27 अप्रैल को विभिन्न राजनितिक दलों ने भारत बंद का एलान किया है. मुद्दा है महंगाई, बिजली, पानी और बिगडती कानून व्यबस्था. अगर आप व्यापारी है या आम नागरिक तो क्या आप को लगता है की इस बंद से यह सभी समस्याए ख़त्म हो जाएगी. चलो माना की ख़त्म नहीं हो सकती तो क्या केंद्र सरकार सहित सभी राज्यों में राज कर रही विभिन्न राजनितिक पार्टियों की सरकारों की नींद इस बंद से खुल जाएगी. तो मेरा मानना है की ऐसा कुछ नहीं होगा. क्योंकि इनमे से कुछ सरकारे ऐसी है जो कभी बंद करने वाले राजनितिक दलों के शासन के समय स्वयं बंद किया करती. जब उस समय वो इनकी नींद नहीं खोल पाई तो अब ऐसा क्या हो गया है की ये सरकारे जनता की भलाई की बात सोचेगी.
कोई नहीं सोचता जनता की भलाई के बारे में. अगर सोचता तो आज जनता ना इन मुद्दों को लेकर परेशान होती और ना ही इस बंद की नौबत आती. तो क्या हम यह मान ले की ये राजनितिक दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए बंद कर रहे है. या सब को कुर्सी दिख रही है. यहाँ आप को यह बता दे की इस बंद का समर्थन वो ही दल कर रहे है जिनको इन लोकसभा व् विधानसभा चुनावो में जनता ने घास नहीं डाली. इनमे से इनलो, सीपीएम, सीपीआई, समाजवादी पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी व् जनता दल यूनाईटीड मुख्य है. क्या यह कह ले की तीसरा मोर्चा इस बंद को समर्थन कर रहा है. इस बंद को लेकर इन राजनितिक दलों का क्या मकसद है यह समझना बहुत मुश्किल है.
लेकिन इतना समझ में आता है की इस बंद को सफल बनाने के लिए जिस तरह इन पार्टियों ने जोर लगा रखा है उससे यह साफ़ होता है की सभी अपनी-अपनी मजबूती दर्शा रहे है. मृतप्राय ये राजनितिक दल जहाँ अपने कार्यकर्ताओ में इस बंद के माध्यम से नया रक्त संचार करने की कोशिश करेंगे वही सफल बंद के पश्चात जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जायेगा की उन्होंने जनता की भलाई के लिए बंद किया जिसमे जनता ने उनका भरपूर साथ दिया. हो सकता है की 28 तारीख के समाचार पत्रों में जनता के नाम लम्बे-लम्बे बधाई सन्देश भी छपे हो. तो क्या यह मान लिया जाये की इस बंद को जनता की जरुरत समझ कर किया गया था या जनता के कहने पर.
हम सभी भली-भांति जानते है की ऐसा कुछ नहीं है. फिर जनता के साथ यह ढकोसला क्यों. क्या यह राजनितिक दल हमको बहकाने की कोशश कर रहे है या हम इनके बहकावे में आ रहे है. इनलो को लगता है इस बंद से हरियाणा की कुर्सी उसको मिल जाएगी तो सीपीआई और सीपीएम को लगता है की केंद्र सरकार दोबारा उससे समर्थन मांगेगी. जबकि लोकजनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी पुनः वजूद में आने के लिए जद्दोजहद कर रही है. जबकि सभी जानते है की ना तो पांच साल तक केंद्र सरकार हिलने वाली है और ना ही हरियाणा की हुड्डा सरकार. बावजूद इसके पता नहीं इन राजनितिक दलों को ऐसा क्यों लगता है की वो रही कुर्सी झप लो.
एक बार सोच कर देखो
धरने-प्रदर्शन व् हड़ताल करने वाले यह क्यों नहीं सोचते उनके ऐसा करने से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं है. आम आदमी चाहे वो व्यापारी हो, नौकरी पेशा हो या भले ही मजदूरी करता हो कोई नहीं चाहता की कोई ऐसा करे. फिर ये राजनितिक दल ऐसा कर क्यों काम-धंधा कर दो वक्त की रोटी कमाने वाले की रोटी छिनना चाहते है. बंद से किसको फर्क नहीं पड़ता. चाहे वो व्यापारी हो या नौकरी वाला. या फिर देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने वाला बैंक. सभी बंद से प्रभावित होते है. लेकिन राजनितिक दलों की तानाशाही के आगे सभी चुप रहते है. तो क्या इससे जनता की समस्याए ख़त्म हो जाएगी या इन राजनितिक दलों को कुर्सी मिल जाएगी.
वो रही कुर्सी झप लो
लेबल: इनलो, कांग्रेस, भूपेन्द्र हुड्डा, महंगाई, राजनितिक गुफ्तगू, सभी, सरकार
तड़का मार के

तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
आओ अब थोडा हँस लें
a
यह गलत बात है

पूरे दिन में हम बहुत कुछ देखते है, सुनते है और समझते भी है. लेकिन मौके पर अक्सर चुप रह जाते है. लेकिन दिल को एक बात कचोटती रहती है की जो कुछ मैंने देखा वो गलत हो रहा था. इसी पर आधारित मेरा यह कॉलम...
* मौका भी - दस्तूर भी लेकिन...
* व्हीकल पर नाबालिग, नाबालिग की...
लडकियां, फैशन और संस्कृति

आज लडकियां ना होने की चाहत या फिर फैशन के चलते अक्सर लडकियां आँखों की किरकिरी नजर आती है. जरुरत है बदलाव की, फैसला आपको करना है की बदलेगा कौन...
* आरक्षण जरुरी की बेटियाँ
* मेरे घर आई नन्ही परी
* आखिर अब कौन बदलेगा
* फैशन में खो गई भारतीय संस्कृति
1 आपकी गुफ्तगू:
Bandse kab koyi masla suljha hai jo suljhega? Jo bhi virodhi paksh hota hai,wo is hathiyar ka istemal karta hai..do patonme pisti hai madhyam vargeey janta..
Post a Comment