अब हाथी पहनेगा चश्मा, गठबंधन की घोषणा


हरियाणा मे नये समीकरण : इनेलो ने बसपा से मिलाया हाथ


चंडीगढ़ : इनेलो-बसपा के गठबंधन की चर्चा कुछ महीनों से प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चल रही थी और इनेलो के नेता इस बारे में इशारा भी कर रहे थे। बीते महीने बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर अभय चौटाला ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर शुभकामनाएं दी थी जिसके बाद चर्चाएं और ज्यादा तेज हो गई थी। इस विषय पर पूछे गए एक सवाल पर अभय चौटाला ने कहा था कि बसपा संस्थापक कांशी राम जी के साथ चौधरी देवीलाल के घनिष्ठ संबंध थे और अगर वे गठबंधन करेंगे तो डंके की चोट पर घोषणा के साथ करेंगे।
शायद यही कारण रहा की प्रदेश की राजनीति में नये सियासी समीकरणों को हवा देते हुए प्रमुख विपक्षी दल इनेलो व बहुजन समाज पार्टी ने आगामी चुनावों के लिए हाथ मिलाया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला, बसपा उत्तर भारत प्रभारी डा. मेघराज एवं प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारतीय ने यहां आयोजित पत्रकार सम्मेलन में समझौते की घोषणा की। फिलहाल समझौते की घोषणा की गई है लेकिन कौन दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, यह बाद में दोनों दलों के नेता बैठक करके तय करेंगे।
अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद इनेलो बसपा की बैसाखी के सहारे लोकसभा चुनाव में उतरने जा रही है। अभय चौटाला ने इस गठबंधन को तीसरे मोर्चे की नई शुरुआत बताया। उन्होंने कहा इस गठबंधन का अर्थ है कि अब किसान, दलित, पिछड़े और कमेरे वर्ग मिलकर नई पहचान बनायेंगे। गठबंधन के ऐलान के साथ ही उन्होंने 'हरियाणा की बनायेंगे नई पहचान-अब समय बदलाव का' नारा दिया।
बसपा का इनेलो से दूसरी बार गठबंधन हुआ है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा में इनेलो व बसपा के बीच गठबंधन की बात कोई नई नहीं है। दोनों दलों के बीच 1998 में भी गठबंधन हुआ था और तब इनेलो-बसपा के बीच क्रमश: 6-4 लोकसभा सीटों पर समझौता हुआ था, यानि छह सीटों पर इनेलो व चार सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनेलो ने छह में से चार सीटें जीतीं थी, जबकि बसपा को चार में से सिर्फ एक सीट पर ही विजय हासिल हुई थी। इनेलो व बीजेपी में गठबंधन होने पर 1999 में इनेलो ने बीएसपी से किनारा कर लिया था।


सब कुछ चुनावी-चुनावी


सभी जानते हैं कि मेरे देश की राजनीति सुबहान अल्ला है। आम कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष राजनेता तक राजनीति में इस कदर डूब गया है कि उसे देश दुनिया से कोई सरोकार नहीं है। अब अगर बात चुनाव की, की जाए तो नेता तो नेता आमआदमी भी चुनावी रंग में रंगा नजर आता है। यही कारण है कि आजकल चहुंओर चुनावी माहौल सा नजर आ रहा है। जिसके चलते हर आम-खास की जुबान चुनावी गुफ्तगु कर रही है तो नेताओं के क्रियाकलाप भी चुनावी-चुनावी से नजर आ रहे हैं। जनता की सोच आज चुनाव तक सिमित लग रही है तो नेताओं के भाषणों में भी चुनावी रस टपक रहा है।
बात देश के पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की हो या आदमपुर व रतिया विधानसभा उपचुनाव की। सभी चुनावों ने देश के माहौल को चुनावी सा कर दिया है. वहीँ हरियाणा के आदमपुर व् रतिया के दोनों उपचुनावों में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला व भविष्य में मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए कुलदीप बिश्रोई एवं कैप्टन अभिमन्यु चुनाव जीतने हेतू रावण के जमाने के प्रसिद्ध फार्मूले साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करने से गूरेज नहीं कर रहे हैं। कहने का भाव सिर्फ इतना सा है की जनता से लेकर नेता तक सब चुनावी हो गए है.
इस गुफ्तगू को उस समय और हवा मिली जब उत्तर प्रदेश  के विकास का दावा करने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तरप्रदेश के ही चार टुकड़े करने का मन बना लिया। परिणामस्वरूप एक प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेज दिया गया। ऐसा ही कुछ हाल केन्द्र सरकार का भी है। केन्द्र भी इन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा हुआ है। यह शायद चुनावी असर ही है की क्रुड (कच्चा तेल) की कीमत्तें दिन-प्रतिदिन बढऩे के बावजूद केन्द्र ने या तो बीते लोकसभा चुनाव में जीत पाने के लिए तेल की कीमतों में कटौती की थी या फिर अब एक बार पुन: तेल के दामों में कटौती की है।
माना जा रहा है कि हिसार लोकसभा उपचुनाव में मात खाने के बाद केन्द्र ने पाँचों राज्यों सहित आदमपुर व रतिया उपचुनाव पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से यह कटौती की है। बीते दिनों राज्यस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हैलीकॉप्टर की हिसार के सीमावर्ती गांव में आपात लैंडिंग के दौरान गरीब के घर चाय पीकर हजार रूपए का नोट देना चुनावी सा नजर आया. प्रदेश में बिजली को लेकर जहाँ हाहाकार मचा हुआ है वहीँ हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का हालिया ब्यान कि जनवरी से प्रदेश की जनता को नियमित बिजली मिलेगी भी यह दर्शाता है कि आज सबकुछ चुनावी-चुनावी सा हो गया है।
जहां उत्तरप्रदेश के हालात पर देश के युवराज राहुल गांधी को शर्म आना उनकी राजनीतिक मंसा को दर्शाता है वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा  भी किसी चुनावी फार्मूले से कम नहीं है।


खुलती गठबंधन की गाँठ


आज जनता हैरान है, परेशान है. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा की राजनीति में आखिर हो क्या रहा है. बस हम सब यह देखने पर मजबूर है की सत्ता के भूखे ये नेता आखिर किस हद तक गिर कर आज किसी भी दल से गठबंधन तो करते है, लेकिन चंद ही दिनों में उस गठबंधन की गाँठ खुलती नजर आती है. इतने से भी पेट नहीं भरता तो गठबंधन के समय जनता के वोट हथियाने के उद्देश्य से कभी दल मिलने तो कभी दिल मिलने की बात करने वाले दोनों ही दलों के नेता एक-दूसरे को कोसते नजर आते है. आज देश हो या देश का कोई भी प्रदेश नेताओं की इस राजनीति से कोई भी अछूता नहीं है. सत्ता के नशे में मदमस्त गठबंधन के समय किसी नेता का उद्देश्य यह नहीं होता की जनता को सुशासन दिया जाये.
जबकि शादी जैसे पवित्र बंधन से एक रीत चली गठजोड़. शादी के दौरान जब लड़का-लड़की के फेरे शुरू होते है तो पंडित सात जन्मों तक यह बंधन ऐसे ही बना रहे इसके लिए गठजोड़ करते है. भारतीय संस्कृति के अनुसार यह गठजोड़ होनी-अनहोनी की सभी सीमाओं को लांघ कर उम्र भर चलता है. लेकिन भारतीय राजनीति ने आज इस गठजोड़ के मायने ही बदल कर रख दिए है. दो दिल और दो जिस्म को एक जान में बाँधने का काम करने वाले इस बंधन को राजनीति ने नाम दिया गठबंधन का. लेकिन आज यह गठबंधन होते बाद में है और टूट पहले जाते है. कुर्सी की चाह में दो दलों के ना दिल मिलते है और ना ही विचार. बावजूद इसके राजनीतिक दल और उसके नेता गठबंधन करते है तो सिर्फ स्वार्थ के लिए.
देश-प्रदेश में हुए गठबंधन को लेकर होने वाली गुफ्तगू का जिक्र छोड़ अगर सिर्फ हाल ही में हुए हिसार लोकसभा उपचुनाव व् आदमपुर तथा रतिया विधानसभा उपचुनाव की बात ही की जाए तो यह स्पष्ट होता है की गठजोड़ और गठबंधन में बहुत फर्क है. जहाँ बहुजन सन्देश पार्टी (कांशीराम) की अध्यक्षा कांता अलहड़िया जो बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में इनलो के साथ एक मंच पर दिखाई दी. वहीँ उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे को लेकर अपनी आवाज बुलंद की. शायद यह सत्ता का नशा ही था की मात्र कुछ ही दिनों में गठबंधन में दरार पड़ती नजर आई. कांता अलहड़िया जहाँ स्वयं इन उपचुनावों में आदमपुर से चुनाव मैदान में है वहीँ कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे है.
ज्ञात रहे की इससे पूर्व भी देश-प्रदेश में बहुत से गठबंधन बने व् टूटे लेकिन गठजोड़ की भूमिका आज तक बहुत ही कम गठबंधन निभा पाए है. केंद्र की सता पर काबिज होने के लिए विभिन्न दलों का कांग्रेस के साथ मिलना आज उन्ही दलों को भारी पड़ रहा है. कारण वहीँ की दल तो अवश्य मिले लेकिन दिल नहीं मिले. महंगाई के विरोध में कभी करूणानिधि का नाराज होना तो कभी ममता बेनर्जी का आँखे तरेरना गठबंधन की गाँठ पर समय-समय पर सवाल खड़े करता है. टूटते गठबन्धनों का हरियाणा में भी एक लम्बा इतिहास रहा है. हविपा-भाजपा, इनलो-बसपा, हजकां-बसपा व् इनलो-भाजपा जैसे गठबन्धनों को लेकर समय-समय पर लम्बे-चौड़े दावे किये गए. लेकिन कभी सत्ता नहीं मिलना तो कभी ज्यादा सत्ता सुख मिलने के कारण इन गठबंधनों की गाँठ खुलती नजर आई.


ड्रामा, ड्रामा और बस ड्रामा


लगता है की भारत अब ड्रामो का देश बन कर रह गया है. यही कारण है की यहाँ प्रतिदिन किसी ना किसी रूप में ड्रामे होते है और समय के साथ ड्रामे का दी एंड भी हो जाता है. उसके बाद किसी को याद नहीं रहता की अभी कुछ समय पहले जो ड्रामा हुआ था उसमे क्या हुआ था और उसमे किस किरदार ने क्या भूमिका अदा की थी. बस याद रहता है तो यह की अब अगला ड्रामा कब और कहा होगा. कुछ इसी याद के साथ हम अगले दिन की शुरुआत करते है.
अब देखो ना अभी कुछ समय पहले एक इच्छाधारी बाबा को यह कहते हुए गिरफ्तार किया गया था की वह देह व्यापार का एक बहुत बड़ा रैकेट चलाता है. उसका नेटवर्क भारत सहित अनेको देशो में फैला है. अरबो रूपए की अवैध संपत्ति होने का भी हवाला दिया गया. और तो और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी


यहाँ तो सब गड़बड़ झाला है भाई


हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव सर पर खड़े है लेकिन जनता अभी भी इस गड़बड़ झाले में फंसी है की प्रदेश में कौन सी पार्टी किस का दामन पकडेगी और कौन सा नेता चुनाव में खड़ा होगा। नेताओ और राजनैतिक पार्टियों की यह आँख मिचौली जनता के लिए ही नही उन नेताओ के लिए भी सिरदर्द बनी हुई है जिन्हें चुनावो के समय जनता के बीच जाना है। यही कारण है की कुछ नेताओ को छोड़ प्रदेश स्तर पर कोई भी नेता कुछ भी बोलने से बच रहा है। कारण साफ़ है की किसी को पता ही नही की यह विधानसभा चुनाव प्रदेश की राजनीति में क्या क्या गुल खिलायेगा। मेरी इस गुफ्तगू में गुल खिलने का मतलब यह है की जहा कांग्रेस अभी नेताओ की छटनी में व्यस्त है वही उसे पार्टी टिकट मांगने वालो की लम्बी फेहरिस्त से भी निपटना होगा। उधर इनलो ने अभी जो 42 उम्मीदवारों की घोषणा की है उससे भी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रदेश की अनुशासित पार्टी कहलाने वाली इनलो में इन दिनों बगावत के सुर सुनने को मिलने लगे है। जबकि हरियाणा जनहित कांग्रेस की स्थिति उससे भी ख़राब है। एक और जहा पार्टी नेता अपने सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई को चमचो से घिरा बता रहे है वही भाजपा के साथ गठबंधन नही होने से भी पार्टी नेता व् कार्यकर्ता उहा-पोह की स्थिति में है।
अगर अब भाजपा नेताओ की बात करे तो वो कुछ बोलने की स्थिति में ही नही है। पहले इनलो से गठबंधन तोड़ने और अब तक हजंका से गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता अपने मुंह को सिले हुए है। विधानसभा चुनाव में जहा मात्र 35 दिन शेष रह गए है वही अभी तक कोई गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता जनता के बीच जाने से हिचक रहे है। उल्लेखनीय है की हरियाणा में राजनीति करने के लिए भाजपा को हमेशा बैशाखियो की जरुरत रही है वही उसके नेताओ को यह पता ही नही है की विधानसभा चुनाव के लिए किसी पार्टी से गठबंधन होगा की नही। वैसे तो हजंका से नाता टूटने के बाद बसपा भी प्रदेश की सभी 90 सीटो पर अपने प्रत्याशी खड़े करने का दम भर रही है लेकिन प्रदेश में उसकी स्थिति बहुत अच्छी नही है। मजेदार बात तो यह है की सिर्फ़ हिसार की 7 विधानसभा सीटो के लिए जहा 100 कांग्रेसी नेताओ ने आवेदन किए है वही जनता भी इस खेल (कांग्रेस के असली नेता होने का दम भरने वाले नेता) को देखने के लिए बेसब्री से इन्तजार कर रही है। वही भाजपा-हजंका गठबंधन, इनलो में उठ रहे उबाल और बसपा को प्रत्याशी तक नही मिलने के कारण हो रहे गड़बड़ झाले से जनता का भरोसा राजनीति और नेताओ से उठता जा रहा है।
और ख़त्म हो गया ड्रामा
मैंने यह पोस्ट लगभग 3 बजे के आसपास यह सोच कर लिखी थी की प्रदेश की राजनैतिक पार्टियों में प्रदेश की राजनीति करने के लिए जो गड़बड़ झाला चल रहा है उस पर में आपसे कुछ गुफ्तगू कर सकूँ, लेकिन शाम होते-होते समाचार आया की हरियाणा में अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस और भाजपा को जिन बैशाखियो की जरुरत थी वो मैं के कारण अब एक-दुसरे पर ही तन गई है। भाजपा जहा प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत मान कर अहम् में है वही हजंका सुप्रीमो स्वयम को मुख्यमंत्री घोषित करने के कारण मैं के आगोश में है।
गुफ्तगू के प्रिय पाठको मैंने एक स्टोरी लिखी थी की आख़िर कौन लेगा ख़बर देने वालो की ख़बरमैंने आपसे वादा किया था की मेरी यह गुफ्तगू अभी ख़त्म नही हुई हैऐसा नही है की मैं मेरे वादे को भूल गया हूँकुछ तथ्य मेरे पास चुके है और कुछ आने अभी बाकी हैउनके आते ही मैं फिर गुफ्तगू करूँगा की किस तरह ख़बर देने वाले अपने मंसूबो को अंजाम दे जाते है और हम चुपचाप तमाशा देखते रहते है.


कहीं वो राजनीति का शिकार तो नही हो गए


लोकसभा चुनाव से पहले एक समय आया जब हरियाणावाशियों को लगने लगा था की भाजपा प्रदेश में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस से गठबंधन करेंगी। दोनों ओर के कार्यकर्ता मुहं बाय खड़े थे की आज नही तो कल दोनों पार्टिया हाथ मिला ही लेगी। लेकिन ऐसी कोई घोषणा होने से पहले भाजपा ने सभी समीकरणों को दरकिनार कर ओमप्रकाश चौटाला वाली इनलो से हाथ मिला लिया। बात कुछ हजम नही हुई तो दोनों दलों के नेताओ ने इसे दो दलों का नही दो दिलो का मिलन बताया। जैसे-तैसे लोकसभा चुनाव तो निपट गए और जनता ने इस गठबंधन को घास तक नही डाली। प्रदेश की राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ ऐसे ही दिल मिले हजंका और बसपा के। दोनों ही गठबंधन का वही हुआ जिसका डर था। ऐसा लगा जैसे दो पार्टियों में पहले हुआ प्यार, फ़िर सगाई, शगुन के समय हुई लट्ठ बजाई, शादी का समय आने ही वाला था की तलाक़ की नौबत आई।
बात कुछ ऐसी थी की रविवार को हिसार में हरियाणा जनहित कांग्रेस और बसपा का सयुंक्त कार्यकर्ता सम्मलेन था। अभी बसपा के राज्य प्रभारी और बसपा के महासचिव मानसिंह मनहेडा कुछ बोलते उससे पहले ही एक बसपा कार्यकर्ता ने हो-हल्ला करते हुए मानसिंह मनहेडा को भला-बुरा कहा और मंच की ओर लपका। अभी कोई कुछ समझ पता उसने मनहेडा को तमाचा जड़ दिया। बात इतनी भड़की की कोई कार्यकर्ता किसी की पिटाई कर रहा था तो कोई किसी की। ऐसा लगा जैसे यह कार्यकर्ता सम्मलेन नही अपितु यहाँ दो पार्टियों द्वारा दंगल खेला जा रहा है। कोई किसी की गाड़ी के शीशे तोड़ रहा था तो कोई किसी की गाड़ी के। आख़िरकार मनहेडा ने कार्यकर्ताओ को संबोधित करते हुए कहा की यह सब कांग्रेस का किया धारा है, जबकि यह गठबंधन 24 घंटे के आदेश पर चुनाव जितने में सक्षम है। लेकिन इस प्रकरण के 3 दिन बाद ही मनहेडा ने यह कहते हुए गठबंधन तोड़ दिया की कुलदीप बिश्नोई झूठ की मशीन है, जबकि बिश्नोई का कहना है की मनहेडा हुडा के एजेंट है। चलो यह तो राजनीति है जिसमे कुछ भी कहना सुनना जायज है, जबकि पहलु यह है की कही हजंका द्वारा भाजपा से गठबंधन करने के लिए मनहेडा राजनीति का शिकार तो नही हो गए।
ऐसी क्या दावा ली बिश्नोई ने
मैंने यह तो सुना था की राजनीति में सब कुछ सम्भव है लेकिन यह समझ नही आ रहा की आख़िरकार हजंका सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई ने ऐसी कौन सी दवा ली जिससे उनकी स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी 4 दिनों में ठीक हो गई। रविवार को कार्यकर्ता सम्मलेन में यह बताया गया की इस सम्मलेन में बिश्नोई को भी आना था लेकिन वो स्वाइन फ्लू से पीड़ित है इसलिए नही आ सके। गठबंधन टूटने के पश्चात् भी कुलदीप बिश्नोई ने बताया की वो स्वाइन फ्लू से पीड़ित है लेकिन शाम होते होते समाचार आया की अब कुलदीप बिश्नोई पूरी तरह स्वस्थ है। तो मुझे यह समझ नही आया की जिस बीमारी से आज भारत में ही नही विश्व में प्रतिदिन कोई न कोई मृत्यु हो रही है उस बीमारी से कुलदीप ने कैसे निजात पाई। मैं भी उनके स्वस्थ रहने की कामना करता हूँ लेकिन जनहित में मेरा यह पूछना ग़लत नही होगा।


आपदा प्राकृतिक, मुद्दा राजनितिक


आज पूरे देश में बिजली-पानी के लिए हा-हाकार मचा हुआहै। खबरिया चैनलों सहित देश का पूरा मिडिया इस बातको जोर शोर से उठा रहा है की अगर जल्द ही बारिश नही हुईतो आने वाले दिनों में जनता बिजली पानी के लिए त्राहि-त्राहि करेंगी। आम आदमी तो इस बात को भली भांतिसमझ गया है लेकिन यह राजनितिक दल है की उन्हें तोबस मुद्दा चाहिए राजनीति में बने रहने के लिए। यहीकारण है की आज किसी भी प्रदेश में किसी भी दल कीसरकार हो विपक्ष बिजली-पानी के लिए सरकार को कोसरहा है। फिर भले ही किसी अन्य प्रदेश में उसी विपक्ष की सरकार क्यो न हो।
अब हजंका और बसपा को ही देख लो। दोनों दल एक क्या हुए की हरियाणा की राजनीति में बने रहने के लिए कोईमौका नही गवाना चाहते। सोमवार को स्वयं दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओ ने बरसात के लिए इन्द्र देवता को खुशकरना चाहा। इसके लिए नगर के एक वेंकटहाल में हवन-यज का आयोजन भी किया गया। लेकिन इस दौरानपत्रकारों को संबोधित करते हुए जब हजंका सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई और मानसिंह मनहेडा ने बिजली-पानी कीसमस्या पर हरियाणा सरकार को कोसना शुरू किया तो मैं यह समझ नही पाया की जिस प्राकृतिक आपदा के लिएयह हवन-यज हो रहा है क्या यह सब दिखावा है या सरकार को कोस कर वो इस मुद्दे को राजनितिक रंग देना चाहतेहै।
क्या उत्तरप्रदेश में है बिजली-पानी
और वो चुप हो गए
कुलदीप बिश्नोई और मनहेडा जी ने हरियाणा सरकार को बिजली-पानी मुद्दे पर जम कर कोसा। जहा श्री बिश्नोई नेमुख्यमंत्री हुड्डा को हर प्रकार से नाकारा घोषित किया वही श्री मनहेडा ने कहा की हुड्डा सरकार सोई हुई है इसलिएप्रदेश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। जब मैंने मनहेडा जी से यह पूछा की जिस प्राकृतिक आपदा के लिए आपहरियाणा सरकार को कोस रहे हो क्या उत्तरप्रदेश में जनता को पूरा बिजली-पानी मिल रहा है तो वो चुप्पी साध गए।


समर्थन की चासनी में सत्ता का गुलाबजामुन


मैं बीते कुछ दिनों से बड़ी उलझन में हूँ । समझ नही पा रहा हूँ की मेरी उलझन को लेकर आपसे क्या गुफ्तगू करू । परेशानी भी ऐसी की दिख सभी को रही है लेकिन कोई कुछ नही बोल रहा । इसका कारण जो मुझे समझ में आया वो यह की किसी को तो समझ में नही आ रहा की यह क्या और क्यो हो रहा है और जिसको समझ में आ रहा है वो कुछ बोल नही रहा । कारण एक की सत्ता । भई जिसके हाथ सत्ता उससे पंगा कौन ले । लेकिन मिडिया का काम तो यही है की जनता को समय-समय पर सजग करता रहे । फिर अगर कोई नेता भी सबक ले ले तो उसकी बढाई नही तो जय राम जी की भाई । इसीलिए मैं उलझन में था । लेकिन अब लिखना शुरू कर दिया है तो इतनी गर्मी में दिल को कुछ ठंडक मिली है । बात कुछ यूँ है की मतदान होने से पहले जो कुछ हुआ वो सब ने देखा । कुर्सी की चाह में किसी ने तीसरा मोर्चा (लेफ्ट) बनाया तो किसी ने चौथा (लालू-मुलायम-पासवान) तो किसी ने अपनी खिचडी अलग (बसपा) पकाई । सभी को सत्ता की चाह ऐसी थी की कोई किसी की सुनने तक को राजी नही था । गिर-पड़ कर मतदान हो गए । उसके बाद जो समीकरणों का दौर शुरू हुआ वह भी कबीले गौर था । कुल मिला कर देश की जनता को जो नही देखना चाहिए था वो सब देखा । आखिरकार मतगणना के पश्चात् जो तस्वीर उभर कर आई सभी ने राहत की साँस ली । चाहे कोई कांग्रेस सरकार से खुश था या नही लेकिन दिल की आवाज़ यही थी की चलो सरकार तो स्थिर आई । अब चाहे महंगाई आए या कालाबाजारी बढे लेकिन रोज की कीच-कीच तो नही रहेंगी ।
अब बारी थी मोर्चो की
अब सब स्पष्ट था की कांग्रेस की सरकार बननी है । लेकिन उन नेताओ के होश फख्ता थे जिन्हें कुर्सी चाहिए थी बेचारे वो उलझन में थे की अब क्या किया जाए । कुर्सी मिलना तो दूर जनता ने तो हरा कर घास तक नही डाली । अब नेताओ की उलझन तो मेरी उलझन । सोचा था की चुनावो के बाद भरी गर्मी से कुछ निजात मिलेगी और हाथ को आराम । लेकिन हार के पश्चात् भी उनकी कुर्सी की चाह के कारण मुझे कहा आराम मिलना था । एक के बाद एक नेता पहुचने शुरू हो गए 7 रेस कोर्से । कोई यहाँ आया तो किसी ने सोनिया के दर की हाजरी मारी । कोई बयानों से चर्चा में आया तो कोई कांग्रेस की जीत की खुशी में अपने सांसदों की टोकरी भर लाया । कोई मनमोहन को अपना बड़ा भाई बता कर समर्थन दे रहा है तो कोई पुराने रिश्तो की दुहाई दे कर एक-एक राजनीति बयानों पर अपनी पैनी नजर रखने वाले इन नेताओ की हेकडी आज दूर-दूर तक कही दिखाई नही दे रही । जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, दिग्विजय सिंह, प्रणव मुखर्जी और अनेको कांग्रेसी नेता समर्थन देने वाले नेताओ की जम कर आलोचना कर रहे है तो भी इनकी बोलती बंद है। जबकि चुनावो से पहले किसी के छोटे से बयान पर यही नेता इतना बवाल खड़ा कर रहे थे की सुनना मुश्किल हो जाता था ।
क्यो देना चाहते है समर्थन
अब मेरी उलझन यह है की जो नेता कल तक एक दुसरे की सूरत देखना पसंद नही कर रहे थे वो अब एक मंचपर कैसे खड़े हो जायेंगे । जो ख़ुद हार गया वो भी भी दे रहा है समर्थन और जिसके पास कुल 4 सांसद है वो भी जिस से नही मांग रहे वो भी लाइन में है तो जो कल तक शर्तो की झडी लगा रही थी उसने तो मनमोहन को अपना बड़ा भाई तक बोल दिया । आखिरकार 10 दिनों के हेर-फेर ऐसी क्या वजह पैदा हो गई की इन नेताओ को बिना शर्त समर्थन देना पड़ रहा है । जनसेवा का दिखावा करने वाले ये नेता क्या समर्थन के बूते राजनीति में बना रहना चाहते है या फिर कांग्रेस सरकार आने से इनको खतरा महसूस हो रहा है । या फिर जनता द्वारा घास नही डालने के बाद भी इनको कुर्सी प्यारी लग रही है ।
कही इनको यह खतरा तो नही
खतरे की बात से याद आया की भई इनमे से तो सभी को किसी न किसी से खतरा है । बात शुरू करता हूँ लालू यादव से । बिहार में उनकी पार्टी जहा हाशिये पर आ गई है वही उनके खिलाफ अनेको मामले अदालत में विचाराधीन है । अब उनको यह खतरा सता रहा है की कही नीतिश कुमार उनके लिए खतरे की घंटी न बजा दे । ऐसा ही कुछ खतरा मुलायम सिंह को भी है । उत्तरप्रदेश में मायावती सत्ता पर काबिज है । और चुनाव पूर्व आपस में इनकी नाराजगी जगजाहिर है । अगर मुलायम सिंह यूपीऐ के साथ नही जाते है तो मायावती उनको परेशानी में डाल सकती है । उधर मायावती को भी खतरा है की अगर मैंने समर्थन नही दिया तो मुलायम सिंह सोनिया गाँधी या मनमोहन सिंह को अपनी बातो की चासनी पिला कर कही उनकी सरकार न गिरवा दे । जैसा की अमरसिंह लोकसभा चुनावो से पूर्व अपने बयानों में कहते रहे थे । रही बात रामबिलास पासवान की तो यूपीऐ के साथ सत्ता में रह कर वो जमीं पाने की तलाश में है जो जनता ने उनसे इन लोकसभा चुनावो में छीन ली है ।


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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