ऐसा ही कुछ हाल केन्द्र सरकार का भी है। केन्द्र भी इन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा हुआ है। यह शायद चुनावी असर ही है की क्रुड (कच्चा तेल) की कीमत्तें दिन-प्रतिदिन बढऩे के बावजूद केन्द्र ने या तो बीते लोकसभा चुनाव में जीत पाने के लिए तेल की कीमतों में कटौती की थी या फिर अब एक बार पुन: तेल के दामों में कटौती की है।
माना जा रहा है कि हिसार लोकसभा उपचुनाव में मात खाने के बाद केन्द्र ने पाँचों राज्यों सहित आदमपुर व रतिया उपचुनाव पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से यह कटौती की है। बीते दिनों राज्यस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हैलीकॉप्टर की हिसार के सीमावर्ती गांव में आपात लैंडिंग के दौरान गरीब के घर चाय पीकर हजार रूपए का नोट देना चुनावी सा नजर आया. प्रदेश में बिजली को लेकर जहाँ हाहाकार मचा हुआ है वहीँ हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का हालिया ब्यान कि जनवरी से प्रदेश की जनता को नियमित बिजली मिलेगी भी यह दर्शाता है कि आज सबकुछ चुनावी-चुनावी सा हो गया है।
जहां उत्तरप्रदेश के हालात पर देश के युवराज राहुल गांधी को शर्म आना उनकी राजनीतिक मंसा को दर्शाता है वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा  भी किसी चुनावी फार्मूले से कम नहीं है।


खुलती गठबंधन की गाँठ


आज जनता हैरान है, परेशान है. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा की राजनीति में आखिर हो क्या रहा है. बस हम सब यह देखने पर मजबूर है की सत्ता के भूखे ये नेता आखिर किस हद तक गिर कर आज किसी भी दल से गठबंधन तो करते है, लेकिन चंद ही दिनों में उस गठबंधन की गाँठ खुलती नजर आती है. इतने से भी पेट नहीं भरता तो गठबंधन के समय जनता के वोट हथियाने के उद्देश्य से कभी दल मिलने तो कभी दिल मिलने की बात करने वाले दोनों ही दलों के नेता एक-दूसरे को कोसते नजर आते है. आज देश हो या देश का कोई भी प्रदेश नेताओं की इस राजनीति से कोई भी अछूता नहीं है. सत्ता के नशे में मदमस्त गठबंधन के समय किसी नेता का उद्देश्य यह नहीं होता की जनता को सुशासन दिया जाये.
जबकि शादी जैसे पवित्र बंधन से एक रीत चली गठजोड़. शादी के दौरान जब लड़का-लड़की के फेरे शुरू होते है तो पंडित सात जन्मों तक यह बंधन ऐसे ही बना रहे इसके लिए गठजोड़ करते है. भारतीय संस्कृति के अनुसार यह गठजोड़ होनी-अनहोनी की सभी सीमाओं को लांघ कर उम्र भर चलता है. लेकिन भारतीय राजनीति ने आज इस गठजोड़ के मायने ही बदल कर रख दिए है. दो दिल और दो जिस्म को एक जान में बाँधने का काम करने वाले इस बंधन को राजनीति ने नाम दिया गठबंधन का. लेकिन आज यह गठबंधन होते बाद में है और टूट पहले जाते है. कुर्सी की चाह में दो दलों के ना दिल मिलते है और ना ही विचार. बावजूद इसके राजनीतिक दल और उसके नेता गठबंधन करते है तो सिर्फ स्वार्थ के लिए.
देश-प्रदेश में हुए गठबंधन को लेकर होने वाली गुफ्तगू का जिक्र छोड़ अगर सिर्फ हाल ही में हुए हिसार लोकसभा उपचुनाव व् आदमपुर तथा रतिया विधानसभा उपचुनाव की बात ही की जाए तो यह स्पष्ट होता है की गठजोड़ और गठबंधन में बहुत फर्क है. जहाँ बहुजन सन्देश पार्टी (कांशीराम) की अध्यक्षा कांता अलहड़िया जो बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में इनलो के साथ एक मंच पर दिखाई दी. वहीँ उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे को लेकर अपनी आवाज बुलंद की. शायद यह सत्ता का नशा ही था की मात्र कुछ ही दिनों में गठबंधन में दरार पड़ती नजर आई. कांता अलहड़िया जहाँ स्वयं इन उपचुनावों में आदमपुर से चुनाव मैदान में है वहीँ कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे है.
ज्ञात रहे की इससे पूर्व भी देश-प्रदेश में बहुत से गठबंधन बने व् टूटे लेकिन गठजोड़ की भूमिका आज तक बहुत ही कम गठबंधन निभा पाए है. केंद्र की सता पर काबिज होने के लिए विभिन्न दलों का कांग्रेस के साथ मिलना आज उन्ही दलों को भारी पड़ रहा है. कारण वहीँ की दल तो अवश्य मिले लेकिन दिल नहीं मिले. महंगाई के विरोध में कभी करूणानिधि का नाराज होना तो कभी ममता बेनर्जी का आँखे तरेरना गठबंधन की गाँठ पर समय-समय पर सवाल खड़े करता है. टूटते गठबन्धनों का हरियाणा में भी एक लम्बा इतिहास रहा है. हविपा-भाजपा, इनलो-बसपा, हजकां-बसपा व् इनलो-भाजपा जैसे गठबन्धनों को लेकर समय-समय पर लम्बे-चौड़े दावे किये गए. लेकिन कभी सत्ता नहीं मिलना तो कभी ज्यादा सत्ता सुख मिलने के कारण इन गठबंधनों की गाँठ खुलती नजर आई.


आखिर कौन लेगा खबर लेने वालों की खबर


इस वक्त देश में भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे हावी है। केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बुरी तरह से घिरी हुई है। चारों तरफ भ्रष्टाचार की ही चर्चा हो रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद से भ्रष्टाचार को मिटाने की जोर-शोर से मांग उठ रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन को सबसे अधिक मीडिया का समर्थन मिला, मगर अब हिसार लोकसभा उपचुनाव में यही मीडिया खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। चुनाव के मद्देनजर कुछ मीडिया कंपनियों ने राजनीतिक विज्ञापन के रेट दो गुणा कर दिए हैं और जो नेता विज्ञापन नहीं देता, उसके समाचार प्रकाशित नहीं किये जाते हैं। अगर समाचार लगाये भी जाते हैं, तो महज खानापूर्ति की जाती है। कुछ मीडिया कंपनियों की तो दिल्ली व चंडीगढ़ से आई टीम ने हिसार में डेरा डाल दिया है। सिर्फ और सिर्फ चुनाव के मौके का फायदा उठाने के लिए। लोगों में गुफ्तगू हो रही है कि आजकल जनता को लूटने वाले नेताओं को मीडिया लूट रहा है।
सरकारी विभागों में रिश्वत लेने-देने के खेल के चलते पूरा देश भ्रष्टाचार में डूबा है। सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के पास जनता के काम करने की ताकत होती है और वह अपनी इसी ताकत का फायदा उठाते हुए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। नेता भी जनता की जरूरतों को पूरा करने के नाम पर भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। नेताओं और सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के पास रोजाना ऐसे मौके होते हैं, जिससे वह भ्रष्टाचार फैला सकें। ऐसे में चुनाव के दिनों में यह ताकत और मौका मीडिया के हाथ लग जाता है। चुनाव की घोषणा होते ही मीडिया कंपनियों की बांछें खिल जाती हैं। आ गया मौका कमाई करने का। हालांकि यह फायदा केवल बड़ी मीडिया कंपनियां ही उठाती हैं, क्योंकि उनके पास मीडिया की ताकत ज्यादा होती है। नेता भी बड़ी मीडिया कंपनियों के आगे नतमस्तक होते हैं।
जहां त्यौहारों के दिनों में समाचार पत्र और चैनल व्यवसायिक विज्ञापनों के लिए अपनी विज्ञापन दरों छूट देते हैं वहीं चुनाव के दिनों में विज्ञापन दरों को बढ़ा दिया जाता है। आखिर चुनाव रोजाना थोड़े ही होते हैं। अब ऐसी स्थिति में कोई कैसे देश से भ्रष्टाचार खत्म होने की बात कर सकता है। इस देश में मौका देखकर हर कोई फायदा उठाना चाहता है, चाहे वह गलत तरीके से ही क्यों नहीं हो। मीडिया भी इस बीमारी से अछूता नहीं है।
संयम जैन, स्वतंत्र पत्रकार


शायद जनता बेवकूफ है


कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश:- लोग कहते है की जयप्रकाश ग्रीन ब्रिगेड का बॉस रहा
है लेकिन सभी जानते है की इनलो के शासन काल में जितनी बदमाशी, डकैती, लूटपाट व् रुपया वसूली प्रदेश में हुई उतनी तो जनता ने कभी नहीं देखी-सुनी होगी. यही कारण रहा की इनलो के शासन में प्रदेश का सिस्टम ही खराब हो गया था. कुलदीप बिश्नोई कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार की बात करते है तो मैं सभी प्रत्याशियों को भ्रष्टाचार पर बहस की चुनौती देता हूँ. मेरा मानना है की चौटाला और भजनलाल परिवार ने सदैव ही झूठ की राजनीति की है. 
इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला:- जब से देश और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार
आई है तब से विकास जनता का नहीं अपितु कांग्रेसी नेताओं के रिश्तेदारों का हुआ है. रही बात सुरक्षा व्यवस्था की तो आज प्रदेश में कोई भी सुरक्षित नहीं है जबकि आयें दिन चिकित्सक व् व्यापारियों पर हमले हो रहे है. उधर कुलदीप बिश्नोई भ्रष्टाचार की बात करते है लेकिन सभी जानते है की वो उस परिवार से है जो प्रदेश में भ्रष्टाचार का जनक रहा है. स्कूलों में छात्राएं यौन शोषण का शिकार हो रही है तो सरकारी विश्राम गृह कांग्रेसियों के ऐशगाह बने हुए है. 
हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई:- कांग्रेस-इनलो को चुनाव के दिनों में
ही हिसार की याद आती है, सत्ता मिलने के बाद इनके नेता हिसार के लोगो के सुख-दुःख की खबर तक नहीं लेते. आज मुख्यमंत्री हुड्डा गाँव-गाँव जयप्रकाश के लिए यह कह कर वोट मांग रहे है की हिसार को नंबर वन बना दूंगा, तो पिछले सात साल से हुड्डा जी कहाँ सो रहे थे. अगर उन्होंने इतना ही विकास करवाया होता तो उन्हें गली-गली जाकर जयप्रकाश के लिए वोट मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जबकि इनलो का शासन जनता अभी तक भूली नहीं है.
समस्त भारतीय पार्टी उम्मीदवार:- महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए केंद्र व् प्रदेश की
सरकारें दोषी है. सरकारी योजनायें समय पर लागू नहीं होती इसलिए जनता को उनका हक़ नहीं मिल पाता. आज कोई भी राजनीतिक दल और उनका नेता बेदाग़ नहीं है. सभी अपना उल्लू सीधा कर स्वार्थ की राजनीति कर रहे है. चुनाव जीतने के पश्चात समस्त भारतीय पार्टी सिर्फ जन लोकपाल बिल का समर्थन ही नहीं अपितु अन्ना के सपनो को साकार करने का काम भी करेगी.
जैसे-जैसे हिसार लोकसभा उपचुनाव का समय नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे प्रत्याशियों का एक-दूसरे के प्रति वाकयुद्ध तेज होता जा रहा है. कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार जा जनक. इतने तक भी किसी का पेट नहीं भरता तो वो व्यापारियों से फिरौतियां वसूलने वाले को कांग्रेस का संरक्षित बता रहा है तो कोई कह रहा है की चौटाला बंधुओ पर जो आय से अधिक संपत्ति का आरोप तय हुआ है वह संपत्ति जनता से अर्जित की गई है. कांग्रेसी उम्मीदवार अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो अजय चौटाला कांग्रेस शासन को कुशासन का दर्जा दे रहे है. उधर कांग्रेसी विधायक व् पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रघुवीर सिंह कादियान ने तो यहाँ तक कह दिया है की पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मौत का कारण कुलदीप बिश्नोई है. जबकि हरियाणा में हो रही हत्याओं, बलात्कार, अपहरण, लूटपाट, फिरौती, आगजनी व् चोरी का सेहरा इनलो, कांग्रेस व् हरियाणा जनहित कांग्रेस एक-दूसरे के सिर धर रही है. 
क्या आपको लगता है की कोई भी राजनीतिक दल, उसका प्रत्याशी या नेता गलत बोल रहा है. शायद नहीं, सभी सही ही तो बोल रहे है. यह सभी वहीँ बोल रहे है जिन समस्याओं से हमको हर समय दो-चार होना पड़ता है या जो हमारे लिए अक्सर गुफ्तगू बनती है. मुद्दा यह नहीं की आज कांग्रेस की सरकार या कल इनलो की सरकार थी. मुद्दा यह है की आज जो आरोप यह नेता एक-दूसरे पर लगा रहे है उनमे से एक को भी किसी नेता व् सरकार ने प्रदेश से ख़त्म करने का काम किया हो. ये वहीँ बोल रहे है जिनका हम शिकार हो रहे है. ये लोग तो आज बोल कर कल चले जायेंगे और हम हाथ मलते रह जाते है. नेताओं की बयानबाजी सुन कर अब गुफ्तगू शुरू हो गई है की भले ही यह सब आरोप ही है लेकिन जब सभी सही बोल रहे है तो आखिर जनता क्या करें. किसको दें वोट और क्यों. कौन विधायक व् सांसद आज चुनने के लिए ठीक है जो जीतने के बाद आपकी गली-मौहल्ले में आया आपका दुःख-दर्द सुनने को. जबकि स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री दावा करते है की एक सांसद और दे दो हिसार को नंबर एक बना दूंगा लेकिन हिसार का पुराना ओवरब्रिज को बंद हुए आज चार साल से अधिक हो गए वह तो बनवाया नहीं गया.


अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...


- संयम जैन - स्वतंत्र पत्रकार
भारत देश तमाशबीनों का देश है। यहां जनता तमाशे देखना बहुत पसंद करती है। पिछले दिनों देश का सबसे बड़ा तमाशा जनता ने देखा और उसमें भागीदारी भी की। 16 अगस्त से अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल बिल लाने की मांग पर अनशन पर बैठे। भ्रष्टाचार को मिटाने की उनकी मुहिम को बहुत से लोगों ने गंभीरता से लिया, लेकिन अधिकतर जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे यह एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया। 24 घंटे टीवी पर दर्जनों न्यूज चैनल्स पर लाइव कवरेज किसी बहुत बड़े तमाशे के समान थी। अन्ना व उनकी टीम ने तो इसे आंदोलन की तरह चलाया लेकिन जनता ने इसे तमाशे की तरह लिया। सरकार ने आंदोलन खत्म कराने के लिए अन्ना हजारे की मांगों को मानने का आश्वासन दिया और उनका अनशन खत्म हो गया। अन्ना का अनशन खत्म होते ही जनता के लिए तमाशा खत्म हो गया। अब अन्ना के आंदोलन के साथ जुडऩे वाले लोग कम नजर आते हैं। राजनीतिक पार्टियां अपनी राजनीतिक फायदे के लिए जनता के साथ इस तमाशे में शामिल हुई। तमाशा खत्म होते ही सब अपने-अपने काम पर लग गए। कहीं कोई बदलाव नजर नहीं आया। अन्ना के आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचारियों ने कुछ हद तक जनता को तंग नहीं किया लेकिन आंदोलन खत्म होते ही रिश्वत लेने व देने का खेल फिर से पहले की तरफ चल पड़ा। 
जनता यदि इस आंदोलन को तमाशा नहीं समझती तो इस आंदोलन को अप्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ाया जाता। क्यों जनता सरकारी दफ्तरों में चल रहे भ्रष्टाचार को सामने नहीं लाती, क्यों रिश्वत मांगने का विरोध नहीं कर पाती। क्यों इस आंदोलन में कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी शामिल नहीं हुआ। अन्ना के आंदोलन को जनता ने तमाशा ही समझा और 12 दिन तक चले इस तमाशे के बाद सभी ने तालियां बजाई, जश्न मनाया और अपने-अपने रास्ते हो लिए। इस देश में अगर भ्रष्टाचार को मिटाना है और बदलाव लाना है तो इस आंदोलन को आंदोलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए और आगे बढ़ाना चाहिए, न कि तमाशा समझ कर भुला दिया जाना चाहिए।


यह कैसा व्यापारी सम्मलेन



ना व्यापारी और ना ही व्यापारियों का संबोधन. और हो गया व्यापारी सम्मलेन. ना किसी व्यापारी को बुलाया गया और ना ही किसी को बोलने का मौका दिया गया. तो क्या यह सिर्फ प्रचार पाने के लिए व्यापारी सम्मलेन था. समाचार पत्रों में कई दिनों से समाचार छप रहे थे की व्यापारियों की समस्याओं को समझने और सुनने व् व्यापारी सम्मलेन को संबोधित करने के लिए राज्यसभा सांसद अमर सिंह और लोकसभा सांसद जयाप्रदा हिसार आ रहे है. हिसार में हत्या, लूटपाट, अपहरण और फिरौती से भय का माहौल व्यापत है. जनता और व्यापारियों को लगा था की शायद इस सम्मलेन के जरिये उनकी आवाज ऊपर तक जाएगी. लेकिन आयोजको ने किसी व्यापारी को बुलाना तो दूर जो कुछ एक व्यापारी सम्मलेन स्थल पर पहुंचे भी थे उनको भी बोलने का मौका नहीं दिया गया. किसी समस्या को उठाने और सुनने की बात तो दूर की लगती है.
रही सही कसर उस समय पूरी हो गई जब सिने तारिका और लोकसभा सांसद जयाप्रदा कुछ देरी से ही सही लेकिन सम्मलेन में पहुंची तो सही लेकिन अमर सिंह नदारद नजर आये. इस पर जयाप्रदा ने कहा की तबियत खराब होने के कारण अमर सिंह नहीं आ सके लेकिन उनका सन्देश वो अपने साथ लाई है. कुछ समय के पश्चात जब अमर सिंह की कमी खलने लगी तो अमर सिंह ने फोन पर ही जनता को संबोधित किया. अमर सिंह ने कहा की वो हिसार आना चाहते थे लेकिन डा. ने कहा की उन्हें
अस्पताल में रहना होगा. लेकिन मजेदार बात यह रही की जब तक वो संबोधित कर रहे थे तब तक पीछे से सायरन की आवाज आ रही थी. मानो या तो सायरन उनके कमरे में रखा गया था या फिर वो किसी गाडी में चल रहे थे. जनता और व्यापारी जिस नई दीवाली के बारे में सोच रहे थे उनका यह पटाखा भी फूस ही निकला.
राजपूत विकास मंच की और से आयोजित की गई व्यापार गोष्ठी के मौके पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए जयाप्रदा ने कहा की आज हम ( अमर सिंह और जयाप्रदा ) आजाद है और जनहित के लिए खुल कर काम कर सकते है. सांसद ने कहा की सपा प्रमुख ने उन्हें बेआबरू कर पार्टी से निकाला.उन्होंने कहा की ऐसा नहीं है राजनितिक पार्टिया फ़िल्मी हस्तियों का सिर्फ उपयोग करती है. स्वयं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा की वो जनता की सुख-दुःख की साथी रही है इसलिए 3 बार सांसद बनी है. अमर सिंह के लोकमंच का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा की अभी तक यह एक गैर राजनितिक मंच है लेकिन जनता का सहयोग ऐसे ही मिलता रहा था तो जल्दी ही यह राजनितिक दल भी बन सकता है. साथ ही उन्होंने कहा की बिहार में सरकार बनाने में लोकमंच की अहम् भूमिका रहेगी.
आज की मेरी यह गुफ्तगू नई दीवाली पर तो नहीं है लेकिन उसका हिस्सा मात्र है.ऐसा इसलिए की यह सम्मलेन किसी भी तरीके सेव्यापारी सम्मलेन नहीं लगा. शुरू से अंत तक जहा इस मंच से राजनीति की बाते होती रही वही जयाप्रदा भी कुछ खास व्यापारियों के लिए नहीं बोल पाई. उन्होंने या तो अमर सिंह का राग अलापा या जो सम्मलेन के संयोजक वेदपाल तंवर उन्हें जो बता रहे थे. इससे पूर्व वो हरियाणा पेट्रोल पम्प एसोसियेशन के अध्यक्ष दिनेश गोयल के आवास पर भी गई लेकिन सैकड़ो की संख्या में व्यापारी वहा पर होने के बावजूद वो वहा 5 मिनट से ज्यादा नहीं ठहरी. इसके पीछे मुख्य भूमिका वेदपाल तंवर की रही. ऐसे में जो व्यापारी इस सम्मलेन से नई दीवाली की आस लगाये बैठे थे वो अपना मन मसोस कर रह गए.


शराब पर भारी पानी


बहुत दिन हो गए. आपके बीच नहीं आ पाया. इसका मुझे मलाल भी है लेकिन ख़ुशी इस बात की है की घर में इस दौरान दो शुभ कार्यक्रम हुए. जिस कारण मैं कोई गुफ्तगू नहीं कर पाया. लेकिन कोई बात नहीं, मौसी के लड़के की शादी और मेरी बहन की सगाई की जो ख़ुशी आज मैं आपसे बाँट रहा हूँ उसे मैं सदा याद रखूँगा. लेकिन एक बात जरुर है की बीते दस दिनों में मुझे मेरे सभी पाठको, समर्थको और नियमित पाठको की बहुत याद आई. इसका जो मुख्य कारण था वो यह की इस दौरान देश-प्रदेश सहित मेरे शहर हिसार में बहुत कुछ घटित हुआ. कुछ जिलो में नगर परिषद्, पंचायत व् नगर पालिकाओ के चुनाव हुए तो देश की शांति को भंग करने वाले नक्सलियों को वार्ता की पेशकश की गई. मिर्चपुर मामले को लेकर संसद का घेराव तक किया गया वहीँ राहुल बाबा ने दोबारा हिसार आकर राजनीति को हवा दी तो ट्रेन हादसे ने भी जनता को हिला कर रख दिया. इन सब से परे हिसार में एक लड़की की अश्लील फोटो खिंच कर तीन साल तक ब्लैक मेलिंग के जरिये रेप किया गया तो गलत दिशा से आ रहे एक ट्रक ने ओवर ब्रिज पर एक व्यक्ति की जान ले ली.
इन सब के बावजूद मैं पिछले काफी समय से सोच रहा था की राजनीति पर कुछ लिखू. लेकिन कुछ तो समय का अभाव और गर्मी में हाल बेहाल. फिर भी मैंने जैसे-तैसे कर कुछ लिख कर छोड़ दिया था. जिसे मैं आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. बात कुछ ऐसी है की अभी हाल ही में हरियाणा के कुछ जिलो में नगर परिषद्, पालिकाओ और पंचायत के चुनाव संपन्न हुए है. मुद्दा यह नहीं है की इन चुनावों में कौन जीता, कौन हारा. बात सिर्फ इतनी सी है की इन चुनावों में क्या-क्या हुआ. कैसे-कैसे हुआ और क्यों हुआ. जैसा की सभी जानते है की उत्तर भारत में गर्मी इन दिनों चरम पर है. तो यह भी लाजमी है की इतनी गर्मी में भले ही मुख्यमंत्री बिजली-पानी के लिए कितने की बड़े-बड़े दावे कर ले लेकिन जनता की पूर्ति करना बहुत मुश्किल है. ऐसे में जनता भी बेचारी क्या करे. उसके पास एक ही रास्ता बचता है की धरना और प्रदर्शन. फिर भले की किसी को परेशानी हो रही हो या किसी को दुःख तकलीफ. यही कारण है की हिसार के उपायुक्त को यह सन्देश देना पड़ा की जनता ऐसा ना करे अगर उन्हें कोई तकलीफ है तो जनता उनसे सीधे मिले.
यहाँ बात हो रही थी चुनावों की. ऐसा नहीं है की चुनावों में खड़े प्रत्याशियों को गर्मी के साथ-साथ बिजली-पानी के पसीना नहीं बहाना पड़ा हो. प्रत्याशियों पर बिजली-पानी के लिए इतना दबाव था की किसी को यह पता नहीं था की इन चुनावों में कौन जीतेगा और कौन हारेगा. यहाँ तक की मतदाता को खुश करने के सभी तरीको के अलावा शराब भी इन चुनावों में कोई काम नहीं आई. जनता की सिर्फ एक ही मांग थी की बिजली-और पानी. जिसका की आज पूरे प्रदेश में बुरा हाल है. स्वयं प्रत्याशी मानते है की जनता को खुश करने के लिए इतना पैसा आज तक के चुनावों में शराब या अन्य तरीको पर नहीं लगा जितना की अब की बार जनता के दरवाजो पर पानी भिजवाने में खर्च हुआ है. तो क्या हम यह बात मान ले की चुनाव आयोग भले ही प्रत्याशियों पर कितना ही शिकंजा कस ले प्रत्याशी तो चुनावी खर्च अपने तरीके से ही करेंगे. कहने का भाव यह है की सभी को जीत सुनिश्चित करनी है फिर काहे का चुनाव आयोग और कैसा पैसा. लेकिन प्रत्याशियों को इन चुनावों में यह गाने का जरुर अवसर मिला की "महंगा हुआ पानी की थोडा-थोडा पिया करो".
चलते-चलते 
एक तो शादी का मौसम, उस पर घर में शादी तो ऐसा नहीं हो सकता की हिसार के पुराने ओवर ब्रिज पर से गुजरना ना हो. लेकिन एक रात मैंने जो नजारा देखा उसे देख में स्तब्ध रह गया. एक तो यह पुल तीन साल से ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है उस पर रात 8 बजे नो अंटरी खुलने के बाद ओवर लोडिड ट्रक ओवर ब्रिज का एक हिस्सा बंद होने के कारण गलत दिशा से जा रहे थे. अगले ही दिन समाचार पत्र में पढ़ा की रात को ट्रक और एक कार की दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत हो गई. पुलिस अधीक्षक ने इस घटना पर तुरंत कार्यवाही करते हुए पुल की 24 घंटे निगरानी के लिए पुलिस दल तैनात किया है.


राजनीति में डबल पावर का गेम


अगर मैं यहाँ सिर्फ डबल पावर लिखता तो आप शायद कुछ जल्दी और ज्यादा समझ जाते. कसूर आपका भी नहीं है मुझे भी यही लगता की कोई खास बात बताई जाने वाली है. डबल पावर से वो खास बात क्या हो सकती है आपको भी पता है और मुझे भी पता है. लेकिन जो बात आज तक मेरे समझ में नहीं आई वो है राजनीति की डबल पावर. प्रदेश के लिए वो चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा. मुख्यमंत्री हुड्डा ने दोनों ही चुनावो के पश्चात् कुछ स्थानों पर डबल पावर का जम कर प्रचार किया. लेकिन जनता को यह डबल पावर ना तो दिखाई दी और ना ही इसका मतलब आज तक समझ में आया.
मैं भी क्या करता, पेशे से पत्रकार हूँ और आजकल गुफ्तगू भी कर लेता हूँ तो सभी तरफ ध्यान देना पड़ता है. लेकिन हिसार के समीपवर्ती शहर हांसी के लोगो का दर्द कुछ ऐसा है की वहा ध्यान देने वाला कोई नहीं है. ना तो अभी तक हांसी के विधायक विनोद भयाना हांसी के हो सकें है और ना ही डबल पावर के रूप में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी नेता छत्रपाल इन दिनों हांसी में दिखाई पद रहे है. बावजूद इसके आज कोई ऐसा सप्ताह बमुश्किल बीतता होता जब हांसी में खून की होली ना खेली गई हो या कोई व्यापारी लूट का शिकार ना हुआ हो.
जनता से इन दोनों की लुकाछिपी अब जगजाहिर सी हो गई है. हरियाणा जनहित कांग्रेस की टिकट पर विधायक बनने वाले विनोद भयाना ने जहा कांग्रेस का दामन थाम लिया है वही कांग्रेस की टिकट पर चुनाव हार चुके छत्रपाल इन दिनों ढूंढे से भी नहीं मिल रहे. अब हांसी में बदमाशो की इतनी दहशत फैली हो और विधायक जी है की पंजाबी सम्मेलन के माध्यम से अपनी राजनीति चमका रहे हो तो बात गले नहीं उतरती. जबकि पुलिस द्वारा जनता से शांति बनाये रखने के उद्देश्य से बुलाया गया पुलिस-पब्लिक सम्मलेन में दोनों ही नेताओ का नहीं पहुंचना जनता और स्थानीय नेताओ के लिए सिरदर्द बना हुआ है.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता छत्रपाल के लिए यह लेख भी जरुर पढ़े. कुर्सी बड़ी की पद
अब इस डबल पावर की बात मैं हिसार के लिए करूँ तो यहाँ भी लोकसभा चुनाव के पश्चात कुछ ऐसा ही प्रचार किया गया था की हिसार को एक नहीं दो सांसद मिले है. इसलिए हिसार अब प्रदेश का पहला ऐसा जिला है जहा दो सांसाद मिलकर विकास करवाएँगे. मुख्यमंत्री हुड्डा के इस उदगार के पीछे कारण था हिसार से विजयी हुए कांग्रेसी सांसद जय प्रकाश और हिसार के रहने वाले कुरुक्षेत्र के सांसद नवीन जिंदल. लेकिन पांच सालो में जहा जयप्रकाश हिसार में दिखाई ही नहीं दिए वही नवीन जिंदल का कहना था की वो तो कुरुक्षेत्र से सांसद है इसलिए हिसार की समस्याओ से वाकिफ ही नहीं है.
इस डबल पावर का हिसार की जनता पर क्या असर हुआ इसका जवाब तो बीते लोकसभा चुनाव में पुन चुनाव लड़ रहे जयप्रकाश को जनता ने दे दिया जबकि हांसी की जनता आज अपने को ठगा सा महसूस कर रही है. या फिर यह मान लिया जाये की जो छत्रपाल हुड्डा की जय-जयकार करने के लिए प्रति सोमवार पत्रकारों से मुखातिब हुआ करते थे उनके पास इस बार हुड्डा का गुणगान करने के लिए शब्द ही नहीं है. लगता है की वो अपनी हार से इतने हताश है की वो कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर वो मुख्यमंत्री द्वारा कहीं जाने वाली डबल पावर की गेम को समझ गए है.


हरियाणा कि राजनीति, नेता और उनका राजनितिक दर्द


लगता है कि अब राजनीति सिर्फ राज करने और पाने वाले नेताओ के लिए ही रह गई है. जबकि एक समय नेताओ द्वारा यह कहा जाता था कि वो राजनीति में इस लिए आये है कि जनता का कुछ भला किया जा सके. यही कारण है कि हाल ही में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावो को लेकर कुछ नेताओ का दर्द अब भी झलक रहा है. कुछ इन्ही बातो को लेकर जो दर्द हरियाणा जनहित कांग्रेस सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई के सीने में है कुछ वैसा ही दर्द इनलो सुप्रीमो औमप्रकाश चौटाला के सीने में भी


हजंका का जन्मदिन और हजंका


हरियाणा जनहित कांग्रेस. कहने को तो दो दिसम्बर को पार्टी की वर्षगाठ है लेकिन बीते कुछ समय से पार्टी में जो कुछ घटित हुआ है उससे लगता नहीं है की आज हजंका में पार्टी जैसी कोई चीज बची है. दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन रोहतक में रैली कर पार्टी सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई ने जो संकेत दिए थे उससे हरियाणा की क्षेत्रीय पार्टिया ही नहीं अपितु कांग्रेस तक में खलबली


यहाँ तो सब गड़बड़ झाला है भाई


हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव सर पर खड़े है लेकिन जनता अभी भी इस गड़बड़ झाले में फंसी है की प्रदेश में कौन सी पार्टी किस का दामन पकडेगी और कौन सा नेता चुनाव में खड़ा होगा। नेताओ और राजनैतिक पार्टियों की यह आँख मिचौली जनता के लिए ही नही उन नेताओ के लिए भी सिरदर्द बनी हुई है जिन्हें चुनावो के समय जनता के बीच जाना है। यही कारण है की कुछ नेताओ को छोड़ प्रदेश स्तर पर कोई भी नेता कुछ भी बोलने से बच रहा है। कारण साफ़ है की किसी को पता ही नही की यह विधानसभा चुनाव प्रदेश की राजनीति में क्या क्या गुल खिलायेगा। मेरी इस गुफ्तगू में गुल खिलने का मतलब यह है की जहा कांग्रेस अभी नेताओ की छटनी में व्यस्त है वही उसे पार्टी टिकट मांगने वालो की लम्बी फेहरिस्त से भी निपटना होगा। उधर इनलो ने अभी जो 42 उम्मीदवारों की घोषणा की है उससे भी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रदेश की अनुशासित पार्टी कहलाने वाली इनलो में इन दिनों बगावत के सुर सुनने को मिलने लगे है। जबकि हरियाणा जनहित कांग्रेस की स्थिति उससे भी ख़राब है। एक और जहा पार्टी नेता अपने सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई को चमचो से घिरा बता रहे है वही भाजपा के साथ गठबंधन नही होने से भी पार्टी नेता व् कार्यकर्ता उहा-पोह की स्थिति में है।
अगर अब भाजपा नेताओ की बात करे तो वो कुछ बोलने की स्थिति में ही नही है। पहले इनलो से गठबंधन तोड़ने और अब तक हजंका से गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता अपने मुंह को सिले हुए है। विधानसभा चुनाव में जहा मात्र 35 दिन शेष रह गए है वही अभी तक कोई गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता जनता के बीच जाने से हिचक रहे है। उल्लेखनीय है की हरियाणा में राजनीति करने के लिए भाजपा को हमेशा बैशाखियो की जरुरत रही है वही उसके नेताओ को यह पता ही नही है की विधानसभा चुनाव के लिए किसी पार्टी से गठबंधन होगा की नही। वैसे तो हजंका से नाता टूटने के बाद बसपा भी प्रदेश की सभी 90 सीटो पर अपने प्रत्याशी खड़े करने का दम भर रही है लेकिन प्रदेश में उसकी स्थिति बहुत अच्छी नही है। मजेदार बात तो यह है की सिर्फ़ हिसार की 7 विधानसभा सीटो के लिए जहा 100 कांग्रेसी नेताओ ने आवेदन किए है वही जनता भी इस खेल (कांग्रेस के असली नेता होने का दम भरने वाले नेता) को देखने के लिए बेसब्री से इन्तजार कर रही है। वही भाजपा-हजंका गठबंधन, इनलो में उठ रहे उबाल और बसपा को प्रत्याशी तक नही मिलने के कारण हो रहे गड़बड़ झाले से जनता का भरोसा राजनीति और नेताओ से उठता जा रहा है।
और ख़त्म हो गया ड्रामा
मैंने यह पोस्ट लगभग 3 बजे के आसपास यह सोच कर लिखी थी की प्रदेश की राजनैतिक पार्टियों में प्रदेश की राजनीति करने के लिए जो गड़बड़ झाला चल रहा है उस पर में आपसे कुछ गुफ्तगू कर सकूँ, लेकिन शाम होते-होते समाचार आया की हरियाणा में अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस और भाजपा को जिन बैशाखियो की जरुरत थी वो मैं के कारण अब एक-दुसरे पर ही तन गई है। भाजपा जहा प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत मान कर अहम् में है वही हजंका सुप्रीमो स्वयम को मुख्यमंत्री घोषित करने के कारण मैं के आगोश में है।
गुफ्तगू के प्रिय पाठको मैंने एक स्टोरी लिखी थी की आख़िर कौन लेगा ख़बर देने वालो की ख़बरमैंने आपसे वादा किया था की मेरी यह गुफ्तगू अभी ख़त्म नही हुई हैऐसा नही है की मैं मेरे वादे को भूल गया हूँकुछ तथ्य मेरे पास चुके है और कुछ आने अभी बाकी हैउनके आते ही मैं फिर गुफ्तगू करूँगा की किस तरह ख़बर देने वाले अपने मंसूबो को अंजाम दे जाते है और हम चुपचाप तमाशा देखते रहते है.


किसी की लगी तो कोई चुक गया हट्रिक लगाने से


आईपीएल के आगाज के साथ शुरू हुए लोकसभा चुनावो के नतीजे भी कुछ-कुछ क्रिकेट की तरह ही रहे हिसार की बात की जाए तो यहाँ से मुख्य रूप से तीन धुरंधर चुनाव मैदान में अपनी किस्मत आजमा रहे थेइनमे से एक ने जहा चुनाव हार कर हट्रिक लगाई तो एक चुनाव हार कर जीत की हट्रिक लगाने से चुक गएज्ञात रहे की हिसार लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के जयप्रकाश, हजंका के भजन लाल व् इनलो-भाजपा के संपत सिंह चुनावी रण में थेशुरू से ही कयास लगाये जाने लगे थे की इन चुनावो में कौन सा प्रत्याशी हट्रिक लगाएगा और कौन सा नहीसंपत सिंह ने यह लोकसभा चुनाव हार कर अपनी हट्रिक पूरी की तो जयप्रकाश ने चुनाव हार करइनलो शासन में प्रदेश के वितमंत्री रह चुके संपत सिंह 2005 के विधान सभा चुनावो में फतेहाबाद के भट्टू हलके से चुनाव हार गएउसके पश्चात् हाल ही में हुए आदमपुर उपचुनाव में वो भजनलाल से हार गए और इन लोकसभा चुनावो में उन्हें फिर भजन लाल से मुंह की खानी पड़ीऐसा ही खेल कुछ जयप्रकाश के साथ हुआवो हिसार से दो बार चुनाव जीत चुके थे और अबकी बार चुनाव जीत कर हट्रिक लगना चाह रहे थे लेकिन तीसरे स्थान पर रहने के कारण उनका जीत की हट्रिक लगाने का सपना टूट गया


कांग्रेस को हराती कांग्रेस


कांग्रेस एक बड़ा परिवार हैऔर बड़े परिवारों में अक्सर नोक-झोक तो चलती ही रहती हैलेकिन समय आने पर सभी एक दुसरे का भरपूर सहयोग देते हैयह कांग्रेस के नेताओ के मुं पर वो रटा-रटाया जुमला है जिसको आप कभी भी सुन सकते होफिर चाहे वो पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल हो या मौजूदा मुख्यमंत्री हुडा और तो और सोनिया गाँधी भी यह कहने से नही चुकतीफिर भले ही भजनलाल अलग पार्टी बना ले या अन्य बड़े नेता किसी और पार्टी में शामिल हो जाएअब हरियाणा की राजनीति को ही देख लोकभी प्रदेश के वितमंत्री वीरेंदर सिंह मुख्यमंत्री से नाराज हो कर पार्टी छोड़ने की बात करते है तो कभी स्वयं मुख्यमंत्रीचलो जी किसी तरह चुनावो तक इस घमासान को विराम दे दिया गया हैलेकिन उसका क्या जो बात ऊपर तक तो नही पहुँच रही लेकिन पार्टी में द्वंदयुद्ध जारी हैकोई नेता किसी प्रत्याशी से उचित दूरी बनाये हुए है तो कोई प्रचार से कन्नी काट रहा हैऐसा नही है की यह सिर्फ़ हिसार ही हो रहा हैहाल ही में हुए हिसार के आदमपुर उपचुनाव के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ थाजब ऊपर से टिकट लेकर आए रणजीत सिंह के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ थाजहा सांसद जयप्रकाश उपचुनाव में रणजीत सिंह से उचित दुरी बनाये हुए थे वही विधायक व् जिलाध्यक्ष छत्रपाल भी चुनाव से कन्नी काट रहे थेरणजीत सिंह ने काफी हो-हल्ला भी किया थाजगह जगह इस बात का प्रचार किया गया था की वो कांग्रेसियों की वजह से ही चुनाव हारे हैउन्होंने कहा था ऐसे नेताओ की एक लिस्ट ऊपर भेज दी गई है और जल्द इस पर कार्यवाही होगीसमय तो बीत गया लेकिन कोई कार्यवाही हुई और ही कोई उम्मीद हैइतना जरुर है की फिर वही इतिहास दोहराया जा रहा हैइन लोकसभा चुनावो में जहा पुनः जिलाध्यक्ष छत्रपाल हिसार जिले से गायब नजर रहे है वही रणजीत सिंह भी आदमपुर के कार्यकर्ताओ को ढूंढे से नही मिल रहेऐसे में यह मान लिया जाए की बड़े परिवारों में अक्सर कलह तो होती रहती है लेकिन कांग्रेस जैसे बड़े परिवार में कलह ख़त्म नही होती या फिर समय समय पर कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती आई है


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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