जब भाजपा का उपवास..., उपहास सा लगने लगा


अधिकतर पदाधिकारी रहे दूर, आए वो कुछ देर में चलते बने, कुछ पहुंचे मात्र औपचारिकता निभाने


हिसार। कांग्रेस पर संसद न चलने देने का आरोप लगाते हुए देशभर में भाजपा के आह्वान पर किये गए उपवास का भाजपाइयों ने ही मजाक बना डाला। उपवास कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे वहीं अधिकतर नेता मौके
पर आकर औपचारिकता निभाकर जाते रहे। यही नहीं, जिले में विभिन्न विभागों, बोर्डों व निगमों के सात चेयरमैनों में से केवल एक चेयरमैन ही उपवास में नजर आए वहीं अन्य बड़े नेता भी कन्नी काटते नजर आए।
भाजपा के राष्ट्रीय आह्वान पर उपवास कार्यक्रम रखा गया था। हिसार में अग्रसेन चौक के उसी पार्क को भाजपा ने उपवास स्थल चुना, जिसमें कांग्रेसियों ने उपवास किया था। भाजपाइयों का उपवास कार्यक्रम भी कांग्रेसियों से कम नहीं रहा। जिस तरह कांग्रेसियों का उपवास कार्यक्रम मजाक बनकर रह गया वहीं भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। भाजपा के अधिकतर पदाधिकारी ही इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, एक प्रदेशस्तरीय नेता लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उक्त नेता के बारे में प्रसिद्ध है कि वह हर कार्यक्रम में देरी से पहुंचकर केवल बैठने के लिए सीट हथियाने के प्रयास में रहता है। बताया जाता है कि उक्त नेताजी को उपवास कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं थी और उन्हें अपने मीडिया प्रभारी के माध्यम से उपवास कार्यक्रम की जानकारी मिली थी। हुआ यूं कि उक्त नेताजी के मीडिया प्रभारी किसी तरह पत्रकारों को मिल गये और जब पत्रकारों ने उससे पूछा की नेताजी उपवास में हैं क्या, तो मीडिया प्रभारी का कहना था कि किस बात का उपवास, आज पार्टी का कोई कार्यक्रम है क्या? इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से पूरी जानकारी लेकर अपने आका को फोन किया और उपवास कार्यक्रम में जाने की सलाह दी, जिस पर उक्त नेताजी लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी हाजिरी लगवाई। 
पार्टी के इस उपवास कार्यक्रम से कुछेक को छोड़कर अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे। पार्टी आए दिन नई नियुक्तियों की घोषणा करती है लेकिन नई नियुक्तियों वाले तो दूर, पुराने पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी पार्टी जुटा नहीं पाई और हालत यह हो गई कि निर्धारित पार्क भरना तो दूर, चौथाई हिस्से में बैठकर सत्तारूढ़ भाजपाइयों को कांग्रेस पर हमले करने पड़े।


गुमशुदा की तलाश


व्यापारी एकता जिंदाबाद, हरियाणा सरकार मुर्दाबाद, जिला प्रशासन हाय-हाय. हिसार में होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना के समय सुनाई देने वाले यह नारे सुनना तो दूर आज इन नारों को लगाने वाले सबके प्रिय व्यापारी नेता जी का ही किसी को कोई अता-पता नहीं है. हिसार में एक के बाद एक होने वाली अपराधिक घटनाओं के पश्चात भी बजरंग दास गर्ग की अनुपस्थिति से अब उनकी तलाश ने जोर पकड़ लिया है. व्यापारी उनकी तलाश में ऐसे जुटे है जैसे किसी गुमशुदा की तलाश की जा रही हो. बावजूद इसके व्यापारियों के हाथ निराशा की लग रही है.
हरियाणा की कांग्रेसी हुड्डा सरकार से पूर्व हरियाणा प्रदेश व्यापर मंडल के अध्यक्ष पूर्व की सरकारों में एक व्यापारी की छोटी सी दुःख-तकलीफ में धरना-प्रदर्शन, नारेबाजी व् हिसार बंद से भी गुरेज नहीं करते थे. आजकल वही व्यापारी नेता नगर के व्यापारियों के लिए ईद का चाँद बने हुए है. ऐसा नहीं है की हिसार से अपराध और अपराधी दोनों ख़त्म हो गए है, या फिर हिसार के व्यापारियों पर दुःख-तकलीफ नहीं आ रही. बस नजर नहीं आ रहे तो वो है सिर्फ नेता. भले ही वो नेता विधायक हो सांसद हो या फिर व्यापारी. फर्क मात्र इतना है की हिसार के विधायक हिसार में रहते नहीं और व्यापारी नेता आजकल सरकारी हो गए है. हिसार में आज ऐसा कोई दिन नहीं जाता होगा जब अपराधी अपनी मंशा पर खरे नहीं उतारते हो. फिर भले ही वो चैन स्नेचिंग हो या मारपीट. जबकि एक व्यापारी की आज हत्या प्रयास से लेकर हत्या तक हो रही है.
बीते दिनों एक ही दिन में छह स्थानों पर फायरिंग, एक लस्सी विक्रेता पर जानलेवा हमला, एक जूस विक्रेता की हत्या, एक अन्य लस्सी विक्रेता की हत्या, शहर के गुजरी महल में एक युवक की लाश का मिलना, बस स्टैंड पर सरेआम चाक़ू मार कर एक युवक की हत्या से नगरवासी सहमे हुए है. जनता को फिर वही पुराने दिन याद आने लगे है जब छोटी-छोटी बातो पर बजरंग दास गर्ग जनता की आवाज बुलंद करने बाजार में आ जाते थे. आज उनकी गैरमौजूदगी से गुफ्तगू शुरू हो चुकी है की अब तो इस व्यापारी नेता की तलाश ही शुरू करनी पड़ेगी.
आलम यह है की आज बजरंग दास गर्ग व्यापारी हित में नहीं अपितु सरकारी हित में जनता के समक्ष खड़े दिखाई देते है. आज उनको सरकार के सभी फैसले सही दिखाई देते है तो हरियाणा प्रदेश में बढ़ने वाला अपराधिक ग्राफ विपक्ष का किया धरा लगता है. आज अगर वो दिखाई देते है तो सिर्फ मुख्यमंत्री के साथ और बोलते है तो सिर्फ सरकार के पक्ष में. ऐसे में व्यापारी और जनता की सुनने वाला आज कोई नजर ही नहीं आता. रही बात घटना के पश्चात की तो जनता और व्यापारी आज अपना गुस्सा जनता पर ही निकालने को मजबूर है. बीते दिनों विक्की लस्सी वाले की हत्या के पश्चात हिसार में हुई तोड़फोड़ और लूटपाट इसी की परिणिति है.


युवराज को शर्म आ रही है


अगर आपको भारतीय होने पर शर्म नहीं आ रही तो आप भी अपनी आँखे बंद कर लो क्योंकि युवराज को शर्म आ रही है. शर्म इसलिए नहीं की घोटालेंबाज नेता व् अधिकारी कांग्रेस के राज में देश की जनता का अरबों-खरबों रुपया हजम कर गए और डकार भी नहीं ली बल्कि मात्र इसलिए की एक गैर कांग्रेसी सरकार में किसानो पर लाठी चार्ज किया गया. यह दुःख का विषय है की इस घटना में दो किसानो की मौत हो गई लेकिन यहाँ गुफ्तगू का विषय इतना सा है की भले ही दिल्ली, पश्चिम बंगाल, हरियाणा या फिर महाराष्ट्र में आरक्षण, भूमि अधिग्रहण, सीलिंग व् कानून व्यवस्था के नाम पर कुछ भी होता रहे युवराज को कुछ भी फर्क नहीं पड़ता. अगर उनका यह ब्यान राजनीति से प्रेरित है तो यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है.
 मैंने अपनी पिछली गुफ्तगू मुद्दा तो बस एक बहाना है में भी लिखा था की मुद्दे की बात करने वाले राजनेता सिर्फ मुद्दे को भुनाने के लिए ईद के चाँद की तरह ही नजर आते है. जबकि आज तक किसी ने भी किसी भी मुद्दे के लिए कोई ठोस प्रयास किया ही नहीं है. इसीलिए आज देश की समस्याएं जस की तस खड़ी है.क्योंकि कोई नेता चाहता ही नहीं की समस्यायों का समाधान हो. क्योंकि अगर समस्याएं ही ख़त्म हो गई तो वो राजनीति कैसे करेंगे. अब कहते है की नेता कपडे कम बदलते है और ब्यान ज्यादा. इसीलिए हर जगह इनके ब्यान अलग-अलग होते है, भले ही मामला एक जैसा ही क्यों ना हो. इनको तो सिर्फ राजनीति करनी है.
अब देखो ना उत्तरप्रदेश में भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानो पर लाठियां बरसाई गई. मामले ने इतना तूल पकड़ा की राहुल गाँधी सुबह-सुबह ही एक कार्यकर्ता की बाइक लेकर पहुँच गए उत्तरप्रदेश के उस गाँव में, जिस गाँव के किसान की पुलिस लाठीचार्ज में मौत हुई थी. अब राहुल बाबा मौके पर स्वयं गए है तो ब्यान देना भी जरुरी था. आपाधापी में कह बैठे की जिस तरीके से लाठीचार्ज में किसानो की मौत हुई है उसे देख उन्हें भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही है. क्या वाकई उन्हें भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही है.
अगर ऐसा है तो मैं यहाँ बात हरियाणा की ही करूँ तो पिछले काफी सालो से भूमि अधिग्रहण को लेकर किसान आन्दोलन कर रहे है. तो आज तक राहुल गांधी को संसद में भूमि अधिग्रहण बिल लाने की जरुरत महसूस क्यों नहीं हुई. जब दिल्ली में मेट्रो के लिए आम जनता की जमीन ली जा रही थी और जनता सड़को पर थी उस समय उन्हें इस बिल की याद क्यों नहीं आई. क्यों उस समय उन्हें शर्म महसूस नहीं हुई जब दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने वाले एक छोटे से व्यापारी की दूकान महज इसलिए बंद करवा दी गई क्योंकि वह सीलिंग के तहत आ रही थी. शायद वो इसलिए चुप रहे क्योंकि दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस की सरकारे थी.
हरियाणा के मिर्चपुर में एक बिरादरी के लोगो ने दूसरी बिरादरी के एक परिवार के मुखिया को जहाँ मार दिया वहीँ उसके घर को आग लगा दी, जिसमे जल कर उसकी एक अपाहिज बेटी मर गई. इस घटना के पश्चात भी आन्दोलन ने इतना उग्र रूप धारण कर लिया था की यहाँ भी राहुल गाँधी को गुपचुप तरीके से आना पड़ा. लेकिन यहाँ आकर उन्हें शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भारतीय होने पर शर्म महसूस नहीं हुई. उनके इस ब्यान में किसानो के प्रति कितना दर्द छुपा है यह तो आने वाला वक्त ही बतायेंगा लेकिन इतना जरुर है की फिलहाल राहुल गाँधी को उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार होने व् अगले वर्ष विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अवश्य भारतीय होने पर शर्म महसूस हो रही है.


वो बिजली-पानी का खेल


अक्सर देखने में आता है की बिजली और पानी दोनो ऐसी चीजे है जो राजनेताओ सहित राजनीति को भी अपने इर्द-गिर्द चक्कर काटने पर मजबूर रखती है. कहने का अर्थ यह है की आज देश का राजनेता बिजली और पानी की राजनीति में ही उलझ कर रह गया है या यह कहे की वो जनता को उलझाये रखता है. यही कारण है की आज देश का कोई भी प्रदेश हो बिजली और पानी जैसे मुद्दे सिर उठाये खड़े है. ऐसा नहीं है की इन मुद्दों को ख़त्म नहीं किया जा सकता लेकिन मुश्किल तो यह है की इन दोनों ही मुद्दों को राजनेता ख़त्म ही नहीं करना चाहते. कारण वही की करनी है तो सिर्फ राजनीति. फिर अगर इन्ही मुद्दों को सुलझा लिया गया तो उनके पास यह बताने के लिए कुछ मिलेगा ही नहीं की उनकी सरकार ने क्या किया और क्या करना अभी बाकी है. यही कारण है की लगभग दो दशक से सतलुज-यमुना लिंक नहर के पानी की हरियाणा का किसान अभी तक मुंह बाए बाट जोह रहा है. इतना जरुर है की किसान को पानी तो नहीं मिला लेकिन एसवाईएल को लेकर पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारे समय-समय पर अपनी राजनीति चमकाती रही है. मजेदार बात तो यह है की जब पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की सरकार थी तो हरियाणा में औमप्रकाश चौटाला की. उल्लेखनीय है की दोनों ही नेता अपने को पगड़ी बदल भाई कहते है. लेकिन ना तो बादल ने पानी देने की हां भरी तो ना चौटाला ने ही कहा की हरियाणा को उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए. उधर कांग्रेस हरियाणा में शोर मचाती रही की चौटाला एसवाईएल मुद्दे पर चुप बैठे है. इस मुद्दे को लेकर अभी दोनों ही प्रदेश की राजनीति अपने चरम पर थी की पंजाब व् हरियाणा में कांग्रेस की सरकारों ने गद्दी संभाल ली. लेकिन तब भी स्थिति जस की तस रही. आज फिर पंजाब में बादल सत्ता में है तो हरियाणा में कांग्रेस. लेकिन पानी है की मुद्दा बन कर ही रह गया है. ऐसा ही कुछ हाल बिजली का है. जहा तक मुझे याद आ रहा है की हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बंसीलाल अपने शासन के अंतिम समय में यही कह गए थे की अब हरियाणा को बिजली के लिए किसी अन्य राज्य पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा. उस समय उन्होंने पानीपत थर्मल प्लांट की नींव रखी थी. उसके बाद गर्मी बीती सर्दी का मौसम आया लेकिन कोई भी सरकार बिजली के मामले में जनता के इरादों पर खरा नहीं उतर सकी. जब भी किसी नेता से बात की गई तो उनका कहना था जनता की बिजली की जरुरत बढ़ गई है इसलिए बिजली की पूर्ति करना बहुत मुश्किल है. जब कभी राजनीति करने की जरुरत पड़ी तो फिर वही राग अलापा जाता की अब खेदड़ प्लांट शुरू होने को है अब हरियाणा में बिजली की कोई कमी नहीं होगी. लेकिन आज हिसार के खेदड़ प्लांट की इकाई भी शुरू हो चुकी है लेकिन बिजली समस्या है की ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. अब तो ऐसा लगने लगा है की भले ही जनता बिजली-पानी के लिए त्राहि-त्राहि करती रहे नेताओ को क्या फर्क पड़ता है. उन्हें तो सत्ता और सत्ता सुख से मतलब है.इसी सत्ता सुख के चलते आज बिजली और पानी नेताओं के लिए महज एक खेल बन कर रह गया है.


फिर भी हम गणतंत्र है


सबसे पहले आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेरो शुभकामनाये और बधाई.
सदियों से राजा रानी वाली राजतंत्र की प्रशासन व्यवस्था में  रह चुकी जनता ने लगभग साठ साल के गणतांत्रिक देश हिन्दुस्तान में हाल  तक भी सभी भारतीयों की मानसिकता लोकतंत्र के लिए परिपक्व नहीं हो पायी है  तभी तो सता पर पकड़ बनाये रखने के लिए नेहरू के वारिसों ने कांग्रेस के नाम  से छद्म लोकतंत्र पर पूरे देश में अपने परिवार तंत्र का राज किया। जनता से  राजगदृदी अपनाने के लिए राजनीति में जाति धर्म का कार्ड खेला। यह खेल इतने  शातिर तरीके से खेला गया कि दूर-दूर तक की सोच रखने वालों से भी कभी यह पकड़ा नहीं जा सका।
हाल के बिहार विघानसभा चुनाव पर अगर सर्वो की खबर को यकीनी माने तो यह लगभग सच  है कि मूल रूप से मुसलमानों ने वंशवाली कांग्रेस और राजद को वोट दिया  क्योंकि कई कारणें के अलावा वो हिन्दु विरोधी भाषणों से खुश किये जाते रहे।  सुन्नी मुसलमानों को आज तक देश के नागरिक के कर्तव्य और अधिकार दोनों को  इमामों के हवाले कर दिया गया। मानों उपर वाले ने हिन्दुस्तान के इमामों को  स्पेशल पोस्टींग करके भेजा है। लम्बें समय तक इमामों के फतवे पर सुन्नी  मताधिकार का प्रयोग करते थे, पर इसमें कोई शक नहीं कि मदरसे की पढ़ाई और  विज्ञान की भूमिका धीमे-धीमे इमामों के मकडजाल से डॉ अब्दुल कलाम जैसे पढ़  लिखे कईयों को बाहर कर चुकी।
अगर आस्था के नाम पर मूर्ख बनाये जाने वाले  लोग जरा सी सोच और तर्क से दिमाग का इस्तेमाल करें तो वे समझ सकते है कि  जहाँ बनाने वाले खुदा के लिए इबादतगाह के नाम पर दकियानुसी सोच का जाल  फैलाना क्यों जारी रहा? जलन और नफरत का माहौल फैला, फूट डाल कर सता कब्जायी  गयी ताकि देश की गरीब जनता की दौलत को लूट कर विदेशों में केवल अपनी  औलादों के ऐशो आराम के लिए रकम जमा करा दी जाए। आज आधे से कम को समझ आया है  कल सबको समझ में आ जाएगा कि राज चलाने की जगह राज पर काबिज रहने के काम बडी ही  सूझबूझ से किये जाते रहे।
भ्रष्टाचार जब तक सौ करोड़ के खून में ना आ जाए तब  तक काम नहीं किया जाता। जब तक हवलदार और सिपाही घूस ना लेने लगे तब तक  तंख्वाह ना बढ़ाई। गरीबों को गरीबी हटाने के नाम पर लूटा गया। नियम कानून  ऐसे बनाये कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह हजार विदेशी कंपनीया आज हमारे  देश में आकर मजदूर और किसान का खून चूस रही है। ईमानदार व्यवसायी को तंग  कर करके मिट्टी में मिला दिया गया। हालात ऐसी बनायी गयी कि लोग कहें आजादी  से अच्छी गुलामी।
आरक्षण के कार्ड को खेल कर सता पर पकड के लिए दलित मुसलमान, दलित इसाई जैसे  शब्दो को जन्म देने वाली कांग्रेस सरकार का बस चला तो कल राजपूत मुसलमान  और ब्राहमण ईसाई शब्दों की भी रचना कर देगी। वैसे इन दिनों दिख रहा है की समाज  खत्म कर चुकी कांग्रेस सरकार अब परिवार खत्म करने के लिए सात जन्म के रिश्तो को महज समझौता बना कर छोड देगी।
हद तो तब है जब दो दिन के राजनैतिक कद वाले युवराज कहे जाते जनाब मीडीया  के सामने दलितों के यहां नहाने खाने का नाटक करेगें जबकि अगर कोई दलित 10  जनपथ पर आ जाऐ तो डंडे खाये। नमाजी टोपी पहने नाटक बस अपने लिए वोट लेने तक  के लिए है। चार बीबी और चालीस बच्चे की छूट इसीलिये तो है कि वो बस कैटल  क्लास वाला वोटर बन कर जिन्दा रहे फिर गटर में या किनारे घिसट घिसट कर जीते  हुए गरीब ने मर ही तो जाना है।
लेकिन वो दिन दूर नहीं जब एक एक करके  मुसलमान जान लेगा कि एक बीबी एक बच्चा करके ही वो अपनी औलाद को आदमी की  जिन्दगी देगा तब हिन्दुओं का वोट पूरी तरह खो चुकी कांग्रेस को एक वोट भी  नहीं मिलेगा। बापू के सम्मान पर जब पटेल जी की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री  बना देना ही इतिहास की एक गलती हो गयी लेकिन सुधार की जिम्मेदारी आज के  नौजवानों की है और बिहार के चुनाव के नतीजों ने विकास के वास्ते बदलाव का  बिगुल बजा दिया। लालू को परिवार वाली कांग्रेस के विरूद्ध सता लाने के बाद  जब लालू भी परिवार तंत्र का राज करने लगे तो कांग्रेस के साथ वह भी आज  हाशिये पर चले गये। जनता जनार्दन ने माना तो भगवान भी बन सका भगवान है।
किसी तंत्र के प्रशासन सफलता जनता के स्वीकारने पर है और यही सच है। फिर  नेताओं की बिसात क्या है। जनता के हित में काम करने के लिए अगर चुना है तो  उसे जिम्मेदारी से करना होगा। वर्ना अंजाम के कई उदाहरणों से दुनिया के  इतिहास भरे है।
साभार- मेरे ई-मेल बाक्स से


सरकार में घोटाले या घोटालो में सरकार


आज हर जगह कांग्रेस सरकार में हुए घोटालो की चर्चा है. सुना था की पैसो में गर्मी कुछ ज्यादा होती है शायद यही कारण है की नोटों की गर्मी के आगे जहां बिहार की चुनावी तपत फीकी लग रही है वही संघ-कांग्रेस भी अपनी लड़ाई भूल गई है. नेता तो नेता जनता भी सोच रही है जब नेताओ ने घोटालो के पैसो की इतनी गर्मी खाई है तो हम भी कुछ हाथ सेंक ले. भले ही जनता के हाथ कुछ ना लगे लेकिन मुद्दा तो मुद्दा है. खबरिया चैनल भी कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले को भूल गए तो कांग्रेस भी संघ के पूर्व सरसंघ चालक सुदर्शन द्वारा सोनिया गाँधी को सीआईए का एजेंट कहे जाने को भूलती नजर आ रही है. इससे पहले जहां संघ नेताओ का आतंकवादी घटनाओं में हाथ बताने को लेकर कांग्रेस चर्चा में थी तो वही सुदर्शन द्वारा सोनिया गांधी को सीआईए एजेंट कहने पर कांग्रेस ने खूब बवाल मचाया. दोनों ही तरफ से धरने-प्रदर्शनों का दौर चला. जनता ने भी सभी समाचार खूब दिल से सुने और पढ़े. लेकिन एक के बाद एक घोटालो के उजागर होने से आज कांग्रेस चुप्पी साधे हुए है वही भाजपा को भी बड़ा मुद्दा मिलने से संघ भी चुप हो गया है.
रही बात घोटालो की तो जिस तरह से पहले कॉमनवेल्थ गेम्स फिर महाराष्ट्र के आदर्श हाउसिंग सोसाईटी और अब 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले में सरकार घिरी नजर आ रही है उसे देख तो यही लगता है की यह सभी घोटाले कांग्रेस सरकार में नहीं अपितु घोटालो में कांग्रेस सरकार है. कहने का भाव यह है की यह सभी घोटाले कांग्रेस सरकार में नहीं हुए. अगर ऐसा होता तो किसी भी एक घोटाले के पश्चात सरकार नहीं तो उसका कोई मंत्री-संतरी तो अवश्य कुछ बोलता लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले में दिल्ली सरकार की चुप्पी जहां चिंताजनक रही वही केंद्र और सोनिया गाँधी का मौन देश के लिए दुखदायी था. उसके पश्चात महाराष्ट्र जमीन घोटाले के पश्चात मुख्यमंत्री अशोक चव्हान की छुट्टी करने में हुई देरी में भी कहीं ना कहीं कांग्रेस सरकार ही दोषी थी. इन सब के पश्चात बात शुरू हुई 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले की तो देश और राजनितिक पार्टियों में घमासान ही मच गया. रही सही कसर सर्वोच्च न्यालय ने प्रधानमन्त्री से जवाब मांग कर पूरी कर दी. देश के आला नेता प्रधानमन्त्री से जवाब मांगने को शर्म की बात बोल कर राजनीति कर रहे है.
कहते है की नेताओ को तो राजनितिक रोटिया सेंकने का मौका चाहिए. तो भला इससे अच्छा मौका कब और कैसे मिल सकता है. अब तो केंद्र सरकार के साथ रहने वाले लालू-मुलायम भी 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री से जवाब मांगने लगे है. अब सबकी नजर देश के युवराज राहुल गाँधी पर टिकी थी की कब वो कुछ बोले और यह मुद्दा किसी तरफ शांत हो जाएँ. अक्सर राहुल गाँधी कांग्रेस के लिए भगवान् साबित हुए है. तो आखिरकार यह मौका भी आ गया लेकिन अबकी बार वो जो कुछ भी बोले वो मेरी समझ में नहीं आया. इसके कई कारण है लेकिन अगर मै एक पत्रकार की नजर से देखूं तो यह ब्यान सिर्फ प्रधानमन्त्री के बचाव में था ना की देश हित में. उन्होंने कहा की अदालत द्वारा प्रधानमन्त्री से जवाब माँगना कोई शर्म की बात नहीं है. शायद सही कहा उन्होंने. जब नेता बेशर्म हो कर देश का अरबो-खरबों रुपया खा सकते है तो जवाब देने में शर्म कैसी. फिर भले ही इससे पहले ऐसा हुआ हो या नहीं. लेकिन उनकी यह टिप्पणी इतना जरुर स्पष्ट कर गई की वाकई आज किसी नेता को जनता के हितो से कोई सरोकार नहीं है.
इन सभी घोटालो में सरकार ही है इससे अच्छा उदहारण और क्या हो सकता है की सरकार शुरू से ही अपने लोगो का बचाव करती रही. चाहे वो कलमाड़ी हो या फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हान. जबकि राजा के मुद्दे पर क्या कुछ हुआ वो सभी ने देखा और सुना. अभी हाल ही में राजस्थान के भाजपा नेताओ ने सरकारी दस्तावेजो के साथ यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है की कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए राजस्थान के पूर्व राज्यपाल के पुत्र को 2000 करोड़ रूपए की राशी बेवजह दी गई. इससे पहले भी जो नाम उजागर हुए है वो सभी सरकार के ही नुमाइंदे है. कुल मिला कर अगर यह कहा जाये की कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले में हर स्तर के नेताओ का मुहं बंद करने के लिए मोटी रकम दी गई थी तो गलत नहीं होगा. जबकि प्रतिदिन लाखों रुपया खर्च कर चलने वाली संसद की कार्यवाही भी भ्रष्टाचार और घोटालो की भेंट चढ़ रही है. लेकिन कांग्रेस व् सरकार के कानो पर जूं तक नहीं रेंग रही. जब नेताओ की ही नहीं सूनी जा रही तो भले ही जनता कुछ भी बोलती रहे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि जब नेताओ का पेट भरा हो तो जनता की सुनता कौन है.


देश की इज्जत का सवाल है













कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने में अब कुछ चंद दिन ही बाकी बचे है. पूरे देश सहित विश्व की निगाहें इस बात पर टिकी है की खेलो का आगाज जहां भले ही फीका रहा हो लेकिन समापन तक अब कोई परेशानी ना आये. हर भारतवाशी भी यही कामना करता है. और तो और शासन-प्रशासन ने भी अपनी गलतियों और खामियों को छुपाने के लिए देशवाशियो और मिडिया को यह दुहाई देनी शुरू कर दी है की अब बहुत हो चुका लेकिन अब ऐसा कुछ ना दिखाए और ना बोले जिससे इन खेलो पर कोई संकट आये. मजेदार बात तो यह है की सब कुछ करने के बाद अब उन्हें यह खेल देश की इज्जत का सवाल नजर आने लगे है. गुफ्तगू मानता है इस बात को की यह देश की इजात का सवाल है लेकिन क्या इसमें देश की इज्जत बढ़ रही है की जहा चहुँ ओर इन खेलो को लेकर भारत की किरकिरी हो रही है वही देश के तख्तो-ताज पर बैठे देश के सिर मोर अब तक चुप है. जी हां यहाँ पहलू पर गौर करे तो अब तक प्रधानमन्त्री ने कुछ चीजो पर आयोजको की नाममात्र की खिंचाई तो जरुर की है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ओर महासचिव राहुल गाँधी अब तक चुप क्यों है. क्या उनका इन खेलो से कोई लेनादेना नहीं है या इतना लेनादेना है की वो चुप रहने में ही भलाई समझते है. जो भी हो लेकिन गुफ्तगू आपके समक्ष समाचार का दूसरा पहलू रखते हुए कुछ कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार हुए स्टेडियम की कुछ तस्वीरे पेश कर रही है जिनमे कारीगरों की मेहनत साफ़ झलक रही है. गुफ्तगू के हाथ लगी इन तस्वीरों को आप तक पहुँचाना गुफ्तगू अपना कर्तव्य समझता है क्योंकि यह देश की इज्जत का सवाल है.


ना बिमारी का पता लगा ना दवा ही मिली


गुफ्तगू ने समाचार के माध्यम से हिसार में जाट आरक्षण के नाम पर जो कुछ घटित हुआ उसकी विस्तार से जानकारी आपको दी. लेकिन कुछ जानकारिया अभी आप तक पहुंचानी बाकी रह गई. यह वो जानकारिय थी जो समाचारों से उठ कर जनता के लिए गुफ्तगू बन गई. यही गुफ्तगू आप तक पहुंचा रहा हूँ. शायद आपको समाचार का वो पहलू समझ में आ सके जिसके लिए गुफ्तगू प्रयासरत्त है. अब तक की सभी गुफ्तगू में आपको बताया गया की कैसे दो नेताओ ने आरक्षण की आग को हवा दी. पुलिस फायरिंग में एक छात्र की मौत के पश्चात किस तरह से ग्रामीणों ने आगजनी व् लूटपाट की वारदातों को अंजाम दिया. नेताओ ने भी अपना पक्ष रखा और हिंसा को रोकने की बजाये बयानबाजी तक ही वो कैसे सिमित रहे.
किसी को कुछ नहीं मिला और आखिरकार दोनों बाहरी नेताओ को अपनी-अपनी गाडियों से हाथ तक धोना पड़ा. शुक्र है की उन्होंने भाग कर अपनी जान तो बचा ली. लेकिन सोचने वाली बात यह है की चरम तक पहुंची हिंसा के पीछे ना बिमारी का पता लगा और ना दवा ही मिली. जी हां, दोनों जाट नेता हिंसा के पश्चात वापिस हो लिए लेकिन आरक्षण को लेकर आज भी वो चुप्पी साधे हुए है. क्यों उन्होंने उत्तरप्रदेश से आकर बिना किसी प्रदेश के नेता को साथ लिए यह मुद्दा उठाया, केंद्र से आरक्षण की मांग की बात कर बिना किसी केंद्र के प्रतिनिधि की मौजूदगी के प्रदेश सरकार से समझौता करना, क्या समझौता हुआ किसी को इसकी जानकारी नहीं होना व् प्रदेश स्तर पर जाट आरक्षण के लिए कुछ नहीं बोलना जैसी कई बाते आज जनता के लिए गुफ्तगू का सबब बन गई है.
आखिर यह जाट नेता क्या करना चाहते थे, इनका मकसद क्या था, यह जानना और समझना तो राजनितिक दलों का काम है लेकिन इससे भी बड़ी गुफ्तगू यह है की जिस आरक्षण के लिए यह लड़ाई लड़ी गई वो तो अभी तक मिला ही नहीं. फिर क्यों तो यह लड़ाई लड़ी गई और क्यों दो जानो को काल का ग्रास बनाया गया. कोई इसको राजस्थान की तर्ज पर कांग्रेस का खेल बता रहा है तो कोई इसको सत्ता से दूर इनलो का किया धरा कह रहा है. राजस्थान की तर्ज का जिक्र इसलिए किया गया क्योंकि जो किरोड़ी सिंह बैंसला भाजपा सरकार के समय गुर्जर आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे बाद में वो भाजपा में ही शामिल हो गए. इतना ही नहीं भाजपा की टिकट पर चुनाव तक उन्हें लड़ाया गया.
तो क्या यह मान ले की प्रदेश में बढ़ते इनलो के ग्राफ को देखते हुए यह भी कोई साजिश की गई है या फिर दोनों नेताओ पर किसी राजनितिक पार्टी का हाथ था. रही बात इनलो की तो गुफ्तगू यह भी है की आतंक का ऐसा तांडव रचने से कभी भी विपक्षी पार्टी को कुछ हासिल नहीं होता. अगर ऐसा होता तो दिल्ली में सीलिंग के पश्चात मची हाय-तौबा से कांग्रेस को सत्ता गवानी पड़ती और राजस्थान में भाजपा को शायद इतनी साईट भी नहीं मिलती. आरक्षण के नाम पर जो कुछ भी हुआ बहुत ही दुखद रहा लेकिन इतना जरुर है की जो दो जिन्दगिया यह दुनिया छोड़ गई उनकी पूर्ति 20 - 20 लाख रूपए से पूरी नहीं की जा सकती.


फिर हमारे साथ ही अन्नाय क्यों


दो-तीन दिन पूर्व संसद में एक नजारा देखा. मैंने क्या सभी ने देखा. जो नहीं देख पाए उन्होंने पढ़ा और सूना. शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जिसने आम आदमी की बात संसद तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उठाने वाले इन नेताओ की यह नजारा देख तारीफ की होगी. वैसे तो नेताओ को वाह-वाही बहुत कम ही मिलती है लेकिन जो थोड़ी बहुत वाह-वाही करने वाले थे भी वो आज अपने को शर्मसार महसूस कर रहे होंगे. तो मुद्दा था सांसदों की वेतन वृद्धि का. बहुत लम्बे समय से उनकी यह मांग चलती आ रही थी लेकिन अब यह पास हो चुका है की सांसदों का वेतन 16 हजार से 50 हजार कर दिया जाये. बहुत ख़ुशी की बात थी की जो आदमी अपना घर छोड़ कर जनता के हक़ की बात रखने संसद तक जाता है उसको उसका हक़ मिलना भी चाहिए. लेकिन यह क्या अभी यह विधेयक रखा ही गया था की कुछ विपक्षी सांसदों ने 50 हजार को थोडा बताते हुए संसद में हो-हल्ला शुरू कर दिया.
यह वो समय था जब किसी को किसी की परवाह नहीं थी. सब शोर मचने और चिल्लाने में मशगुल थे. सब को अपनी-अपनी पड़ी थी. शोर मचने वाले सभी नेता जो चुनावो के समय आम आदमी का हक़ दिलाने की बात करते देखे जाते थे वो अब उन्ही के खून-पसीने की कमाई से अपनी जेबे भरने के प्रयास में जुटे हुए थे. कोई 50 हजार को कम बता रहा था तो कोई 80 हजार की मांग कर रहा था. मजेदार घटनाक्रम तो उस समय हुआ जब सरकार की दलील से नाराज कुछ सांसदों ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को अपना प्रधानमन्त्री चुन लिया, तथा जल्द ही अपना मंत्रिमंडल बनाने की बात का स्वांग तक रच डाला. आखिरकार भाजपा व् अन्य सांसदों के बीच में आने के पश्चात् अब यह मुद्दा सुलझता नजर आ रहा है. उधर सरकार का भी कहना है की वह वेतन को 80 हजार किये जाने पर विचार करेगी. वेतन भले ही कुछ भी हो जाये लेकिन इतना जरुर है की आम जनता को इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
अब देखो ना उसी दिन सुबह के समाचार पत्र इस बात से अटे पड़े थे की न्यायलय के आदेश के बावजूद कृषि मंत्री शरद यादव ने सड़ रहा अनाज यह कहते हुए गरीबो में बांटने से इनकार कर दिया की भले ही अनाज सड़ जाए लेकिन यह बांटा नहीं जा सकता. इस बात से कुछ दिन पूर्व ही केंद्रीय रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने अपनी रैली में माओवादियों का समर्थन किया था. उधर दोबारा सत्ता में आने से पहले केंद्र सरकार ने विदेशो में जमा भारतीय नेताओ का काला धन वापिस लाने के बड़े-बड़े दावे किये थे. रही कामनवेल्थ गेम्स की बात तो उसमे हुआ घोटाला किसी से छुपा नहीं है. जबकि महंगाई ने देश में किस कदर तांडव रचा है यश भी सभी सांसदों को पता है. मुद्दा यह नहीं की यह सब बाते आपको या किसी को पता नहीं होगी. पहलू यह है की इतना सब कुछ होने के बाद भी वेतन बढाने की मांग कर रहे सांसदों की कान पर इन मुद्दों के लिए आज तक जूं क्यों नहीं रेंगी. क्या यह मुद्दे सिर्फ चर्चा के लिए थे.
तो जवाब होगा नहीं, ऐसा नहीं है. फर्क है तो मात्र इतना की यह मुद्दे आम जनता से जुड़े थे और वेतन सांसदों का बढना था. इसलिए किसी भी सांसद ने शरद पवार से यह नहीं पूछा की वो न्यायलय के आदेश के पश्चात् भी क्यों अनाज बांटने से माना कर रहे है. या ममता बेनर्जी का माओवादियों से क्या रिश्ता है. और तो और महंगाई मुद्दे पर राजनीति करते हुए विपक्षी पार्टियों ने भारत बंद तो किया लेकिन सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थो में की गई वृद्धि को वापिस लेने से माना करने के बावजूद क्यों संसद ठप्प नहीं की. जबकि कामनवेल्थ गेम्स के लिए हुए घोटाले में संसद में सिर्फ चर्चा ही की गई. जबकि आज जनता से लेकर नेता तक स्विस बैंक में जमा भारतीयों का काला धन वापिस लाने की बात भूल चुके है. क्या यह सरकार की वादाखिलाफी नहीं है. तो क्यों नहीं इन मुद्दों पर कभी संसद में हंगामा किया जाता. अगर यह संसद जनता से जुड़े मुद्दे संसद में नहीं उठा सकते तो इन्हें कोई हक़ नहीं है की यह वेतन वृद्धि की बात करे.


बाढ़, सरकार और नेता


हरियाणा में जिसके पानी को राजनितिक दलों ने आज तक अपनी राजनितिक चमकाने के लिए सिर्फ मुद्दा बनाये रखा, उसी नहर के पानी ने आज फिर से राजनितिक दलों को मुद्दा दे दिया है. मुद्दा यह नहीं की उस नहर के पानी को हरियाणा का किसान कैसे उपयोग करेगा या कब से करेगा बल्कि मुद्दा यह है की उस नहर के पानी से हुई तबाही के लिए प्रदेश सरकार किसानो को 15 हजार करोड़ से अधिक का मुआवजा दे. जी हां हम यहाँ बात कर रहे है हर चुनाव में अपना रंग दिखाने वाली एसवाईएल नहर का. यह नहर हरियाणा के प्रत्येक चुनावों में मुद्दे का काम करती है. लेकिन पिछले एक सप्ताह से बाढ़ की स्थिति झेल रहे अम्बाला, कुरुक्षेत्र, कैथल और फतेहाबाद जैसे जिलो सहित देश-प्रदेश के अनेको नेताओ को बाढ़ और उससे हुए नुक्सान पर वाकयुद्ध करने के लिए इस नहर ने एक और मुद्दा दे दिया है.
मुद्दे के बावजूद 
वैसे तो पानी और बिजली ऐसे दो मुख्य मुद्दे है जिनका हरियाणा के साथ चोली-दामन का साथ है. पंचायत चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावो तक में इन दोनों ही मुद्दों की गूंज सुनी जा सकती है. बावजूद इसके आज तक ना तो हरियाणा के किसानो को एसवाईएल का पानी मिला और ना ही प्रदेश का किसान हांसी-बुटाना लिंक नहर के पानी का सही से इस्तेमाल कर पाया. दोनों ही नहरों के पानी को लेकर अपनी राजनीति चमकाने वाले हर नेता और दल के लिए मुख्य मुद्दा होने के बावजूद आज चार जिलो सहित प्रदेश की जनता पानी की पीड़ा पर भारी पड़ रही राजनीति को सहने को मजबूर है.
तबाही ही तबाही
आज तक के समाचारों को पढ़-सुन कर तो यही लगता है जहा भी बाढ़ का पानी पहुंचा है वह हर तरफ तबाही ही तबाही नजर आ रही है. खेतो में खड़ी फसले जहा नष्ट हो चुकी है वही कई लोग अब तक काल का ग्रास बन चुके है. इतना जरुर है की अनाज पर राजनीति करने वाले नेताओ की जुबान पर भी ताले लग चुके है. क्योंकि अब तक हजारो टन अनाज पानी लगने से खराब हो चुका है. उधर हजारो लोगो के बेघर होने का भी समाचार है. अभी पहले वाला पानी निकला नहीं और हर घंटे जहा वह अपना कहर बरपा रहा है वही मौसम विभाग ने चेतावनी दी है की एक-दो दिन में मानसून फिर से दिक्कत कर सकता है.
ऐसा तो सभी कर रहे है 
चुनाव हुए, नेता चुने गए और सरकार बन गई. नेताओ ने पांच साल तक क्या किया किसी को पता नहीं चलता. सरकार ने कितने विकास किये जनता पांच साल के उपरान्त भूल जाती है. लेकिन प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज काम कर रही है यह तो तभी पता चलता है जब ऐसी कोई त्रासदी से जनता को दो-चार होना पड़ता है. आज प्रदेश में जो कुछ हो रहा है उससे देख तो नहीं लगता की अभी तक प्रदेश में सरकार है. बाढ़ को आये एक सप्ताह होने को आया और अब तक विभिन्न पार्टियों के नेता जिनमे हजंका सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई शामिल है बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का हवाई सर्वेक्षण कर चुके है. उधर इनलो, भाजपा और हजंका सहित अनेक राजनितिक दलों के नेता मौके पर जाकर जनता का दुःख बाँट चुके है. 
ऐसा कुछ हो की लगे की सरकार है
अभी तक जो सभी ने किया है प्रदेश सरकार के मुखिया ने भी कुछ-कुछ वैसा ही किया है. भले ही उस काम की शुरुआत उन्होंने पहले की हो लेकिन हुड्डा जी ऐसा कुछ ख़ास अभी तक नहीं कर पाए की लगे की यह काम सरकार की तरफ से किया गया है. प्रदेश में कोई सरकार काम कर रही है या करती है इसका एहसास जनता को तभी होता है जब सरकार जनता की आशाओं पर खरा उतारे. लेकिन बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का हवाई दौरा करने और जनता का दर्द सुनने के अलावा मुख्यमंत्री हुड्डा व् केंद्र सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया की लगे की सरकारे काम कर रही है. अगर कुछ किया तो सिर्फ इतना की प्रदेश सरकार केंद्र से मदद के रूप में करोडो रूपए की मांग है.


ऐसा ही क्यों होता है


जितनी देरी से मैं यह गुफ्तगू कर रहा हूँ उतना ही मेरा यह प्रयास रहेगा की मेरी यह गुफ्तगू स्टिक बैठे की आपको समाचार का दूसरा पहलू समझ में आ सके. सभी भली-भांति जानते है की 5 जुलाई को भारत बंद का आयोजन किया गया था. क्यों किया गया था, किसने किया था यहाँ अब शायद यह बताने की जरुरत शेष नहीं रह जाती है. देश की विपक्षी पार्टियों द्वारा किये गए भारत बंद के दिन जो कुछ भी हुआ वो सभी ने बहुत ही इत्मिनाम से टीवी पर देखा और सुना होगा. लेकिन इतना जरुर है की ऐसा कुछ होने से पहले ही मेरे मोबाईल पर प्रतिदिन की तरह ही सुबह एसएमएस आने लगे थे. कुछ दोस्त हर रोज की तरह सुप्रभात की शुभकामनाये दे रहे थे तो कुछ बंद को लेकर एसएमएस कर रहे थे. उसमे से एक एसएमएस, जो मुझे बहुत पसंद भी आया और बहुत कुछ सोचने को मजबूर भी कर रहा था. वो एसएमएस कुछ इस तरह था.
वो तालो का लटकना,
वो रैली की बहार,
वो बस को आग लगाना,
वो मार-पीट का समाचार,
रेल को रोकना,
वो आम लोगो पर प्रहार,
मुबारक हो आपको भारत बंद का त्यौहार.
यह उस सुबह आये कुछ एसएमएस में से एक था जिसको पढने के बाद मैं यही सोच रहा था की वाकई आज के बंद से आम आदमी को कुछ नहीं मिलने वाला है. क्योंकि केंद्र सरकार पहले ही तेल प्रदार्थो की मूल्यवृद्धि वापिस लेने से मना कर गई थी. शाम होते-होते रही सही कसर सरकार के मंत्रियो ने यह कह कर पूरी कर दी थी की विपक्ष का यह भारत बंद किसी भी तरीके से औपचारिक नहीं है. फिर क्यों जगह-जगह बसों और ट्रेनों को रोका गया. क्यों बसों को आग लगाईं जाती है. सरकारी संपत्ति को नुक्सान सहित क्यों बंद की एवज मैं व्यापारियों को धमकाया जाता है.
5 जुलाई को विपक्ष द्वारा किया गया भारत बंद पूर्णतया सफल था. यह कहने में कोई संकोच नहीं लेकिन जिस तरह इस बंद को सफल किया गया या यह कहे की किस तरीके से इस बंद को सफल किया गया क्या इसकी पूर्णतया सच्चाई जनता के सामने लाई गई. तो जवाब मिलेगा नहीं, हमको क्या पता. मैं यह पूछना चाहता हूँ की कितने की व्यापारियों ने अपनी मर्जी से अपने प्रतिष्ठान बंद रखे. कौन कर्मचारी मूल्यवृद्धि के विरोध में उस दिन अपने कार्यालय नहीं गया. शायद ना के बराबर. फिर राजनैतिक दल किस बात पर अपनी पीठ थपथपा रहे है की भारत बंद सफल हुआ.
जनता परिणाम चाहती है, जबकि उस दिन के बंद से ऐसा कोई परिणाम नहीं निकला की जनता किसी भी दल की वाह-वाही करे. परिणाम देखने को मिला तो सिर्फ इतना की विपक्षी पार्टिया या तो अपने कार्यकर्ताओ में जोश भरने में सफल रही या फिर यह कहती हुई सुनी गई की उन्होंने जनता की आवाज को बुलंद किया है. फिर भले ही वो दिल्ली की विपक्षी भाजपा हो या राजस्थान की भाजपा. या फिर पंजाब में राज कर रही अकाली दल या हरियाणा की विपक्षी इनलो हो. सब ने मतलब साधा तो सिर्फ अपना. जबकि उत्तरप्रदेश में राज कर रही बसपा के कार्यकर्ताओ ने तो उस दिन जिस तरीके से तांडव किया, उससे सबकी आँखे फटी की फटी रह गई.
तो क्या यहाँ हम यह मान ले की आज जो राजनितिक दल धरना-प्रदर्शन, या फिर बंद का आयोजन करते है वो सिर्फ अपने लिए ही करते है, जनता के लिए नहीं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमको जागने की जरुरत है और अब नेताओ से यह पूछना होगा की ऐसा ही क्यों होता है.
पाबला जी का धन्यवाद
8 जुलाई को मेरी शादी की तीसरी वर्षगाठ थी. हर बार की तरह ही इस बार भी मेरे पारिवारिक सदस्यों और दोस्तों ने सुबह से मुझे बधाई देना आरम्भ कर दिया था. दोपहर तक कुछ और फोन आने के बाद मैं निश्चिन्त हो गया की अब और कोई नहीं रह गया है जो मुझे बधाई देगा. बहन की शादी के कारण कुछ व्यस्त हूँ इसलिए कंप्यूटर पर भी नहीं बैठ पा रहा हूँ. लगभग 5 बजे एक ब्लागर साथी का बधाई भरा फोन आया और उसने बताया की पाबला जी ने जब आपके लिए पोस्ट लिखी तो पता चला की आज आपकी शादी की सालगिरह है. मैंने भी बिना देरी किये कंप्यूटर चालू किया और पाबला जी की पोस्ट पढ़ी. पढ़ कर बड़ा सुकून मिला की पारिवारिक सदस्यों के साथ-साथ कुछ और साथी सदस्य भी मेरी जिंदगी में शामिल हो चुके थे. जब तक मैंने यह पोस्ट पढ़ी तब तक 5 लोगो ने मुझे बधाई दी. 5 साथी सदस्य देख मैंने भी सोचा की क्यों ना 5 जुलाई पर ही कुछ लिखा जाये. पाबला जी सहित सभी साथियों का मेरी जिंदगी से जुड़ने के लिए दिल से धन्यवाद.


वो रही कुर्सी झप लो


27 अप्रैल को विभिन्न राजनितिक दलों ने भारत बंद का एलान किया है. मुद्दा है महंगाई, बिजली, पानी और बिगडती कानून व्यबस्था. अगर आप व्यापारी है या आम नागरिक तो क्या आप को लगता है की इस बंद से यह सभी समस्याए ख़त्म हो जाएगी. चलो माना की ख़त्म नहीं हो सकती तो क्या केंद्र सरकार सहित सभी राज्यों में राज कर रही विभिन्न राजनितिक पार्टियों की सरकारों की नींद इस बंद से खुल जाएगी. तो मेरा मानना है की ऐसा कुछ नहीं होगा. क्योंकि इनमे से कुछ सरकारे ऐसी है जो कभी बंद करने वाले राजनितिक दलों के शासन के समय स्वयं बंद किया करती. जब उस समय वो इनकी नींद नहीं खोल पाई तो अब ऐसा क्या हो गया है की ये सरकारे जनता की भलाई की बात सोचेगी.
कोई नहीं सोचता जनता की भलाई के बारे में. अगर सोचता तो आज जनता ना इन मुद्दों को लेकर परेशान होती और ना ही इस बंद की नौबत आती. तो क्या हम यह मान ले की ये राजनितिक दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए बंद कर रहे है. या सब को कुर्सी दिख रही है. यहाँ आप को यह बता दे की इस बंद का समर्थन वो ही दल कर रहे है जिनको इन लोकसभा व् विधानसभा चुनावो में जनता ने घास नहीं डाली. इनमे से इनलो, सीपीएम, सीपीआई, समाजवादी पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी व् जनता दल यूनाईटीड मुख्य है. क्या यह कह ले की तीसरा मोर्चा इस बंद को समर्थन कर रहा है. इस बंद को लेकर इन राजनितिक दलों का क्या मकसद है यह समझना बहुत मुश्किल है.
लेकिन इतना समझ में आता है की इस बंद को सफल बनाने के लिए जिस तरह इन पार्टियों ने जोर लगा रखा है उससे यह साफ़ होता है की सभी अपनी-अपनी मजबूती दर्शा रहे है. मृतप्राय ये राजनितिक दल जहाँ अपने कार्यकर्ताओ में इस बंद के माध्यम से नया रक्त संचार करने की कोशिश करेंगे वही सफल बंद के पश्चात जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जायेगा की उन्होंने जनता की भलाई के लिए बंद किया जिसमे जनता ने उनका भरपूर साथ दिया. हो सकता है की 28 तारीख के समाचार पत्रों में जनता के नाम लम्बे-लम्बे बधाई सन्देश भी छपे हो. तो क्या यह मान लिया जाये की इस बंद को जनता की जरुरत समझ कर किया गया था या जनता के कहने पर.
हम सभी भली-भांति जानते है की ऐसा कुछ नहीं है. फिर जनता के साथ यह ढकोसला क्यों. क्या यह राजनितिक दल हमको बहकाने की कोशश कर रहे है या हम इनके बहकावे में आ रहे है. इनलो को लगता है इस बंद से हरियाणा की कुर्सी उसको मिल जाएगी तो सीपीआई और सीपीएम को लगता है की केंद्र सरकार दोबारा उससे समर्थन मांगेगी. जबकि लोकजनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी पुनः वजूद में आने के लिए जद्दोजहद कर रही है. जबकि सभी जानते है की ना तो पांच साल तक केंद्र सरकार हिलने वाली है और ना ही हरियाणा की हुड्डा सरकार. बावजूद इसके पता नहीं इन राजनितिक दलों को ऐसा क्यों लगता है की वो रही कुर्सी झप लो.
एक बार सोच कर देखो
धरने-प्रदर्शन व् हड़ताल करने वाले यह क्यों नहीं सोचते उनके ऐसा करने से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं है. आम आदमी चाहे वो व्यापारी हो, नौकरी पेशा हो या भले ही मजदूरी करता हो कोई नहीं चाहता की कोई ऐसा करे. फिर ये राजनितिक दल ऐसा कर क्यों काम-धंधा कर दो वक्त की रोटी कमाने वाले की रोटी छिनना चाहते है. बंद से किसको फर्क नहीं पड़ता. चाहे वो व्यापारी हो या नौकरी वाला. या फिर देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने वाला बैंक. सभी बंद से प्रभावित होते है. लेकिन राजनितिक दलों की तानाशाही के आगे सभी चुप रहते है. तो क्या इससे जनता की समस्याए ख़त्म हो जाएगी या इन राजनितिक दलों को कुर्सी मिल जाएगी.


भोज जरुरी की श्रधांजलि


भले ही जिला प्रशासन अपने स्तर पर किसी दिवंगत नेता को श्रधांजलि नहीं देता हो लेकिन कभी ऐसा भी नहीं हुआ की किसी दिवंगत नेता की जयंती हो और जिला प्रशासन भोज दे रहा हो. लेकिन बीती 31 मार्च को हिसार जिला प्रशासन ने कुछ ऐसा ही किया की जहा कांग्रेसी नेता प्रदेश के दो-दो पूर्व मंत्रियो को श्रधांजलि दे रहे थे वही हिसार का जिला प्रशासन नगर के पत्रकारों को भोज देने में व्यस्त था. कहने को तो यह भोज जिला लोक संपर्क विभाग द्वारा आयोजित था लेकिन जिले के सभी अधिकारी इस भोज में आमंत्रित थे. उल्लेखनीय है की 31 मार्च 2005 को प्रदेश के दो मंत्री ओम प्रकाश जिंदल और सुरेन्द्र सिंह की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी.
उधर 30 मार्च को जिला लोकसंपर्क विभाग की और से स्थानीय पत्रकारों को निमंत्रण पत्र मिला की 31 मार्च को विभाग की और से सभी पत्रकारों को भोज के लिए आमंत्रित किया गया है. ऐसा नहीं है की विभाग ने यह भोज क्यों दिया, क्योंकि लोक संपर्क विभाग द्वारा पत्रकारों को भोज देने की परम्परा चलती आ रही है लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात यह है की जिले में सरकार की नुमाइंदगी करने वाला यह विभाग क्या यह भूल गया की इस दिन प्रदेश सरकार ने अपने दो चहेते मंत्रियो को खोया था. क्या यह विभाग का दायित्व नहीं बनता था की अगर उसे भोज देना ही था तो इस दिन के लिए तारीख को बादल दिया जाये.


कुर्सी बड़ी की पद


कभी-कभी कुछ अनहोनी सी बाते हो जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता. एक लम्बे अरसे के बाद अगर उस विषय पर गौर किया भी जाये तो लगता है की या तो हम ठगे गए या तकलीफ हो कर रह जाती है. लेकिन आम जनता है की कुछ नहीं कर पाती. करे भी तो क्या कर लेगी जनता. जनता की सुनने वाला है की कौन. हमारे देश में या तो साधु-संतो की सुनी जाती है या फिर नेताओ का राज चलता है. अब उनकी मर्जी की वो जो कुछ करे वो ठीक.
अब देखो ना किसी को पद की लालसा होती है तो किसी को कुर्सी की. फर्क सिर्फ इतना है की पद किसी को कहीं भी मिल सकता है लेकिन देश में कुर्सी तो सिर्फ नेताओ के भाग्य में ही लिखी है. लेकिन अगर किसी नेता को यह दोनों चीज मिल जाये तो सोने पर सुहागा. लेकिन आम जनता यही सोचती है की अब इस नेता के लिए कुर्सी बड़ी है की पद. तो भाई जब तक कुर्सी है तब तक ही पद की गरिमा है. वरना कैसा पद और कौन सी जनता.
अब हरियाणा के एक पूर्व विधायक को ही देख लो. जब तक कुर्सी थी तब तक ही वो कांग्रेस के हिसार हलके के ग्रामीण जिलाध्यक्ष थे. बीते विधानसभा चुनाव में कुर्सी क्या छीन गई वो तो भूल ही गए की वो जिलाध्यक्ष भी है या थे. कहने का भाव यह है की जब वो कांग्रेस के विधायक थे उस समय भी प्रदेश में कांग्रेस राज था और आज भी कांग्रेस की सरकार है. फर्क मात्र इतना है की आज वो विधायक नहीं है लेकिन जिलाध्यक्ष जरुर है.
मजे की बात तो यह है की पिछली सरकार के समय प्रत्येक सोमवार को ग्रामीण जिलाध्यक्ष के नाते वो जनता की समस्याए तो सुना ही करते साथ ही साथ पत्रकारों से भी रूबरू हुआ करते. जहा वो सरकार की वाहवाही किया करते वही जनता के भी दुःख-दर्द दूर करने का भरपूर प्रयास किया करते. यही कारण था की उन्हें पूरा विश्वास था की वो दोबारा भी विधायक बनेंगे. लेकिन जहा उन्हें मन मुताबिक सीट नहीं मिली वही हार का सामना भी करना पड़ा.
जनता तो जनता अब तो पत्रकार भी सोचने लगे है की जो छत्रपाल जिलाध्यक्ष होने के नाते चुनाव नहीं लड़ने की बाते किया करते आज वो कहीं दिखाई क्यों नहीं पड़ रहे है. क्या उन्हें इस बात का मलाल है की वो चुनाव हार कर विधायक नहीं बन पाए या इस बात को भूल गए की वो हिसार ग्रामीण जिलाध्यक्ष भी थे. कुछ भी हो इतना जरुर है की यहाँ तो नेताओ की चलती है जनता की किसको पड़ी है. इसलिए लगता है की आज नेताओ के लिए पद नहीं कुर्सी बड़ी है.
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हरियाणा की राजनीति के ये फर्जी प्रोफ़ेसर


यह लड़ाई आखिर है किसकी : प्रेम, परिवार, सत्ता की या.....


बहुत समय हो गया या यह कहूँ की अब तो हद ही हो गई, एक ही बात सुनते-सुनते की महाराष्ट्र पर मराठियों का हक़ है. मुंबई मराठियों की है. मांगने वाले और भी बहुत कुछ मांग रहे है. बहुत दिनों से यह सोच कर चुप था की इस मसले पर कोई गुफ्तगू ना करूँ. डर सा था की कोई मुझे भी यह ना कह दे की भाई साहब ब्लोगिंग करनी है तो करो लेकिन मुंबई मामले से दूर ही रहो. जैसा की कल आर एस एस. को कह दिया गया. ऐसा भी नहीं है की कल ऐसा पहली बार किसी को बोला गया है. इससे पहले अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, मुकेश अम्बानी और भाजपा सहित बहुत से लोगो को इस मसले पर चुप रहने या दूर रहने की सलाह दी जा चुकी है. लेकिन कहते है की ऊपर वाले ने जो यह बिना हड्डी की जुबान दी है ना, वो दी ही गुफ्तगू करने के लिए


क्योंकि हम आज को देखते है


जैसा की सभी जानते है की हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने वाले है। इन्ही को देखते हुए इस बार भी अनेक नेताओ का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आना-जाना लाजमी था। अक्सर देखने में आता है की जब ये नेता ऐसा करते है तो जनता की वाह-वाही लूटने के लिए अपनी पुरानी पार्टी पर 100 लांछन लगाते है। जनता भी उनके बहकावे में आकर उनका भरपूर सहयोग देती है। कोई उस समय नही समझ पाता की अगर नेता ऐसा कर रहा है तो इसका मुख्य कारण क्या है। लेकिन जनता वही देखती है जो वो नेता दिखाना चाहता है। लेकिन जो जनता उसके ऐसा करने में सहभागी नही है वो समझती है की अगर नेता दल-बदल कर रहा है तो वो या तो ग़लत कर रहा है या फ़िर उसके दिल में कुछ और चल रहा है। लेकिन समय के साथ-साथ जब दूसरी पार्टी में भी उस नेता को चुनावो के दिनों में टिकट नही मिलती तो वो फ़िर से पहले वाला राग अलापने लगता है। जनता फ़िर कुछ और समझती है लेकिन देखती वही है जो नेता दिखाना चाहता है। ऐसा नही है की मैं सिर्फ़ दल-बदल करने वाले नेताओ के प्रति ही गुफ्तगू करना चाहता हूँ। मैं उन सभी अनछुए पहलुओ पर गौर करना चाहता हूँ जो चुनावो के दिनों में सर उठाये खड़े हो जाते है। लेकिन कुछ पहलुओ को छोड़ ये नेता जनता को उल्लू बना अपना कार्य सिद्ध कर जाते है। ऐसा इसलिए नही की नेता हम से ज्यादा समझदार है लेकिन इसका मुख्य कारण यह है की हर बार की भांति चुनावो के दिनों में हम वो ही देखते है जो राजनितिक आदमी हमको दिखाना चाहता है।
लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही हुआ
चार माह पूर्व संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भी शायद ऐसा ही कुछ हुआ। किसी ने यह सपने में ही नही सोचा था की कांग्रेस फ़िर से सत्तासीन होगी। इसका मुख्य कारण था महंगाई और कालाबाजारी। स्वयं कांग्रेस मान रही थी की उसको सीटो का नुक्सान उठाना पड़ेगा। लेकिन जो नतीजे आए वो चौकाने वाले थे। बीती भाजपा सरकार में जो शेयर बाजार 14 से 15 हजारी था वो कांग्रेस सरकार में 21 हजारी तक पहुँच गया था। सोने के जो भावः पॉँच हजार के आसपास थे वो कांग्रेस सरकार में 8 से10 हजार तक पहुँच गए थे। जो रसोई गैस भाजपा सरकार में घर-घर आती थी वो कालाबाजारी के चलते मिलनी मुश्किल हो गई थी। बावजूद इसके लोकसभा चुनावो में जनता ने वही देखा जो कांग्रेस सरकार ने दिखाना चाहा। शेयर बाजार औधे मुंह निचे गिरा तो सोने के आसमान छुते भावः भी कम कर दिए गए। महंगाई आसमान पर होने के बावजूद भी सरकार महंगाई दर शून्य से निचे दिखा रही थी। लेकिन आज कांग्रेस सरकार गठन के बाद एक बार फ़िर से जहा महंगाई अपने चरम पर है वही कालाबाजारी ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। सोने के भावः जहा सोलह हजार तक पहुँच गए है वही शेयर बाजार प्रतिदिन छलांग मार रहा है।
अब हरियाणा की बारी
ऐसा नही है की ऐसा सिर्फ़ केन्द्र सरकार ही करती है। कोई भी प्रदेश सरकार हो वो पुनः सत्तासीन होने के लिए ऐसे कई कदम उठाती है जिससे जनता को बेवकूफ बना कर कुर्सी हासिल की जा सके। अगर हम हरियाणा सरकार की बात करे तो सत्ता सँभालते ही प्रदेश में जिस कदर लाठी चार्ज किए गए उससे जनता को लगा की मुख्यमंत्री हुडा को राजनीति करनी नही आती। अभी कुछ समय ही गुजरा था की प्रदेश में फर्जी एनकाउंटर होने लगे। हर तरफ़ सरकार की किरकिरी के साथ-साथ सवाल उठने लगे की जहा प्रदेश का शासन किसी काम का नही है वही प्रशासन भी हुडा के बताये अनुसार काम नही कर रहा है। मंत्री से लेकर संतरी तक अपनी-अपनी राजनीति कर रहा है। हुडा है की सिर्फ़ इन्हे ही खुश करने में लगा हुआ है। लेकिन एक के बाद एक लोकप्रिय घोषनाये कर जहा जनता की वाह-वाही लूटने में मुख्यमंत्री कामयाब रहे वही जनता भी बहुत जल्दी उन सभी घटनाओं को भूल गई जिनके लिए वो कल तक मुख्यमंत्री को कोसा करती थी। अभी हाल ही की घटनाओं पर गौर करे तो पाता चलता है की प्रदेश में किसी कदर अपराधिक ग्राफ बड़ा है। पढ़े : हिसार में बेकाबू होते बदमाशो की बादशाहत जारी
हिसार
भी नही है अछुता
आज को सामने रख कर जनता का दिल चुराने से हिसार भी अछुता नही है। पॉँच साल तक प्रदेश सरकार में मंत्री रही सावित्री जिंदल के बारे में भी जनता कुछ न कुछ बोलती रही लेकिन यह समय का ही खेल था की आज कोई भी कुछ भी बोलने से हिचक रहा है। विकास के नाम पर सिर्फ़ दो पार्क बनाने को लेकर जहा विपक्षी पार्टिया कह रही थी की जिंदल परिवार ने अरबो रुपए की सरकारी जमीन हड़प ली है वही सड़के और बिजली की समस्या से भी गर्मी में जनता को दो-चार होना पड़ा था। चार साल से जिंदल फैक्टरी के समीप बनने वाले पुल के निर्माण को लेकर भी जिंदल परिवार की काफी किरकिरी हुई है। जहा नगर का पुराना पुल अभी तक कंडम पड़ा है वही हिसार से सावित्री जिंदल की जीत सिनिश्चित करने के लिए उस पर लाखो रुपए की बर्बादी कर रबड़ की परत बिछाई जा रही है। क्या यह माना जाए की यह सिर्फ़ इसलिए हो रहा है की जनता को आज दिखाना है की हिसार में विकास हो रहा है।
वाह रे राज और वाह री राजनीति
इतना तो स्पष्ट है की यह जो कुछ हो रहा है वो सब राज पाने के लिए राजनीति के अंतर्गत हो रहा है लेकिन मेरी यह गुफ्तगू इसलिए मायने रखती है की आखिर समझ आने के बावजूद जनता कुछ भी समझने को तैयार क्यो नही है। तो क्या मैं यह मान लू की राजनीति हमको आज दिखाती रहेगी और हम आज को देख कर बेवकूफ बनते रहेंगे। या फ़िर लोकसभा चुनावो में मिली जीत के पश्चात् भी कांग्रेस को उपचुनावो में भाजपा के हाथो मुहं की खानी पड़ी उससे यह माना जाए की जनता ने आज देखना छोड़ दिया है। मेरी इस गुफ्तगू के लिए आपकी गुफ्तगू भी जरुरी हैकृपया इस गुफ्तगू मैं मेरा साथ दें


मात्र दो महीने में ही हम जानवर हो गए


कांग्रेस लोकसभा चुनाव में दिए अपने नारे कांग्रेस का हाथ-आम आदमी के साथ को अभी किसी भी तरीके चरितार्थ तो नही कर पाई लेकिन लोकसभा चुनाव के मात्र दो महीने पश्चात् ही उसके मंत्री इन आम आदमी को अगर भेड़-बकरी समझने लगे तो इसे क्या कहा जाए। मंत्री साहब पर राजनीति का रंग चढ़ गया या मंत्री की कुर्सी मिलते ही जुबान बदल गई। राजनीति के जो सफ़ेदपोश कल तक गली-गली जाकर अपने दोनों हाथ जोड़ कर इन्ही आम आदमी से वोट देने की विनती कर रहे थे वो ही लोग आज उनके लिए भेड़-बकरी बन गए। देश में एकाएक बढ़ी महंगाई से आम आदमी का ध्यान हटाने के लिए जहा कांग्रेस के बड़े नेता स्वयं इकोनोमी क्लास में सफर कर रहे है वही देश के विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर ने इकोनोमी क्लास को कैटल क्लास की संज्ञा देकर राजनीति मायनो में एक नए विवाद को जनम दे दिया है। कांग्रेस सहित देश की अन्य राजनितिक पार्टियों को भले ही थरूर की इस टिप्पणी से अपनी-अपनी राजनीति करने का मुद्दा मिल गया हो लेकिन आज कांग्रेस भी इन मंत्री मोहदय से यह पूछने से कतरा रही है की उन्होंने क्यो और कैसे इकोनोमी क्लास को कैटल क्लास बोल दिया। जबकि अभी हरियाणा सहित 3 राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। चलो जी मंत्री जी की इस टिप्पणी से कांग्रेस ने तो अपना पल्ला झाड़ लिया लेकिन देखना यह है की अब आमआदमी उनकी इस टिप्पणी को किस लहजे में लेता है लेकिन इतना जरुर है की हम इन नेताओ के लिए मात्र दो महीने में ही जानवर हो गए।


टिकट के लिए नेताओ की कब्बडी शुरू


हरियाणा में अभी तक विधानसभा चुनावो की कोई औपचारिक घोषणा तो नही हुई है लेकिन लोकसभा चुनावो में कसरत कर चुके प्रदेश के प्रत्येक नेता अब एक बार फ़िर से लाइन में है। ये वो नेता है जिन्होंने या तो अपने नेता को जिताने के लिए कसरत की थी या फिर लोकसभा चुनाव की टिकट पाने के लिए। अब आप सोच रहे होंगे की ये लाइन में क्यो है तो सीधी सी बात है की कसरत की थी तो अब इनको भी कुछ न कुछ चाहिए। इसलिए जिसे देखो वो विधानसभा चुनाव की टिकट मांग रहा है। कोई भाजपा से तो कोई कांग्रेस से। यहाँ तक की हजंका व् इनलो में भी टिकट मांगने वालो की लम्बी लाइन लगी है। फिलहाल हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है तो लाजमी है की सबसे लम्बी लाइन उसके नेताओ की ही होगी टिकट मांगने वालो में। अगर यहाँ हिसार की बात की जाए तो यहाँ के सभी 9 हलको में जितने कांग्रेस कार्यकर्ता है उन सभी के नाम टिकट मांगने वालो की सूची में शामिल है। भले ही वो ब्लाक प्रधान हो या फ़िर चाहे कार्यकर्ता मात्र हो। भाजपा, इनलो व् हजंका जैसी पार्टिया भी इसी उधेड़बुन में है की किस सीट से किसको टिकट दी जाए। मजेदार बात तो यह है की कोई नेता टिकट मेरी है बोल कर जनसंपर्क अभियान शुरू किए हुए है तो कोई जनसभा कर कह रहा है की बस अब आपके आर्शीवाद की जरुरत है टिकट तो मेरी पक्की है। कोई भी पार्टी टिकट किसी को भी दे वो उसके ऊपर निर्भर है लेकिन यहाँ मेरी इस गुफ्तगू का पहलु यह है की आख़िर नेताओ ने टिकट के लिए यह कब्बडी क्यो शुरू कर रखी है। इससे वो जनता को क्या संदेश देना चाहते है और क्या दिखाना चाहते है। अगर ये नेता ऐसा कर यह संदेश देना चाहते है की उनको टिकट मिलने से उनकी पार्टी जीत गई तो हार के बाद वो क्या करेंगे। इसके अतिरिक्त अगर कोई नेता अन्य नेता को पछाड़ टिकट ले भी आए तो क्या वो यह दिखाएगा की उसकी पार्टी में कितनी फूट है।
जितने नेता उतनी पार्टिया
दिल्ली पास होने के कारण हरियाणा का राजनितिक माहौल कोई आज से ख़राब नही है। जिसे देखो वो दिल्ली दरबार में हाजरी लगाने की बात करता है। चाहे वो कांग्रेस नेता हो या भाजपा नेता। इसीलिए कांग्रेस प्रभारी पृथ्वी राज चौहान ने हाल ही में कांग्रेस नेताओ को आगाह किया था की टिकट की चाह रखने वाले नेता दिल्ली न जाए। क्योंकि अबकी बार टिकट दिल्ली दरबार से नही अपितु जिला स्तर पर दी जाएँगी। साथ ही साथ हरियाणा में कांग्रेस का हाल तो उससे भी बुरा है। इसका मुख्य कारण है की यहाँ कांग्रेसी नेता नही नेता कांग्रेस है। कहने का अर्थ यह है की हरियाणा में यहाँ जितने नेता उतनी कांग्रेस है। यही कारण है की यहाँ टिकट मांगने वालो की लाइन हर बार अन्य प्रदेशो से अधिक होती जा रही है। यहाँ कोई मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडा का करीबी दोस्त टिकट मांग रहा है तो कही प्रदेश के वित्तमंत्री वीरेंद्र सिंह का नजदीकी। केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा का रिश्तेदारी में भाई भी कांग्रेस की टिकट मांगने वालो की लाइन में है तो नलवा विधानसभा सीट से सांसद नवीन जिंदल अपने मित्र को टिकट दिलवाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है।
ये तो राजनीति में बने रहने का मूल मन्त्र है
ऐसा नही है की अभी तक ये नेता सिर्फ़ टिकट पाने के लिए लाइन में ही लगे है। कुछ नेताओ ने तो टिकट पाने और चुनाव में जीत हासिल करने के लिए राजनीति के मूल मन्त्र को अपनाना भी शुरू कर दिया है। भले ही प्रदेश में चुनाव की घोषणा नही हुई हो उनको कोई फर्क नही पड़ता। लेकिन राजनीति में बने रहना है तो उसके मूल मन्त्र को तो आजमाना ही होगा। कुछ ऐसा ही सोच कर ये नेता दिन रात दौड़ धुप किए हुए है। जो जैसा नेता वैसे ही मन्त्र अपना रहा है। कोई जनसंपर्क अभियान के तहत दौरे कर रहा है तो कोई सभा कर जनता से आर्शीवाद मांग रहा है। अगर किसी ऐसे नेता की बात की जाए जो अपनी पार्टी में या फ़िर पैसे का दम रखता है तो वो बड़ी जनसभा कर जनता को अपने नेता की दुहाई दे रहा है की उसके नेता आपके लिए ये किया वो किया। अगर बात इससे ऊपर कि की जाए तो बात आती है पत्रकारों की। हिसार में कई ऐसे नेता है जो चाहे किसी पार्टी से जुडा हो या निर्दलीय चुनाव लड़ने की इच्छा रखता हो सभी को पत्रकारों का समर्थन तो चाहिए ही। कुछ ऐसा ही सोच कर आज कल ये नेता पत्रकारों को भोज देने में जुटे है। साथ ही इनको पता है की यह भी आज कल राजनीति का मूल मन्त्र है।


हरियाणा की राजनीति के ये फर्जी प्रोफेसर


इनलो सुप्रीमो ने दिया अपवाद को जन्म
हरियाणा के पूर्व वित्तमंत्री प्रो संपत सिंह ने 36 वर्षो के अपने लंबे राजनीतिक जीवन की शुरुवात भले ही पूर्व प्रधानमंत्री देवीलाल के साथ शुरू की हो लेकिन राजनीतिक पारी तो उन्होंने ओमप्रकाश चौटाला के साथ ही खेली है। इस बीच ओमप्रकाश चौटाला ने भी प्रो संपत सिंह का भरपूर फायदा उठाया है। यही कारण रहा है की इनलो में संपत सिंह दूसरे न. के नेता जाने जाते थे। उनकी राजनितिक पारी का एक अहम् पहलु यह भी है की उनके राजनीतिक जीवन पर आज तक कोई दाग नही है। यही कारण है की आज कोई नेता उन्हें इनलो का हीरा बता रहा है तो कोई उन्हें गोल्डन मै रहा है। लेकिन संपत सिंह की ये तारीफ इनलो सुप्रीमो ओमप्रका चौटाला के गले नही उतर रही। शायद इसीलिए उन्होंने संपत सिंह को फर्जी प्रोफेसर की संज्ञा देकर हरियाणा की राजनीति में एक नए अपवाद को जन्म दे दिया है। भले ही ओमप्रकाश चौटाला ने संपत सिंह को फर्जी प्रोफेसर की संज्ञा दे दी हो लेकिन वो यह नही बता पाए की हरियाणा की राजनीति में कौन सा नेता असली प्रोफेसर है जो अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगता है।
संपत सिंह द्वारा इनलो छोड़ने के बाद ओमप्रकाश चौटाला का कहना था की संपत सिंह बुद्धि जीवि नही है और संपत सिंह तो फर्जी प्रो. निकला। इसके 2 दिन बाद ही संपत सिंह ने कहा की उन्होंने कब कहा की वो प्रोफेसर है वो तो एक साधारण से प्रवक्ता (लेक्चरार)है। इसी वाद-विवाद से इस अपवाद ने जन्म ले लिया है की क्या राजनीति के वो सभी नेता फर्जी प्रोफेसर है जो अपने नाम के आगे प्रोफेसर लगते है। तो यह कहना ग़लत नही होगा की जी हाँ हरियाणा की राजनीति में जो भी नेता अपने आगे प्रो. लगाते है वो सभी फर्जी है। ये सभी महाविध्यालयो में पढाने वाले प्रवक्ता (लेक्चरार) है। जबकि राजनीति में आने के बाद इनके समर्थक इन्हे प्रो. कहने लगते है और यही कारण है की वो ही इनका सर नेम हो जाता है। जबकि असलियत यह है प्रो. बनने के लिए पहले लेक्चरार फिर रीडर और प्रोफेसर की डिग्री लेनी पड़ती है। जबकि हरियाणा के सरकारी महाविध्यालयो में कोई भी लेक्चरार प्रोफेसर नही है। बावजूद इसके ये नेता अपने को प्रोफेसर कहलवाने में गर्व महसूस करते है।
अगर संपत सिंह यह कहते है की उन्होंने कभी नही कहा की वो प्रोफेसर है तो कभी उन्होंने यह भी कभी नही कहा की उन्हें प्रोफेसर नही बुलाया जाए। इस कड़ी में हरियाणा के कई नेता शुमार है जो विधायक के साथ-साथ मंत्री पद को भी सुशोभित कर चुके है लेकिन आज भी उनके नाम के आगे प्रोफेसर जरुर लगा है। हरियाणा की राजनीति के इन फर्जी प्रोफेसरों में संपत सिंह के साथ-साथ भाजपा के प्रो. गणेशी लाल, इनलो के प्रो. रामभगत शर्मा और कांग्रेस के प्रो. छत्रपाल शामिल है। संपत सिंह द्वारा इनलो छोड़ने के गम ने भले ही हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को इस कदर घेर लिया हो की उन्होंने संपत सिंह को फर्जी प्रोफेसर तक कह दिया लेकिन अब देखना यह है की क्या उनकी इस टिप्पणी से हरियाणा के अन्य नेता या राजनीतिक दल अपने नेताओ के नाम के आगे से यह प्रोफेसर का सिम्बल हटवाने के लिए कोई कदम उठाते है या नही।


जन्मदिन पर पता चला आटे-दाल का भावः


सोमवार को मेरा जन्मदिन था। बड़ी खुशी की बात थी की मैंने 30 सावन देख लिए। अर्तार्थ जो सावन चल रहा है वो मेरे लिए 31 वा है। इसलिए रविवार को मन किया की सोमवार को अपने पाठको को पढने के लिए जो भी दिया जाए वो कुछ ऐसा हो की मैं कुछ यादगार पल अपने जन्मदिन पर जोड़ पाऊ। क्या लिखू, कैसा लिखू, किस विषय पर लिखू यही सोच कर मैंने न जाने कितनी ही साईट छान मारी। लेकिन कोई ऐसा मुद्दा नही मिल सका जिस पर मैं अपने पाठको से गुफ्तगू कर सकू। मन मार कर मैंने आशीष खंडेलवाल जी की हिन्दी ब्लॉग टिप्स ही खोल ली। पढ़ा की वो भी शनिवार को कुछ अपने पाठको के लिए हल्का फुल्का लिखने के लिए सोच रहे थे। उनकी यह लाइन पढ़ कर दिल में कुछ आया की अब तो अपने जन्मदिन पर कुछ तो अवश्य लिखूंगा। सोमवार को सारा दिन माथा-पच्ची करता रहा। लेकिन बात नही बनी। शाम होते-होते मेरे एक पत्रकार दोस्त का फ़ोन आया की सूर्य भाई तुम्हारे कार्यालय के बराबर में एक परचून की दूकान है उस से मेरे लिए उड़द की दाल लेकर रख लेना मैं अपना काम निपटा कर तुम से ले लूँगा। मैंने उससे पूछा की भाई साहब कितने की आएँगी तो उसने कहा की यही कोई 50 - 55 रुपए किलो होगी। जेब में हाथ मारा तो देखा की 100 का नोट रखा पाया। चलो मित्र का काम तो चल ही जायेगा सोच कर कुछ मिनटों में काम से फरीक हो कर मैं परचून की दूकान पर गया और 1 किलो दाल ले ली। मैंने दूकान स्वामी को 100 का नोट दिया तो उसने मुझे 35 रुपए वापिस दिए। मैंने कहा जनाब 35 क्यो 50 या 45 रुपए दोगे। उसने तपाक से जवाब दिया की पत्रकार महोदय सारा दिन फिल्ड में रहते हो आटे-दाल का भावः नही पता क्या। ना में गर्दन हिलाते हुए मैंने कहा नही श्री मान ऐसी तो कोई बात नही है लेकिन बताया गया है की 50 - 55 रुपए किलो आयेगी। तो उन महोदय का कहना था की वो ज़माने लद गए। मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने कागज-पैन निकल कर विस्तार से जानना चाहा। जब मुझे सारी जानकारी मिली तो सकपका सा गया की यह महंगाई और जेब में एक 100 का नोट। तो आने वाले समय में घर कैसे चलेगा। जब मैंने पूछा की इतनी महंगाई कब से आई है तो बताया गया की 2 से 3 महीनो में। कहने का अर्थ यह की चुनाव से कुछ समय पहले ही। मेरा सर चकराया और दाल हाथ में लेकर कार्यालय तक यही सोचता आया की क्या हल्का फुल्का लिखूंगा यहाँ तो सर ही भारी हो गया है। ये तो शुक्र है की अभी तक 31 सावन देख चुका हूँ लेकिन महंगाई ऐसे ही बढती रही तो..... एक वो जमाना था जब लोग दाल-रोटी खा कर 100 साल तक जी जाते थे लेकिन आज अगर महंगाई ऐसे ही बढती रही तो आने वाले समय में दाल-रोटी को भूलना पड़ेगा। मेरा दिमाग घुमा की अगर आटे-दाल के रेटों में इतनी तेजी आई है तो सरकार मुद्रा स्फीति दर 0 प्रतिशत कैसे दिखा रही है। कही सरकार जनता को उल्लू तो नही बना रही। बस यही सोचते सोचते मैंने अपनी पोस्ट लिख दी और लिखने के बाद ऐसा लगने लगा की दिल कुछ हल्का हो गया हो। आप भी देखिये की 2 महीनो में खाद्ध पदार्थो में कितनी तेजी आई है।

पहले आज के भावः और फिर 2 महीने पहले के भावः
मुंग साबुत - 55 - 45
मुंग धुली - 68 - 50
मसूर - 65 - 50
चना दाल - 35 - 25
उड़द साबुत - 50 - 40
राजमा - 45 - 45
काबली चना - 45 से 60 - 35 से 50
मुंग छिलका - 60 - 50
उड़द धुली - 65 - 50
उड़द छिलका - 58 - 46
मोठ - 52 - 30

इनके अतिरिक्त जिन खाद्ध पदार्थो के भावः आज आसमान छु रहे है वो भी प्रतिदिन हमारी जेब ढीली करवा रहे है। प्रतिदिन पीने जाने वाली चाय जो 2 माह पूर्व तक 120 रुपए किलो हुआ करती थी वो आज 160 से 200 रुपए किलो तक पहुँच गई है। जबकि हल्दी 60 रुपए हुआ करती जिसकी कीमत आज हमको 100 रुपए तक देनी पड़ रही है। मसालों के भावः सुन कर तो मैं ऐसे ही नमकीन हो गया जब मुझे पता चला की मसालों में भी 40 प्रतिशत से अधिक की तेजी आई है। अब आप ही बताये की ऐसे में मैं अपना जन्मदिन याद रखु या दुकानदार की बताई बात की भाई साहब आटे-दाल का भावः पता करो


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तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

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चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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