कुर्सी बड़ी की पद


कभी-कभी कुछ अनहोनी सी बाते हो जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता. एक लम्बे अरसे के बाद अगर उस विषय पर गौर किया भी जाये तो लगता है की या तो हम ठगे गए या तकलीफ हो कर रह जाती है. लेकिन आम जनता है की कुछ नहीं कर पाती. करे भी तो क्या कर लेगी जनता. जनता की सुनने वाला है की कौन. हमारे देश में या तो साधु-संतो की सुनी जाती है या फिर नेताओ का राज चलता है. अब उनकी मर्जी की वो जो कुछ करे वो ठीक.
अब देखो ना किसी को पद की लालसा होती है तो किसी को कुर्सी की. फर्क सिर्फ इतना है की पद किसी को कहीं भी मिल सकता है लेकिन देश में कुर्सी तो सिर्फ नेताओ के भाग्य में ही लिखी है. लेकिन अगर किसी नेता को यह दोनों चीज मिल जाये तो सोने पर सुहागा. लेकिन आम जनता यही सोचती है की अब इस नेता के लिए कुर्सी बड़ी है की पद. तो भाई जब तक कुर्सी है तब तक ही पद की गरिमा है. वरना कैसा पद और कौन सी जनता.
अब हरियाणा के एक पूर्व विधायक को ही देख लो. जब तक कुर्सी थी तब तक ही वो कांग्रेस के हिसार हलके के ग्रामीण जिलाध्यक्ष थे. बीते विधानसभा चुनाव में कुर्सी क्या छीन गई वो तो भूल ही गए की वो जिलाध्यक्ष भी है या थे. कहने का भाव यह है की जब वो कांग्रेस के विधायक थे उस समय भी प्रदेश में कांग्रेस राज था और आज भी कांग्रेस की सरकार है. फर्क मात्र इतना है की आज वो विधायक नहीं है लेकिन जिलाध्यक्ष जरुर है.
मजे की बात तो यह है की पिछली सरकार के समय प्रत्येक सोमवार को ग्रामीण जिलाध्यक्ष के नाते वो जनता की समस्याए तो सुना ही करते साथ ही साथ पत्रकारों से भी रूबरू हुआ करते. जहा वो सरकार की वाहवाही किया करते वही जनता के भी दुःख-दर्द दूर करने का भरपूर प्रयास किया करते. यही कारण था की उन्हें पूरा विश्वास था की वो दोबारा भी विधायक बनेंगे. लेकिन जहा उन्हें मन मुताबिक सीट नहीं मिली वही हार का सामना भी करना पड़ा.
जनता तो जनता अब तो पत्रकार भी सोचने लगे है की जो छत्रपाल जिलाध्यक्ष होने के नाते चुनाव नहीं लड़ने की बाते किया करते आज वो कहीं दिखाई क्यों नहीं पड़ रहे है. क्या उन्हें इस बात का मलाल है की वो चुनाव हार कर विधायक नहीं बन पाए या इस बात को भूल गए की वो हिसार ग्रामीण जिलाध्यक्ष भी थे. कुछ भी हो इतना जरुर है की यहाँ तो नेताओ की चलती है जनता की किसको पड़ी है. इसलिए लगता है की आज नेताओ के लिए पद नहीं कुर्सी बड़ी है.
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हरियाणा की राजनीति के ये फर्जी प्रोफ़ेसर

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2 आपकी गुफ्तगू:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पद मिलने पर ही कुर्सी मिलती है!

सूर्य गोयल said...

शास्त्री जी, मेरी यह पोस्ट पढने के लिए मेरे ब्लॉग पर आने का धन्यवाद. गुरु जी मै आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ की पद होगा तो ही कुर्सी मिलती है. लेकिन क्या आज नेता सिर्फ कुर्सी के लिए रह गए है जो कुर्सी गई तो अपने पद की गरिमा भूल जाते है. कृपया कोई मुझे समझाए की ऐसा क्यों हो रहा है.

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