आखिर बिकता क्या है



बहुत दिनों से कुछ सोच रहा था लेकिन साथ ही उस सोच के एक सोच और चल रही थी. सोच सोच में सोचना मुश्किल सा लग रहा था की जो मै सोच रहा हूँ उसको शब्द कैसे दूँ. यही कारण था की मैंने सोचने में ही लगभग एक सप्ताह निकाल दिया. आज जाकर उस सोच को कुछ शब्द दे पाया हूँ. मुद्दा ही कुछ ऐसा था की सोचना भी जरुरी था और आपको बताना भी जरुरी. वैसे तो बात बड़ी छोटी सी है लेकिन जब कोई बात समझ में नहीं आये तो वो गुफ्तगू बन जाती है. अब देखो ना मेरी समझ में यह नहीं आ रहा की आज बाजार में बिकता क्या है.
अब आप भी सोच में पड़ गए होंगे की यह मै क्या पूछ रहा हूँ. जी हां आज कल के विज्ञापनों, भले ही वो कोई पोस्टर, कैलेण्डर या फिर कोई होर्डिंग हो उन्हें देख यह समझ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगता है की आखिर आज बिकता क्या है. क्योंकि प्रचार की इन सब चीजों में उत्पाद व् उत्पादन करने वाली कंपनी का नाम कम और एक मॉडल के देह का प्रचार कुछ ज्यादा ही नजर आता है. ऐसा कोई सिर्फ एक-आधी कंपनी ही नहीं करती अपितु आज हर कंपनी इस दौड़ में कूद पड़ी है. भले ही वो कंपनी किसी भी चीज का उत्पादन कर रही हो.
अब देखो ना किंग फिशर ने हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 2011 का कैलेण्डर जारी किया है. जैसी की उम्मीद जताई जा रही थी कुछ उसी अंदाज में धूम-धड़ाके के साथ यह रंगीन कैलेण्डर निकाला गया. मेरी जब भी कभी किसी वाइन शाप पर नजर पड़ती तो उस कंपनी के नाम से पहले अर्ध नग्न लड़कियों की फोटो पहले दिखाई देती. मै अक्सर सोचता की एक वाइन के बोर्ड पर आखिर इस लड़की का क्या काम. मेरे लिए यह सोचना मुश्किल था की वाइन लड़के ज्यादा पीते है या लडकियां वाइन की ज्यादा आदि होती है.
अगर वाइन पीने वालो में आदमियों की तादाद ज्यादा है तो लड़कियों की देह को क्यों दिखाया जाता है. क्या शराब कम्पनियां शराब के साथ-साथ शबाब परोसना चाहती है या फिर मॉडलों अर्ध नग्न देह दिखा कर अपनी बिक्री बढ़ाना चाहती है.

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3 आपकी गुफ्तगू:

Minakshi Pant said...

मै भी आज तक ये समझ नहीं पाई दोस्त कि पेसे कि इतनी भूख क्यु जो अपनी इज़त का भी ख्याल न रहें !
विचारणीय प्रस्तुति !

संजय भास्कर said...

विचारणीय प्रस्तुति !

shailendra said...

dikhne ka ye bhi badiya bahana hai...

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अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

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यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

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आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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