आज मेरे देश का 61वा गणतंत्र था यह मैं भलीभांति जानता था. लेकिन मुझे यह कहते कोई संकोच नहीं की आज कितने ही भारतीयों को यह बात पता थी. कारण एक की आज सभी या तो अपने में व्यस्त है या फिर वो देश को आजादी दिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को भूल गए है. आज सुबह मुझे उस समय बहुत अफ़सोस हुआ जब किसी ने मुझे फोन कर पूछा की आज बैंक की छुट्टी
क्यों है. मेरा सर चकराया और बड़े इत्मीनान से जवाब दिया भाई साहब आज गणतंत्र दिवस है. उसने भी सहमती से जवाब दिया ओह हो दिमाग से उतर गया. मैं भी आज सुबह जल्दी तैयार हो गया था. कारण था मुझे गणतंत्र दिवस की परेड में जाना था. सिर्फ इसलिए नहीं की मुझे समाचार एकत्रित करने थे. वो तो शायद जिला लोक संपर्क कार्यालय से भी आ जाते. क्योंकि मुख्य उद्देश्य परेड में शामिल होना था सो मैं 9 बजे ही घर से निकल पड़ा. साथी पत्रकारों से फोन पर बात कर मैं 10 बजे ग्राउंड में पहुंचा तो मुख्य अतिथि मंच पर विराजमान थे. सांस्कृतिक कार्यकर्म में स्कूलों के नन्हे-मुन्ने बच्चे दर्शको का मन मोह रहे थे. लेकिन जैसे ही मेरी नजर ग्राउंड के चारो और पड़ी मैं हक्का-बक्का रह गया. भले ही आज देश का 61वा गणतंत्र दिवस है लेकिन हम आज के दिन भी देश के उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते है जिनके कारण हम आज खुले में सांस ले रहे है और यह गणतंत्र दिवस मना रहे है. आज मैंने जो नजारा देखा उसे देख ज्यादा दुःख इसलिए हुआ की विभिन्न स्कूलों के सैकड़ो बच्चे जिन्होंने लगभग एक महीना लगा कर यह सोच अपनी तैयारी की थी की आज उनकी प्रस्तुति को देखने दुनिया आएगी. लेकिन आज यह देख मायूसी छा गई की जो लोग उन्हें देख रहे है वो या तो प्रशासनिक अधिकारी है या फिर कर्मचारी. या उनके साथ आने वाले उनके परिचित या अभिभावक. तो क्या आजाद भारत की आजाद जानता का वो जोश ख़त्म हो गया जिसे देख अंग्रेज भारत से दुम दबा कर भागे थे. बावजूद इसके आज ग्राउंड में आम जानता की उपस्थिति शून्य मात्र थी.
और आज गणतंत्र दिवस है
लेबल: त्यौहार, युवा, राष्ट्रीय ध्वज, सभी, सामाजिक गुफ्तगू
तड़का मार के

तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
आओ अब थोडा हँस लें
a
यह गलत बात है

पूरे दिन में हम बहुत कुछ देखते है, सुनते है और समझते भी है. लेकिन मौके पर अक्सर चुप रह जाते है. लेकिन दिल को एक बात कचोटती रहती है की जो कुछ मैंने देखा वो गलत हो रहा था. इसी पर आधारित मेरा यह कॉलम...
* मौका भी - दस्तूर भी लेकिन...
* व्हीकल पर नाबालिग, नाबालिग की...
लडकियां, फैशन और संस्कृति

आज लडकियां ना होने की चाहत या फिर फैशन के चलते अक्सर लडकियां आँखों की किरकिरी नजर आती है. जरुरत है बदलाव की, फैसला आपको करना है की बदलेगा कौन...
* आरक्षण जरुरी की बेटियाँ
* मेरे घर आई नन्ही परी
* आखिर अब कौन बदलेगा
* फैशन में खो गई भारतीय संस्कृति
1 आपकी गुफ्तगू:
गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ!
Post a Comment