आग पश्चिम की, धुँआ भारत का


मंगलवार को विश्व तम्बाकू दिवस था. बहुत से साथियों ने तम्बाकू पर बहुत कुछ लिखा और कुछ मेरे जैसे भी थे जो लिखने से रह गए. लेकिन कहते है की देर आये दरुस्त आयें. कुछ इसी सोच के साथ आज लिखने बैठ गया. लेकिन आज एक अजब सा इतिफाक हुआ. जहाँ आज मैं यह सोच रहा था की भारत में सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करने पर रोक लगी हुई है वहीँ पुलिस अभिनेता सलमान को सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करने के दोष में पकड़ने पहुँच गई. गुफ्तगू हुई की आखिर पुलिस सलमान खान को ही पकड़ने क्यों गई जबकि आज हम प्रतिदिन सैकड़ों लोगो को धुम्रपान करते देख लेते है. तो पता लगा की सलमान को मिडिया वालों ने फिल्म की शूटिंग के दौरान धुम्रपान करते दिखाया था. समाचार का पहलु यह है की सड़क पर चलते, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सरकारी कार्यालय व् अस्पतालों सहित विभिन्न सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान करते लोग आज प्रशासन को नजर नहीं आते लेकिन समाचारों में सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करते सलमान खान अधिकारियों को जरुर दिखाई दे गए.
अब आप ही देख लो की आज जिन पर हमें गर्व है, जिन्होंने भारत का नाम दुनिया में रोशन किया है उन मुट्ठीभर भारतीय युवक-युवतियों को छोड़ दीजिए, लेकिन भारत की सडक़ों पर, पब में, वाइन शॉप में, सिनेमा हॉल में, धार्मिक उत्सवों में और साइबर कैफे  में जिन युवाओं की जमात देखने को मिल रही है उस पर कतई गर्व नहीं किया जा सकता। क्योंकि इस तरह के युवा ना सिर्फ पथ भ्रष्ट हो चुके है बल्कि देश की संस्कृति के लिए सबसे खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। ये हमारे समाज का कल्चर और देश का माहौल बदल रहे हैं। इनकी सोच न तो भारतीय है और न ही इन्होंने खुद की कोई मौलिक सोच डेवलप की है। ना ही उसे किसी विदेशी संस्कृति में ढाला है। ये सभी एक शहरी कोलाहल और पश्चिमी चकाचौंध के बीच अँधी दौड़ के अनुसरणकर्ता हैं।
इन्हें देख यहीं लगता है की यह आग तो पश्चिम की है लेकिन फर्क मात्र इतना है की उस आग का धुंआ जरुर भारत से निकल रहा है. क्या आप जानते है की आखिर आज के युवाओं का ये मूढ क्या गुल खिला रहा है. शायद इसमें इनका कोई दोष भी नहीं है। नकलचियों की ये जमात वर्तमान युग की कई खोखली चीजों से प्रभावित होती है। पहली ब्लयू फिल्मों से, दूसरी पब संस्कृति से और तीसरी इंटरनेट से। इन तीनों का ही कल्चर कुछ इस तरह का है कि ये युवाओं में एक नई सोच के बजाय एक घातक सोच को विकसित कर रहे हैं।
मोबाइल और इंटरनेट:- इंटरनेट की दुनिया में जितनी जानकारियों का संग्रह है, उतना जंजाल भी है। युवा इंटरनेट से ज्ञानवर्धक सामग्री ये ज्यादा कुछ ऐसी बातें खोजते हैं, जो उनके नैतिक पतन का रास्ता तैयार करती है। जैसे कि वेब पोर्टलों पर सुरक्षित यौन संबंध के उपाय क्या-क्या हैं, हार्ड कोर पोर्न साइट, वीडियो, ब्लॉग पर यौन स्टोरिज ऐसे कई टॉपिक हैं, जिन्हें युवा इंटरनेट पर देखने/पढऩे के लिए हर समय बेताव रहते हैं। इंटरनेट पर सोशलनेटवर्किंग साइट्स के जरिए नए दोस्त बनाना बेहद आसान है और फिर इन दोस्तों के साथ सारी हदे पार करने की सीख और प्रोत्साहन भी इंटरनेट से ही मिलता है।
पब कल्चर का प्यार:- बड़े शहरों में बढ़ते पब कल्चर ने लडक़ों-लड़कियों का काम और भी आसान कर दिया है। डिस्को और काम करके खिसको के कल्चर ने सब लचर-पचर कर दिया है। पब ने लडक़ों के साथ लड़कियों को भी नशे में झूमने की सुविधा उपलब्ध करा दी है। यह सब चलता है एडवांस एज और मॉर्डनसिटी के नाम पर। सुनने में यहाँ तक आ रहा है कि कुछ कामकाजी लड़कियों के अलावा नाइट कॉलेज की लड़कियाँ, काल सेंटर या ग्लैरम से जुड़ी लड़कियाँ और माँ-बाप द्वारा खुली छोड़ दी गई लड़कियाँ शराब के अलावा गालियाँ बकना भी सीख गई हैं और देर रात तक घर आना तो अब आम चलन हो चला है।
विज्ञान की मेहरबानी:- विज्ञान की मेहरबानी से अब कुछ ऐसे साधन भी हैं जैसे गर्भनिरोधक गोलियां और बाजार में उपलब्ध दूसरी तरह के गर्भनिरोधक साधनों जिन्होंने अब काम और भी आसान कर दिया है।
आफत में ऑफिस :- काल सेंटर, फैशन, एड, ग्लैमर वर्ल्ड, बैंकिंग, आई-टी सेक्टर या फिर कोई भी प्राईवेट कंपनियों में अब लडक़े और लड़कियों का अनुपात लगभग समान हो चला है। इसमें से कुछ नवविवाहित हैं तो कुछ नहीं भी, लेकिन हैं सभी युवा। सभी उस कल्चर का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जहाँ काम से ज्यादा लोग चापलूसी, दिखावा, रणनीति और प्रेम संबंधों में ज्यादा रत रहते हैं और इनकी आड़ में अपना-अपना मतलब साधने की फिराक में रहते हैं।
शीशा लाऊँज:- इस शीशा लाऊँज से दम मारो दम की तर्ज पर ग्रुप में मजा लिया जाता है। यह धुआँ सिगरेट और अन्य नशे से ज्यादा घातक है क्योंकि पानी के जरिए पहुँचा निकोटिन फेफड़ों में स्थाई रुप से जम जाता है। उससे कहीं  अधिक घातक लगता है किसी भी शीशा लाऊँज का वह माहौल जिसमें लडक़े-लड़कियाँ बेसुध से नशीली हालत में एक-दूसरे को घुरते रहते हैं।
आखिर क्यों अखरता है:- खुली संस्कृति की वकालत करने वाले और इसकी मुखालिफत करने वाले दोनों ही उस तूफान में बह रहे हैं जोकि पश्चिम से उठा है। पश्चिम तो उस तूफान से निजात पाने के तरीके ढूँढ रहा है, लेकिन भारत को अभी तूफान का मजा चखना है। पाश्चात्य कल्चर की वकालत करने वाले कह सकते हैं कि आखिर आपको अखरता क्यों हैं, हमारी मर्जी चाहे हम निर्वस्त्र नाचें।
दिशाहीन युवा:- पश्चिम को मालूम है कि हम कहाँ जा रहे हैं और हमें कहाँ जाना है। चीन जानता है कि उसकी दिशा क्या है। लेकिन भारत के युवा किसी चौराहें पर खड़े नजर आते हैं। उक्त बातों के खिलाफ लोग हाथ खड़े कर सकते हैं- लेकिन बहुसंस्कृति, बहुधर्मी और दुष्ट राजनीतिज्ञों के इस देश में वही होता है जो विदेशी चाहते हैं.

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