अब हाथी पहनेगा चश्मा, गठबंधन की घोषणा


हरियाणा मे नये समीकरण : इनेलो ने बसपा से मिलाया हाथ


चंडीगढ़ : इनेलो-बसपा के गठबंधन की चर्चा कुछ महीनों से प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चल रही थी और इनेलो के नेता इस बारे में इशारा भी कर रहे थे। बीते महीने बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर अभय चौटाला ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर शुभकामनाएं दी थी जिसके बाद चर्चाएं और ज्यादा तेज हो गई थी। इस विषय पर पूछे गए एक सवाल पर अभय चौटाला ने कहा था कि बसपा संस्थापक कांशी राम जी के साथ चौधरी देवीलाल के घनिष्ठ संबंध थे और अगर वे गठबंधन करेंगे तो डंके की चोट पर घोषणा के साथ करेंगे।
शायद यही कारण रहा की प्रदेश की राजनीति में नये सियासी समीकरणों को हवा देते हुए प्रमुख विपक्षी दल इनेलो व बहुजन समाज पार्टी ने आगामी चुनावों के लिए हाथ मिलाया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला, बसपा उत्तर भारत प्रभारी डा. मेघराज एवं प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारतीय ने यहां आयोजित पत्रकार सम्मेलन में समझौते की घोषणा की। फिलहाल समझौते की घोषणा की गई है लेकिन कौन दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, यह बाद में दोनों दलों के नेता बैठक करके तय करेंगे।
अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद इनेलो बसपा की बैसाखी के सहारे लोकसभा चुनाव में उतरने जा रही है। अभय चौटाला ने इस गठबंधन को तीसरे मोर्चे की नई शुरुआत बताया। उन्होंने कहा इस गठबंधन का अर्थ है कि अब किसान, दलित, पिछड़े और कमेरे वर्ग मिलकर नई पहचान बनायेंगे। गठबंधन के ऐलान के साथ ही उन्होंने 'हरियाणा की बनायेंगे नई पहचान-अब समय बदलाव का' नारा दिया।
बसपा का इनेलो से दूसरी बार गठबंधन हुआ है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा में इनेलो व बसपा के बीच गठबंधन की बात कोई नई नहीं है। दोनों दलों के बीच 1998 में भी गठबंधन हुआ था और तब इनेलो-बसपा के बीच क्रमश: 6-4 लोकसभा सीटों पर समझौता हुआ था, यानि छह सीटों पर इनेलो व चार सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनेलो ने छह में से चार सीटें जीतीं थी, जबकि बसपा को चार में से सिर्फ एक सीट पर ही विजय हासिल हुई थी। इनेलो व बीजेपी में गठबंधन होने पर 1999 में इनेलो ने बीएसपी से किनारा कर लिया था।


नया वर्ष - नए सपने - नई दुआए


हर वर्ष की भाँती इस वर्ष भी नया साल नए आगाज के साथ हमारे सामने है. लेकिन गुफ्तगू का विषय यह है की बीता वर्ष सभी के लिए कैसा रहा. कोई कहेगा की ठीक है यार जैसा था बीत गया तो कोई कहेगा की पता ही नहीं चला की एक साल कैसे बीत गया. सब अपना-अपना तर्क देने के बाद फिर से अपने काम में जुट जाते है. लेकिन आओ आज नई दुआओं के साथ नववर्ष में नए सपने संजोते हुए हम कामना करे की जो कुछ बीते वर्ष में हमको झेलना पड़ा, नए साल में हमको उससे मुक्ति मिले और जो हमको अच्छा मिला उसमे वृद्धि हो. दिली तमन्ना है की बीता साल सभी के लिए सुखद रहा हो. इतना जरुर है की बीते वर्ष में अनेक लेखे-जोखे और घटनाक्रम समय-समय पर समाचार पत्र-पत्रिकाओ की सुर्खिया बने रहे.
जहाँ पूरे साल एक के बाद एक भ्रष्टाचार के खुलासों ने आम जनता के नाक में दम किये रखा वहीँ भारत का क्रिकेट विश्वकप जीतना दिल को सुकून देने वाला था. देश में बढती महंगाई के साथ-साथ पैट्रोल के दामों ने जहाँ आग में घी डालने का काम किया वहीँ दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने लोगों की धड़कने तेज किये रखी. इन सबके साथ-साथ वर्ष भर राजनीति भी खूब हावी रही. कभी कलमाड़ी, कभी ए राजा तो कभी कनिमोड़ी के मुद्दे पर राजनीति में घमासान मचा रहा तो काले धन पर बाबा रामदेव, भ्रष्टाचार पर स्वामी अग्निवेश तो लोकपाल बिल पर अन्ना हजारे के अनशन ने सरकार की नाक में दम किये रखा. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए चुनावों के कारण भी राजनीति में अस्थिरता का माहौल रहा.
हिसार भी बीते वर्ष के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवाने में कामयाब रहा. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मृत्यु जहाँ दुखद रही वहीँ कुलदीप बिश्नोई का भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे गया. इतना ही नहीं हिसार लोकसभा उपचुनाव में अन्ना हजारे का कांग्रेस के खिलाफ प्रचार हिसार के नाम को बुलंदियों पर ले गया वहीँ इस सीट को जीतने के लिए मुख्यमंत्री हुड्डा और पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के सभी साम-दाम-दंड-भेद को धत्ता बताते हुए कुलदीप बिश्नोई यह चुनाव जीतने में सफल हुए. जीत का जश्न समाप्त होता की आदमपुर विधानसभा उपचुनाव में उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई विजयी हुई. उधर जनता गैस और बिजली के लिए त्राहि-त्राहि करती रही.
अब बहुत हुआ, आओ दुआ करे
जो कुछ मैंने लिखा ऐसा नहीं है की आप पहली बार पढ़ रहे है. मेरा तो उद्देश्य ही यही है की मैं समाचारों के दूसरे पहलू को आपके सामने रख सकूँ. लेकिन जरुरत है तो सिर्फ जन जागरण की, सोचने की और सोच कर विचार करने की क्या इन हालातों में हम चैन की सांस ले सकते है. क्या हमारा देश आगे बढ़ सकता है. अगर नहीं तो आइये सब मिल कर नववर्ष में दुआ करे की महंगाई, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता व् राजनीति में परिवारवाद जड़ से ख़त्म हो. आने वाला साल राजनीति से मुक्त वर्ष हो और देश में लोकपाल बिल आये जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके ताकि हर इंसान का चेहरा खिला-खिला रहे.


मुंह चिढाता परिवारवाद


आज राजनीति में बने रहने के लिए सबसे ज्यादा जरुरत पड़ती है तो मुद्दों की. अगर आज किसी पार्टी व् नेता के पास मुद्दा नहीं है तो समझो राजनीति ख़त्म. लेकिन लगता है की आज देश के किसी भी राजनितिक दल व् नेता के पास जनहित के लिए तो दूर जनता को बताने व् समझाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है. यही कारण है की कहीं ना कहीं जाकर जनसभाओ, चुनावी दौरों व् पत्रकारवार्ताओं में बिजली और पानी ही एक ऐसा मुद्दा बचा है जिस पर नेता खुल कर भाषण दे सकते है. इसके अतिरिक्त अगर जनता को आज कोई मुद्दा लुभा रहा है तो वो है भ्रष्टाचार. भले ही जनता राजनीति व् नेताओ को रात-दिन कोसती हो लेकिन भ्रष्टाचार का मुद्दा आते ही उसको वहीँ नेता अच्छा लगता है जो भ्रष्टाचार पर लम्बा-चौड़ा भाषण दे रहा है.
इतने से भी अगर नेताओ का पेट नहीं भरता और उसको लगता है की अन्य राजनितिक दल व् नेता पर कटाक्ष करना अभी बाकी है तो मुद्दा बचता है परिवारवाद का. ऐसे में वह यह बात भूल जाता है की उसकी पार्टी में या स्वयं उसने राजनीति में भले ही परिवारवाद को कितना ही बढ़ावा दिया हो उसका कोई जिक्र नहीं लेकिन दूसरों ने क्या किया इसका कोरा चिठठा खोलने से आज कोई भी नेता एक- दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहता. मजेदार बात तो यह है की आज हर राजनीतिक दल में परिवारवाद है और हर नेता इसको बढ़ावा देने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. फिर भले ही वह गांधी परिवार हो या हरियाणा की राजनीति के सरताज तीनो लाल परिवार. जबकि आज प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा भी इससे अछूते नहीं है.
जबकि देश के अन्य प्रदेशों की बात की जाए तो ऐसे नामों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने में अपना भरपूर सहयोग दिया है. फिर भले ही वो मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता या राजनेता ही क्यों ना हो. इसके पीछे सबके अपने-अपने तर्क भी हो सकते है. कोई कहेगा की बेटा बाप की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा है तो कोई कहेगा की जनता की भावना के अनुरूप किसी नेता के पुत्र-पुत्री व् पत्नी को चुनाव की टिकट दी गई है. जबकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की राजनीतिक दल किसी नेता की मृत्युपरांत उसके परिवार के किसी जन को चुनावी मैदान में उतर कर जनता के वोट पाना चाहता है. बावजूद इसके आज राजनीति में बढ़ता परिवारवाद नेताओं का मुंह चिढ़ा रहा है.
अब आदमपुर व् रतिया विधानसभा उपचुनाव को ही देख लो. दोनों ही चुनाव में परिवारवाद इस कदर हावी है की किसी भी नेता से कुछ बोलते नहीं बन रहा है. हिसार के सांसद व् पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मृत्युपरांत रिक्त हुई हिसार लोकसभा सिट के उपचुनाव में आदमपुर से उनके विधायक पुत्र कुलदीप बिश्नोई हिसार से सांसद बन गए. चलो वो तो राजनीति में पुराने है लेकिन ऐसे में आदमपुर उपचुनाव में जहाँ उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई को पहली बार चुनावी मैदान में उतरा गया है वहीँ रतिया से इनलो विधायक के मरणोपरांत उनकी पत्नी इनलो की टिकट पर चुनावी समर में है. जबकि कांग्रेस भी आदमपुर से इनलो की टिकट पर चुनाव लड़ चुके कांग्रेसी विधायक संपत सिंह के पुत्र को टिकट देना चाहती थी.
अगर देश की बात की जाएँ तो ऐसा कोई विरला ही राजनीतिक दल मिलेगा जिसने परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया हो. कश्मीर से कन्याकुमारी व् महाराष्ट्र से आसाम तक प्रत्येक मुख्यमंत्री परिवारवाद को बढाने का गुनहगार है. ऐसे में मुद्दों की तलाश में रहने वाले राजनीतिक दल व् नेताओं को परिवादवाद पर भाषण देना भारतीय राजनीति में मुंह चिढाने के सामान लगता है.


सब कुछ चुनावी-चुनावी


सभी जानते हैं कि मेरे देश की राजनीति सुबहान अल्ला है। आम कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष राजनेता तक राजनीति में इस कदर डूब गया है कि उसे देश दुनिया से कोई सरोकार नहीं है। अब अगर बात चुनाव की, की जाए तो नेता तो नेता आमआदमी भी चुनावी रंग में रंगा नजर आता है। यही कारण है कि आजकल चहुंओर चुनावी माहौल सा नजर आ रहा है। जिसके चलते हर आम-खास की जुबान चुनावी गुफ्तगु कर रही है तो नेताओं के क्रियाकलाप भी चुनावी-चुनावी से नजर आ रहे हैं। जनता की सोच आज चुनाव तक सिमित लग रही है तो नेताओं के भाषणों में भी चुनावी रस टपक रहा है।
बात देश के पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की हो या आदमपुर व रतिया विधानसभा उपचुनाव की। सभी चुनावों ने देश के माहौल को चुनावी सा कर दिया है. वहीँ हरियाणा के आदमपुर व् रतिया के दोनों उपचुनावों में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला व भविष्य में मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए कुलदीप बिश्रोई एवं कैप्टन अभिमन्यु चुनाव जीतने हेतू रावण के जमाने के प्रसिद्ध फार्मूले साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करने से गूरेज नहीं कर रहे हैं। कहने का भाव सिर्फ इतना सा है की जनता से लेकर नेता तक सब चुनावी हो गए है.
इस गुफ्तगू को उस समय और हवा मिली जब उत्तर प्रदेश  के विकास का दावा करने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तरप्रदेश के ही चार टुकड़े करने का मन बना लिया। परिणामस्वरूप एक प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेज दिया गया। ऐसा ही कुछ हाल केन्द्र सरकार का भी है। केन्द्र भी इन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा हुआ है। यह शायद चुनावी असर ही है की क्रुड (कच्चा तेल) की कीमत्तें दिन-प्रतिदिन बढऩे के बावजूद केन्द्र ने या तो बीते लोकसभा चुनाव में जीत पाने के लिए तेल की कीमतों में कटौती की थी या फिर अब एक बार पुन: तेल के दामों में कटौती की है।
माना जा रहा है कि हिसार लोकसभा उपचुनाव में मात खाने के बाद केन्द्र ने पाँचों राज्यों सहित आदमपुर व रतिया उपचुनाव पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से यह कटौती की है। बीते दिनों राज्यस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हैलीकॉप्टर की हिसार के सीमावर्ती गांव में आपात लैंडिंग के दौरान गरीब के घर चाय पीकर हजार रूपए का नोट देना चुनावी सा नजर आया. प्रदेश में बिजली को लेकर जहाँ हाहाकार मचा हुआ है वहीँ हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का हालिया ब्यान कि जनवरी से प्रदेश की जनता को नियमित बिजली मिलेगी भी यह दर्शाता है कि आज सबकुछ चुनावी-चुनावी सा हो गया है।
जहां उत्तरप्रदेश के हालात पर देश के युवराज राहुल गांधी को शर्म आना उनकी राजनीतिक मंसा को दर्शाता है वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा  भी किसी चुनावी फार्मूले से कम नहीं है।


खुलती गठबंधन की गाँठ


आज जनता हैरान है, परेशान है. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा की राजनीति में आखिर हो क्या रहा है. बस हम सब यह देखने पर मजबूर है की सत्ता के भूखे ये नेता आखिर किस हद तक गिर कर आज किसी भी दल से गठबंधन तो करते है, लेकिन चंद ही दिनों में उस गठबंधन की गाँठ खुलती नजर आती है. इतने से भी पेट नहीं भरता तो गठबंधन के समय जनता के वोट हथियाने के उद्देश्य से कभी दल मिलने तो कभी दिल मिलने की बात करने वाले दोनों ही दलों के नेता एक-दूसरे को कोसते नजर आते है. आज देश हो या देश का कोई भी प्रदेश नेताओं की इस राजनीति से कोई भी अछूता नहीं है. सत्ता के नशे में मदमस्त गठबंधन के समय किसी नेता का उद्देश्य यह नहीं होता की जनता को सुशासन दिया जाये.
जबकि शादी जैसे पवित्र बंधन से एक रीत चली गठजोड़. शादी के दौरान जब लड़का-लड़की के फेरे शुरू होते है तो पंडित सात जन्मों तक यह बंधन ऐसे ही बना रहे इसके लिए गठजोड़ करते है. भारतीय संस्कृति के अनुसार यह गठजोड़ होनी-अनहोनी की सभी सीमाओं को लांघ कर उम्र भर चलता है. लेकिन भारतीय राजनीति ने आज इस गठजोड़ के मायने ही बदल कर रख दिए है. दो दिल और दो जिस्म को एक जान में बाँधने का काम करने वाले इस बंधन को राजनीति ने नाम दिया गठबंधन का. लेकिन आज यह गठबंधन होते बाद में है और टूट पहले जाते है. कुर्सी की चाह में दो दलों के ना दिल मिलते है और ना ही विचार. बावजूद इसके राजनीतिक दल और उसके नेता गठबंधन करते है तो सिर्फ स्वार्थ के लिए.
देश-प्रदेश में हुए गठबंधन को लेकर होने वाली गुफ्तगू का जिक्र छोड़ अगर सिर्फ हाल ही में हुए हिसार लोकसभा उपचुनाव व् आदमपुर तथा रतिया विधानसभा उपचुनाव की बात ही की जाए तो यह स्पष्ट होता है की गठजोड़ और गठबंधन में बहुत फर्क है. जहाँ बहुजन सन्देश पार्टी (कांशीराम) की अध्यक्षा कांता अलहड़िया जो बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में इनलो के साथ एक मंच पर दिखाई दी. वहीँ उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे को लेकर अपनी आवाज बुलंद की. शायद यह सत्ता का नशा ही था की मात्र कुछ ही दिनों में गठबंधन में दरार पड़ती नजर आई. कांता अलहड़िया जहाँ स्वयं इन उपचुनावों में आदमपुर से चुनाव मैदान में है वहीँ कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे है.
ज्ञात रहे की इससे पूर्व भी देश-प्रदेश में बहुत से गठबंधन बने व् टूटे लेकिन गठजोड़ की भूमिका आज तक बहुत ही कम गठबंधन निभा पाए है. केंद्र की सता पर काबिज होने के लिए विभिन्न दलों का कांग्रेस के साथ मिलना आज उन्ही दलों को भारी पड़ रहा है. कारण वहीँ की दल तो अवश्य मिले लेकिन दिल नहीं मिले. महंगाई के विरोध में कभी करूणानिधि का नाराज होना तो कभी ममता बेनर्जी का आँखे तरेरना गठबंधन की गाँठ पर समय-समय पर सवाल खड़े करता है. टूटते गठबन्धनों का हरियाणा में भी एक लम्बा इतिहास रहा है. हविपा-भाजपा, इनलो-बसपा, हजकां-बसपा व् इनलो-भाजपा जैसे गठबन्धनों को लेकर समय-समय पर लम्बे-चौड़े दावे किये गए. लेकिन कभी सत्ता नहीं मिलना तो कभी ज्यादा सत्ता सुख मिलने के कारण इन गठबंधनों की गाँठ खुलती नजर आई.


खुश तो बहुत हुए होगे आप



भारत निर्वाचन आयोग ने आदमपुर और रतिया विधानसभा उपचुनाव में रोड रोलर चुनाव चिन्ह को हटाने का फैसला लिया है. यह वही रोड रोलर है जिसने बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में जिस तरीके से हजकां-भाजपा प्रत्याशी कुलदीप बिश्नोई के ट्रैक्टर को कुचला उससे शायद वो कभी उभर नहीं पायेंगे. इसी रोड रोलर के बेकाबू होने से ही ना सिर्फ कुलदीप बिश्नोई की जीत का अंतर नाम मात्र रह गया बल्कि यह रोलर अगर कुछ कदम और चल गया होता तो कुलदीप बिश्नोई की हार निश्चित ही थी. यह रोड रोलर इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला को जीत तो नहीं दिलवा सका लेकिन जीत का अंतर मात्र 6335 करने में अवश्य कामयाब रहा, जो मुख्य विपक्षी उम्मीदवारों के लिए सुखद अनुभूति थी. यहीं कारण था की जीत के पश्चात कुलदीप की होली मनी तो भाजपा की दिवाली. लेकिन इतना अवश्य है की चुनाव परिणाम आने के अंत तक सभी की साँसे थमी हुई थी. चुनाव आयोग का यह फैसला आने से कुलदीप बिश्नोई खुश तो जरुर हुए होंगे.
कितने से जीत - कितने से हार 
हिसार लोकसभा उपचुनाव को हुए एक माह होने को आया, चुनाव परिणाम भी आ चूका है. सभी को पता है की इस उपचुनाव में हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई ने इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला को हराया. लेकिन आज भी बहुत से लोगों और नेताओं के लिए यह एक पहेली ही बनी हुई है की आखिर कुलदीप बिश्नोई ने कितने मतों से जीत दर्ज की. भले ही चुनाव आयोग के आकडों के हिसाब से कुलदीप बिश्नोई 6335 वोट से जीत कर ही लोकसभा में पहुंचे है. लेकिन इनलो कुलदीप बिश्नोई की इस जीत को मात्र बता कर शायद अपने दिल का दर्द छुपाने की कोशिश कर रही है.
सभी जानते है की इस चुनाव में अगर रोड रोलर चुनाव चिन्ह नहीं होता तो परस्थितियाँ आज कुछ और ही होती. इसके साथ साथ चार कुलदीप नामक प्रत्याशियों ने भी क्रमशः 2353, 2712, 1659 व् 2053 वोट लेकर 8777 वोटों से कुलदीप बिश्नोई की जीत का अंतर कम करने में आग में घी का काम किया है. जबकि निर्दलीय प्रत्याशी ओमप्रकाश कल्याण जिनका चुनाव चिन्ह रोड रोलर था ने इस चुनाव में 27802 प्राप्त किये. इनलो - कांग्रेस को यह मानना पड़ेगा की भले ही कुलदीप बिश्नोई की जीत 6335 मतों से हुई हो लेकिन इनलो उम्मीदवार अजय चौटाला की हार अवश्य ही 42914 वोटों से हुई है. इसलिए यह गुफ्तगू गलत नहीं है की रोड रोलर द्वारा प्राप्त किये गए वोटों से अजय चौटाला खुश तो बहुत हुए होगे.


महिलायें गायब


- हिसार लोकसभा उपचुनाव के चुनावी मुद्दों में से -
रैली- 1 
राजनीतिक दल- भाजपा
महिला नेत्री- विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज
केंद्र की कांग्रेस सरकार महंगाई व् भ्रषाचार के कारण अलोकप्रिय व् बदनाम हो चुकी है. हजकां-भाजपा गठबंधन एक + एक नहीं अपितु एक और एक ग्यारह बन कर भारत की राजनीति में बदलाव की आहट करेगा. 
रैली- 2 
राजनीतिक दल- कांग्रेस
महिला नेत्री- दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित
भ्रष्टाचार को रोकने में अगर किसी पार्टी ने जरुरी कदम उठायें है तो वो सिर्फ कांग्रेस ने उठायें है. भाजपा के पास ना नेता है ना नीति है और ना ही कोई नियत. देश का विकास सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है. 
रैली- 3 
राजनीतिक दल- इनलो
महिला नेत्री- कांता अलहड़िया 
हजकां-भाजपा व् कांग्रेस ने कभी भी बाल्मीकि समुदाय को याद नहीं किया वहीँ प्रदेश के मुख्यमंत्री, उनके पुत्र और पूरा सरकारी अमला एक-एक वोट के लिए जिले में डेरा डाल कर लोगो से भीख मांग रहे है. 
लोगों को विकास करने व् भ्रष्टाचार मिटाने के सब्जबाग दिखाने के पश्चात आखिरकार वह दिन भी नजदीक आ ही गए जब सभी राजनीतिक दलों ने अपना दमखम लगाने के बाद विशाल रैली कर अपनी ताकत दिखाने का प्रयास किया. तीन दिन तक लगातार हुई इन रैलियों में जहाँ नेताओं ने  आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ वोट हथियाने के लिए किसी ने कोई दिग्गज नेता बुलाया तो किसी ने अभिनेता. सभी रैलियों में उच्च स्तर की महिला नेत्री भी उपस्थित रही. सिर्फ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.
ज्ञात रहे की हिसार लोकसभा के कुल मतदाताओं में 45 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है. बावजूद इसके प्रदेश में महिलाओं के प्रति असुरक्षित वातावरण व् आनर किलिंग के मुद्दे पर ना विपक्ष कुछ बोला और ना पक्ष से कुछ बोला गया. जबकि 33 प्रतशत आरक्षण की बात करने वाले सभी राजनीतिक दलों के पास लोकसभा चुनाव लड़ने वाली एक महिला नेत्री तक नहीं है. अक्सर राजनीतिक पार्टियां संसद तथा विधानसभा के अन्दर व् बाहर महिलाओं की बातें तो करते है लेकिन पता नहीं क्यों हिसार के मंच पर किसी भी नेता को महिलाओं की याद तक नहीं आई.
किसी ने महंगाई का रोना रोया तो किसी ने भ्रष्टाचार का गीत गया. अन्ना हजारे व् उनकी मुहीम का जिक्र करना भी कोई नहीं भुला. मकसद सभी का एक ही था की किसी तरह जनता के वोट हासिल किये जाये. लेकिन क्या हिसार जिले में महिलाओं के वोट नहीं है या राजनीतिक पार्टियों व् नेताओं को महिलाओं से कोई सरोकार नहीं है.


जिंदगी के कुछ अच्छे पल


हिसार लोकसभा उपचुनाव की गहमागहमी हुए भले ही महीनों बीत गए हो लेकिन अब कहीं जाकर जनता को पता लगने लगा है की हां चुनाव आ गया है. सिर्फ इसलिए नहीं की मतदान की तिथि समीप आ गई है या चुनाव का शोर बढ़ गया है बल्कि इसलिए की चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जिसकी भरी गर्मी में बिजली नहीं होने से सांस फूली हुई थी. चोरी का आलम यह था की व्यापारियों को नहीं पता था की जो प्रतिष्ठान वो ठीक से बंद कर के जा रहा है वो सुबह स्वयं आकर खोलेगा या शटर के ताले चटके हुए मिलेंगे. बीते कुछ समय में नगर हुई हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ ने आम आदमी की नींद तक उचाट दी थी. पुलिस की हर कोशिश को नाकाम करते हुए चैन स्नेचर आये दिन महिलाओं की या तो चैन तोड़ कर रफूचक्कर हो जाते रहे है या फिर उनका पर्स उड़ा कर भाग जाते थे. 
मगर जनता आज खुश है. उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करना है सिर्फ इसलिए नहीं, बल्कि उनकी ख़ुशी का मुख्य कारण है की आज शहर सहित जिले में जहाँ ना कोई अपराधिक वारदात हो रही है वहीँ महिलायें भी त्यौहार के दिनों में सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन कर पा रही है. लोगो में गुफ्तगू हो रही है की जिन अपराधियों ने जनता का जीना दूभर कर दिया था आखिर आज वो किसके कहने मात्र से अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे रहे. एकाएक कहाँ गए सभी अपराधी. क्या उनको चुनाव के दिनों में कुछ और काम दे दिया गया है. ऐसा भी हो सकता है की हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्नोई व् अनेक भाजपा नेता जो की पिछले दो सप्ताह से हिसार जिले में डेरा डाले हुए है उनके डर व् पुलिस की सक्रियता के चलते सभी अपराधी खामोश हो गए है. 
अभी कुछ दिनों पूर्व जब मई रात को अपनी गली में घुसा तो गली का नजारा कुछ बदला-बदला सा नजर आया. टाक-झांक करने पर पता लगा की जिस गली की स्ट्रीट लाईट कई साल से बंद पड़ी थी आज वो जगमगा रही थी. दीवाली का समय है शायद इसलिए नगर निगम द्वारा ठीक करवा दी गई होगी यह सोच मैं घर के अन्दर चला गया. सुबह जैसे ही गली से गुजर रहा था तो गली की सड़क का वह हिस्सा मुझे खुदा हुआ मिला जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी की यह जल्दी से बनवा दिया जायेगा. आस-पड़ोस वालों ने खुश होते हुए बताया की रात को जेसीबी मशीन से इसको खोदा गया है और यहाँ सीमेंट की सड़क बनवाई जाएगी. अभी कुछ आगे ही चला था की ऐसा ही एक और नजारा देख मैं हतप्रद था. मुख्य सड़क पर आया तो कहीं रंग पुताई का कार्य चल रहा था तो कहीं-कहीं मरम्मत का काम जोर-शोर से जारी था. 
इसका जिक्र मैंने अपने कुछ साथियों से किया. उन्होंने कहाँ की तुम पत्रकारों की यहीं कमी है. कोई काम हो रहा है तो होने दो, क्यों बात को बढाते हो. अब कहीं जाकर तो कुछ विकास के काम हो रहे है उसको भी क्या बंद करवा दोगे. जो मैं सोच रहा था उसने स्पष्ट कह दिया की जो काम बहुत पहले होने चाहिए थे वो आज चुनाव के दिनों में हो रहे है. इसका अर्थ यह हुआ की ऐसा नहीं है की शासन-प्रशासन को पता नहीं होता की कहा क्या कमी है, बस कमी है तो काम को अंजाम तक पहुंचाने की. जो काम आज हो रहे है अगर वो समय पर हो जाये तो सत्ता में रहते हुए ना मुख्यमंत्री को जिले में डेरा डालना पड़े और ना ही पूर्व मुख्यमंत्री को विकास की याद दिलानी पड़े. कुछ भी हो जनता खुश है और चाह रही है चुनाव पांच वर्ष में नहीं अपितु वर्ष में एक बार होने चाहिए, जिससे चुनाव की आड़ में वो जिंदगी के कुछ अच्छे पल गुजार सके.


शायद जनता बेवकूफ है


कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश:- लोग कहते है की जयप्रकाश ग्रीन ब्रिगेड का बॉस रहा
है लेकिन सभी जानते है की इनलो के शासन काल में जितनी बदमाशी, डकैती, लूटपाट व् रुपया वसूली प्रदेश में हुई उतनी तो जनता ने कभी नहीं देखी-सुनी होगी. यही कारण रहा की इनलो के शासन में प्रदेश का सिस्टम ही खराब हो गया था. कुलदीप बिश्नोई कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार की बात करते है तो मैं सभी प्रत्याशियों को भ्रष्टाचार पर बहस की चुनौती देता हूँ. मेरा मानना है की चौटाला और भजनलाल परिवार ने सदैव ही झूठ की राजनीति की है. 
इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला:- जब से देश और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार
आई है तब से विकास जनता का नहीं अपितु कांग्रेसी नेताओं के रिश्तेदारों का हुआ है. रही बात सुरक्षा व्यवस्था की तो आज प्रदेश में कोई भी सुरक्षित नहीं है जबकि आयें दिन चिकित्सक व् व्यापारियों पर हमले हो रहे है. उधर कुलदीप बिश्नोई भ्रष्टाचार की बात करते है लेकिन सभी जानते है की वो उस परिवार से है जो प्रदेश में भ्रष्टाचार का जनक रहा है. स्कूलों में छात्राएं यौन शोषण का शिकार हो रही है तो सरकारी विश्राम गृह कांग्रेसियों के ऐशगाह बने हुए है. 
हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई:- कांग्रेस-इनलो को चुनाव के दिनों में
ही हिसार की याद आती है, सत्ता मिलने के बाद इनके नेता हिसार के लोगो के सुख-दुःख की खबर तक नहीं लेते. आज मुख्यमंत्री हुड्डा गाँव-गाँव जयप्रकाश के लिए यह कह कर वोट मांग रहे है की हिसार को नंबर वन बना दूंगा, तो पिछले सात साल से हुड्डा जी कहाँ सो रहे थे. अगर उन्होंने इतना ही विकास करवाया होता तो उन्हें गली-गली जाकर जयप्रकाश के लिए वोट मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जबकि इनलो का शासन जनता अभी तक भूली नहीं है.
समस्त भारतीय पार्टी उम्मीदवार:- महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए केंद्र व् प्रदेश की
सरकारें दोषी है. सरकारी योजनायें समय पर लागू नहीं होती इसलिए जनता को उनका हक़ नहीं मिल पाता. आज कोई भी राजनीतिक दल और उनका नेता बेदाग़ नहीं है. सभी अपना उल्लू सीधा कर स्वार्थ की राजनीति कर रहे है. चुनाव जीतने के पश्चात समस्त भारतीय पार्टी सिर्फ जन लोकपाल बिल का समर्थन ही नहीं अपितु अन्ना के सपनो को साकार करने का काम भी करेगी.
जैसे-जैसे हिसार लोकसभा उपचुनाव का समय नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे प्रत्याशियों का एक-दूसरे के प्रति वाकयुद्ध तेज होता जा रहा है. कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार जा जनक. इतने तक भी किसी का पेट नहीं भरता तो वो व्यापारियों से फिरौतियां वसूलने वाले को कांग्रेस का संरक्षित बता रहा है तो कोई कह रहा है की चौटाला बंधुओ पर जो आय से अधिक संपत्ति का आरोप तय हुआ है वह संपत्ति जनता से अर्जित की गई है. कांग्रेसी उम्मीदवार अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो अजय चौटाला कांग्रेस शासन को कुशासन का दर्जा दे रहे है. उधर कांग्रेसी विधायक व् पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रघुवीर सिंह कादियान ने तो यहाँ तक कह दिया है की पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मौत का कारण कुलदीप बिश्नोई है. जबकि हरियाणा में हो रही हत्याओं, बलात्कार, अपहरण, लूटपाट, फिरौती, आगजनी व् चोरी का सेहरा इनलो, कांग्रेस व् हरियाणा जनहित कांग्रेस एक-दूसरे के सिर धर रही है. 
क्या आपको लगता है की कोई भी राजनीतिक दल, उसका प्रत्याशी या नेता गलत बोल रहा है. शायद नहीं, सभी सही ही तो बोल रहे है. यह सभी वहीँ बोल रहे है जिन समस्याओं से हमको हर समय दो-चार होना पड़ता है या जो हमारे लिए अक्सर गुफ्तगू बनती है. मुद्दा यह नहीं की आज कांग्रेस की सरकार या कल इनलो की सरकार थी. मुद्दा यह है की आज जो आरोप यह नेता एक-दूसरे पर लगा रहे है उनमे से एक को भी किसी नेता व् सरकार ने प्रदेश से ख़त्म करने का काम किया हो. ये वहीँ बोल रहे है जिनका हम शिकार हो रहे है. ये लोग तो आज बोल कर कल चले जायेंगे और हम हाथ मलते रह जाते है. नेताओं की बयानबाजी सुन कर अब गुफ्तगू शुरू हो गई है की भले ही यह सब आरोप ही है लेकिन जब सभी सही बोल रहे है तो आखिर जनता क्या करें. किसको दें वोट और क्यों. कौन विधायक व् सांसद आज चुनने के लिए ठीक है जो जीतने के बाद आपकी गली-मौहल्ले में आया आपका दुःख-दर्द सुनने को. जबकि स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री दावा करते है की एक सांसद और दे दो हिसार को नंबर एक बना दूंगा लेकिन हिसार का पुराना ओवरब्रिज को बंद हुए आज चार साल से अधिक हो गए वह तो बनवाया नहीं गया.


ट्रैक्टर पर हो के सवार चला रे


हरियाणा के मुख्यमंत्री प्रदेश के लिए नारा देते है नंबर वन हरियाणा. उनका कहना ठीक है की आज हरियाणा नंबर वन है. लेकिन कोई उनसे पूछे की किस चीज में, तो शायद जो वो कहेंगे उनमे से एक भी चीज में नहीं. ना यहाँ बिजली है, ना पानी. रही-सही कसर सड़के और अपराध पूरी कर देते है. इस पर भी अगर कोई जवाब या सुना-सुनाया जुमला सुना दिया जाये तो मिर्चपुर प्रकरण और जाट आरक्षण की आग अभी तक बुझी नहीं है. तो अब आप कहेंगे की फिर हरियाणा नंबर वन कैसे है. वो ऐसे की पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने प्रदेश में ताबड़तोड़ बेमौसमी रैलियाँ कर हरियाणा को नंबर एक पर ला दिया. उसके बाद इनलो व् हरियाणा जनहित कांग्रेस ने भी प्रदेश में बेमौसमी रैलियाँ कर मुख्यमंत्री हुड्डा का साथ दिया. अब भाजपा भी इसी नक़्शे कदम पर चल रही है. यह तो भविष्य की गर्भ में है की इन रैलियों का किस को क्या फायेदा मिलता है लेकिन इतना जरुर है की जनता सब कुछ देख-समझ रही है की मौजूदा समय में हरियाणा नंबर वन क्यों है.
वैसे राजनितिक तौर पर हरियाणा हमेशा ही नंबर वन रहा है. क्योंकि यहाँ की राजनीति हमेशा तिकोनी रही है. एक समय था जब यह तीन लालो का ढंका बजता था. देवी लाल, भजन लाल और बंसी लाल. लेकिन समय के साथ और बंसी लाल की मृत्यु के साथ हरियाणा विकास पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया. अब बचे दो लाल, उसमे से भजन लाल ने अपनी अलग पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस बना ली. तो अब कुल मिला कर लालो के प्रदेश में ओम प्रकाश चौटाला अकेले कमान संभाल रहे है. ऐसे में कांग्रेस और इनलो हर दम आमने-सामने रहते है. लेकिन इस बीच चर्चा में कोई रहता है तो वो है भजन लाल के पुत्र और हजकां सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई. वो समय-समय पर अपने बयानों और क्रिया-कलापों से सुर्खियाँ बटोरते रहते है. कहने को तो वो अपने को प्रदेश का आगामी मुख्यमंत्री बताते है लेकिन यह वो भी भली-भांति जानते है की अकेले मुख्यमंत्री बनना तो दूर प्रदेश की राजनीति में चलना भी उनके लिए बहुत कठिन है.
लेकिन मजे की बात यह है की इन दिनों कुलदीप बिश्नोई किसी साइकिल, जानवर, गाड़ी या पैदल नहीं बल्कि ट्रैक्टर पर बैठ कर प्रदेश का दौरा कर रहे है. आपको यह भी बता दें की चुनाव आयोग द्वारा उनकी पार्टी हजकां का चुनाव चिन्ह बदल कर अब ट्रैक्टर कर दिया है. यहीं कारण है की अब वो जहां कभी भाजपा के डर पर दीखते है तो कभी ट्रैक्टर पर बैठ कर किसी गाँव के दौरे पर. कभी वो रैली में देसी घी का हलवा बाँट रहे है तो कभी महंगाई, भ्रष्टाचार और बिजली-पानी के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार की खिंचाई करते नजर आते है. जबकि बीते विधानसभा चुनावों में हजकां की टिकट पर जीतने वाले 5 विधायक जो अब कांग्रेस में शामिल हो चुके है उनका क्या होगा यह शायद कुलदीप बिश्नोई भी नहीं जानते. इतना जरुर है की इस मुद्दे पर वो सिर्फ मुख्यमंत्री हुड्डा, पांचो विधायको और विधानसभा स्पीकर को सिर्फ कोस ही सकते है. चलो जी अब जब कुलदीप बिश्नोई ट्रैक्टर पर बैठ कर निकल ही पड़े है तो उसकी रफ़्तार क्या रंग दिखाती है यह तो आगामी चुनावों में ही पता लगेगा.


राजनीति में डबल पावर का गेम


अगर मैं यहाँ सिर्फ डबल पावर लिखता तो आप शायद कुछ जल्दी और ज्यादा समझ जाते. कसूर आपका भी नहीं है मुझे भी यही लगता की कोई खास बात बताई जाने वाली है. डबल पावर से वो खास बात क्या हो सकती है आपको भी पता है और मुझे भी पता है. लेकिन जो बात आज तक मेरे समझ में नहीं आई वो है राजनीति की डबल पावर. प्रदेश के लिए वो चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा. मुख्यमंत्री हुड्डा ने दोनों ही चुनावो के पश्चात् कुछ स्थानों पर डबल पावर का जम कर प्रचार किया. लेकिन जनता को यह डबल पावर ना तो दिखाई दी और ना ही इसका मतलब आज तक समझ में आया.
मैं भी क्या करता, पेशे से पत्रकार हूँ और आजकल गुफ्तगू भी कर लेता हूँ तो सभी तरफ ध्यान देना पड़ता है. लेकिन हिसार के समीपवर्ती शहर हांसी के लोगो का दर्द कुछ ऐसा है की वहा ध्यान देने वाला कोई नहीं है. ना तो अभी तक हांसी के विधायक विनोद भयाना हांसी के हो सकें है और ना ही डबल पावर के रूप में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी नेता छत्रपाल इन दिनों हांसी में दिखाई पद रहे है. बावजूद इसके आज कोई ऐसा सप्ताह बमुश्किल बीतता होता जब हांसी में खून की होली ना खेली गई हो या कोई व्यापारी लूट का शिकार ना हुआ हो.
जनता से इन दोनों की लुकाछिपी अब जगजाहिर सी हो गई है. हरियाणा जनहित कांग्रेस की टिकट पर विधायक बनने वाले विनोद भयाना ने जहा कांग्रेस का दामन थाम लिया है वही कांग्रेस की टिकट पर चुनाव हार चुके छत्रपाल इन दिनों ढूंढे से भी नहीं मिल रहे. अब हांसी में बदमाशो की इतनी दहशत फैली हो और विधायक जी है की पंजाबी सम्मेलन के माध्यम से अपनी राजनीति चमका रहे हो तो बात गले नहीं उतरती. जबकि पुलिस द्वारा जनता से शांति बनाये रखने के उद्देश्य से बुलाया गया पुलिस-पब्लिक सम्मलेन में दोनों ही नेताओ का नहीं पहुंचना जनता और स्थानीय नेताओ के लिए सिरदर्द बना हुआ है.
वरिष्ठ कांग्रेसी नेता छत्रपाल के लिए यह लेख भी जरुर पढ़े. कुर्सी बड़ी की पद
अब इस डबल पावर की बात मैं हिसार के लिए करूँ तो यहाँ भी लोकसभा चुनाव के पश्चात कुछ ऐसा ही प्रचार किया गया था की हिसार को एक नहीं दो सांसद मिले है. इसलिए हिसार अब प्रदेश का पहला ऐसा जिला है जहा दो सांसाद मिलकर विकास करवाएँगे. मुख्यमंत्री हुड्डा के इस उदगार के पीछे कारण था हिसार से विजयी हुए कांग्रेसी सांसद जय प्रकाश और हिसार के रहने वाले कुरुक्षेत्र के सांसद नवीन जिंदल. लेकिन पांच सालो में जहा जयप्रकाश हिसार में दिखाई ही नहीं दिए वही नवीन जिंदल का कहना था की वो तो कुरुक्षेत्र से सांसद है इसलिए हिसार की समस्याओ से वाकिफ ही नहीं है.
इस डबल पावर का हिसार की जनता पर क्या असर हुआ इसका जवाब तो बीते लोकसभा चुनाव में पुन चुनाव लड़ रहे जयप्रकाश को जनता ने दे दिया जबकि हांसी की जनता आज अपने को ठगा सा महसूस कर रही है. या फिर यह मान लिया जाये की जो छत्रपाल हुड्डा की जय-जयकार करने के लिए प्रति सोमवार पत्रकारों से मुखातिब हुआ करते थे उनके पास इस बार हुड्डा का गुणगान करने के लिए शब्द ही नहीं है. लगता है की वो अपनी हार से इतने हताश है की वो कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर वो मुख्यमंत्री द्वारा कहीं जाने वाली डबल पावर की गेम को समझ गए है.


हरियाणा कि राजनीति, नेता और उनका राजनितिक दर्द


लगता है कि अब राजनीति सिर्फ राज करने और पाने वाले नेताओ के लिए ही रह गई है. जबकि एक समय नेताओ द्वारा यह कहा जाता था कि वो राजनीति में इस लिए आये है कि जनता का कुछ भला किया जा सके. यही कारण है कि हाल ही में हुए हरियाणा विधानसभा चुनावो को लेकर कुछ नेताओ का दर्द अब भी झलक रहा है. कुछ इन्ही बातो को लेकर जो दर्द हरियाणा जनहित कांग्रेस सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई के सीने में है कुछ वैसा ही दर्द इनलो सुप्रीमो औमप्रकाश चौटाला के सीने में भी


हजंका का जन्मदिन और हजंका


हरियाणा जनहित कांग्रेस. कहने को तो दो दिसम्बर को पार्टी की वर्षगाठ है लेकिन बीते कुछ समय से पार्टी में जो कुछ घटित हुआ है उससे लगता नहीं है की आज हजंका में पार्टी जैसी कोई चीज बची है. दो वर्ष पूर्व आज ही के दिन रोहतक में रैली कर पार्टी सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई ने जो संकेत दिए थे उससे हरियाणा की क्षेत्रीय पार्टिया ही नहीं अपितु कांग्रेस तक में खलबली


चुनाव, इज्जत और दावेदारी-फ़िर भी जनता सब पर भारी


हिसार जिले की सात विधानसभा सीटो पर चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशी अब अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे है। वैसे तो रविवार को एक महीने से चल रहा चुनाव प्रचार का शोर-शराबा थम सा गया है लेकिन अब प्रत्याशी जनता से संपर्क कर अपने-अपने दावे कर रहे है। उल्लेखनीय है की हरियाणा विधानसभा के लिए 13 अक्तूबर को चुनाव होने है। रविवार को चुनाव प्रचार थमने से पूर्व सभी प्रत्याशियों ने जीत के लिए अपनी ताकत झोंक दी। किसी ने रैली कर अपनी ताकत दिखाई तो किसी ने रोड शो कर। किसी ने जनसभा कर वोट देने की अपील की तो किसी ने घर-घर जाकर अपने व् अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगे। कुल मिला कर रविवार का दिन सभी पार्टीयो व् उम्मीदवारों के लिए अहम् रहा। कोई किसी तरह की कोर-कसर बाकि नही रखना चाहता था। यही कारण था की जहा पंजाबी समुदाय के पंचायती प्रत्याशी गौतम सरदाना ने एक विशाल रैली कर अपनी ताकत दिखानी चाही वही कांग्रेस सांसद और हिसार विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी सावित्री जिंदल के पुत्र नवीन जिंदल ने छोटी-छोटी जनसभाए कर अपनी माता को वोट देने की अपील की। इन सब से परे ज्येष्ठ जिंदल पुत्र पृथ्वी राज ने नगर के व्यापारियों और प्रतिष्ठित लोगो को पत्र के माध्यम से कांग्रेस और अपनी माँ को जिताने की अपील की। इसी कड़ी में हरियाणा जनहित कांग्रेस सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई ने भी रोड शो कर हजंका को वोट देने की अपील की। यह तो 22 अक्तूबर को ढोल की पोल खुलने पर ही पता चलेगा की कौन कितने पानी में है लेकिन इतना जरुर है की यह चुनाव हिसार के लिए अहम् होंगे। इन चुनावो में कांग्रेस, भाजपा व् हजंका सहित कई बड़े नेताओ की इज्जत दांव पर लगी है। अगर जनता से थोडी सी भी चुक हो गई तो जहा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल का राजनैतिक भविष्य दांव पर लग सकता है वही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व् पूर्व सांसद जयप्रकाश का राजनितिक जीवन अंधकारमय हो सकता है। तो इनलो छोड़ कर कांग्रेस का दामन थामने वाले पूर्व वित्त मंत्री संपत सिंह भी अपने को राजनैतिक मैदान में खड़ा रखने में असमर्थ होंगे। वही भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए भाजपा विधायक रामकुमार गौतम का राजनितिक अस्तित्व भी खतरे में है।
इन सब में एक चेहरा भाजपा का भी है। वैसे तो हरियाणा में पाँव जमाने के लिए भाजपा शुरू से ही मशक्कत करती रही है लेकिन अब तक उसको कुछ चंद सीटो से ही गुजरा करना पड़ा है। वही हिसार की नारनौंद सीट पिछले चुनावो में भाजपा के पाले में गई थी जिसे भाजपा गवाना नही चाहती। यही कारण है की भाजपा ने यहाँ से वरिष्ठ नेता कैप्टन अभिमन्यु को मैदान में उतरा है। अगर इस सीट पर गलती से भी कोई गलती हो गई तो या तो कैप्टन अभिमन्यु या फ़िर कांग्रेस उम्मीदवार रामकुमार गौतम को राजनीति से संन्यास लेना पड़ सकता है। जबकि इनलो भी बरवाला व् उकलाना से अच्छी स्थिति में दिखाई दे रही है। अगर यहाँ भी भाग्य ने इनलो का साथ नही दिया तो दोनों इनलो प्रत्याशी सरोज मोर और शीला भ्यान जो की आज पार्टी के उच्चस्थ पद पर बैठी है को हार का मुहं देखना पड़ सकता है। रही बात हजंका की तो उसने बिना कोई गलती करे हिसार की सात सीटो में से तीन को हथियाने का काम किया है। आदमपुर से पार्टी सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई को, नलवा से माता जसमां देवी को तो हांसी से पार्टी के वरिष्ठ नेता विनोद भयाना को चुनाव मैदान में उतरा है। यहाँ थोडी सी चुक होते ही जहा सीधा असर पार्टी पर पड़ेगा वही दिग्गज भी किसी को मुहं दिखाने लायक नही रहेंगे। फ़िर भले ही ये नेता अपनी जीत को लेकर कुछ भी दावे करते रहे, जनता को कुछ भी सब्जबाग दिखा ले लेकिन यह तो जनता को ही देखना है की वो किस की इज्जत उतारती है और किस पर मेहरबान होती है।


यहाँ तो सब गड़बड़ झाला है भाई


हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव सर पर खड़े है लेकिन जनता अभी भी इस गड़बड़ झाले में फंसी है की प्रदेश में कौन सी पार्टी किस का दामन पकडेगी और कौन सा नेता चुनाव में खड़ा होगा। नेताओ और राजनैतिक पार्टियों की यह आँख मिचौली जनता के लिए ही नही उन नेताओ के लिए भी सिरदर्द बनी हुई है जिन्हें चुनावो के समय जनता के बीच जाना है। यही कारण है की कुछ नेताओ को छोड़ प्रदेश स्तर पर कोई भी नेता कुछ भी बोलने से बच रहा है। कारण साफ़ है की किसी को पता ही नही की यह विधानसभा चुनाव प्रदेश की राजनीति में क्या क्या गुल खिलायेगा। मेरी इस गुफ्तगू में गुल खिलने का मतलब यह है की जहा कांग्रेस अभी नेताओ की छटनी में व्यस्त है वही उसे पार्टी टिकट मांगने वालो की लम्बी फेहरिस्त से भी निपटना होगा। उधर इनलो ने अभी जो 42 उम्मीदवारों की घोषणा की है उससे भी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रदेश की अनुशासित पार्टी कहलाने वाली इनलो में इन दिनों बगावत के सुर सुनने को मिलने लगे है। जबकि हरियाणा जनहित कांग्रेस की स्थिति उससे भी ख़राब है। एक और जहा पार्टी नेता अपने सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई को चमचो से घिरा बता रहे है वही भाजपा के साथ गठबंधन नही होने से भी पार्टी नेता व् कार्यकर्ता उहा-पोह की स्थिति में है।
अगर अब भाजपा नेताओ की बात करे तो वो कुछ बोलने की स्थिति में ही नही है। पहले इनलो से गठबंधन तोड़ने और अब तक हजंका से गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता अपने मुंह को सिले हुए है। विधानसभा चुनाव में जहा मात्र 35 दिन शेष रह गए है वही अभी तक कोई गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता जनता के बीच जाने से हिचक रहे है। उल्लेखनीय है की हरियाणा में राजनीति करने के लिए भाजपा को हमेशा बैशाखियो की जरुरत रही है वही उसके नेताओ को यह पता ही नही है की विधानसभा चुनाव के लिए किसी पार्टी से गठबंधन होगा की नही। वैसे तो हजंका से नाता टूटने के बाद बसपा भी प्रदेश की सभी 90 सीटो पर अपने प्रत्याशी खड़े करने का दम भर रही है लेकिन प्रदेश में उसकी स्थिति बहुत अच्छी नही है। मजेदार बात तो यह है की सिर्फ़ हिसार की 7 विधानसभा सीटो के लिए जहा 100 कांग्रेसी नेताओ ने आवेदन किए है वही जनता भी इस खेल (कांग्रेस के असली नेता होने का दम भरने वाले नेता) को देखने के लिए बेसब्री से इन्तजार कर रही है। वही भाजपा-हजंका गठबंधन, इनलो में उठ रहे उबाल और बसपा को प्रत्याशी तक नही मिलने के कारण हो रहे गड़बड़ झाले से जनता का भरोसा राजनीति और नेताओ से उठता जा रहा है।
और ख़त्म हो गया ड्रामा
मैंने यह पोस्ट लगभग 3 बजे के आसपास यह सोच कर लिखी थी की प्रदेश की राजनैतिक पार्टियों में प्रदेश की राजनीति करने के लिए जो गड़बड़ झाला चल रहा है उस पर में आपसे कुछ गुफ्तगू कर सकूँ, लेकिन शाम होते-होते समाचार आया की हरियाणा में अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस और भाजपा को जिन बैशाखियो की जरुरत थी वो मैं के कारण अब एक-दुसरे पर ही तन गई है। भाजपा जहा प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत मान कर अहम् में है वही हजंका सुप्रीमो स्वयम को मुख्यमंत्री घोषित करने के कारण मैं के आगोश में है।
गुफ्तगू के प्रिय पाठको मैंने एक स्टोरी लिखी थी की आख़िर कौन लेगा ख़बर देने वालो की ख़बरमैंने आपसे वादा किया था की मेरी यह गुफ्तगू अभी ख़त्म नही हुई हैऐसा नही है की मैं मेरे वादे को भूल गया हूँकुछ तथ्य मेरे पास चुके है और कुछ आने अभी बाकी हैउनके आते ही मैं फिर गुफ्तगू करूँगा की किस तरह ख़बर देने वाले अपने मंसूबो को अंजाम दे जाते है और हम चुपचाप तमाशा देखते रहते है.


कहीं वो राजनीति का शिकार तो नही हो गए


लोकसभा चुनाव से पहले एक समय आया जब हरियाणावाशियों को लगने लगा था की भाजपा प्रदेश में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस से गठबंधन करेंगी। दोनों ओर के कार्यकर्ता मुहं बाय खड़े थे की आज नही तो कल दोनों पार्टिया हाथ मिला ही लेगी। लेकिन ऐसी कोई घोषणा होने से पहले भाजपा ने सभी समीकरणों को दरकिनार कर ओमप्रकाश चौटाला वाली इनलो से हाथ मिला लिया। बात कुछ हजम नही हुई तो दोनों दलों के नेताओ ने इसे दो दलों का नही दो दिलो का मिलन बताया। जैसे-तैसे लोकसभा चुनाव तो निपट गए और जनता ने इस गठबंधन को घास तक नही डाली। प्रदेश की राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ ऐसे ही दिल मिले हजंका और बसपा के। दोनों ही गठबंधन का वही हुआ जिसका डर था। ऐसा लगा जैसे दो पार्टियों में पहले हुआ प्यार, फ़िर सगाई, शगुन के समय हुई लट्ठ बजाई, शादी का समय आने ही वाला था की तलाक़ की नौबत आई।
बात कुछ ऐसी थी की रविवार को हिसार में हरियाणा जनहित कांग्रेस और बसपा का सयुंक्त कार्यकर्ता सम्मलेन था। अभी बसपा के राज्य प्रभारी और बसपा के महासचिव मानसिंह मनहेडा कुछ बोलते उससे पहले ही एक बसपा कार्यकर्ता ने हो-हल्ला करते हुए मानसिंह मनहेडा को भला-बुरा कहा और मंच की ओर लपका। अभी कोई कुछ समझ पता उसने मनहेडा को तमाचा जड़ दिया। बात इतनी भड़की की कोई कार्यकर्ता किसी की पिटाई कर रहा था तो कोई किसी की। ऐसा लगा जैसे यह कार्यकर्ता सम्मलेन नही अपितु यहाँ दो पार्टियों द्वारा दंगल खेला जा रहा है। कोई किसी की गाड़ी के शीशे तोड़ रहा था तो कोई किसी की गाड़ी के। आख़िरकार मनहेडा ने कार्यकर्ताओ को संबोधित करते हुए कहा की यह सब कांग्रेस का किया धारा है, जबकि यह गठबंधन 24 घंटे के आदेश पर चुनाव जितने में सक्षम है। लेकिन इस प्रकरण के 3 दिन बाद ही मनहेडा ने यह कहते हुए गठबंधन तोड़ दिया की कुलदीप बिश्नोई झूठ की मशीन है, जबकि बिश्नोई का कहना है की मनहेडा हुडा के एजेंट है। चलो यह तो राजनीति है जिसमे कुछ भी कहना सुनना जायज है, जबकि पहलु यह है की कही हजंका द्वारा भाजपा से गठबंधन करने के लिए मनहेडा राजनीति का शिकार तो नही हो गए।
ऐसी क्या दावा ली बिश्नोई ने
मैंने यह तो सुना था की राजनीति में सब कुछ सम्भव है लेकिन यह समझ नही आ रहा की आख़िरकार हजंका सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई ने ऐसी कौन सी दवा ली जिससे उनकी स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी 4 दिनों में ठीक हो गई। रविवार को कार्यकर्ता सम्मलेन में यह बताया गया की इस सम्मलेन में बिश्नोई को भी आना था लेकिन वो स्वाइन फ्लू से पीड़ित है इसलिए नही आ सके। गठबंधन टूटने के पश्चात् भी कुलदीप बिश्नोई ने बताया की वो स्वाइन फ्लू से पीड़ित है लेकिन शाम होते होते समाचार आया की अब कुलदीप बिश्नोई पूरी तरह स्वस्थ है। तो मुझे यह समझ नही आया की जिस बीमारी से आज भारत में ही नही विश्व में प्रतिदिन कोई न कोई मृत्यु हो रही है उस बीमारी से कुलदीप ने कैसे निजात पाई। मैं भी उनके स्वस्थ रहने की कामना करता हूँ लेकिन जनहित में मेरा यह पूछना ग़लत नही होगा।


आपदा प्राकृतिक, मुद्दा राजनितिक


आज पूरे देश में बिजली-पानी के लिए हा-हाकार मचा हुआहै। खबरिया चैनलों सहित देश का पूरा मिडिया इस बातको जोर शोर से उठा रहा है की अगर जल्द ही बारिश नही हुईतो आने वाले दिनों में जनता बिजली पानी के लिए त्राहि-त्राहि करेंगी। आम आदमी तो इस बात को भली भांतिसमझ गया है लेकिन यह राजनितिक दल है की उन्हें तोबस मुद्दा चाहिए राजनीति में बने रहने के लिए। यहीकारण है की आज किसी भी प्रदेश में किसी भी दल कीसरकार हो विपक्ष बिजली-पानी के लिए सरकार को कोसरहा है। फिर भले ही किसी अन्य प्रदेश में उसी विपक्ष की सरकार क्यो न हो।
अब हजंका और बसपा को ही देख लो। दोनों दल एक क्या हुए की हरियाणा की राजनीति में बने रहने के लिए कोईमौका नही गवाना चाहते। सोमवार को स्वयं दोनों दलों के वरिष्ठ नेताओ ने बरसात के लिए इन्द्र देवता को खुशकरना चाहा। इसके लिए नगर के एक वेंकटहाल में हवन-यज का आयोजन भी किया गया। लेकिन इस दौरानपत्रकारों को संबोधित करते हुए जब हजंका सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई और मानसिंह मनहेडा ने बिजली-पानी कीसमस्या पर हरियाणा सरकार को कोसना शुरू किया तो मैं यह समझ नही पाया की जिस प्राकृतिक आपदा के लिएयह हवन-यज हो रहा है क्या यह सब दिखावा है या सरकार को कोस कर वो इस मुद्दे को राजनितिक रंग देना चाहतेहै।
क्या उत्तरप्रदेश में है बिजली-पानी
और वो चुप हो गए
कुलदीप बिश्नोई और मनहेडा जी ने हरियाणा सरकार को बिजली-पानी मुद्दे पर जम कर कोसा। जहा श्री बिश्नोई नेमुख्यमंत्री हुड्डा को हर प्रकार से नाकारा घोषित किया वही श्री मनहेडा ने कहा की हुड्डा सरकार सोई हुई है इसलिएप्रदेश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। जब मैंने मनहेडा जी से यह पूछा की जिस प्राकृतिक आपदा के लिए आपहरियाणा सरकार को कोस रहे हो क्या उत्तरप्रदेश में जनता को पूरा बिजली-पानी मिल रहा है तो वो चुप्पी साध गए।


लालो के लाल के हाथो हरियाणा की राजनीति


मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने वाले वरुण गाँधी पर भले ही भाजपा के आला नेताओ ने लगाम लगा दीहो लेकिन इतना अवश्य है की आगामी लोकसभा चुनावो में इन युवा नेताओ की अहम् भूमिका होगी । यही नहीहरियाणा की राजनीति भी धीरे-धीरे युवा लालो के हाथो जा रही है । हरियाणा के लिए एक कहावत थी की अगरकिसी को राजनीति में आना है तो इन तीनो लालो (बंसीलाल, देवीलाल, भजनलाल ) से सामना करना होगा फिरकही जा कर नेता बनोगे । स्थिति तो आज भी यही है लेकिन फर्क इतना है की आज इन तीनो लालो के पुत्र - पुत्रियों ने हरियाणा की राजनीति में अपना वर्चस्व कायम कर लिया है । बंसीलाल के पुत्र सुरेन्द्र सिंह कीमृत्युपरांत जहा उनकी राजनितिक विरासत किरण चौधरी ने संभाली वही अब किरण चौधरी की पुत्री श्रुतिलोकसभा चुनावो के द्वारा राजनीति में आने को आतुर दिखाई दे रही है । वही इसी परिवार के रणवीर महेंद्रा भीअपने पुत्र अनिरुद्ध चौधरी को लोकसभा चुनावो के माध्यम से राजनीति में लाना चाह रहे है । जबकि देवीलाल केपुत्र ओमप्रकाश चौटाला के बाद अब अजय चौटाला व् अभय चौटाला हरियाणा की राजनीति में अहम् भूमिका निभारहे है । रही बात भजन लाल की तो वह तो शुरू से ही राजनीति के पिअचडी माने जाते रहे है । उनके पश्चात् अबउनके सांसद पुत्र कुलदीप बिश्नोई राजनीति में सक्रिय है । जबकि चन्द्रमोहन कुछ माह पूर्व तक हरियाणा केउपमुख्यमंत्री थे ।

यह
भी है लाइन में


तीनो
लालो के अतिरिक्त अब हरियाणा में राजनीतिज्ञों के लालो की संख्या बढती जा रही हैऐसा नही है की यह युवा राजनीती के नए चहरे है लेकिन यह पहलु इसलिए मायेने रखता है की प्रदेश की १० लोकसभा सीटो में से से अधिक सीटो पर इन लालो का अधिपत्य हैस्व ओमप्रकाश जिंदल के पुत्र नवीन जिंदल जहा कुरुक्षेत्र से सांसद है वही आगामी चुनावो में भी वो यही से अपना भाग्य आजमा रहे हैअम्बाला से कुमारी शैलजा कांग्रेस की उम्मीदवार होगी वही भिवानी से अजय चौटाला इनलो-भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैभिवानी लोकसभा सीट पर जहा पारिवारिक लडाई अपने चरम पर है वही किरण चौधरी की पुत्री श्रुति कांग्रेस की और से चुनाव मैदान में सकती हैहिसार से कुलदीप बिश्नोई अपनी सीट पक्की मान रहे है तो रोहतक से मुख्यमंत्री के सांसद पुत्र दीपेन्द्र हुडा मैदान में डटे हैइन सब के अलावा प्रताप चौटाला के पुत्र रवि चौटाला, डॉ के.वि.सिंह के पुत्र अमित सिहाग व् राव नरवीर के पुत्र भी हरियाणा की राजनीति में अपना स्थान बना चुके है


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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