साला मै तो साब बन गया


कुछ भी लिखने से पहले मै ब्लागस्पाट का शुक्रिया करना चाहूँगा जिसने मुझे एक मंच दिया कुछ लिखने का, अपनी बात कहने का और उससे भी ज्यादा गुफ्तगू करने का. शायद मेरे जैसे एक पाक्षिक पत्रिका में काम करने वाले रिपोर्टर को अपने सभी समाचार पाठको तक पहुँचाने का इससे अच्छा जरिया कुछ मिल भी नहीं सकता था.
इसके बाद बारी आती है सुधि पाठको की, फोलोअर की और उन पाठको की जो मेल के जरिये गुफ्तगू पढ़ते और करते है. बावजूद इसके जब एक अधिकारी ने मुझे यह कहा की ब्लॉग भी कोई पढने की चीज है तो मैंने गुफ्तगू का डोमेन ले लिया और इसको एक साईट की तरह चलाने लगा. इसलिए मै .को.एनआर का भी शुक्रिया अदा करता हूँ.
अब आपको मै यह बताना चाहता हूँ की बतौर पत्रिका का रिपोर्टर होने के नाते मुझे हिसार प्रेस क्लब में स्थाई सदस्यता नहीं मिल रही थी. लगभग एक साल मुझे क्लब का साधारण सदस्य रहना पड़ा. लेकिन उस समय तक मैंने अपना ब्लॉग बना लिया था और गुफ्तगू करने के लिए मै सक्रिय भी हो गया था. यही कारण था की कुछ साथियों ने मेरा साथ दिया और अध्यक्ष को कहा की जो सूर्य गोयल सप्ताह के सात दिन में से आठ दिन फिल्ड में दिखाई देता हो उसको साधारण सदस्य क्यों रखा गया है. साथी सदस्यों का विरोध देख कर मुझे पिछले वर्ष हिसार प्रेस क्लब का स्थाई सदस्य बना दिया गया और इसके साथ ही मुझे वोट देने का अधिकार मिल गया.
अब बारी आई क्लब की गतिविधियों में भी सक्रिय होने की. इसके लिए बीते वर्ष हुए चुनाव में मैंने क्लब का कोषाध्यक्ष बनने पर विचार किया. कुछ साथी भी मेरे पक्ष में थे लेकिन चुनाव अधिकारी के पास समय पर नहीं पहुँच पाने के कारण मै चुनाव लड़ने से रह गया लेकिन हमारे पैनल का अन्य साथी चुनाव जीत गया. इसके बाद मैंने अपने स्तर पर क्लब के लिए जो करना चाहिए था वो तो किया ही साथ ही उन सभी गतिविधियों में क्लब का साथ दिया जो क्लब द्वारा शुरू की गई. इसके लिए क्लब और साथी पत्रकारों का भी मुझे पूर्ण सहयोग मिला. जैसे-तैसे कर एक साल गुजर गया. अब बारी थी इस चुनाव की. अबकी बार मै मै कुछ साथियो के सहयोग से उपप्रधान पद की दौड़ में था. विचार था की अगर चुनाव होता है तो सूर्य गोयल हमारे पैनल का उपप्रधान पद का दावेदार है.
अफ़सोस की रविवार को हुई बैठक में सर्वसम्मति बन गई. यह एक ख़ुशी की बात भी थी की लगभग 80 सदस्यों ने एक मत से क्लब के पूर्व प्रधान व् दैनिक भास्कर के ब्यूरो चीफ राकेश क्रांति को पुनः प्रधान, पंजाब केसरी के ब्यूरो चीफ पवन राठी को सचिव, धर्मपाल बिश्नोई व् आज तक के भूपेन्द्र मोर को उपप्रधान, सच कहूँ के सुशिक कुमार व् पंजाब केसरी के महेंद्र सप्र को सह सचिव व् हरी भूमि के शमशेर को पुनः कोषाध्यक्ष चुन लिया गया. सूर्य गोयल और संयम जैन की क्लब के कार्यो में सक्रियता को देखते हुए प्रेस प्रभारी का पद दिया गया. इसके साथ ही यह घोषणा भी की गई की क्लब की कोई भी नई गतिविधि को शुरू करने से लेकर अंतिम चरण तक सूर्य गोयल और संयम जैन की देखरेख में पूरा किया जायेगा.
बात जहां से शुरू हुई थी
यही कारण है की मै ब्लागस्पाट, .को.एनआर सहित मेरे सभी पाठको और फोलोअर का शुक्रिया अदा करता हूँ की अगर उनका इतना स्नेह, साथ और प्यार ना मिलता तो मै आज तक गुफ्तगू नहीं कर पाता. अगर गुफ्तगू ही नहीं कर पाता तो पत्रकारिता की फिल्ड में सक्रिय कैसे होता. और अगर सक्रिय ही नहीं होता तो प्रेस क्लब का स्थाई सदस्य कैसे बनता. स्थाई सदस्य नहीं होता तो आज आपका यह ब्लॉगर साथी क्लब के मुख्य पद पर बैठ कर यह कैसे गता की साला मै तो साब बन गया.


फिर भी हम गणतंत्र है


सबसे पहले आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेरो शुभकामनाये और बधाई.
सदियों से राजा रानी वाली राजतंत्र की प्रशासन व्यवस्था में  रह चुकी जनता ने लगभग साठ साल के गणतांत्रिक देश हिन्दुस्तान में हाल  तक भी सभी भारतीयों की मानसिकता लोकतंत्र के लिए परिपक्व नहीं हो पायी है  तभी तो सता पर पकड़ बनाये रखने के लिए नेहरू के वारिसों ने कांग्रेस के नाम  से छद्म लोकतंत्र पर पूरे देश में अपने परिवार तंत्र का राज किया। जनता से  राजगदृदी अपनाने के लिए राजनीति में जाति धर्म का कार्ड खेला। यह खेल इतने  शातिर तरीके से खेला गया कि दूर-दूर तक की सोच रखने वालों से भी कभी यह पकड़ा नहीं जा सका।
हाल के बिहार विघानसभा चुनाव पर अगर सर्वो की खबर को यकीनी माने तो यह लगभग सच  है कि मूल रूप से मुसलमानों ने वंशवाली कांग्रेस और राजद को वोट दिया  क्योंकि कई कारणें के अलावा वो हिन्दु विरोधी भाषणों से खुश किये जाते रहे।  सुन्नी मुसलमानों को आज तक देश के नागरिक के कर्तव्य और अधिकार दोनों को  इमामों के हवाले कर दिया गया। मानों उपर वाले ने हिन्दुस्तान के इमामों को  स्पेशल पोस्टींग करके भेजा है। लम्बें समय तक इमामों के फतवे पर सुन्नी  मताधिकार का प्रयोग करते थे, पर इसमें कोई शक नहीं कि मदरसे की पढ़ाई और  विज्ञान की भूमिका धीमे-धीमे इमामों के मकडजाल से डॉ अब्दुल कलाम जैसे पढ़  लिखे कईयों को बाहर कर चुकी।
अगर आस्था के नाम पर मूर्ख बनाये जाने वाले  लोग जरा सी सोच और तर्क से दिमाग का इस्तेमाल करें तो वे समझ सकते है कि  जहाँ बनाने वाले खुदा के लिए इबादतगाह के नाम पर दकियानुसी सोच का जाल  फैलाना क्यों जारी रहा? जलन और नफरत का माहौल फैला, फूट डाल कर सता कब्जायी  गयी ताकि देश की गरीब जनता की दौलत को लूट कर विदेशों में केवल अपनी  औलादों के ऐशो आराम के लिए रकम जमा करा दी जाए। आज आधे से कम को समझ आया है  कल सबको समझ में आ जाएगा कि राज चलाने की जगह राज पर काबिज रहने के काम बडी ही  सूझबूझ से किये जाते रहे।
भ्रष्टाचार जब तक सौ करोड़ के खून में ना आ जाए तब  तक काम नहीं किया जाता। जब तक हवलदार और सिपाही घूस ना लेने लगे तब तक  तंख्वाह ना बढ़ाई। गरीबों को गरीबी हटाने के नाम पर लूटा गया। नियम कानून  ऐसे बनाये कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह हजार विदेशी कंपनीया आज हमारे  देश में आकर मजदूर और किसान का खून चूस रही है। ईमानदार व्यवसायी को तंग  कर करके मिट्टी में मिला दिया गया। हालात ऐसी बनायी गयी कि लोग कहें आजादी  से अच्छी गुलामी।
आरक्षण के कार्ड को खेल कर सता पर पकड के लिए दलित मुसलमान, दलित इसाई जैसे  शब्दो को जन्म देने वाली कांग्रेस सरकार का बस चला तो कल राजपूत मुसलमान  और ब्राहमण ईसाई शब्दों की भी रचना कर देगी। वैसे इन दिनों दिख रहा है की समाज  खत्म कर चुकी कांग्रेस सरकार अब परिवार खत्म करने के लिए सात जन्म के रिश्तो को महज समझौता बना कर छोड देगी।
हद तो तब है जब दो दिन के राजनैतिक कद वाले युवराज कहे जाते जनाब मीडीया  के सामने दलितों के यहां नहाने खाने का नाटक करेगें जबकि अगर कोई दलित 10  जनपथ पर आ जाऐ तो डंडे खाये। नमाजी टोपी पहने नाटक बस अपने लिए वोट लेने तक  के लिए है। चार बीबी और चालीस बच्चे की छूट इसीलिये तो है कि वो बस कैटल  क्लास वाला वोटर बन कर जिन्दा रहे फिर गटर में या किनारे घिसट घिसट कर जीते  हुए गरीब ने मर ही तो जाना है।
लेकिन वो दिन दूर नहीं जब एक एक करके  मुसलमान जान लेगा कि एक बीबी एक बच्चा करके ही वो अपनी औलाद को आदमी की  जिन्दगी देगा तब हिन्दुओं का वोट पूरी तरह खो चुकी कांग्रेस को एक वोट भी  नहीं मिलेगा। बापू के सम्मान पर जब पटेल जी की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री  बना देना ही इतिहास की एक गलती हो गयी लेकिन सुधार की जिम्मेदारी आज के  नौजवानों की है और बिहार के चुनाव के नतीजों ने विकास के वास्ते बदलाव का  बिगुल बजा दिया। लालू को परिवार वाली कांग्रेस के विरूद्ध सता लाने के बाद  जब लालू भी परिवार तंत्र का राज करने लगे तो कांग्रेस के साथ वह भी आज  हाशिये पर चले गये। जनता जनार्दन ने माना तो भगवान भी बन सका भगवान है।
किसी तंत्र के प्रशासन सफलता जनता के स्वीकारने पर है और यही सच है। फिर  नेताओं की बिसात क्या है। जनता के हित में काम करने के लिए अगर चुना है तो  उसे जिम्मेदारी से करना होगा। वर्ना अंजाम के कई उदाहरणों से दुनिया के  इतिहास भरे है।
साभार- मेरे ई-मेल बाक्स से


सपने तो सिर्फ सपने होते है


अक्सर नेता जनता को सपने दिखाते रहते है. यह उनका काम भी है ओर राजनीति करने के लिए धंधा भी. लेकिन यह हिसार का दुर्भाग्य ही है की यहाँ के नेताओ द्वारा देखे गए सपने कभी पूरे नहीं होते. यही कारण है की चुनावो के बाद एक समय ऐसा आता है जब जनता अपने को ढगा सा महसूस करती है. अब देखो ना पूर्व बिजली मंत्री स्व. ओमप्रकाश जिंदल ने हिसार के लिए एक सपना देखा था की वो हिसार को पेरिस बना देंगे. आज हिसार किसी भी सूरत में पेरिस तो नहीं बना लेकिन आज इतना बदसूरत हो गया है की जनता को फिर वही सपना याद आने लगा है. जनता भी बेचारी क्या करे. बड़ी भोली है, बार-बार याद दिलाने से भी जब जिंदल घराने को स्व. जिंदल का वो सपना याद नहीं आ रहा तो सड़क पर बैनर तक लगा दिया. उधर शासन और प्रशासन है की बार-बार कहने के पश्चात भी नींद से नहीं जाग रहा.
आज शहर की ऐसी कोई सड़क नहीं होगी जो खस्ता हाल ना हो. लेकिन इन सब सडको के बीच एक सड़क ऐसी भी है की जिसकी तरफ शासन, प्रशासन सहित जिंदल घराने का कोई ध्यान नहीं है. पिछले चार वर्षो से यह सड़क है की बनने का नाम नहीं ले रही. चार साल पहले रेलवे विभाग ने नगर का पुराना ओवरब्रिज यह कहते हुए एक तरफ से बंद कर दिया था की यह टूटने की कगार पर है. इसके चलते राजस्थान और दिल्ली की ओर से आने वाला ट्रैफिक बालसमंद रोड से गुजारा जाने लगा. एकाएक भारी ट्रैफिक के गुजरने से सड़क टूटने लगी. व्यवसायियों के हो-हल्ला करने, प्रशासनिक अधिकारियो सहित नेताओ को ज्ञापन व् जाम लगाने के कारण पुल को कियो बार खोला गया और बंद किया गया.
लेकिन एक दिन ऐसा आया की जनता को यह सपना सच होता नजर आया. मौका था चुनावो का. इसी रोड पर स्व. ओमप्रकाश जिंदल की धर्मपत्नी व् पूर्व मंत्री सावित्री जिंदल का चुनाव कार्यालय बनता है. चुनाव नजदीक आने के कारण एक बार तो सड़क की मरम्मत करवा दी गई लेकिन आज फिर सड़क की हालत दयनीय बनी हुई है. प्रशासन की तरफ से समय-समय पर सड़क पर मिटटी व् रोड़े तो गिरव दिए जाते है लेकिन अभी तक ऐसी किसी कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया गया जिससे जनता को इन खड्डों व् सड़क से उठने वाली मिटटी से निजात मिल सके. अब बारी थी दूसरे नेता के सपने दिखाने की. हाल ही में विधायक संपत सिंह ने फिर जनता को एक सपना दिखाया की वो इस सड़क का निर्माण अतिशीघ्र करवा देंगे.
उनके इस सपने के बाद जनता व् व्यवसायी निश्चिन्त होकर बैठ गए की अब तो सड़क बन ही जाएगी. लेकिन आज दो माह बीतने के बाद भी सड़क की और कोई ध्यान नहीं दिया गया तो व्यापारियों की संघर्ष समिति ने पुनः अधिकारियो के चक्कर काटने आरम्भ किये. पता लगा की जल्द ही सड़क का टेंडर छोड़ा जायेगा. लेकिन हाल ही में टेंडर को ख़ारिज किया गया तो जनता फिर से अपने को ढगा सा महसूस करने लगी है. कोई विकल्प ना दीखते हुए व्यापारियों ने सड़क के दोनों और बैनर लगा दिए की जिंदल साहब के पेरिस में आपका स्वागत है. इसके बाद भी कोई कार्यवाही नहीं होने से अब तो यही लगने लगा है की सपने तो सिर्फ सपने होते है.


फिर हमारे साथ ही अन्नाय क्यों


दो-तीन दिन पूर्व संसद में एक नजारा देखा. मैंने क्या सभी ने देखा. जो नहीं देख पाए उन्होंने पढ़ा और सूना. शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जिसने आम आदमी की बात संसद तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उठाने वाले इन नेताओ की यह नजारा देख तारीफ की होगी. वैसे तो नेताओ को वाह-वाही बहुत कम ही मिलती है लेकिन जो थोड़ी बहुत वाह-वाही करने वाले थे भी वो आज अपने को शर्मसार महसूस कर रहे होंगे. तो मुद्दा था सांसदों की वेतन वृद्धि का. बहुत लम्बे समय से उनकी यह मांग चलती आ रही थी लेकिन अब यह पास हो चुका है की सांसदों का वेतन 16 हजार से 50 हजार कर दिया जाये. बहुत ख़ुशी की बात थी की जो आदमी अपना घर छोड़ कर जनता के हक़ की बात रखने संसद तक जाता है उसको उसका हक़ मिलना भी चाहिए. लेकिन यह क्या अभी यह विधेयक रखा ही गया था की कुछ विपक्षी सांसदों ने 50 हजार को थोडा बताते हुए संसद में हो-हल्ला शुरू कर दिया.
यह वो समय था जब किसी को किसी की परवाह नहीं थी. सब शोर मचने और चिल्लाने में मशगुल थे. सब को अपनी-अपनी पड़ी थी. शोर मचने वाले सभी नेता जो चुनावो के समय आम आदमी का हक़ दिलाने की बात करते देखे जाते थे वो अब उन्ही के खून-पसीने की कमाई से अपनी जेबे भरने के प्रयास में जुटे हुए थे. कोई 50 हजार को कम बता रहा था तो कोई 80 हजार की मांग कर रहा था. मजेदार घटनाक्रम तो उस समय हुआ जब सरकार की दलील से नाराज कुछ सांसदों ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना प्रधानमन्त्री चुन लिया, तथा जल्द ही अपना मंत्रिमंडल बनाने की बात का स्वांग तक रच डाला. आखिरकार भाजपा व् अन्य सांसदों के बीच में आने के पश्चात् अब यह मुद्दा सुलझता नजर आ रहा है. उधर सरकार का भी कहना है की वह वेतन को 80 हजार किये जाने पर विचार करेगी. वेतन भले ही कुछ भी हो जाये लेकिन इतना जरुर है की आम जनता को इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
अब देखो ना उसी दिन सुबह के समाचार पत्र इस बात से अटे पड़े थे की न्यायलय के आदेश के बावजूद कृषि मंत्री शरद यादव ने सड़ रहा अनाज यह कहते हुए गरीबो में बांटने से इनकार कर दिया की भले ही अनाज सड़ जाए लेकिन यह बांटा नहीं जा सकता. इस बात से कुछ दिन पूर्व ही केंद्रीय रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने अपनी रैली में माओवादियों का समर्थन किया था. उधर दोबारा सत्ता में आने से पहले केंद्र सरकार ने विदेशो में जमा भारतीय नेताओ का काला धन वापिस लाने के बड़े-बड़े दावे किये थे. रही कामनवेल्थ गेम्स की बात तो उसमे हुआ घोटाला किसी से छुपा नहीं है. जबकि महंगाई ने देश में किस कदर तांडव रचा है यश भी सभी सांसदों को पता है. मुद्दा यह नहीं की यह सब बाते आपको या किसी को पता नहीं होगी. पहलू यह है की इतना सब कुछ होने के बाद भी वेतन बढाने की मांग कर रहे सांसदों की कान पर इन मुद्दों के लिए आज तक जूं क्यों नहीं रेंगी. क्या यह मुद्दे सिर्फ चर्चा के लिए थे.
तो जवाब होगा नहीं, ऐसा नहीं है. फर्क है तो मात्र इतना की यह मुद्दे आम जनता से जुड़े थे और वेतन सांसदों का बढना था. इसलिए किसी भी सांसद ने शरद पवार से यह नहीं पूछा की वो न्यायलय के आदेश के पश्चात् भी क्यों अनाज बांटने से माना कर रहे है. या ममता बेनर्जी का माओवादियों से क्या रिश्ता है. और तो और महंगाई मुद्दे पर राजनीति करते हुए विपक्षी पार्टियों ने भारत बंद तो किया लेकिन सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थो में की गई वृद्धि को वापिस लेने से माना करने के बावजूद क्यों संसद ठप्प नहीं की. जबकि कामनवेल्थ गेम्स के लिए हुए घोटाले में संसद में सिर्फ चर्चा ही की गई. जबकि आज जनता से लेकर नेता तक स्विस बैंक में जमा भारतीयों का काला धन वापिस लाने की बात भूल चुके है. क्या यह सरकार की वादाखिलाफी नहीं है. तो क्यों नहीं इन मुद्दों पर कभी संसद में हंगामा किया जाता. अगर यह संसद जनता से जुड़े मुद्दे संसद में नहीं उठा सकते तो इन्हें कोई हक़ नहीं है की यह वेतन वृद्धि की बात करे.


हिसार की 7 विधानसभा सीटो की मतगणना पर हरपल की नजर


वीरवार सुबह हिसार की सात विधानसभा सीटो के लिए 8 बजे शुरू हुई मतगणना की जानकारी आप तक पहुँचाने के लिए हम हरपल प्रयास करते रहेंगे। हमारा भरसक प्रयास रहेगा की आपसे पल-पल गुफ्तगू करने के लिए हम हरपल की गतिविधियों पर नजर रखे। आपको बता दें की हिसार की सात विधानसभा सीटो में हिसार, नलवा, हांसी, उकलाना, बरवाला, नारनौंद व् आदमपुर शामिल है।


हिसार के कुल 90 डाक मत में से कांग्रेस 44, इनलो 4 , भाजपा 2 , हरियाणा जनहित कांग्रेस 9 , गौतम सरदाना 30 मत प्राप्त हुए।

पहले दौर के 10643 मत में से कांग्रेस 5445 , इनलो 760 , भाजपा 325 , हरियाणा जनहित कांग्रेस 1246 , गौतम सरदाना 2413 मत प्राप्त हुए।

दुसरे दौर के 11052 मतों में से कांग्रेस को 4261 , इनलो 844 , भाजपा 439 , हजंका 1758 , गौतम सरदाना को 3301 वोट मिलने के पश्चात् कांग्रेस की सावित्री जिंदल 4006 वोटो से आगे चल रही है।

तीसरे दौर के 11772 वोटो में से इनलो को 510 , भाजपा को 619 , हजंका को 3054 , गौतम सरदाना को 4131 वोट मिलने के बाद कांग्रेस प्रत्याशी सावित्री जिंदल को 2865 वोट मिले। तीसरे दौर के पश्चात् कांग्रेस प्रत्याशी सावित्री जिंदल 2740 वोटो से आगे चल रही है।

चौथे दौर में कांग्रेस को 3879 , इनलो को 868 , भाजपा को 412 , हजंका को 3551 व् गौत्तम सरदाना को 1850 वोट मिले है। चौथे दौर में 11266 वोटो की गिनती के बाद श्री मति जिंदल 4769 वोटो से आगे है।

पांचवे दौर के 11813 मतों की गिनती के पश्चात् कांग्रेस को 4532 , इनलो 1720 , भाजपा 380 , हजंका 2649 व् गौतम सरदाना को 2016 मत मिले है।

छठा दौर कांग्रेस प्रत्याशी के लिए संजीवनी का काम कर गया। इस दौर में 8732 मतों की गिनती की गई। जिसमे से सावित्री जिंदल को 5686 , इनलो 662 , भाजपा 218 , हजंका 673 व् गौतम सरदाना को 1286 मत मिलने से कांग्रेस प्रत्याशी की जीत जैसे निश्चित सी लगने लगी। यहाँ उनकी जीत का अन्तर 11685 पार कर गया।

सात दौर पूरे होते-होते सावित्री जिंदल की जीत का अन्तर 14340 तक पहुँच गया था। इस दौर में कुल 10429 मतों की गिनती की गई। इनमे से श्रीमती जिंदल को 5419 , इनलो को 414 , भाजपा को 171 , हजंका को 974 व् गौतम सरदाना को 2764 मत मिले है।

आठ दौर पूरे होते ही कांग्रेस कार्यकर्ताओ की खुशी का ठिकाना नही रहा। कही कांग्रेस जिंदाबाद के नारे लग रहे थे तो कहीं सावित्री जिन्दक के। जैसे ही चुनाव अधिकारी ने घोषणा कि की कांग्रेस प्रत्याशी सावित्री जिंदल को 2233 मतों में से 735 वोट मिले है तो किसी को बताने कि जरुरत नही पड़ी कि जिंदल ने 14728 वोटो से जीत दर्ज कर ली है। इस दौर में इनलो को 414 , भाजपा को 28 , हजंका को 523 व् निर्दलीय प्रत्याशी गौतम सरदाना को 347 वोट मिले।
जीत के पश्चात् श्रीमती जिंदल ने इसे जनता के प्यार कि जीत बताया हैसाथ ही उन्होंने कहा कि प्रचार दौरों के दौरान उन्होंने अपने होंठो से जो कहा है उन्हें पूरा करने का वह प्रयास करेंगी


वोट, राजनीती और व्यापार- सभी का अपना अपना स्वार्थ


कहने को तो 13 अक्तूबर को हरियाण में विधानसभा चुनाव है। लेकिन जब सोमवार को रात 8 बजे मेरा फोन खनका तो मेरा सर चकराया सोचा जिस मित्र का फोन है वो भी राजनीती या चुनाव के बारे में जानकारी लेने के लिए ही मेरा दिमाग खायेगा। लेकिन जब उसने चुनाव के दिन दिल्ली चलने की बात कहीं तो मैं भी सोच में पड़ गया। मैंने झट से उसको कहा की भइया कल तो चुनाव है दिल्ली कैसे जा सकते है। तो उसने भी फट से कहा की श्री मान पत्रकार महोदय चुनाव हरियाणा में है न की दिल्ली में। बात मेरी भी समझ में आ गई लेकिन फ़िर मैंने उसको कहा की वोट तो देना ही है तो उसने कहा की अगर अपने 2 वोट नही गिरेंगे तो कोई हार-जीत नही जाएगा। चल कल दिल्ली चलते है कुछ दीपावली की खरीदारी कर आयेंगे। अभी मैंने उसको मना कर के फोन रखा ही था की फ़िर एक मित्र का फोन घनघनाया और उसने जो पूछा वो मुझे यह सोचने पर मजबूर कर गया की आखिर हम जैसे मतदाताओ की यही सोच है तो फ़िर ये नेता किस नाम की राजनीती करते है और क्यो घर घर जाकर चुनाव के दिन वोट डालने की अपील करते है। आप भी सुनिए उस दोस्त ने क्या कहा। उसने कहा की सूर्य कल हरियाणा में चुनाव है इसलिए मैंने लुधियाना से माल लाने का कार्यक्रम बनाया है, गाड़ी लेकर जा रहा हूँ अगर तू भी चले तो सोचता हूँ की एक से दो भले। उसको भी मैंने टालने की सोची तो वो तपाक से बोला की चुनाव की कवरेज़ करने के लिए क्या गले में बिल्ला टांग कर सड़क ही तो नापेगा, चल लुधियाना घुमा कर लाता हूँ सोच लेना की सड़क ही नाप रहा हूँ। अब इस महानुभाव को कौन समझाए की एक तो मतदान के दिन मतदान करना जरुरी उस पर अपना पेशा ऐसा। लेकिन किसी तरह मैंने उसको भी अपनी मज़बूरी समझाई और आखिर में ना कर दी।
लेकिन इन दोनों दोस्तों के फोन ने मुझे जो आप से गुफ्तगू करने का पहलू दिया वो गौर करने लायक है की जिस तरह नेता लोग हमारा वोट हथियाने के लिए हमारा उपयोग करते है क्या उसी तरह हमको भी ऐसे क्षण का उपयोग करना चाहिए की जब हरियाणा बंद है तो दिल्ली या लुधियाना जाकर अपने व्यापार या अपने काम के लिए समय का उपयोग कर ले। अगर ऐसा ही है तो फ़िर क्यों ये नेता राजनीती करते है और क्यों वोट मांगते है लेकिन फ़िर मेरी समझ में आता है की अगर दिल्ली और लुधियाना से माल लाना अगर इनका व्यापार है तो राजनीती कर वोट मांगना इन नेताओ का व्यापार है। आख़िर सभी को अपना स्वार्थ ही तो सिद्द करना है।


भाजपा, नीति और नियत


आज देश में जितनी भी राजनितिक पार्टिया है वो सभी सत्ता हासिल करने के लिए ही बनी है। भले ही उन्हें इसके लिए वाद-विवाद करना पड़े या सत्ता पर काबिज होने के लिए झगडा। मकसद एक ही है की किसी तरह सत्ता का स्वाद चखना है। फ़िर चाहे वो अपनी बात से मुकर जाए या उन्हें याद ही न हो की अभी कुछ दिनों पहले या चंद समय पहले उन्होंने क्या कहा था। लेकिन अगर कोई पत्रकार उनकी मंशा को भांप जाए और उनकी कथनी और करनी को लेकर कोई सवाल दाग दे तो गिरगिट की तरह ऐसे रंग बदल जाते है जैसे वो यह सब कुछ सत्ता हासिल करने के लिए नही बल्कि जनता के लिए ही कर रहे है। अब भाजपा को ही देख लो। कहने को तो यह पार्टी राष्ट्रीय है और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते इस समय विपक्ष में बैठी है। लेकिन इस समय भाजपा के पास जहा नेताओ की भारी कमी खल रही है वही लोकसभा चुनावो के बाद नियत भी साफ़ नजर नही आ रही है। यही कारण है की जहा लोकसभा चुनावो से पहले भाजपा क्षेत्रीय दलों को नकार रही थी वही लोकसभा चुनाव में उसने किस तरह इन दलों का साथ लिया वो सभी ने देखा। भाजपा और कांग्रेस अक्सर कहती आई है की देश में सिर्फ़ राष्ट्रीय पार्टिया ही होनी चाहिए लेकिन जिस तरह सत्ता सुख पाने के लिए ये राजनितिक दल अपनी नीति और नियत दिखाते आए है उससे आम आदमी अक्सर अपने को ठगा सा महसूस करता है। कांग्रेस और भाजपा जहा आज कई प्रदेशो में क्षेत्रीय दलों के साथ मिल कर सरकार चला रही है वो कबीले गौर है और हरियाणा में भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए क्या-क्या समीकरण बिठाने की कोशिश की वो भी सभी को पता है। हरियाणा में अपने को उभारने के लिए भाजपा ने पहले ओमप्रकाश चौटाला नित इनलो से समझौता किया तो लोकसभा चुनावो में मुहं की खाने के बाद इनलो से दामन छुडाने के पश्चात् भजनलाल नित हरियाणा जनहित कांग्रेस का दामन थामने की कोशिशे की लेकिन दाल नही गली। इस पर अगर भाजपा नेता यह कहे की भाजपा चाहती है की देश में सिर्फ़ क्षेत्रीय दल ही राजनीति में रहे तो ऐसा लगता है की भाजपा मजाक कर रही है। अब हरियाणा भाजपा के सहप्रभारी हरजीत सिंह ग्रेवाल को ही देख लो। कहने को तो उनका नाम व् पद बहुत बड़ा है लेकिन आज वो यह नही समझ पाए की मिडिया के आगे वो क्या बोल गए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा की हरियाणा में उनका मुकाबला सीधे कांग्रेस से है क्योंकि अब देश में क्षेत्रीय पार्टियों का कोई वजूद नही रह गया है। साथ ही वो बोल गए की प्रदेश में अब भाजपा को किसी गठबंधन की कोई आवश्यकता नही है। लेकिन जब मैंने इस बात पर उनसे पूछा की भाजपा प्रदेश विधानसभा चुनावो को लेकर किसी क्षेत्रीय दल से गठबंधन को लेकर सबसे ज्यादा उत्साहित थी तो गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए वो बोले की वो इस लिए की कांग्रेस को सत्ता से दूर करना आज की जरुरत है। जबकि भाजपा ने जो प्रत्याशी आज मैदान में उतारे है वो सत्ता सुख के लिए नही अपितु जनता की सेवा के लिए चुनाव मैदान में है। जब उनसे पूछा गया की अगर भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों को इतना ही अछूत मानती है तो कई प्रदेशो में आज भी भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ मिल कर सरकार चला रही है तो उन्होंने कहा की वो इसलिए की भाजपा ने सरकार में रहते हुए महंगाई को रोक कर रखा था लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह महंगाई को बढ़ावा दिया है उससे आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। इसलिए भाजपा चाहती है की किसी भी तरह सरकार बना कर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा जाए।
तो दिखावा किस बात का
अब आप स्वयं ही समझदार है की भाजपा नेता क्या बोलना चाहते है और क्या बोल रहे है। अब यह कौन जाने की भाजपा सत्ता सुख पाना चाहती है की महंगाई को दूर रखने के लिए कांग्रेस को सत्ता से बाहर। लेकिन इनको कौन समझाए की किसको सत्ता में रखना है और किसको नही यह तो मतदान के दिन विचार करके ही जनता मतदान करती है। लेकिन यह राजनीति है यहाँ सब कुछ दिखावे के लिए ही होता है जनता की किसको पड़ी है। क्योंकि सत्ता तो सत्ता ही है।


क्योंकि हम आज को देखते है


जैसा की सभी जानते है की हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले है। इन्ही को देखते हुए इस बार भी अनेक नेताओ का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आना-जाना लाजमी था। अक्सर देखने में आता है की जब ये नेता ऐसा करते है तो जनता की वाह-वाही लूटने के लिए अपनी पुरानी पार्टी पर 100 लांछन लगाते है। जनता भी उनके बहकावे में आकर उनका भरपूर सहयोग देती है। कोई उस समय नही समझ पाता की अगर नेता ऐसा कर रहा है तो इसका मुख्य कारण क्या है। लेकिन जनता वही देखती है जो वो नेता दिखाना चाहता है। लेकिन जो जनता उसके ऐसा करने में सहभागी नही है वो समझती है की अगर नेता दल-बदल कर रहा है तो वो या तो ग़लत कर रहा है या फ़िर उसके दिल में कुछ और चल रहा है। लेकिन समय के साथ-साथ जब दूसरी पार्टी में भी उस नेता को चुनावो के दिनों में टिकट नही मिलती तो वो फ़िर से पहले वाला राग अलापने लगता है। जनता फ़िर कुछ और समझती है लेकिन देखती वही है जो नेता दिखाना चाहता है। ऐसा नही है की मैं सिर्फ़ दल-बदल करने वाले नेताओ के प्रति ही गुफ्तगू करना चाहता हूँ। मैं उन सभी अनछुए पहलुओ पर गौर करना चाहता हूँ जो चुनावो के दिनों में सर उठाये खड़े हो जाते है। लेकिन कुछ पहलुओ को छोड़ ये नेता जनता को उल्लू बना अपना कार्य सिद्ध कर जाते है। ऐसा इसलिए नही की नेता हम से ज्यादा समझदार है लेकिन इसका मुख्य कारण यह है की हर बार की भांति चुनावो के दिनों में हम वो ही देखते है जो राजनितिक आदमी हमको दिखाना चाहता है।
लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ
चार माह पूर्व संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भी शायद ऐसा ही कुछ हुआ। किसी ने यह सपने में ही नही सोचा था की कांग्रेस फ़िर से सत्तासीन होगी। इसका मुख्य कारण था महंगाई और कालाबाजारी। स्वयं कांग्रेस मान रही थी की उसको सीटो का नुक्सान उठाना पड़ेगा। लेकिन जो नतीजे आए वो चौकाने वाले थे। बीती भाजपा सरकार में जो शेयर बाजार 14 से 15 हजारी था वो कांग्रेस सरकार में 21 हजारी तक पहुँच गया था। सोने के जो भावः पॉँच हजार के आसपास थे वो कांग्रेस सरकार में 8 से10 हजार तक पहुँच गए थे। जो रसोई गैस भाजपा सरकार में घर-घर आती थी वो कालाबाजारी के चलते मिलनी मुश्किल हो गई थी। बावजूद इसके लोकसभा चुनावो में जनता ने वही देखा जो कांग्रेस सरकार ने दिखाना चाहा। शेयर बाजार औधे मुंह निचे गिरा तो सोने के आसमान छुते भावः भी कम कर दिए गए। महंगाई आसमान पर होने के बावजूद भी सरकार महंगाई दर शून्य से निचे दिखा रही थी। लेकिन आज कांग्रेस सरकार गठन के बाद एक बार फ़िर से जहा महंगाई अपने चरम पर है वही कालाबाजारी ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। सोने के भावः जहा सोलह हजार तक पहुँच गए है वही शेयर बाजार प्रतिदिन छलांग मार रहा है।
अब हरियाणा की बारी
ऐसा नही है की ऐसा सिर्फ़ केन्द्र सरकार ही करती है। कोई भी प्रदेश सरकार हो वो पुनः सत्तासीन होने के लिए ऐसे कई कदम उठाती है जिससे जनता को बेवकूफ बना कर कुर्सी हासिल की जा सके। अगर हम हरियाणा सरकार की बात करे तो सत्ता सँभालते ही प्रदेश में जिस कदर लाठी चार्ज किए गए उससे जनता को लगा की मुख्यमंत्री हुडा को राजनीति करनी नही आती। अभी कुछ समय ही गुजरा था की प्रदेश में फर्जी एनकाउंटर होने लगे। हर तरफ़ सरकार की किरकिरी के साथ-साथ सवाल उठने लगे की जहा प्रदेश का शासन किसी काम का नही है वही प्रशासन भी हुडा के बताये अनुसार काम नही कर रहा है। मंत्री से लेकर संतरी तक अपनी-अपनी राजनीति कर रहा है। हुडा है की सिर्फ़ इन्हे ही खुश करने में लगा हुआ है। लेकिन एक के बाद एक लोकप्रिय घोषनाये कर जहा जनता की वाह-वाही लूटने में मुख्यमंत्री कामयाब रहे वही जनता भी बहुत जल्दी उन सभी घटनाओं को भूल गई जिनके लिए वो कल तक मुख्यमंत्री को कोसा करती थी। अभी हाल ही की घटनाओं पर गौर करे तो पाता चलता है की प्रदेश में किसी कदर अपराधिक ग्राफ बड़ा है। पढ़े : हिसार में बेकाबू होते बदमाशो की बादशाहत जारी
हिसार
भी नही है अछुता
आज को सामने रख कर जनता का दिल चुराने से हिसार भी अछुता नही है। पॉँच साल तक प्रदेश सरकार में मंत्री रही सावित्री जिंदल के बारे में भी जनता कुछ न कुछ बोलती रही लेकिन यह समय का ही खेल था की आज कोई भी कुछ भी बोलने से हिचक रहा है। विकास के नाम पर सिर्फ़ दो पार्क बनाने को लेकर जहा विपक्षी पार्टिया कह रही थी की जिंदल परिवार ने अरबो रुपए की सरकारी जमीन हड़प ली है वही सड़के और बिजली की समस्या से भी गर्मी में जनता को दो-चार होना पड़ा था। चार साल से जिंदल फैक्टरी के समीप बनने वाले पुल के निर्माण को लेकर भी जिंदल परिवार की काफी किरकिरी हुई है। जहा नगर का पुराना पुल अभी तक कंडम पड़ा है वही हिसार से सावित्री जिंदल की जीत सिनिश्चित करने के लिए उस पर लाखो रुपए की बर्बादी कर रबड़ की परत बिछाई जा रही है। क्या यह माना जाए की यह सिर्फ़ इसलिए हो रहा है की जनता को आज दिखाना है की हिसार में विकास हो रहा है।
वाह रे राज और वाह री राजनीति
इतना तो स्पष्ट है की यह जो कुछ हो रहा है वो सब राज पाने के लिए राजनीति के अंतर्गत हो रहा है लेकिन मेरी यह गुफ्तगू इसलिए मायने रखती है की आखिर समझ आने के बावजूद जनता कुछ भी समझने को तैयार क्यो नही है। तो क्या मैं यह मान लू की राजनीति हमको आज दिखाती रहेगी और हम आज को देख कर बेवकूफ बनते रहेंगे। या फ़िर लोकसभा चुनावो में मिली जीत के पश्चात् भी कांग्रेस को उपचुनावो में भाजपा के हाथो मुहं की खानी पड़ी उससे यह माना जाए की जनता ने आज देखना छोड़ दिया है। मेरी इस गुफ्तगू के लिए आपकी गुफ्तगू भी जरुरी हैकृपया इस गुफ्तगू मैं मेरा साथ दें


सिंह इस किंग नारे के साथ राष्ट्रपति का काम हुआ आसन


भले ही देश में कांग्रेस का एक छत्र राज कायम हो गया है और अब कांग्रेस की सरकार बनना तय है लेकिनइसके साथ ही देश की महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का काम भी आसान हो गया हैकल तक जोअनुमान लगाया जा रहा था की देश में खिचडी की सरकार बन सकती है और देश की लगभग सभी पार्टियाजोड़-तोड़ में जुटी हुई थी वही कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलना सभी अनुमानों को फेल कर गयाकांग्रेस बहुमतके करीब पहुँच गई हो लेकिन इस जीत के पीछे सिंह इस किंग का फेक्टर काम करना शुरू कर गया हैआजजैसे जैसे कांग्रेस प्रत्याशियों की जीत की सुचना आती गई वैसे वैसे कांग्रेस समर्थक सात रेसकोर्स पर मनमोहनआवास पर उमड़ने लगेएक समय ऐसा आया जब ये समर्थक सिंह इस किंग के नारे लगाते नजर आए
कहते है भारतीय राजनीति में सबकुछ सम्भव हैशायद यही कारण रहा की कल तक जहा यह सोचा जा रहाथा की अगर देश में खिचडी की सरकार बनी तो महामहिम सरकार बनाने के लिए किसको आमंत्रित करेंगीकांग्रेस को छोड़ किसी और गठबंधन को आमंत्रित करना उनके लिए दुविधा का काम होताक्योंकि एक लंबेअरसे के बाद देश का राष्ट्रपति ऐसा है जिस पर किसी पार्टी की मुहर लगी हैलेकिन अब उनके लिए किसी एकदल को सरकार बनाने के लिए बुलाना आसान हो गया हैउधर भाजपा सहित लेफ्ट ने भी स्वीकार कर लियाहै की उनके लिए सरकार बनाना गुजरे ज़माने की बात हो चुकी है


आखिर किसको दे वोट और क्यो


शायद यह मेरा भारत के पूर्व राष्ट्रपति पी जे अब्दुल कलाम के प्रति अपार प्रेम ही था की आज जब मेरी नज़र सड़क किनारे लगे एक होर्डिंग पर पड़ी तो सहसा रुक गया और होर्डिंग पर लिखे कुछ शब्द पढने लगा लेकिन मैं पढ़ते पढ़ते गंभीर हो गया । बोर्ड पर लिखा था की वोट जरुर डालिए पर दिल से नही दिमाग से । लेकिन मैं विनम्र हो कर श्री कलाम से यह पूछना चाहता हूँ की भारत में आप ही एक ऐसा राजनितिक दल या नेता बता दे जिसको मैं अपना कीमती वोट दे सकूँ । मैं उनके कहे अनुसार वोट तो जरुर डालूँगा लेकिन अगर उनकी बात मान भी लूँ की दिमाग से डालो तो सबसे पहले तो मैं यह देंखू की मेरे वोट डालने से देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा । वह जो सोनिया गाँधी के हाथ की कठपुतली है या वह जिसको चुनाव के समीप आते ही भगवन राम की याद सताने लगी या फिर वो जो कुर्सी प्रेम में इतने अंधे हो गए है की जनता की सुध भूल कर आपस में लड़ रहे है । एक बार तो मैं यह बात भी मानू की देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस अध्यक्ष के हाथो की कठपुतली है लेकिन मैं बड़ों की कही उस बात से भी किनारा नही कर सकता की जहा से धुआ उठता है आग तो जरुर लगी होती है । जबकि कांग्रेस के साथियों सहित अन्य राजनितिक दलों का हाल तो हाल ही में सब ने देखा ।
अब तो दिल ही काम आएगा
अब आप ही बताये जब दिमाग काम करना छोड़ दे तो क्या किया जाए । दिल की बात मान ली जाए या नेताओ से यह पूछा जाए की आखिर अब आप ही बता दे की हम आपको वोट क्यो दे । आज जो नेता गली गली, घर घर वोट मांगता दिखाई दे रहा है वो जीतने के बाद 5 साल कहा रहता है । कहने का अर्थ यह है की सभी नेता एक ही थाली के चट्टे बट्टे दिखाई देते है । किसी ने विकास के नाम पर कुछ नही किया तो कोई विकास कर नही सकता । तो कोई विकास करना ही नही चाहता । अगर वो विकास ही करवा देंगे तो आने चुनाव में मुद्दा क्या होगा ।
किल बनोगे या हथोडा
अब तो आपको ही विचार करना होगा की कलाम के कहे अनुसार आप दिल की सुनोगे या दिमाग से काम लोगे क्योकि दिल से काम लिया तो हो सकता है की आप को किल के रूप में इस्तेमाल किया जाए। क्योकि फिर तो आप नेताओ की बातो में कर जहा वो कहेंगे बटन दबा देंगे । लेकिन अगर आपने दिमाग से काम किया तो आप द्वारा दबाया गया बटन हथोडे का काम करेगा ।


भाषण और उसकी मर्यादा


वाह रे राजनीति तेरे भी कैसे - कैसे रंग देखेगी जनतातू ही है जो कभी किसी बिछडे को मिला देती है तो कभी लंगोटिया यारो को भी जुदा कर देती है तेरे रंग का ही कमाल है की कभी-कभी तो रिश्तेदार भी तेरे लपेटे में कर अपनी रिश्तेदारी भुला देते हैएक समय था जब राजनेता समाजसेवा के लिए राजनीती में आते थे और जनता से कुछ करने का वादा करते थे और उसे पूरा भी करते थेवो नेता कुछ ऐसा कर जाते थे की आज भी जनता उनको याद कर-कर आज के नेताओ को कोसती हैउस समय नेता अपने भाषणों में जो बोलते थे जनता उनके उन बोलो को अपने जहन में उतार लेती थी और वो बोल ही होते थे की आज भी उन नेताओ की समय-समय पर याद ताज़ा करवाते रहते हैकहने का अर्थ यह है की भाषणों की भी एक मर्यादा होती थीलेकिन आज तो यह याद रहता है की कब किस नेता ने किसको बुरा भला कहा, कितनी बार कहाराजनीती की सच्चाई तो आज यह है की आज नेता अपने भाषणों में जनता से वादे कम और अपने विरोधियो पर कटाक्ष ज्यादा करते हैयही कारण है की आज जनता भी यही सब सुनने को उत्सुक रहती है
अब आप ही देख लो की कभी लाल कृष्ण आडवाणी काले धन के लिए बोलते है तो कभी वरुण गाँधी मुसलमानों केखिलाफहद तो उस समय होती है जब राबड़ी देवी नीतिश कुमार के खिलाफ बोलती है और मामला इतना बढ जाता है की एक जनसभा में लालू यादव को नीतिश कुमार अपने छोटे भाई के रूप में नज़र आने लगते हैइतना ही नही राजनीती फिर मोड़ लेती है और राबड़ी देवी कहती है की भले ही लालू यादव निभाते रहे अपनी रिश्तेदारी मुझे कोई फर्क नही पड़ताकहानी फिओर मोड़ लेती है और अब लालू जी भी राजनीती के फेर में घिरते नज़र रहे हैमामला टूल पकड़ता नज़र रहा हैभाजपा ने तो यहाँ तक कह दिया है की अब लालू पर भी रासुका लगनाचाहिएज्ञात रहे की लालू ने वरुण गाँधी के खिलाफ एक जनसभा में कहा था की अगर में देश का गृहमंत्री होता तोवरुण को बुलडोजर के निचे कुचल देताउनके इस बयां से जहा वरुण गाँधी मामला पुनः हरा भरा हो गया है वहीराज्निओती भी गरमा गई हैभले ही किशन गंज ठाणे में लालू के खिलाफ मामला दर्ज हो गया हो लेकिन यह तोजगजाहिर है की आज तक भारत में किसी मंत्री - सन्तरी का कुछ नही बिगडा तो लालू जी का क्या बिगड़ सकता हैलेकिन यहाँ पहलु यह है की क्या अब राजनेता अपने भाषणों की मर्यादा भूल गए है या ऐसे भाषण समय की जरुरतबन गए है


और खिल गए मायूस चेहरे


लोकसभा चुनाव की घोषणा के पश्चात् जहा नेताओ और कार्यकर्ताओ के चेहरों पर खुशी छलक रही थी वही इनकी भीड़ से दूर कुछ लोग ऐसे भी थे जो चुनाव घोषित होने से फूले नही समां रहे थे । यह वो लोग थे जो अक्सर चुनावो के दिनों में अपने नेताओ का झंडा बुलंद करते है । वैसे तो नेताओ की भी इन दिनों में इनकी जरुरत होती है लेकिन अगर कोई चुनाव का इंतजार करता है तो वो यही लोग होते है । आगामी लोकसभा चुनावो की लेकर तो इनकी खुशी का ठिकाना ही नही था । इसका मुख्य कारण था की घोषणा होने के पश्चात् चुनावो का 1 . 5 माह बाद होना । इन्हे लगा जैसे अब इनकी रोजी-रोटी का जुगाड़ तो हो गया । चुनावी कार्यालयों की हाजरी मारेंगे और नेताओ की चमचागिरी, हो जाएगा 1 . 5 महीने के खर्चा-पानी का जुगाड़ । लेकिन यह सियासत ही थी या इनके सपनो पर पानी फेरने की कवायत की पहले आप पहले आप करते - करते राजनितिक पार्टियों ने शुरू का आधा महिना तो प्रत्याशी घोषित करने में ही निकाल दिया । चुनाव कार्यालय खुलना और इनको नेताओ का दीदार होना तो दूर की बात थी । ऐसे में ये भी क्या करते । जैसे तैसे कर के आधा महिना तो इन्तजार में निकल ही दिया । अब फिलहाल हजंका को छोड़ हिसार में सियासी बिसाते बिछ चुकी है । बसपा से राम दयाल गोयल जहा सब से पहले चुनाव मैदान में डट चुके थे वही हरियाणा में पार्टी का जनाधार नही होने के कारण व् नए नेता होने से भी ऐसे लोग उनसे दुरी बनाये रहे जो अपने पेट के लिए किसी भी पार्टी का झंडा उठाते है । हाल ही में इनलो-भाजपा से संपत सिंह और 2 दिन पूर्व ही कांग्रेस से जयप्रकाश को टिकट मिलने से मायूस चेहरों पर मुस्कान दिखने लगी है । उल्लेखनीय है की इन लोगो को किसी भी पार्टी, नेता और चुनावो से कोई लेना देना नही होता । यह सिर्फ़ रैलियों और सभाओ में होने वाली भीड़ में शामिल होते है । ये सुबह किसी की रैली में तो शाम को किसी और के चुनावी कार्यालयों में हाजरी मारते दिखाई देते है । इनके लिए सिर्फ़ प्रत्याशी बदलता है कर्म नही । इनकी विस्तार से जानकारी के लिए पढ़े-
चुनाव है कुछ न कुछ तो मिलेगा


भागते चोर की लंगोटी ही सही


चलो जी हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल नित हरियाणा जनहित कांग्रेस के सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई कोआखिरकार कुछ तो राहत मिली यहाँ मैंने राहत शब्द कई मायनो से लिखा है एक तो इसलिए की कुलदीपबिश्नोई की सोच अनुसार उम्रदराज नेता जो भजनलाल के समीप रहते थे वह एक-एक कर हंजका से दूर होते चलेगए और दूसरी राहत इसलिए की हिसार के 8 पार्षदों के समर्थन से पार्टी सहित कुलदीप में नया रक्त संचार शुरू होगया है यहाँ मुझे वह कहावत याद आती है की भागते चोर की लंगोटी ही सही यही कारण है की जहा बड़े नेताओके पार्टी छोड़ने से हंजका की साख पर बुरा असर पड़ रहा था वही अब युवा ही सही लेकिन 8 पार्षदों के हंजका मेंशामिल होने से इतना तो अवश्य है की हिसार में कुलदीप बिश्नोई अपने प्रत्याशी की जीत निश्चित मानने लगे है इन पार्षदों के शामिल होने से जोश से सराबोर कुलदीप ने कहा की कई और पार्षद जल्द ही पार्टी में शामिल होंगेवही पार्षदों का कहना था की अब उन्हें भी भजनलाल का कर्ज चुकाने का मौका मिल जाएगा हजंका में शामिलहोने वाले पार्षदों में दयानंद शर्मा, विनोद कुमार, पंकज दीवान, मनोहर लाल नागरू, शादी लाल यादव, इन्द्रोशगुज्जर, उषा अठवाल व् दिनेश शर्मा मुख्य है


चुनाव है कुछ न कुछ तो मिलेगा


लोक सभा चुनाव सिर पर हैराजनीति चरम हैऔर शीर्ष पर वो लोग बैठे है जो ऐसे समय में नेताओ की राजनीति चमकाने का काम करते हैबावजूद इसके कुछ ऐसे लोग भी है जो पुरे 5 साल कुछ काम कर अपना व् अपने परिवार का गुजर बसर करते हैलेकिन सदा ऐसे मौके की तैलाश में रहते है की कब चुनाव आयेंगे और कब उनके दिन फिरेंगेऐसा नही है की उन्हें कोई गैरकानूनी काम करना होता है लेकिन देश का एक ऐसा तबका है जिनकी रोजी-रोटी चुनावो पर टिकी होती हैऔर यही लोग चुनावो के दिनों में चाँदी कुटते हैफिर चाहे कोई काम मिल जाए या खाली बैठने का पैसा मिल जाएबात तो 2 वक़्त पेट भरने की हैइन लोगो में कुछ लोग ऐसे है जो राजनितिक पार्टियों की रैलियों, जनसभाओ और यात्राओ के दौरान पार्टी और नेता के झंडे, बैनर और पोस्टर इत्यादि लगा कर अपने परिवार का पेट पालते है और कुछ ऐसे है जिन्हें चुनाव आते ही यही सामग्री बनाने का भरपूर काम मिल जाता हैबस फिर क्या नेता का हर चमचा इनके चक्कर काटता दिखाई देता है
इन लोगो की भीड़ में समाज का एक तबका ऐसा भी होता है जिन्हें कुछ लोग मोटा पैसा कमाने के चक्कर में उपयोग करता हैये वो लोग होते है जिन्हें कुछ ठेकेदार सिर्फ़ इसलिए उपयोग करते है की आज किसी की रैली में जाना है या आज कही भीड़ इकट्ठी करनी हैजहा यह ठेकेदार नेता से भीड़ इकट्ठी करने के नाम पर मोटा पैसा वसूल करते है वही इन लोगो को प्रतिदिन के हिसाब से 50 से 100 रुपए मिल जाते हैइन लोगो में वो दिहाडीदार भी होते है जो काम कर अपना घर तो पलते है लेकिन कमाई करने का कोई मौका नही छोड़ना चाहतेइन्हे किसी पार्टी विशेष से कोई लेना देना नही होता बस यह संपर्क में होते है तो अपने ठेकेदार केजिनके कहने पर यह अपना काम छोड़ भीड़ जुटाने के लिए चल पड़ते है
इन सबकी भीड़ से अलग ऐसे लोग भी छुपे होते है जिन्हें काम करने या भीड़ जुटाने के लिए नही बस चुनाव के दिन खाली बैठने का पैसा मिलता हैनेताओ और उनके चमचो की तरफ़ से इन लोगो को खास हिदायत होती है की चुनाव के दिन ये घर से नही निकलेंगेइसी के नाम का इन लोगो को लोकसभा चुनावो में परिवार के प्रति सदस्यके हिसाब से 200 से 500 रुपए मिल जाते हैशायद आप कुछ कुछ समझने लगेजी हा हम उन लोगो की बात कर रहे है जिन्हें वोट डालने के नाम का भी पैसा मिलता हैइनकी कीमत वैसे तो परिवार के सदस्य के हिसाबसे मुक़र्रर की जाती हैजिस परिवार में ज्यादा सदस्य होंगे उसका दाम भी ज्यादा होगाचुनाव नजदीक आते आते नेता के चमचे इसी काम में जुट जाते है की उनके एरिया का कौन सा वोट कितने में बिकने वाला हैराजनीति है भाई सब का हिसाब-किताब रखना पड़ता है


चुनावो के समय ही क्यो सुनाई देते है भक्ति के गीत


चुनाव की घंटी बजने के कारण चुनावी हलचल के साथ-साथ आपको नेताओ के लंबे-लंबे भाषणों का सामनाभीकरना पड़ेगा इन सबके बीच जहा आपका ध्यान समाचार पत्रों की और खीचा जाएगा वही समाचार चैंनलभीअपनी ओर आकर्षित करने के लिए उन्ही समाचारों को सुर्खिया बना कर आपके बीच करेंगे अगर आप किसीसेबात करोगे तो वो भी राजनीति पर कहने का अर्थ यह है की कुल मिला कर सारा दिन वही कीच-कीच केबीचगुजर जाएगा लेकिन शाम होते होते अगर एक चीज आपके दिल को शुकून पहुचायेगी तो वह यह कीआजआपके कानो में देशभक्ति से सराबोर किसी गाने के बोल अवश्य पड़े थे जी हा, वही देशभक्ति के गीत जिनकेकुछबोल मात्र कानो में पड़ने से ही शरीर के रोम रोम में हलचल पैदा हो जाती है इन गीतों का देश की आजादी मेंजहाअहम् रोल था वही आज भी देश की रक्षा करने वालो के लिए ये गीत मुख्य भूमिका अदा करते है
लेकिन यहाँ सोचने वाली बात यह है की देश सेवा करने के नाम पर राजनीति करने वाले इन नेताओ को पुरे 5 सालयह गीत याद नही आते लेकिन चुनाव के दिनों में ये लोग अपने लिए ऐसे ऐसे गीतों का चयन करते है की इनगीतोंको सुन बेवकूफ जनता उन्हें जयादा से जयादा वोट दे यही देश भक्ति के गीत इन नेताओ की चुनावी रिक्शाकोआगे बढाते है तो चुनाव कार्यालयों में भी इन्ही गीतों की गूंज सुनाई देती है लेकिन अब यह याद रखना कीजिनगीतों को सुन आपके रोम रोम में देश भक्ति हिचकोले खाने लगती उन्हें यह नेता चुनावो के बाद फिर से भुलादेंगे


दिल है की दिल्ली हो गया


यह बात बताने से कोई फायेदा नही की चुनावी दंगल का बिगुल बज चुका है । इस दंगल में एक दुसरे को मात देने के लिए कोई आमने सामने है तो कोई कुर्सी के लिए आपस में हाथ मिला रहे हैकोई ऐसे है की किसी का हाथ छोड़ किसी और का दामन पकड़ रहे हैकुल मिला कर कुर्सी पाने के लिए सब जनता को बेवकूफ बना रहे हैजनता भी बेचारी क्या करेआज किसी को कोस रही है तो कल उसी की बातो में आ कर उसी को वोट दे देती हैये राजनेता भी जनता की इसी कथनी और करनी का फायेदा उठाते हैक्यो उठाये फायेदा उनका तो धंधा ही यही हैफिर चाहे अपने स्वार्थ के लिए किसी से हाथ मिलाये और किसी का छोड़ दे जानता की किसको पड़ी है । जबकि एक समय होता था जब गठबंधन जनता के हित के लिए किया जाता थालेकिन आज सब कुर्सी के लिए होने लगा है । यही करण है की आज जनता के हित से जुड़े मुद्दे गौण हो रहे है फिर चाहे नवीन पटनायक हो या फिर हरियाणा में इनलो-भाजपाफर्क इतना है की एक ने राज के लिए साथ छोड़ दिया तो एक ने दिल्ली के लिए दिल मिला लिएराजनीति में यह सब देख अब तो ऐसा लगने लगा है की राजनेताओ का दिल अब दिल नही दिल्ली बन गया हैइसी का परिणाम था की मायावती ने नेताओ को भोज तक दे डाला तो कुलदीप बिश्नोई सीपीएम कार्यालय तक जा आए
इन सब बातो से मुझे जो पहलु मिला वो यह की क्या इन्साफ की तरह हमारी आँखों पर भी पट्टी बंधी हैक्या नेता कुर्सी के लिए हमारी खून पसीने की कमाई ऐसे ही उडाते रहेंगेअब हमको भी अपने दिल को संभालना होगा अब देश में सत्ता परिवर्तन से सुधार नही होगा बल्कि हमको ही जागरूक होना भी पड़ेगा और करना भी पड़ेगा


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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