265 करोड़ से सेक्टरों की सड़कें जल्द होंगी चकाचक


हिसार के सेक्टरों की सड़कों के लिए 13.55 करोड़ रुपये मिले


हिसार : सेक्टरों में बदहाल सडकों के दिन जल्द बहुरेंगे। हिसार के सेक्टरों की सड़कें 13.55 करोड़ रुपये की लागत से चकाचक होंगी. उपायुक्त अशोक कुमार मीणा ने बताया कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने 20 शहरों के 163 सेक्टरों की विभिन्न सड़कों के स्पेशल रिपेयर के लिए 265 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है। जल्द ही विभागीय टेंडर प्रक्रिया होने के बाद इस सडकों की स्पेशल रिपेयर कराकर लोगों को राहत दिलाई जाएगी।
उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री द्वारा हिसार में सेक्टरों की सड़कों के नवीनीकरण हेतु 13.55 करोड़ मंजूर किए गए हैं। इसके तहत सेक्टर 14, सेक्टर-13, सेक्टर 16-17, पीएलए, सेक्टर-15 व मेला ग्राउंड सहित अन्य सेक्टरों की सड़कें शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हिसार के अलावा हांसी में 2 सेक्टरों की सड़कों की मरम्मत के लिए भी 4 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं जो यहां की जर्जर सड़कों के सुधार पर खर्च किए जाएंगे।
उन्होंने बताया कि लंबे अरसे से सेक्टरों की सड़कों के उचित रखरखाव के अभाव में इनकी हालत जर्जर हो गई थी। शहरी निकाय मंत्री कविता जैन के अनुरोध तथा वाहन चालकों व आमजन की परेशानियों के मद्देनजर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने सभी शहरों के ऐसे स्पेशल रिपेयर वाली सड़कों के एस्टीमेट मांगे थे। अब मुख्यमंत्री ने 20 शहरों के 163 सेक्टरों की सड़कों के सुधार के लिए 265 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है।


अब हाथी पहनेगा चश्मा, गठबंधन की घोषणा


हरियाणा मे नये समीकरण : इनेलो ने बसपा से मिलाया हाथ


चंडीगढ़ : इनेलो-बसपा के गठबंधन की चर्चा कुछ महीनों से प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चल रही थी और इनेलो के नेता इस बारे में इशारा भी कर रहे थे। बीते महीने बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर अभय चौटाला ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर शुभकामनाएं दी थी जिसके बाद चर्चाएं और ज्यादा तेज हो गई थी। इस विषय पर पूछे गए एक सवाल पर अभय चौटाला ने कहा था कि बसपा संस्थापक कांशी राम जी के साथ चौधरी देवीलाल के घनिष्ठ संबंध थे और अगर वे गठबंधन करेंगे तो डंके की चोट पर घोषणा के साथ करेंगे।
शायद यही कारण रहा की प्रदेश की राजनीति में नये सियासी समीकरणों को हवा देते हुए प्रमुख विपक्षी दल इनेलो व बहुजन समाज पार्टी ने आगामी चुनावों के लिए हाथ मिलाया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला, बसपा उत्तर भारत प्रभारी डा. मेघराज एवं प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारतीय ने यहां आयोजित पत्रकार सम्मेलन में समझौते की घोषणा की। फिलहाल समझौते की घोषणा की गई है लेकिन कौन दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, यह बाद में दोनों दलों के नेता बैठक करके तय करेंगे।
अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद इनेलो बसपा की बैसाखी के सहारे लोकसभा चुनाव में उतरने जा रही है। अभय चौटाला ने इस गठबंधन को तीसरे मोर्चे की नई शुरुआत बताया। उन्होंने कहा इस गठबंधन का अर्थ है कि अब किसान, दलित, पिछड़े और कमेरे वर्ग मिलकर नई पहचान बनायेंगे। गठबंधन के ऐलान के साथ ही उन्होंने 'हरियाणा की बनायेंगे नई पहचान-अब समय बदलाव का' नारा दिया।
बसपा का इनेलो से दूसरी बार गठबंधन हुआ है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा में इनेलो व बसपा के बीच गठबंधन की बात कोई नई नहीं है। दोनों दलों के बीच 1998 में भी गठबंधन हुआ था और तब इनेलो-बसपा के बीच क्रमश: 6-4 लोकसभा सीटों पर समझौता हुआ था, यानि छह सीटों पर इनेलो व चार सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनेलो ने छह में से चार सीटें जीतीं थी, जबकि बसपा को चार में से सिर्फ एक सीट पर ही विजय हासिल हुई थी। इनेलो व बीजेपी में गठबंधन होने पर 1999 में इनेलो ने बीएसपी से किनारा कर लिया था।


जब भाजपा का उपवास..., उपहास सा लगने लगा


अधिकतर पदाधिकारी रहे दूर, आए वो कुछ देर में चलते बने, कुछ पहुंचे मात्र औपचारिकता निभाने


हिसार। कांग्रेस पर संसद न चलने देने का आरोप लगाते हुए देशभर में भाजपा के आह्वान पर किये गए उपवास का भाजपाइयों ने ही मजाक बना डाला। उपवास कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे वहीं अधिकतर नेता मौके
पर आकर औपचारिकता निभाकर जाते रहे। यही नहीं, जिले में विभिन्न विभागों, बोर्डों व निगमों के सात चेयरमैनों में से केवल एक चेयरमैन ही उपवास में नजर आए वहीं अन्य बड़े नेता भी कन्नी काटते नजर आए।
भाजपा के राष्ट्रीय आह्वान पर उपवास कार्यक्रम रखा गया था। हिसार में अग्रसेन चौक के उसी पार्क को भाजपा ने उपवास स्थल चुना, जिसमें कांग्रेसियों ने उपवास किया था। भाजपाइयों का उपवास कार्यक्रम भी कांग्रेसियों से कम नहीं रहा। जिस तरह कांग्रेसियों का उपवास कार्यक्रम मजाक बनकर रह गया वहीं भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। भाजपा के अधिकतर पदाधिकारी ही इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, एक प्रदेशस्तरीय नेता लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उक्त नेता के बारे में प्रसिद्ध है कि वह हर कार्यक्रम में देरी से पहुंचकर केवल बैठने के लिए सीट हथियाने के प्रयास में रहता है। बताया जाता है कि उक्त नेताजी को उपवास कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं थी और उन्हें अपने मीडिया प्रभारी के माध्यम से उपवास कार्यक्रम की जानकारी मिली थी। हुआ यूं कि उक्त नेताजी के मीडिया प्रभारी किसी तरह पत्रकारों को मिल गये और जब पत्रकारों ने उससे पूछा की नेताजी उपवास में हैं क्या, तो मीडिया प्रभारी का कहना था कि किस बात का उपवास, आज पार्टी का कोई कार्यक्रम है क्या? इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से पूरी जानकारी लेकर अपने आका को फोन किया और उपवास कार्यक्रम में जाने की सलाह दी, जिस पर उक्त नेताजी लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी हाजिरी लगवाई। 
पार्टी के इस उपवास कार्यक्रम से कुछेक को छोड़कर अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे। पार्टी आए दिन नई नियुक्तियों की घोषणा करती है लेकिन नई नियुक्तियों वाले तो दूर, पुराने पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी पार्टी जुटा नहीं पाई और हालत यह हो गई कि निर्धारित पार्क भरना तो दूर, चौथाई हिस्से में बैठकर सत्तारूढ़ भाजपाइयों को कांग्रेस पर हमले करने पड़े।


कुर्सी के लिए खुले आम रिश्वत


देश: बीते वर्ष में जनता देश में फैले भ्रष्टाचार को ख़त्म करने व् विदेशों में जमा हमारा अरबों-खरबों रुपया वापिस लाने के लिए लड़ती रही. जन लोकपाल बिल के लिए तरसती रही. लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला. भला मिलता भी कैसे. क्योंकि जिस देश में कुर्सी के लिए ही रिश्वत चलती हो वहां भला जनता की कौन सुनेगा. भारत के नेताओं को तो बस कुर्सी चाहिए फिर चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े, कुछ ही कहना पड़े. बात चल रही थी कुर्सी के लिए रिश्वत की. तो जैसा की सभी जानते है की आगामी महीनों में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है. इसके लिए सभी राजनीतिक दल कमर कस चुके है.
कोई वादों की झड़ी लगा रहा है तो कोई सब्जबाग दिखा कर जनता का वोट हथियाना चाहता है. जिनको इतने भर से भी जीत की उम्मीद नहीं है वो तो जनता को खुलेआम रिश्वत देने तक पर उतर आया है. रिश्वत भी थोड़ी बहुत नहीं अपितु पूरे एक लैपटाप की. अब देखो न उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह ने जीतने के पश्चात जनता को फ्री में लैपटाप देने का वादा किया है तो पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर बादल ने भी जीत की ख़ुशी में जनता को फ्री लैपटाप देने की हामी भर दी है. ऐसे में गुफ्तगू होना लाजमी था की अब तो कुर्सी के लिए भी खुलेआम रिश्वत चलने लगी है.


रणनीति में भविष्य या भविष्य की रणनीति


हर वर्ष की भांति साल 2011 भी गुजर गया. जिस तरह हम सभी ने इस वर्ष के आने की ख़ुशी मनाई थी उसी तरह इसके जाने की भी उतनी ही ख़ुशी मनाई. मेरे ऐसा कहने के कारण बहुत से रहे लेकिन मुख्य कारण रहा की पूरा वर्ष जहाँ एक के बाद एक भ्रष्टाचार की परते खुलती रही वहीँ पूरा साल हमने भ्रष्टाचार से लड़ने में गुजार दिया. इतना जरुर है की 2011 में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जनता एक मत होकर सड़को पर अवश्य उतरी. इसी कारण रहा की कभी हमने बाबा रामदेव के काले धन को वापसी लाने की आवाज को बुलंद किया तो कभी स्वामी अग्निवेश की भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम में हम शामिल हुए. जबकि लोकपाल बिल के समर्थन में समाजसेवी अन्ना हजारे के अनशन को देश के राजनीतिज्ञ और जनता अभी तक भूले नहीं है.
देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करने व् लोकपाल बिल को लागू करवाने के लिए कुछ जाने-माने लोगों ने एक रणनीति के तहत काम किया. यह इस रणनीति का ही कमाल ही था की जनता को अपना भविष्य उज्जवल दिखाई देने लगा. फिर भले ही वो अनशन का मौका हो या फिर कैंडल मार्च या हो बाजार बंद का आयोजन. लोकपाल बिल के समर्थन में पूरे देश ने अपनी आहुति डाली. एक बारगी तो आम जनता ने भ्रष्टाचार विरोधी मुहीम की रणनीति से भविष्य के सपने संजोने आरम्भ कर दिए थे. ऐसा लगने लगा था की या तो अब देश में भ्रष्टाचार कुछ ही दिनों का महमान है या फिर यह भ्रष्ट सरकारे. हर एक आयोजन से जहाँ सरकार की खूब किरकिरी हुई वहीँ राजनीति में भी उहापोह की स्थिति बनी रही.
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला आरम्भ हुआ तो राजनीति और भ्रष्टाचार के गढ़े मुर्दे भी उखड़ने लगे. कभी बाबा रामदेव पर राजनीतिक प्रहार हुए तो कभी अरविन्द केजरीवाल व् किरण बेदी पर सरकारी खजाने को नुक्सान पहुँचाने के आरोप. कभी प्रशांत भूषण पर हमला तो कभी अनशन को लेकर हंगामा हुआ. राजनीतिक दल बाहर तो एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे लेकिन भ्रष्टाचार व् लोकपाल बिल पर संसद में सभी भाई-बहन की तरह बैठे दिखाई दिए. हर किसी ने भ्रष्टाचार के विरोध में हर एक मुहीम की काट की जुगत बैठानी आरम्भ कर दी थी. इसी का नतीजा था की भ्रष्टाचार व् लोकपाल बिल पर काम कम और बात ज्यादा होने लगी. रणनीति एक मुद्दा बन गई और लोग इस से उबने लगे.
चुनावों के दौरान कांग्रेस की खिलाफत करने की रणनीति हो या मुंबई में अनशन. जनता अन्ना हजारे से किनारा करने लगी. संसद की कार्यवाही के दौरान जनता समझने लगी थी की जिस रणनीति में वो अपना भविष्य संजो रही है वो कामयाब होने वाली नहीं है. नेता चाहते ही नहीं की उनके ऊपर कोई लोकपाल व् कानून बने. जब करना ही इन नेताओं को है तो समय खराब करने से क्या फायेदा. ऐसा नहीं है की जनता चाहती नहीं की देश में लोकपाल बिल आये लेकिन वो आज एक बार फिर टीम अन्ना की ओर एक आशा भरी नजरों से देखने लगी है. भले ही संसद के इस सत्र में लोकपाल बिल पास ना हुआ हो लेकिन मजबूत लोकपाल बिल लाने के लिए आज जरुरत है तो भविष्य की रणनीति बनाने की.


मुंह चिढाता परिवारवाद


आज राजनीति में बने रहने के लिए सबसे ज्यादा जरुरत पड़ती है तो मुद्दों की. अगर आज किसी पार्टी व् नेता के पास मुद्दा नहीं है तो समझो राजनीति ख़त्म. लेकिन लगता है की आज देश के किसी भी राजनितिक दल व् नेता के पास जनहित के लिए तो दूर जनता को बताने व् समझाने के लिए कुछ बचा ही नहीं है. यही कारण है की कहीं ना कहीं जाकर जनसभाओ, चुनावी दौरों व् पत्रकारवार्ताओं में बिजली और पानी ही एक ऐसा मुद्दा बचा है जिस पर नेता खुल कर भाषण दे सकते है. इसके अतिरिक्त अगर जनता को आज कोई मुद्दा लुभा रहा है तो वो है भ्रष्टाचार. भले ही जनता राजनीति व् नेताओ को रात-दिन कोसती हो लेकिन भ्रष्टाचार का मुद्दा आते ही उसको वहीँ नेता अच्छा लगता है जो भ्रष्टाचार पर लम्बा-चौड़ा भाषण दे रहा है.
इतने से भी अगर नेताओ का पेट नहीं भरता और उसको लगता है की अन्य राजनितिक दल व् नेता पर कटाक्ष करना अभी बाकी है तो मुद्दा बचता है परिवारवाद का. ऐसे में वह यह बात भूल जाता है की उसकी पार्टी में या स्वयं उसने राजनीति में भले ही परिवारवाद को कितना ही बढ़ावा दिया हो उसका कोई जिक्र नहीं लेकिन दूसरों ने क्या किया इसका कोरा चिठठा खोलने से आज कोई भी नेता एक- दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहता. मजेदार बात तो यह है की आज हर राजनीतिक दल में परिवारवाद है और हर नेता इसको बढ़ावा देने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. फिर भले ही वह गांधी परिवार हो या हरियाणा की राजनीति के सरताज तीनो लाल परिवार. जबकि आज प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा भी इससे अछूते नहीं है.
जबकि देश के अन्य प्रदेशों की बात की जाए तो ऐसे नामों की एक लम्बी फेहरिस्त है जिन्होंने राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने में अपना भरपूर सहयोग दिया है. फिर भले ही वो मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता या राजनेता ही क्यों ना हो. इसके पीछे सबके अपने-अपने तर्क भी हो सकते है. कोई कहेगा की बेटा बाप की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा है तो कोई कहेगा की जनता की भावना के अनुरूप किसी नेता के पुत्र-पुत्री व् पत्नी को चुनाव की टिकट दी गई है. जबकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की राजनीतिक दल किसी नेता की मृत्युपरांत उसके परिवार के किसी जन को चुनावी मैदान में उतर कर जनता के वोट पाना चाहता है. बावजूद इसके आज राजनीति में बढ़ता परिवारवाद नेताओं का मुंह चिढ़ा रहा है.
अब आदमपुर व् रतिया विधानसभा उपचुनाव को ही देख लो. दोनों ही चुनाव में परिवारवाद इस कदर हावी है की किसी भी नेता से कुछ बोलते नहीं बन रहा है. हिसार के सांसद व् पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मृत्युपरांत रिक्त हुई हिसार लोकसभा सिट के उपचुनाव में आदमपुर से उनके विधायक पुत्र कुलदीप बिश्नोई हिसार से सांसद बन गए. चलो वो तो राजनीति में पुराने है लेकिन ऐसे में आदमपुर उपचुनाव में जहाँ उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई को पहली बार चुनावी मैदान में उतरा गया है वहीँ रतिया से इनलो विधायक के मरणोपरांत उनकी पत्नी इनलो की टिकट पर चुनावी समर में है. जबकि कांग्रेस भी आदमपुर से इनलो की टिकट पर चुनाव लड़ चुके कांग्रेसी विधायक संपत सिंह के पुत्र को टिकट देना चाहती थी.
अगर देश की बात की जाएँ तो ऐसा कोई विरला ही राजनीतिक दल मिलेगा जिसने परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया हो. कश्मीर से कन्याकुमारी व् महाराष्ट्र से आसाम तक प्रत्येक मुख्यमंत्री परिवारवाद को बढाने का गुनहगार है. ऐसे में मुद्दों की तलाश में रहने वाले राजनीतिक दल व् नेताओं को परिवादवाद पर भाषण देना भारतीय राजनीति में मुंह चिढाने के सामान लगता है.


सब कुछ चुनावी-चुनावी


सभी जानते हैं कि मेरे देश की राजनीति सुबहान अल्ला है। आम कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष राजनेता तक राजनीति में इस कदर डूब गया है कि उसे देश दुनिया से कोई सरोकार नहीं है। अब अगर बात चुनाव की, की जाए तो नेता तो नेता आमआदमी भी चुनावी रंग में रंगा नजर आता है। यही कारण है कि आजकल चहुंओर चुनावी माहौल सा नजर आ रहा है। जिसके चलते हर आम-खास की जुबान चुनावी गुफ्तगु कर रही है तो नेताओं के क्रियाकलाप भी चुनावी-चुनावी से नजर आ रहे हैं। जनता की सोच आज चुनाव तक सिमित लग रही है तो नेताओं के भाषणों में भी चुनावी रस टपक रहा है।
बात देश के पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की हो या आदमपुर व रतिया विधानसभा उपचुनाव की। सभी चुनावों ने देश के माहौल को चुनावी सा कर दिया है. वहीँ हरियाणा के आदमपुर व् रतिया के दोनों उपचुनावों में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला व भविष्य में मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए कुलदीप बिश्रोई एवं कैप्टन अभिमन्यु चुनाव जीतने हेतू रावण के जमाने के प्रसिद्ध फार्मूले साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल करने से गूरेज नहीं कर रहे हैं। कहने का भाव सिर्फ इतना सा है की जनता से लेकर नेता तक सब चुनावी हो गए है.
इस गुफ्तगू को उस समय और हवा मिली जब उत्तर प्रदेश  के विकास का दावा करने वाली मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तरप्रदेश के ही चार टुकड़े करने का मन बना लिया। परिणामस्वरूप एक प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेज दिया गया। ऐसा ही कुछ हाल केन्द्र सरकार का भी है। केन्द्र भी इन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा हुआ है। यह शायद चुनावी असर ही है की क्रुड (कच्चा तेल) की कीमत्तें दिन-प्रतिदिन बढऩे के बावजूद केन्द्र ने या तो बीते लोकसभा चुनाव में जीत पाने के लिए तेल की कीमतों में कटौती की थी या फिर अब एक बार पुन: तेल के दामों में कटौती की है।
माना जा रहा है कि हिसार लोकसभा उपचुनाव में मात खाने के बाद केन्द्र ने पाँचों राज्यों सहित आदमपुर व रतिया उपचुनाव पर कब्जा जमाने के उद्देश्य से यह कटौती की है। बीते दिनों राज्यस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हैलीकॉप्टर की हिसार के सीमावर्ती गांव में आपात लैंडिंग के दौरान गरीब के घर चाय पीकर हजार रूपए का नोट देना चुनावी सा नजर आया. प्रदेश में बिजली को लेकर जहाँ हाहाकार मचा हुआ है वहीँ हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का हालिया ब्यान कि जनवरी से प्रदेश की जनता को नियमित बिजली मिलेगी भी यह दर्शाता है कि आज सबकुछ चुनावी-चुनावी सा हो गया है।
जहां उत्तरप्रदेश के हालात पर देश के युवराज राहुल गांधी को शर्म आना उनकी राजनीतिक मंसा को दर्शाता है वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा  भी किसी चुनावी फार्मूले से कम नहीं है।


खुलती गठबंधन की गाँठ


आज जनता हैरान है, परेशान है. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा की राजनीति में आखिर हो क्या रहा है. बस हम सब यह देखने पर मजबूर है की सत्ता के भूखे ये नेता आखिर किस हद तक गिर कर आज किसी भी दल से गठबंधन तो करते है, लेकिन चंद ही दिनों में उस गठबंधन की गाँठ खुलती नजर आती है. इतने से भी पेट नहीं भरता तो गठबंधन के समय जनता के वोट हथियाने के उद्देश्य से कभी दल मिलने तो कभी दिल मिलने की बात करने वाले दोनों ही दलों के नेता एक-दूसरे को कोसते नजर आते है. आज देश हो या देश का कोई भी प्रदेश नेताओं की इस राजनीति से कोई भी अछूता नहीं है. सत्ता के नशे में मदमस्त गठबंधन के समय किसी नेता का उद्देश्य यह नहीं होता की जनता को सुशासन दिया जाये.
जबकि शादी जैसे पवित्र बंधन से एक रीत चली गठजोड़. शादी के दौरान जब लड़का-लड़की के फेरे शुरू होते है तो पंडित सात जन्मों तक यह बंधन ऐसे ही बना रहे इसके लिए गठजोड़ करते है. भारतीय संस्कृति के अनुसार यह गठजोड़ होनी-अनहोनी की सभी सीमाओं को लांघ कर उम्र भर चलता है. लेकिन भारतीय राजनीति ने आज इस गठजोड़ के मायने ही बदल कर रख दिए है. दो दिल और दो जिस्म को एक जान में बाँधने का काम करने वाले इस बंधन को राजनीति ने नाम दिया गठबंधन का. लेकिन आज यह गठबंधन होते बाद में है और टूट पहले जाते है. कुर्सी की चाह में दो दलों के ना दिल मिलते है और ना ही विचार. बावजूद इसके राजनीतिक दल और उसके नेता गठबंधन करते है तो सिर्फ स्वार्थ के लिए.
देश-प्रदेश में हुए गठबंधन को लेकर होने वाली गुफ्तगू का जिक्र छोड़ अगर सिर्फ हाल ही में हुए हिसार लोकसभा उपचुनाव व् आदमपुर तथा रतिया विधानसभा उपचुनाव की बात ही की जाए तो यह स्पष्ट होता है की गठजोड़ और गठबंधन में बहुत फर्क है. जहाँ बहुजन सन्देश पार्टी (कांशीराम) की अध्यक्षा कांता अलहड़िया जो बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में इनलो के साथ एक मंच पर दिखाई दी. वहीँ उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे को लेकर अपनी आवाज बुलंद की. शायद यह सत्ता का नशा ही था की मात्र कुछ ही दिनों में गठबंधन में दरार पड़ती नजर आई. कांता अलहड़िया जहाँ स्वयं इन उपचुनावों में आदमपुर से चुनाव मैदान में है वहीँ कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे है.
ज्ञात रहे की इससे पूर्व भी देश-प्रदेश में बहुत से गठबंधन बने व् टूटे लेकिन गठजोड़ की भूमिका आज तक बहुत ही कम गठबंधन निभा पाए है. केंद्र की सता पर काबिज होने के लिए विभिन्न दलों का कांग्रेस के साथ मिलना आज उन्ही दलों को भारी पड़ रहा है. कारण वहीँ की दल तो अवश्य मिले लेकिन दिल नहीं मिले. महंगाई के विरोध में कभी करूणानिधि का नाराज होना तो कभी ममता बेनर्जी का आँखे तरेरना गठबंधन की गाँठ पर समय-समय पर सवाल खड़े करता है. टूटते गठबन्धनों का हरियाणा में भी एक लम्बा इतिहास रहा है. हविपा-भाजपा, इनलो-बसपा, हजकां-बसपा व् इनलो-भाजपा जैसे गठबन्धनों को लेकर समय-समय पर लम्बे-चौड़े दावे किये गए. लेकिन कभी सत्ता नहीं मिलना तो कभी ज्यादा सत्ता सुख मिलने के कारण इन गठबंधनों की गाँठ खुलती नजर आई.


खुश तो बहुत हुए होगे आप



भारत निर्वाचन आयोग ने आदमपुर और रतिया विधानसभा उपचुनाव में रोड रोलर चुनाव चिन्ह को हटाने का फैसला लिया है. यह वही रोड रोलर है जिसने बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में जिस तरीके से हजकां-भाजपा प्रत्याशी कुलदीप बिश्नोई के ट्रैक्टर को कुचला उससे शायद वो कभी उभर नहीं पायेंगे. इसी रोड रोलर के बेकाबू होने से ही ना सिर्फ कुलदीप बिश्नोई की जीत का अंतर नाम मात्र रह गया बल्कि यह रोलर अगर कुछ कदम और चल गया होता तो कुलदीप बिश्नोई की हार निश्चित ही थी. यह रोड रोलर इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला को जीत तो नहीं दिलवा सका लेकिन जीत का अंतर मात्र 6335 करने में अवश्य कामयाब रहा, जो मुख्य विपक्षी उम्मीदवारों के लिए सुखद अनुभूति थी. यहीं कारण था की जीत के पश्चात कुलदीप की होली मनी तो भाजपा की दिवाली. लेकिन इतना अवश्य है की चुनाव परिणाम आने के अंत तक सभी की साँसे थमी हुई थी. चुनाव आयोग का यह फैसला आने से कुलदीप बिश्नोई खुश तो जरुर हुए होंगे.
कितने से जीत - कितने से हार 
हिसार लोकसभा उपचुनाव को हुए एक माह होने को आया, चुनाव परिणाम भी आ चूका है. सभी को पता है की इस उपचुनाव में हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई ने इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला को हराया. लेकिन आज भी बहुत से लोगों और नेताओं के लिए यह एक पहेली ही बनी हुई है की आखिर कुलदीप बिश्नोई ने कितने मतों से जीत दर्ज की. भले ही चुनाव आयोग के आकडों के हिसाब से कुलदीप बिश्नोई 6335 वोट से जीत कर ही लोकसभा में पहुंचे है. लेकिन इनलो कुलदीप बिश्नोई की इस जीत को मात्र बता कर शायद अपने दिल का दर्द छुपाने की कोशिश कर रही है.
सभी जानते है की इस चुनाव में अगर रोड रोलर चुनाव चिन्ह नहीं होता तो परस्थितियाँ आज कुछ और ही होती. इसके साथ साथ चार कुलदीप नामक प्रत्याशियों ने भी क्रमशः 2353, 2712, 1659 व् 2053 वोट लेकर 8777 वोटों से कुलदीप बिश्नोई की जीत का अंतर कम करने में आग में घी का काम किया है. जबकि निर्दलीय प्रत्याशी ओमप्रकाश कल्याण जिनका चुनाव चिन्ह रोड रोलर था ने इस चुनाव में 27802 प्राप्त किये. इनलो - कांग्रेस को यह मानना पड़ेगा की भले ही कुलदीप बिश्नोई की जीत 6335 मतों से हुई हो लेकिन इनलो उम्मीदवार अजय चौटाला की हार अवश्य ही 42914 वोटों से हुई है. इसलिए यह गुफ्तगू गलत नहीं है की रोड रोलर द्वारा प्राप्त किये गए वोटों से अजय चौटाला खुश तो बहुत हुए होगे.


चिठ्ठी पर चिठ्ठी-चिठ्ठी पर चिठ्ठी



शायद यह कांग्रेस के लिए विडम्बना ही है की जब से केंद्र में मनमोहन सिंह और हरियाणा में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने अपनी दूसरी पारी शुरू की है तब से चिठ्ठी-पत्री की अनोखी परम्परा शुरू हो गई है. कभी कोई समाजसेवी मनमोहन सिंह को कांग्रेस में सुधार के लिए चिठ्ठी लिखता है तो कभी कोई कांग्रेसी नेता हाईकमान को कांग्रेसियों की शिकायत के लिए पत्र लिखता है. एक के बाद एक पत्र जाते है लेकिन कार्यवाही जहाँ शून्य मात्र है वहीँ कांग्रेस और कांग्रेसियों की हरकतें दिन-प्रतिदिन बिगडती ही जा रही है. चिठ्ठी के जवाब में जहाँ प्रधानमंत्री ना महंगाई रोक पा रहे है वहीँ अभी तक जन लोकपाल बिल पारित करवाने के प्रति भी उनका रवैया नकारात्मक ही रहा है.
अगर प्रदेश की बात करें तो कांग्रेस हिसार में एक के बाद एक चुनाव हार रही है और हारे हुए कांग्रेसी उम्मीदवारों द्वारा बार-बार पत्र लिखने के बाद भी हाईकमान चुनावों के दौरान कांग्रेस की मुखालफत करने वाले अपने छोटे-बड़े व् वरिष्ठ नेताओं पर नकेल नहीं कस पा रही है. शायद यहीं कारण है की प्रदेश में मैं भी कांग्रेसी-मैं भी कांग्रेसी की कवायद बढ़ रही है. बीते हिसार लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश की जमानत जब्त होना इसी की परिणिति है. अगर यहीं हाल रहा तो इसी माह होने वाले आदमपुर और रतिया विधानसभा उपचुनाव में साख खोती कांग्रेस व् कांग्रेस को हराती कांग्रेस के लिए अपना वर्चस्व बचाना भी मुश्किल हो जायेगा. 
अभी कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश की हार की स्याही सूखी भी नहीं है की यह दोनों उपचुनाव कांग्रेस के लिए सिर दर्द पैदा कर सकते है. लेकिन इतना जरुर है की कोई वरिष्ठ नेता या फिर कोई हारा हुआ प्रत्याशी कांग्रेस हाईकमान को पत्र लिख कर अपना दुखड़ा रोये कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ता. पड़े भी क्यों, क्योंकि एक की सुनी नहीं तो कई नाराज. अगर कांग्रेस को फर्क पड़ना होता या फिर उसको कार्यवाही ही करनी होती तो उस समय ही कोई ठोस कदम उठा लिए जाते जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता रंजीत सिंह ने आदमपुर विधानसभा उपचुनाव में शिकस्त खाई थी. उन्होंने भी उस समय हाईकमान को एक चिठ्ठी लिख उन सभी नेताओं के नाम दिए थे जिन्होंने उनकी मुखालफत की थी. 
अब गुफ्तगू इस बात को लेकर हो रही है की आखिर ऐसी कौन सी वजह है की कांग्रेस अपने ही प्रत्याशियों की हार और उनके साथ हुए भीतरघात के पश्चात भी चुप बैठी है. कांग्रेसियों की मुश्किल यह है की बार-बार नेताओं द्वारा विभिन्न चुनावों के पश्चात हाईकमान को शिकायत देने के वर्षो बाद भी आज तक किसी पर कोई कार्यवाही नहीं की गई. मजेदार बात तो यह है की खुलम-खुल्ला भीतरघात करने वाले नेताओं के खिलाफ अपनी आवाज मुखर करने वाले सभी कांग्रेसी नेता व् प्रत्याशी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के करीबी है और मुख्यमंत्री के कहने के बाद ही उनको टिकट दी गई थी. ऐसे में कोई कार्यवाही नहीं किये जाने पर बड़ा परिवार और अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाली कांग्रेस आज चिठियों के फेर में जरुर उलझी नजर आ रही है.


हमने मनाई राजनीतिक दीवाली


गुफ्तगू की ओर से सभी पाठकों, नियमित पाठकों, समर्थकों व् मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं. 


भले ही हिसार उपचुनाव संपन्न हो चुका हो. चुनाव परिणाम भी आ चुका है. मुद्दा यह नहीं की इस चुनाव में कौन जीता कौन हारा. लेकिन इतना जरुर है की सब कुछ होने के पश्चात भी जनता है की हिसार उपचुनाव को भुला नहीं पा रही है. शायद यही कारण रहा की चुनाव के पश्चात वोटों की गिनती और उसके बाद दिवाली के कारण आज बहुत दिनों बाद आपसे गुफ्तगू कर रहा हूँ. क्या करूँ मैं भी आपकी ही तरह दीपों का पर्व दिवाली मनाने में व्यस्त था, तो साथ ही साथ इस बात पर भी मेरा विशेष ध्यान था की अभी कुछ दिनों पहले तक उपचुनाव को लेकर नेताओं द्वारा जो वादे जनता से किये जा रहे थे वो आज कहा काफूर हो गए. 
अब देखो ना आप ख़ुशी-ख़ुशी दीवाली मना रहे थे और मैं और मेरे शहर की जनता राजनीतिक दिवाली मनाने पर मजबूर थे. हमारा राजनीतिक दीवाली मनाने का मुख्य कारण था हिसार लोकसभा उपचुनाव के पश्चात हिसार में एकाएक हुई अपराधिक वारदाते. दिवाली के अवसर पर भी रह-रह कर वो हसीन पल याद आ रहे थे जो हमने चुनाव के दिनों में बिताये थे. चुनाव के दिनों में ना सिर्फ जनता को पूरा दिन बिजली मिली वहीँ कोई अपराधिक घटना होना तो दूर की बात है अपराधी भी ढूंढे से भी नहीं मिल रहे थे. मानो उन्हें या तो कोई काम मिल गया है या फिर जनता के वोट हथियाने की खातिर कोई और काम दे दिया गया है.
एक दिन वो थे जब हिसार के लिए ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब अपराधी कोई भी दिन ऐसा छोड़ते हो जिस दिन वो अपने मंसूबो को अंजाम नहीं देते हो. महिलाओं के लिए चैन स्नेचिंग जहाँ सिरदर्द बनी हुई थी वहीँ व्यापारियों के लिए आये दिन प्रतिष्ठानों के ताले टूटना जी का जंजाल बना हुआ था. हत्या, हत्या प्रयास, चोरी व् धमकी जहाँ आम बात हो गई थी वहीँ बिजली की आँख मिचौली से जनता परेशान थी. नेताओं द्वारा चुनाव के दिनों में दिखाए गए हसीन सपने लिए जैसे ही जनता दिवाली की खुमारी में अभी खोई ही थी की अपराधियों ने हिसार को फिर से अपने आगोश में ले लिया. 
चैन स्नेचिंग का मामला प्रकाश में आया तो एक युवक की हत्या कर दी गई. पुलिस अभी इस मामले को सुलझा पाती की दीवाली से एक दिन पूर्व एक जूते के शोरुम पर गोली चला बदमाश फिरौती की मांग कर गए. अभी दिवाली गई ही थी की शनिवार को आदमपुर के समीप एक युवक का पहले गला रेता फिर उस पर गोलियां दाग कर हत्या कर दी गई. चुनाव के दिनों में हर चौराहे पर दिखने वाली पुलिस भी अपराधियों का कोई सुराग नहीं लगा पा रही है. हद तो उस समय हो गई जब इतना सब कुछ होने के पश्चात भी चुनाव के दिनों में गली-गली दिखने वाला कोई नेता जनता के बीच नजर नहीं आया. कहीं-कहीं नजर आये तो सिर्फ उनके प्रतिनिधि.


महिलायें गायब


- हिसार लोकसभा उपचुनाव के चुनावी मुद्दों में से -
रैली- 1 
राजनीतिक दल- भाजपा
महिला नेत्री- विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज
केंद्र की कांग्रेस सरकार महंगाई व् भ्रषाचार के कारण अलोकप्रिय व् बदनाम हो चुकी है. हजकां-भाजपा गठबंधन एक + एक नहीं अपितु एक और एक ग्यारह बन कर भारत की राजनीति में बदलाव की आहट करेगा. 
रैली- 2 
राजनीतिक दल- कांग्रेस
महिला नेत्री- दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित
भ्रष्टाचार को रोकने में अगर किसी पार्टी ने जरुरी कदम उठायें है तो वो सिर्फ कांग्रेस ने उठायें है. भाजपा के पास ना नेता है ना नीति है और ना ही कोई नियत. देश का विकास सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है. 
रैली- 3 
राजनीतिक दल- इनलो
महिला नेत्री- कांता अलहड़िया 
हजकां-भाजपा व् कांग्रेस ने कभी भी बाल्मीकि समुदाय को याद नहीं किया वहीँ प्रदेश के मुख्यमंत्री, उनके पुत्र और पूरा सरकारी अमला एक-एक वोट के लिए जिले में डेरा डाल कर लोगो से भीख मांग रहे है. 
लोगों को विकास करने व् भ्रष्टाचार मिटाने के सब्जबाग दिखाने के पश्चात आखिरकार वह दिन भी नजदीक आ ही गए जब सभी राजनीतिक दलों ने अपना दमखम लगाने के बाद विशाल रैली कर अपनी ताकत दिखाने का प्रयास किया. तीन दिन तक लगातार हुई इन रैलियों में जहाँ नेताओं ने  आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ वोट हथियाने के लिए किसी ने कोई दिग्गज नेता बुलाया तो किसी ने अभिनेता. सभी रैलियों में उच्च स्तर की महिला नेत्री भी उपस्थित रही. सिर्फ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.
ज्ञात रहे की हिसार लोकसभा के कुल मतदाताओं में 45 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है. बावजूद इसके प्रदेश में महिलाओं के प्रति असुरक्षित वातावरण व् आनर किलिंग के मुद्दे पर ना विपक्ष कुछ बोला और ना पक्ष से कुछ बोला गया. जबकि 33 प्रतशत आरक्षण की बात करने वाले सभी राजनीतिक दलों के पास लोकसभा चुनाव लड़ने वाली एक महिला नेत्री तक नहीं है. अक्सर राजनीतिक पार्टियां संसद तथा विधानसभा के अन्दर व् बाहर महिलाओं की बातें तो करते है लेकिन पता नहीं क्यों हिसार के मंच पर किसी भी नेता को महिलाओं की याद तक नहीं आई.
किसी ने महंगाई का रोना रोया तो किसी ने भ्रष्टाचार का गीत गया. अन्ना हजारे व् उनकी मुहीम का जिक्र करना भी कोई नहीं भुला. मकसद सभी का एक ही था की किसी तरह जनता के वोट हासिल किये जाये. लेकिन क्या हिसार जिले में महिलाओं के वोट नहीं है या राजनीतिक पार्टियों व् नेताओं को महिलाओं से कोई सरोकार नहीं है.


जिंदगी के कुछ अच्छे पल


हिसार लोकसभा उपचुनाव की गहमागहमी हुए भले ही महीनों बीत गए हो लेकिन अब कहीं जाकर जनता को पता लगने लगा है की हां चुनाव आ गया है. सिर्फ इसलिए नहीं की मतदान की तिथि समीप आ गई है या चुनाव का शोर बढ़ गया है बल्कि इसलिए की चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जिसकी भरी गर्मी में बिजली नहीं होने से सांस फूली हुई थी. चोरी का आलम यह था की व्यापारियों को नहीं पता था की जो प्रतिष्ठान वो ठीक से बंद कर के जा रहा है वो सुबह स्वयं आकर खोलेगा या शटर के ताले चटके हुए मिलेंगे. बीते कुछ समय में नगर हुई हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ ने आम आदमी की नींद तक उचाट दी थी. पुलिस की हर कोशिश को नाकाम करते हुए चैन स्नेचर आये दिन महिलाओं की या तो चैन तोड़ कर रफूचक्कर हो जाते रहे है या फिर उनका पर्स उड़ा कर भाग जाते थे. 
मगर जनता आज खुश है. उन्हें अपने मताधिकार का प्रयोग करना है सिर्फ इसलिए नहीं, बल्कि उनकी ख़ुशी का मुख्य कारण है की आज शहर सहित जिले में जहाँ ना कोई अपराधिक वारदात हो रही है वहीँ महिलायें भी त्यौहार के दिनों में सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन कर पा रही है. लोगो में गुफ्तगू हो रही है की जिन अपराधियों ने जनता का जीना दूभर कर दिया था आखिर आज वो किसके कहने मात्र से अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे रहे. एकाएक कहाँ गए सभी अपराधी. क्या उनको चुनाव के दिनों में कुछ और काम दे दिया गया है. ऐसा भी हो सकता है की हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, हजकां प्रमुख कुलदीप बिश्नोई व् अनेक भाजपा नेता जो की पिछले दो सप्ताह से हिसार जिले में डेरा डाले हुए है उनके डर व् पुलिस की सक्रियता के चलते सभी अपराधी खामोश हो गए है. 
अभी कुछ दिनों पूर्व जब मई रात को अपनी गली में घुसा तो गली का नजारा कुछ बदला-बदला सा नजर आया. टाक-झांक करने पर पता लगा की जिस गली की स्ट्रीट लाईट कई साल से बंद पड़ी थी आज वो जगमगा रही थी. दीवाली का समय है शायद इसलिए नगर निगम द्वारा ठीक करवा दी गई होगी यह सोच मैं घर के अन्दर चला गया. सुबह जैसे ही गली से गुजर रहा था तो गली की सड़क का वह हिस्सा मुझे खुदा हुआ मिला जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी की यह जल्दी से बनवा दिया जायेगा. आस-पड़ोस वालों ने खुश होते हुए बताया की रात को जेसीबी मशीन से इसको खोदा गया है और यहाँ सीमेंट की सड़क बनवाई जाएगी. अभी कुछ आगे ही चला था की ऐसा ही एक और नजारा देख मैं हतप्रद था. मुख्य सड़क पर आया तो कहीं रंग पुताई का कार्य चल रहा था तो कहीं-कहीं मरम्मत का काम जोर-शोर से जारी था. 
इसका जिक्र मैंने अपने कुछ साथियों से किया. उन्होंने कहाँ की तुम पत्रकारों की यहीं कमी है. कोई काम हो रहा है तो होने दो, क्यों बात को बढाते हो. अब कहीं जाकर तो कुछ विकास के काम हो रहे है उसको भी क्या बंद करवा दोगे. जो मैं सोच रहा था उसने स्पष्ट कह दिया की जो काम बहुत पहले होने चाहिए थे वो आज चुनाव के दिनों में हो रहे है. इसका अर्थ यह हुआ की ऐसा नहीं है की शासन-प्रशासन को पता नहीं होता की कहा क्या कमी है, बस कमी है तो काम को अंजाम तक पहुंचाने की. जो काम आज हो रहे है अगर वो समय पर हो जाये तो सत्ता में रहते हुए ना मुख्यमंत्री को जिले में डेरा डालना पड़े और ना ही पूर्व मुख्यमंत्री को विकास की याद दिलानी पड़े. कुछ भी हो जनता खुश है और चाह रही है चुनाव पांच वर्ष में नहीं अपितु वर्ष में एक बार होने चाहिए, जिससे चुनाव की आड़ में वो जिंदगी के कुछ अच्छे पल गुजार सके.


आखिर कौन लेगा खबर लेने वालों की खबर


इस वक्त देश में भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे हावी है। केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बुरी तरह से घिरी हुई है। चारों तरफ भ्रष्टाचार की ही चर्चा हो रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद से भ्रष्टाचार को मिटाने की जोर-शोर से मांग उठ रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ इस आंदोलन को सबसे अधिक मीडिया का समर्थन मिला, मगर अब हिसार लोकसभा उपचुनाव में यही मीडिया खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। चुनाव के मद्देनजर कुछ मीडिया कंपनियों ने राजनीतिक विज्ञापन के रेट दो गुणा कर दिए हैं और जो नेता विज्ञापन नहीं देता, उसके समाचार प्रकाशित नहीं किये जाते हैं। अगर समाचार लगाये भी जाते हैं, तो महज खानापूर्ति की जाती है। कुछ मीडिया कंपनियों की तो दिल्ली व चंडीगढ़ से आई टीम ने हिसार में डेरा डाल दिया है। सिर्फ और सिर्फ चुनाव के मौके का फायदा उठाने के लिए। लोगों में गुफ्तगू हो रही है कि आजकल जनता को लूटने वाले नेताओं को मीडिया लूट रहा है।
सरकारी विभागों में रिश्वत लेने-देने के खेल के चलते पूरा देश भ्रष्टाचार में डूबा है। सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के पास जनता के काम करने की ताकत होती है और वह अपनी इसी ताकत का फायदा उठाते हुए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। नेता भी जनता की जरूरतों को पूरा करने के नाम पर भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। नेताओं और सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के पास रोजाना ऐसे मौके होते हैं, जिससे वह भ्रष्टाचार फैला सकें। ऐसे में चुनाव के दिनों में यह ताकत और मौका मीडिया के हाथ लग जाता है। चुनाव की घोषणा होते ही मीडिया कंपनियों की बांछें खिल जाती हैं। आ गया मौका कमाई करने का। हालांकि यह फायदा केवल बड़ी मीडिया कंपनियां ही उठाती हैं, क्योंकि उनके पास मीडिया की ताकत ज्यादा होती है। नेता भी बड़ी मीडिया कंपनियों के आगे नतमस्तक होते हैं।
जहां त्यौहारों के दिनों में समाचार पत्र और चैनल व्यवसायिक विज्ञापनों के लिए अपनी विज्ञापन दरों छूट देते हैं वहीं चुनाव के दिनों में विज्ञापन दरों को बढ़ा दिया जाता है। आखिर चुनाव रोजाना थोड़े ही होते हैं। अब ऐसी स्थिति में कोई कैसे देश से भ्रष्टाचार खत्म होने की बात कर सकता है। इस देश में मौका देखकर हर कोई फायदा उठाना चाहता है, चाहे वह गलत तरीके से ही क्यों नहीं हो। मीडिया भी इस बीमारी से अछूता नहीं है।
संयम जैन, स्वतंत्र पत्रकार


शायद जनता बेवकूफ है


कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश:- लोग कहते है की जयप्रकाश ग्रीन ब्रिगेड का बॉस रहा
है लेकिन सभी जानते है की इनलो के शासन काल में जितनी बदमाशी, डकैती, लूटपाट व् रुपया वसूली प्रदेश में हुई उतनी तो जनता ने कभी नहीं देखी-सुनी होगी. यही कारण रहा की इनलो के शासन में प्रदेश का सिस्टम ही खराब हो गया था. कुलदीप बिश्नोई कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार की बात करते है तो मैं सभी प्रत्याशियों को भ्रष्टाचार पर बहस की चुनौती देता हूँ. मेरा मानना है की चौटाला और भजनलाल परिवार ने सदैव ही झूठ की राजनीति की है. 
इनलो प्रत्याशी अजय चौटाला:- जब से देश और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार
आई है तब से विकास जनता का नहीं अपितु कांग्रेसी नेताओं के रिश्तेदारों का हुआ है. रही बात सुरक्षा व्यवस्था की तो आज प्रदेश में कोई भी सुरक्षित नहीं है जबकि आयें दिन चिकित्सक व् व्यापारियों पर हमले हो रहे है. उधर कुलदीप बिश्नोई भ्रष्टाचार की बात करते है लेकिन सभी जानते है की वो उस परिवार से है जो प्रदेश में भ्रष्टाचार का जनक रहा है. स्कूलों में छात्राएं यौन शोषण का शिकार हो रही है तो सरकारी विश्राम गृह कांग्रेसियों के ऐशगाह बने हुए है. 
हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप बिश्नोई:- कांग्रेस-इनलो को चुनाव के दिनों में
ही हिसार की याद आती है, सत्ता मिलने के बाद इनके नेता हिसार के लोगो के सुख-दुःख की खबर तक नहीं लेते. आज मुख्यमंत्री हुड्डा गाँव-गाँव जयप्रकाश के लिए यह कह कर वोट मांग रहे है की हिसार को नंबर वन बना दूंगा, तो पिछले सात साल से हुड्डा जी कहाँ सो रहे थे. अगर उन्होंने इतना ही विकास करवाया होता तो उन्हें गली-गली जाकर जयप्रकाश के लिए वोट मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती. जबकि इनलो का शासन जनता अभी तक भूली नहीं है.
समस्त भारतीय पार्टी उम्मीदवार:- महंगाई और भ्रष्टाचार के लिए केंद्र व् प्रदेश की
सरकारें दोषी है. सरकारी योजनायें समय पर लागू नहीं होती इसलिए जनता को उनका हक़ नहीं मिल पाता. आज कोई भी राजनीतिक दल और उनका नेता बेदाग़ नहीं है. सभी अपना उल्लू सीधा कर स्वार्थ की राजनीति कर रहे है. चुनाव जीतने के पश्चात समस्त भारतीय पार्टी सिर्फ जन लोकपाल बिल का समर्थन ही नहीं अपितु अन्ना के सपनो को साकार करने का काम भी करेगी.
जैसे-जैसे हिसार लोकसभा उपचुनाव का समय नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे प्रत्याशियों का एक-दूसरे के प्रति वाकयुद्ध तेज होता जा रहा है. कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार जा जनक. इतने तक भी किसी का पेट नहीं भरता तो वो व्यापारियों से फिरौतियां वसूलने वाले को कांग्रेस का संरक्षित बता रहा है तो कोई कह रहा है की चौटाला बंधुओ पर जो आय से अधिक संपत्ति का आरोप तय हुआ है वह संपत्ति जनता से अर्जित की गई है. कांग्रेसी उम्मीदवार अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो अजय चौटाला कांग्रेस शासन को कुशासन का दर्जा दे रहे है. उधर कांग्रेसी विधायक व् पूर्व विधानसभा अध्यक्ष रघुवीर सिंह कादियान ने तो यहाँ तक कह दिया है की पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल की मौत का कारण कुलदीप बिश्नोई है. जबकि हरियाणा में हो रही हत्याओं, बलात्कार, अपहरण, लूटपाट, फिरौती, आगजनी व् चोरी का सेहरा इनलो, कांग्रेस व् हरियाणा जनहित कांग्रेस एक-दूसरे के सिर धर रही है. 
क्या आपको लगता है की कोई भी राजनीतिक दल, उसका प्रत्याशी या नेता गलत बोल रहा है. शायद नहीं, सभी सही ही तो बोल रहे है. यह सभी वहीँ बोल रहे है जिन समस्याओं से हमको हर समय दो-चार होना पड़ता है या जो हमारे लिए अक्सर गुफ्तगू बनती है. मुद्दा यह नहीं की आज कांग्रेस की सरकार या कल इनलो की सरकार थी. मुद्दा यह है की आज जो आरोप यह नेता एक-दूसरे पर लगा रहे है उनमे से एक को भी किसी नेता व् सरकार ने प्रदेश से ख़त्म करने का काम किया हो. ये वहीँ बोल रहे है जिनका हम शिकार हो रहे है. ये लोग तो आज बोल कर कल चले जायेंगे और हम हाथ मलते रह जाते है. नेताओं की बयानबाजी सुन कर अब गुफ्तगू शुरू हो गई है की भले ही यह सब आरोप ही है लेकिन जब सभी सही बोल रहे है तो आखिर जनता क्या करें. किसको दें वोट और क्यों. कौन विधायक व् सांसद आज चुनने के लिए ठीक है जो जीतने के बाद आपकी गली-मौहल्ले में आया आपका दुःख-दर्द सुनने को. जबकि स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्री दावा करते है की एक सांसद और दे दो हिसार को नंबर एक बना दूंगा लेकिन हिसार का पुराना ओवरब्रिज को बंद हुए आज चार साल से अधिक हो गए वह तो बनवाया नहीं गया.


शराब पर भारी पानी


बहुत दिन हो गए. आपके बीच नहीं आ पाया. इसका मुझे मलाल भी है लेकिन ख़ुशी इस बात की है की घर में इस दौरान दो शुभ कार्यक्रम हुए. जिस कारण मैं कोई गुफ्तगू नहीं कर पाया. लेकिन कोई बात नहीं, मौसी के लड़के की शादी और मेरी बहन की सगाई की जो ख़ुशी आज मैं आपसे बाँट रहा हूँ उसे मैं सदा याद रखूँगा. लेकिन एक बात जरुर है की बीते दस दिनों में मुझे मेरे सभी पाठको, समर्थको और नियमित पाठको की बहुत याद आई. इसका जो मुख्य कारण था वो यह की इस दौरान देश-प्रदेश सहित मेरे शहर हिसार में बहुत कुछ घटित हुआ. कुछ जिलो में नगर परिषद्, पंचायत व् नगर पालिकाओ के चुनाव हुए तो देश की शांति को भंग करने वाले नक्सलियों को वार्ता की पेशकश की गई. मिर्चपुर मामले को लेकर संसद का घेराव तक किया गया वहीँ राहुल बाबा ने दोबारा हिसार आकर राजनीति को हवा दी तो ट्रेन हादसे ने भी जनता को हिला कर रख दिया. इन सब से परे हिसार में एक लड़की की अश्लील फोटो खिंच कर तीन साल तक ब्लैक मेलिंग के जरिये रेप किया गया तो गलत दिशा से आ रहे एक ट्रक ने ओवर ब्रिज पर एक व्यक्ति की जान ले ली.
इन सब के बावजूद मैं पिछले काफी समय से सोच रहा था की राजनीति पर कुछ लिखू. लेकिन कुछ तो समय का अभाव और गर्मी में हाल बेहाल. फिर भी मैंने जैसे-तैसे कर कुछ लिख कर छोड़ दिया था. जिसे मैं आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. बात कुछ ऐसी है की अभी हाल ही में हरियाणा के कुछ जिलो में नगर परिषद्, पालिकाओ और पंचायत के चुनाव संपन्न हुए है. मुद्दा यह नहीं है की इन चुनावों में कौन जीता, कौन हारा. बात सिर्फ इतनी सी है की इन चुनावों में क्या-क्या हुआ. कैसे-कैसे हुआ और क्यों हुआ. जैसा की सभी जानते है की उत्तर भारत में गर्मी इन दिनों चरम पर है. तो यह भी लाजमी है की इतनी गर्मी में भले ही मुख्यमंत्री बिजली-पानी के लिए कितने की बड़े-बड़े दावे कर ले लेकिन जनता की पूर्ति करना बहुत मुश्किल है. ऐसे में जनता भी बेचारी क्या करे. उसके पास एक ही रास्ता बचता है की धरना और प्रदर्शन. फिर भले की किसी को परेशानी हो रही हो या किसी को दुःख तकलीफ. यही कारण है की हिसार के उपायुक्त को यह सन्देश देना पड़ा की जनता ऐसा ना करे अगर उन्हें कोई तकलीफ है तो जनता उनसे सीधे मिले.
यहाँ बात हो रही थी चुनावों की. ऐसा नहीं है की चुनावों में खड़े प्रत्याशियों को गर्मी के साथ-साथ बिजली-पानी के पसीना नहीं बहाना पड़ा हो. प्रत्याशियों पर बिजली-पानी के लिए इतना दबाव था की किसी को यह पता नहीं था की इन चुनावों में कौन जीतेगा और कौन हारेगा. यहाँ तक की मतदाता को खुश करने के सभी तरीको के अलावा शराब भी इन चुनावों में कोई काम नहीं आई. जनता की सिर्फ एक ही मांग थी की बिजली-और पानी. जिसका की आज पूरे प्रदेश में बुरा हाल है. स्वयं प्रत्याशी मानते है की जनता को खुश करने के लिए इतना पैसा आज तक के चुनावों में शराब या अन्य तरीको पर नहीं लगा जितना की अब की बार जनता के दरवाजो पर पानी भिजवाने में खर्च हुआ है. तो क्या हम यह बात मान ले की चुनाव आयोग भले ही प्रत्याशियों पर कितना ही शिकंजा कस ले प्रत्याशी तो चुनावी खर्च अपने तरीके से ही करेंगे. कहने का भाव यह है की सभी को जीत सुनिश्चित करनी है फिर काहे का चुनाव आयोग और कैसा पैसा. लेकिन प्रत्याशियों को इन चुनावों में यह गाने का जरुर अवसर मिला की "महंगा हुआ पानी की थोडा-थोडा पिया करो".
चलते-चलते 
एक तो शादी का मौसम, उस पर घर में शादी तो ऐसा नहीं हो सकता की हिसार के पुराने ओवर ब्रिज पर से गुजरना ना हो. लेकिन एक रात मैंने जो नजारा देखा उसे देख में स्तब्ध रह गया. एक तो यह पुल तीन साल से ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है उस पर रात 8 बजे नो अंटरी खुलने के बाद ओवर लोडिड ट्रक ओवर ब्रिज का एक हिस्सा बंद होने के कारण गलत दिशा से जा रहे थे. अगले ही दिन समाचार पत्र में पढ़ा की रात को ट्रक और एक कार की दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौत हो गई. पुलिस अधीक्षक ने इस घटना पर तुरंत कार्यवाही करते हुए पुल की 24 घंटे निगरानी के लिए पुलिस दल तैनात किया है.


चुनाव, इज्जत और दावेदारी-फ़िर भी जनता सब पर भारी


हिसार जिले की सात विधानसभा सीटो पर चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशी अब अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे है। वैसे तो रविवार को एक महीने से चल रहा चुनाव प्रचार का शोर-शराबा थम सा गया है लेकिन अब प्रत्याशी जनता से संपर्क कर अपने-अपने दावे कर रहे है। उल्लेखनीय है की हरियाणा विधानसभा के लिए 13 अक्तूबर को चुनाव होने है। रविवार को चुनाव प्रचार थमने से पूर्व सभी प्रत्याशियों ने जीत के लिए अपनी ताकत झोंक दी। किसी ने रैली कर अपनी ताकत दिखाई तो किसी ने रोड शो कर। किसी ने जनसभा कर वोट देने की अपील की तो किसी ने घर-घर जाकर अपने व् अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगे। कुल मिला कर रविवार का दिन सभी पार्टीयो व् उम्मीदवारों के लिए अहम् रहा। कोई किसी तरह की कोर-कसर बाकि नही रखना चाहता था। यही कारण था की जहा पंजाबी समुदाय के पंचायती प्रत्याशी गौतम सरदाना ने एक विशाल रैली कर अपनी ताकत दिखानी चाही वही कांग्रेस सांसद और हिसार विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी सावित्री जिंदल के पुत्र नवीन जिंदल ने छोटी-छोटी जनसभाए कर अपनी माता को वोट देने की अपील की। इन सब से परे ज्येष्ठ जिंदल पुत्र पृथ्वी राज ने नगर के व्यापारियों और प्रतिष्ठित लोगो को पत्र के माध्यम से कांग्रेस और अपनी माँ को जिताने की अपील की। इसी कड़ी में हरियाणा जनहित कांग्रेस सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई ने भी रोड शो कर हजंका को वोट देने की अपील की। यह तो 22 अक्तूबर को ढोल की पोल खुलने पर ही पता चलेगा की कौन कितने पानी में है लेकिन इतना जरुर है की यह चुनाव हिसार के लिए अहम् होंगे। इन चुनावो में कांग्रेस, भाजपा व् हजंका सहित कई बड़े नेताओ की इज्जत दांव पर लगी है। अगर जनता से थोडी सी भी चुक हो गई तो जहा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल का राजनैतिक भविष्य दांव पर लग सकता है वही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व् पूर्व सांसद जयप्रकाश का राजनितिक जीवन अंधकारमय हो सकता है। तो इनलो छोड़ कर कांग्रेस का दामन थामने वाले पूर्व वित्त मंत्री संपत सिंह भी अपने को राजनैतिक मैदान में खड़ा रखने में असमर्थ होंगे। वही भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए भाजपा विधायक रामकुमार गौतम का राजनितिक अस्तित्व भी खतरे में है।
इन सब में एक चेहरा भाजपा का भी है। वैसे तो हरियाणा में पाँव जमाने के लिए भाजपा शुरू से ही मशक्कत करती रही है लेकिन अब तक उसको कुछ चंद सीटो से ही गुजरा करना पड़ा है। वही हिसार की नारनौंद सीट पिछले चुनावो में भाजपा के पाले में गई थी जिसे भाजपा गवाना नही चाहती। यही कारण है की भाजपा ने यहाँ से वरिष्ठ नेता कैप्टन अभिमन्यु को मैदान में उतरा है। अगर इस सीट पर गलती से भी कोई गलती हो गई तो या तो कैप्टन अभिमन्यु या फ़िर कांग्रेस उम्मीदवार रामकुमार गौतम को राजनीति से संन्यास लेना पड़ सकता है। जबकि इनलो भी बरवाला व् उकलाना से अच्छी स्थिति में दिखाई दे रही है। अगर यहाँ भी भाग्य ने इनलो का साथ नही दिया तो दोनों इनलो प्रत्याशी सरोज मोर और शीला भ्यान जो की आज पार्टी के उच्चस्थ पद पर बैठी है को हार का मुहं देखना पड़ सकता है। रही बात हजंका की तो उसने बिना कोई गलती करे हिसार की सात सीटो में से तीन को हथियाने का काम किया है। आदमपुर से पार्टी सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई को, नलवा से माता जसमां देवी को तो हांसी से पार्टी के वरिष्ठ नेता विनोद भयाना को चुनाव मैदान में उतरा है। यहाँ थोडी सी चुक होते ही जहा सीधा असर पार्टी पर पड़ेगा वही दिग्गज भी किसी को मुहं दिखाने लायक नही रहेंगे। फ़िर भले ही ये नेता अपनी जीत को लेकर कुछ भी दावे करते रहे, जनता को कुछ भी सब्जबाग दिखा ले लेकिन यह तो जनता को ही देखना है की वो किस की इज्जत उतारती है और किस पर मेहरबान होती है।


यहाँ तो सब गड़बड़ झाला है भाई


हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव सर पर खड़े है लेकिन जनता अभी भी इस गड़बड़ झाले में फंसी है की प्रदेश में कौन सी पार्टी किस का दामन पकडेगी और कौन सा नेता चुनाव में खड़ा होगा। नेताओ और राजनैतिक पार्टियों की यह आँख मिचौली जनता के लिए ही नही उन नेताओ के लिए भी सिरदर्द बनी हुई है जिन्हें चुनावो के समय जनता के बीच जाना है। यही कारण है की कुछ नेताओ को छोड़ प्रदेश स्तर पर कोई भी नेता कुछ भी बोलने से बच रहा है। कारण साफ़ है की किसी को पता ही नही की यह विधानसभा चुनाव प्रदेश की राजनीति में क्या क्या गुल खिलायेगा। मेरी इस गुफ्तगू में गुल खिलने का मतलब यह है की जहा कांग्रेस अभी नेताओ की छटनी में व्यस्त है वही उसे पार्टी टिकट मांगने वालो की लम्बी फेहरिस्त से भी निपटना होगा। उधर इनलो ने अभी जो 42 उम्मीदवारों की घोषणा की है उससे भी पार्टी में कोहराम मचा हुआ है। प्रदेश की अनुशासित पार्टी कहलाने वाली इनलो में इन दिनों बगावत के सुर सुनने को मिलने लगे है। जबकि हरियाणा जनहित कांग्रेस की स्थिति उससे भी ख़राब है। एक और जहा पार्टी नेता अपने सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई को चमचो से घिरा बता रहे है वही भाजपा के साथ गठबंधन नही होने से भी पार्टी नेता व् कार्यकर्ता उहा-पोह की स्थिति में है।
अगर अब भाजपा नेताओ की बात करे तो वो कुछ बोलने की स्थिति में ही नही है। पहले इनलो से गठबंधन तोड़ने और अब तक हजंका से गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता अपने मुंह को सिले हुए है। विधानसभा चुनाव में जहा मात्र 35 दिन शेष रह गए है वही अभी तक कोई गठबंधन नही हो पाने के कारण भाजपा नेता जनता के बीच जाने से हिचक रहे है। उल्लेखनीय है की हरियाणा में राजनीति करने के लिए भाजपा को हमेशा बैशाखियो की जरुरत रही है वही उसके नेताओ को यह पता ही नही है की विधानसभा चुनाव के लिए किसी पार्टी से गठबंधन होगा की नही। वैसे तो हजंका से नाता टूटने के बाद बसपा भी प्रदेश की सभी 90 सीटो पर अपने प्रत्याशी खड़े करने का दम भर रही है लेकिन प्रदेश में उसकी स्थिति बहुत अच्छी नही है। मजेदार बात तो यह है की सिर्फ़ हिसार की 7 विधानसभा सीटो के लिए जहा 100 कांग्रेसी नेताओ ने आवेदन किए है वही जनता भी इस खेल (कांग्रेस के असली नेता होने का दम भरने वाले नेता) को देखने के लिए बेसब्री से इन्तजार कर रही है। वही भाजपा-हजंका गठबंधन, इनलो में उठ रहे उबाल और बसपा को प्रत्याशी तक नही मिलने के कारण हो रहे गड़बड़ झाले से जनता का भरोसा राजनीति और नेताओ से उठता जा रहा है।
और ख़त्म हो गया ड्रामा
मैंने यह पोस्ट लगभग 3 बजे के आसपास यह सोच कर लिखी थी की प्रदेश की राजनैतिक पार्टियों में प्रदेश की राजनीति करने के लिए जो गड़बड़ झाला चल रहा है उस पर में आपसे कुछ गुफ्तगू कर सकूँ, लेकिन शाम होते-होते समाचार आया की हरियाणा में अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस और भाजपा को जिन बैशाखियो की जरुरत थी वो मैं के कारण अब एक-दुसरे पर ही तन गई है। भाजपा जहा प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत मान कर अहम् में है वही हजंका सुप्रीमो स्वयम को मुख्यमंत्री घोषित करने के कारण मैं के आगोश में है।
गुफ्तगू के प्रिय पाठको मैंने एक स्टोरी लिखी थी की आख़िर कौन लेगा ख़बर देने वालो की ख़बरमैंने आपसे वादा किया था की मेरी यह गुफ्तगू अभी ख़त्म नही हुई हैऐसा नही है की मैं मेरे वादे को भूल गया हूँकुछ तथ्य मेरे पास चुके है और कुछ आने अभी बाकी हैउनके आते ही मैं फिर गुफ्तगू करूँगा की किस तरह ख़बर देने वाले अपने मंसूबो को अंजाम दे जाते है और हम चुपचाप तमाशा देखते रहते है.


समर्थन की चासनी में सत्ता का गुलाबजामुन


मैं बीते कुछ दिनों से बड़ी उलझन में हूँ । समझ नही पा रहा हूँ की मेरी उलझन को लेकर आपसे क्या गुफ्तगू करू । परेशानी भी ऐसी की दिख सभी को रही है लेकिन कोई कुछ नही बोल रहा । इसका कारण जो मुझे समझ में आया वो यह की किसी को तो समझ में नही आ रहा की यह क्या और क्यो हो रहा है और जिसको समझ में आ रहा है वो कुछ बोल नही रहा । कारण एक की सत्ता । भई जिसके हाथ सत्ता उससे पंगा कौन ले । लेकिन मिडिया का काम तो यही है की जनता को समय-समय पर सजग करता रहे । फिर अगर कोई नेता भी सबक ले ले तो उसकी बढाई नही तो जय राम जी की भाई । इसीलिए मैं उलझन में था । लेकिन अब लिखना शुरू कर दिया है तो इतनी गर्मी में दिल को कुछ ठंडक मिली है । बात कुछ यूँ है की मतदान होने से पहले जो कुछ हुआ वो सब ने देखा । कुर्सी की चाह में किसी ने तीसरा मोर्चा (लेफ्ट) बनाया तो किसी ने चौथा (लालू-मुलायम-पासवान) तो किसी ने अपनी खिचडी अलग (बसपा) पकाई । सभी को सत्ता की चाह ऐसी थी की कोई किसी की सुनने तक को राजी नही था । गिर-पड़ कर मतदान हो गए । उसके बाद जो समीकरणों का दौर शुरू हुआ वह भी कबीले गौर था । कुल मिला कर देश की जनता को जो नही देखना चाहिए था वो सब देखा । आखिरकार मतगणना के पश्चात् जो तस्वीर उभर कर आई सभी ने राहत की साँस ली । चाहे कोई कांग्रेस सरकार से खुश था या नही लेकिन दिल की आवाज़ यही थी की चलो सरकार तो स्थिर आई । अब चाहे महंगाई आए या कालाबाजारी बढे लेकिन रोज की कीच-कीच तो नही रहेंगी ।
अब बारी थी मोर्चो की
अब सब स्पष्ट था की कांग्रेस की सरकार बननी है । लेकिन उन नेताओ के होश फख्ता थे जिन्हें कुर्सी चाहिए थी बेचारे वो उलझन में थे की अब क्या किया जाए । कुर्सी मिलना तो दूर जनता ने तो हरा कर घास तक नही डाली । अब नेताओ की उलझन तो मेरी उलझन । सोचा था की चुनावो के बाद भरी गर्मी से कुछ निजात मिलेगी और हाथ को आराम । लेकिन हार के पश्चात् भी उनकी कुर्सी की चाह के कारण मुझे कहा आराम मिलना था । एक के बाद एक नेता पहुचने शुरू हो गए 7 रेस कोर्से । कोई यहाँ आया तो किसी ने सोनिया के दर की हाजरी मारी । कोई बयानों से चर्चा में आया तो कोई कांग्रेस की जीत की खुशी में अपने सांसदों की टोकरी भर लाया । कोई मनमोहन को अपना बड़ा भाई बता कर समर्थन दे रहा है तो कोई पुराने रिश्तो की दुहाई दे कर एक-एक राजनीति बयानों पर अपनी पैनी नजर रखने वाले इन नेताओ की हेकडी आज दूर-दूर तक कही दिखाई नही दे रही । जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, दिग्विजय सिंह, प्रणव मुखर्जी और अनेको कांग्रेसी नेता समर्थन देने वाले नेताओ की जम कर आलोचना कर रहे है तो भी इनकी बोलती बंद है। जबकि चुनावो से पहले किसी के छोटे से बयान पर यही नेता इतना बवाल खड़ा कर रहे थे की सुनना मुश्किल हो जाता था ।
क्यो देना चाहते है समर्थन
अब मेरी उलझन यह है की जो नेता कल तक एक दुसरे की सूरत देखना पसंद नही कर रहे थे वो अब एक मंचपर कैसे खड़े हो जायेंगे । जो ख़ुद हार गया वो भी भी दे रहा है समर्थन और जिसके पास कुल 4 सांसद है वो भी जिस से नही मांग रहे वो भी लाइन में है तो जो कल तक शर्तो की झडी लगा रही थी उसने तो मनमोहन को अपना बड़ा भाई तक बोल दिया । आखिरकार 10 दिनों के हेर-फेर ऐसी क्या वजह पैदा हो गई की इन नेताओ को बिना शर्त समर्थन देना पड़ रहा है । जनसेवा का दिखावा करने वाले ये नेता क्या समर्थन के बूते राजनीति में बना रहना चाहते है या फिर कांग्रेस सरकार आने से इनको खतरा महसूस हो रहा है । या फिर जनता द्वारा घास नही डालने के बाद भी इनको कुर्सी प्यारी लग रही है ।
कही इनको यह खतरा तो नही
खतरे की बात से याद आया की भई इनमे से तो सभी को किसी न किसी से खतरा है । बात शुरू करता हूँ लालू यादव से । बिहार में उनकी पार्टी जहा हाशिये पर आ गई है वही उनके खिलाफ अनेको मामले अदालत में विचाराधीन है । अब उनको यह खतरा सता रहा है की कही नीतिश कुमार उनके लिए खतरे की घंटी न बजा दे । ऐसा ही कुछ खतरा मुलायम सिंह को भी है । उत्तरप्रदेश में मायावती सत्ता पर काबिज है । और चुनाव पूर्व आपस में इनकी नाराजगी जगजाहिर है । अगर मुलायम सिंह यूपीऐ के साथ नही जाते है तो मायावती उनको परेशानी में डाल सकती है । उधर मायावती को भी खतरा है की अगर मैंने समर्थन नही दिया तो मुलायम सिंह सोनिया गाँधी या मनमोहन सिंह को अपनी बातो की चासनी पिला कर कही उनकी सरकार न गिरवा दे । जैसा की अमरसिंह लोकसभा चुनावो से पूर्व अपने बयानों में कहते रहे थे । रही बात रामबिलास पासवान की तो यूपीऐ के साथ सत्ता में रह कर वो जमीं पाने की तलाश में है जो जनता ने उनसे इन लोकसभा चुनावो में छीन ली है ।


राजनितिक देवियों का है अपना ही वजूद


आने वाले लोकसभा चुनावो के मद्देनज़र सरगर्मिया अपने रम पर हैजोड़-तोड़, रूठना-मनाना, बनना-बिगड़ना और मिलने-बिछड़ने के खेल से सभी राजनीतिज्ञों को आज दो-चार होना पड़ रहा हैकिसी को प्रधानमंत्री की कुर्सी प्यारी है तो किसी को मंत्री की तो कोई सांसद बनना चाह रहा हैमतलब आज हर कोई इसी खेल में उलझा हुआ नज़र हा हैयही कारण है की आज चहु और राजनीति हो रही हैलेकिन मजेदार बात तो यह है की जो हो रहा है वो आप सभी को समय समय पर दिखाई या सुनाई दे रहा हैइन सब से दूर जो आवाज़ अभी नही रही वो आने वाले समय में या अंदर खाते जरुर हलचल में हैल्दी कीजिये बता रहा हु क्योकि मेरा मकसद ही यही है की मै समय समय पर आपको समाचारों से दूर ले जाकर कुछ ऐसी गुफ्तगू करू की आप को समाचार का दूसरा पहलु भी समझ सकेजी हा में बात कर रहा हु राजनीति की देवियों कीजिनकी आवाज़ अभी तो कानो में नही पड़ रही लेकिन प्रत्येक दल की ये देविया समय समय पर अपने करतबों से चुनावो के दिनों में एक अमिट छाप अवश्य छोड़ जाती हैयही करण है की चुनावो तक ये सभी देविया अक्सर चुप दिखाई देती है या फिर दिखाई ही नही देतीलेकिन भीतर ही भीतर इनकी कारगुजारिया चालू रहती हैफिर चाहे भाजपा की सुषमा स्वराज हो या तृणमूल कांग्रेस की ममता बनेर्जीजय ललिता की आवाज़ भी जहा कम सुनाई देती है वही वसुंधरा राजे सिंधिया भी कम ही दिखाई देती हैऐसा नही है की चुनावो के दिनों में ही ऐसा होता हैअक्सर ये सभी अंदर खाते ही अपनी गतिविधियों को अंजाम देती हैफिर चाहे किसी को मनाना हो या किसी से जोड़-तोड़ करना होकुल मिला कर प्रत्येक चुनावो में इनकी भूमिका अहम् होती है

ये भी कुछ कम नही

हम बात करे सोनिया गाँधी और मायावती की तो ये दोनों देविया तो आज राजनीती के उस शीर्ष पर बैठी है की अगर इनकी आवाज़ नही आए तो पता ही नही लगता की देश में राजनीति हो रही हैलेकिन् इनके अलावा राजनितिक हस्तियों में शुमार और भी कई दिग्गज देविया है जो समय समय पर अपने क्रिया-कलापों से जनता की नज़रो में रहती हैसुषमा स्वराज, उमा भारती, जय ललिता, ममता बनर्जी के अतिरिक्त केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा, हरियाणा में मंत्री किरण चौधरी व् सावित्री जिंदल, बिहार से राबड़ी देवी व् वृंदा करात इनमे मुख्य है ।


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तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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