फौज, फौजी और हरियाणा


हरियाणा: यह शायद प्रदेश में हो रहे ओधौगिक विकास का ही असर है की एक ओर तो भारतीय सेना के उच्चाधिकारी सेना में भर्ती के लिए युवाओं की बाट जोह रहे है और दूसरी तरफ उनकी आशा के विपरीत मात्र 30 प्रतिशत प्रतिभागी ही भर्ती में हिस्सा लेने के लिए पहुँच रहे है. एक समय होता था जब भारतीय फौज में हरियाणा का दबदबा होता था. जाट लैंड के युवा फौजी बनने में गर्व महसूस करते थे. भारतीय फौज में हरियाणा का नाम जहाँ सबसे ऊपर होता था वहीँ युद्ध के समय हरियाणा के फौजी भी सबसे आगे होते थे. शायद ही ऐसा कोई युद्ध रहा हो जिसमे हरियाणा के वीरों ने अपना व् प्रदेश का नाम रोशन नहीं किया हो. लेकिन आज स्थिति यह है की हरियाणवी युवाओं में फौजी बनने को लेकर रुझान घट रहा है.
यहीं कारण है की सेना के आलाधिकारी जहाँ फतेहाबाद जिले से 6000 से अधिक प्रतिभागी आने की उम्मीद जता रहे थे वहीँ फतेहाबाद से मात्र 2300 प्रतिभागी ही सेना का भर्ती टेस्ट देने के लिए पहुंचे. इसमें भी मजेदार बात यह है की 2300 में से भी केवल 120 युवक ही सेना का फिजिकल टेस्ट का पहला चरण पूरा कर पाए. जो औसतन 0.5 प्रतिशत रहा. ऐसा ही कुछ हाल जींद जिले का भी रहा. भले ही जींद के युवा फतेहाबाद जिले के युवाओं से मोर्चा मार गए हो लेकिन सेनाधिकारियों की उम्मीदों पर खरा उतरने में वो भी नाकामयाब रहे. जींद से 4500 प्रतिभागी फौज में भर्ती होने के लिए हिसार पहुंचे थे लेकिन 400 युवा ही टेस्ट का पहला चरण पार कर पाए. जिसका औसतन लगभग 10 प्रतिशत रहा.
एक ओर जहाँ ओधौगिक व् व्यापारिक विकास के चलते पानीपत, करनाल, फरीदाबाद, गुडगाँव व् अम्बाला जिले के युवाओं का रुझान सेना के प्रति कम हो चुका है वहीँ सेना को हिसार, जींद, रोहतक, भिवानी व् फतेहाबाद जिले के युवाओं का सेना में भर्ती होने के लिए बेसब्री से इन्तजार रहता है. इस पर भी अगर कुल 0.5 या 10 फीसदी युवा ही फिजिकल टेस्ट पास कर पाएंगे तो वो दिन दूर नहीं जब हरियाणा के साथ वीरों की धरती का नाम जुड़ना बंद हो जायेगा. सेना में भर्ती के लिए युवाओं की घटती संख्या जहाँ दुःखदायी है वहीँ यह शायद हरियाणा का दुर्भाग्य ही है की बीते वर्ष सिरसा में हुए वायु सेना के भर्ती टेस्ट से वापिस लौट रहे युवाओं ने रेलगाड़ी में सफ़र कर रही एक लड़की के कपडे तक फाड़ दिए थे.


2011 - शर्मसार कर गया हमको


खट्टी - मीठी यादों के साथ साल 2011 हमको अलविदा कह गया. बहुत सी यादें छोड़ गया तो बहुत कुछ करने को सपने दे गया. लेकिन जाते-जाते यह हिसारवासियों को शर्मसार कर गया. शर्मसार सिर्फ इसलिए नहीं की हिसार ए फिरोजा की धरती पर साल गुजरते-गुजरते गुंडागर्दी के साथ-साथ जम कर तोड़-फोड़ हुई बल्कि यह दूसरा मौका था जब देश की "ए" ग्रेड यूनिवर्सिटी में "सी" ग्रेड काम हुआ. 31 दिसंबर की रात से पहले कुछ माह पूर्व जब गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय में कुछ गैर शिक्षक कर्मचारियों ने शिक्षकों को पीटा, उसे देख यह गुफ्तगू आम थी की कौन कह सकता है की यह तकनीकी विश्वविद्यालय "ए" ग्रेड विश्वविद्यालय की श्रेणी में आता है. जबकि 31 दिसंबर की रात 11:59 पर गुजवि में जो कुछ हुआ वो वाकई शर्मसार करने वाला था.
देश के कोने-कोने से गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय में पढने आये छात्रों को उनके परिजनों ने मात्र इसलिए भेजा था की हिसार ए फिरोजा की धरती पर जाकर उनके बच्चे अच्छे संस्कारों के साथ अपने उज्जवल भविष्य का आइना देखेंगे, लेकिन उन्हें क्या पता था की शराब के नशे में धुत उनके बच्चे 50 से अधिक कमरों के शीशे, दरवाजे तोड़ देंगे. इस दौरान आरोपी युवकों ने ना सिर्फ होस्टल वार्डन के कमरे, स्नानघर, कैंटीन सहित सभी जगह के बिजली उपकरणों सहित सारे सामान की तोड़ फोड़ की बल्कि बाद में टूटे सामान को होस्टल के बाहर ले जाकर उसे जला दिया. होस्टल नंबर 1 में नव वर्ष के आगमन पर हास्टल में रहने वाले और बाहर से आए युवकों ने खूब गुंडागर्दी  और दहशतगर्दी फैलाई.
हास्टल में गुंडागर्दी और दहशत फैलाने वाले युवकों को जो सामान सामने दिखा उसे तोड़ते चले गए. उनकी जुबान से एक ही बात निकल रही थी कि यहां के हम हैं डॉन, और नए साल का जश्न डॉन ऐसे ही मनाते हैं. यह घटना जितनी शर्मनाक है उससे भी ज्यादा शर्म की बात तो यह है की गुजवि प्रशासन ने विश्वविद्यालय में पढने वाले हजारों बच्चो की परवाह किये बिना अज्ञात युवकों के खिलाफ मामला दर्ज करवा दिया. हालांकि जिस हास्टल में यह वारदात हुई उस हास्टल के सैकड़ो बच्चे इस घटना के गवाह है. इतना ही नहीं इस वारदात के प्रत्यक्षदर्शी वो सुरक्षा कर्मी भी है जो रात को डयूटी पर तैनात थे. मजेदार बात तो यह है की प्रशासन ने यह जानने का प्रयास तक नहीं किया की तोड़-फोड़ और गुंडागर्दी करने वाले युवक आखिर कौन थे.


क्रिसमस : ITS MY LIFE



सबसे पहले तो गुफ्तगू के सभी पाठकों को क्रिसमस कि हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई. 
मेरे दिल को यह बात सकून देने वाली है की मेरा देश अपने भीतर अनेक संस्कृतियों और परम्पराओं को समेटे हुए है. इसीलिए हमको समय-समय पर मनाये जाने वाले विभिन्न त्यौहारों का आंनंद उठाने का अवसर भी मिलता है. यही कारण है कि प्रत्येक हिन्दुस्तानी देश में मनाये जाने वाले हर त्यौहार में बराबर का हिस्सेदार बनता है. हम यहाँ जितनी ख़ुशी से होली व् दीवाली को मनाते है उतनी ही ख़ुशी हर भारतवासी को ईद व् क्रिसमस मनाने में भी होती है. लेकिन पता नहीं क्यों फिर भी कभी-कभी मेरे मन को एक बात कचोटती रहती है की आखिर आज भारतीय त्यौहारों में ऐसी क्या कमी आ गई की युवा तो युवा जवान-बुजुर्ग भी भारतीय त्यौहारों को मनाने से पीछे हटने लगे है.
कभी दिल कहता है कि आज देश का युवा होली व् दीवाली को कम और पश्चिमी त्यौहारों को बड़े चाव से मनाने लगा है तो कभी लगता है आज की युवा पीढ़ी भारतीय त्यौहारों की रूढ़िवादिता से निकल कर अपनी इच्छा के अनुरूप जीना चाहती है. युवाओं के विचार परम्पराओं के बंधन से मुक्त स्वतंत्रता की उचाईयों को छूना चाहते है तो कभी उनकी इच्छा रहती है की सभी बंदिशों से दूर खुले वातावरण में सांस लेने की. यहीं वजह रहती है की आज जहाँ क्रिसमस को मनाने के लिए प्रति वर्ष भारतीयों की संख्या बढती जा रही है वही युवा तो युवा देश का प्रबुद्ध व्यक्ति भी अनेकों पश्चिमी त्यौहारों की ओर आकर्षित होने लगा है. एक बारगी तो ऐसा लगता है की यही कारण है की पश्चिमी देश भारतीय त्यौहारों की कमीयों का फायेदा उठाने से नहीं चुक रहे.
तो क्या वाकई देश का युवा पाश्चात्य संस्कृति की और खींचा चला जा रहा है या भारतीय त्यौहारों में पाई जाने वाली असमानता से वो ऊब चुका है. ऐसा नहीं है की मैं क्रिसमस पर चर्च नहीं जाता. हर बार की तरह अबकी बार भी मैं क्रिसमस के अवसर चर्च गया था लेकिन यह देख मैं स्तब्ध था की प्रत्येक वर्ष की भाँती इस वर्ष भी क्रिसमस मनाने वालो की संख्या पहले से कहीं अधिक थी. यह मेरे लिए कोई दुखद नहीं था लेकिन गुफ्तगू का विषय यह था की जहाँ कुछ त्यौहारों पर अपराधी किस्म के लोग अपनी गतिविधियों को अंजाम देने लगे है वही दीवाली जैसे त्यौहार आतंकियों के निशानों पर होते है. इसी की परिणिति है की अन्य धर्म अपनी रणनीति में कामयाब होते हुए पाश्चात्य संस्कृति की आड़ में अपने धर्म का प्रचार कर रहे है.
आज का युवा भारतीय परम्परा और संस्कृति से ऊपर उठ कर कुछ नया करने और पाने की फिराक में है. इन युवाओं में जहां लड़कियों की अधिकता थी वहीँ लड़के भी इनके पीछे-पीछे नजर आये. ठण्ड के मौसम में खिली धूप और रविवार के दिन का लाभ उठाते हुए सुबह से ही हिसार के सेंट थॉमस चर्च में भीड़ लगनी आरम्भ हो गई थी. चर्च में युवाओं की यह संख्या कम होने कि बजाय सुबह से दोपहर, शाम और रात होने तक स्थिर ही रही जबकि शाम ढलते-ढलते कुछ सपरिवार लोग आते दिखाई दिए. कोई गुलाब का फूल भगवान् यीशु को चढ़ा रहा था तो कोई मोमबती जला कर प्रार्थना कर रहा था. कुछ युवा चर्च के किसी कोने खड़े होकर बतिया रहे थे तो कुछ लड़के-लड़कियां हाथ में हाथ डाल कर मोमबती जला रहे थे.
कुल मिला कर सब कुछ पश्चिमी लग रहा था. ऐसा नहीं है की यह गुफ्तगू क्रिसमस के विरोध में है, लेकिन अपनी सभ्यता को भूल कर कोई अन्य त्यौहार मनाना कहाँ कि संस्कृति है. जबकि मजे की बात यह थी की अक्सर मंदिरों में लगने वाली लाइनों में जहां धक्का-मुक्की देखी जाती है वही चर्च में लगने वाली लाइन शांतिप्रिय ढंग से आगे बढ़ रही थी. जूते उतारने पर भी कोई पाबन्दी नहीं थी तो हाथ धोना भी कोई जरुरी नहीं था. अगर युवाओं के जीने का तौर-तरीका इसी कदर बदलता रहा तो वो समय दूर नहीं जब वो सिर्फ यहीं कहेंगे की ITS MY LIFE, और आने वाली पीढ़िया हमसे यह पूछेंगी की आखिर हमारी सभ्यता और संस्कृति क्या थी. इसके लिए हमको ही कुछ सोचना होगा और सोच कर कुछ करना होगा.


वाह रे मेरे देश के युवा



आजकल अन्ना  का जादू सबके सिर  चढ़  कर बोल रहा है. बूढ़े हो, जवान हो या फिर हो युवा, सभी को मौका मिल गया है एक मुद्दा मिल गया है कुछ करने का. अभी हाल ही की तो बात है. एक युवा प्रेस-नोट देने प्रैस कार्यालय आता है. संयोगवश उसे वहां उसके एक बुजुर्ग परिचित मिल जाते हैं. बुजुर्ग, युवा से पूछते हैं कि यहां कैसे आना हुआ? युवा बताता है कि मैंने भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन में अपना समर्थन देने हेतु अन्य युवा साथियों के साथ गांव से शहर तक पैदल जनजागरण यात्रा निकाली है और लोगों को जागरुक किया है. बुजुर्ग युवा से बातों ही बातों में पूछते हैं कि आजकल क्या कर रहे हो तुम? पढ़ाई जारी है या पूरी हो गई? हां, पढ़ाई तो पूरी हो गई है, अब तो सरकारी नौकरी का इंतजार है, युवा ने बताया. बुजुर्ग टक से बोले- सरकारी नौकरी तो बहुत मुश्किल है भई, फिर तुम्हें.......। युवा मुस्कुराते हुए बोला- आप समझे नहीं, इस बार मेरे दादा जी गांव के सरपंच हैं और रही बात एक-दो या पांच लाख की तो वो भी दे देंगे. एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो एक साल में सारे पूरे कर दूंगा. सो तो है-बुजुर्ग ने कहा. उन दोनों की बात सुन रही कार्यालय स्टाफ कहती है-वाह रे मेरे देश के युवा, एक तरफ तो तुम भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में अपना समर्थन करते हो और दूसरी तरफ स्वयं ही..........।

- सुमन वर्मा -


इतने अन्ना कहाँ से आयेंगे


एक अन्ना, एक सरकार और एक ही कानून को बनाने की कवायद. 12 दिन के अनशन व् एक लम्बी जद्दोजहद के पश्चात् बात कुछ आगे बढ़ी और विपक्ष सहित सरकार जन लोकपाल बिल पर बहस हो तैयार हो गई. विपक्ष हो या भले ही सरकार या यूँ कहे की सम्पूर्ण राजनितिक दलों के इसी घाल-मेल का हम जश्न तो मना चुके है लेकिन कामयाब कब होंगे यह अभी तक किसी को पता नहीं है. लेकिन जनता की एकजुटता ने यह अवश्य दिखा दिया की किस कदर भ्रष्टाचार रूपी दानव से वो परेशान है. जनता का परेशान होना भी लाजमी है और भ्रष्टाचार विरोधी हवन में आहुति डालना भी जरुरी है. लेकिन क्या देश में सिर्फ भ्रष्टाचार ही एक ऐसी बिमारी है जो हमको खोखला किये जा रही है.
अगर आप भी ऐसा सोच रहे है तो आप गलत है. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे जी ने आवाज क्या उठाई सभी को भ्रष्टाचार दिखाई देने लगा. मानो इस से पहले किसी को पता ही नहीं था की आखिर यह भ्रष्टाचार भला किस बला का नाम है. जैसे-जैसे अन्ना जी का कारवाँ आगे बढ़ा वैसे-वैसे हम अपनी अन्य परेशानियों को भूलते चले गए. हम भूल गए की जिस तरह हमको भ्रष्टाचार से दो-चार होना पड़ता है उसी तरह हमारे जीवन की रोजमर्रा की ऐसी बहुत सी चीजें है जिनसे हमको जूझना पड़ता है. फर्क मात्र इतना है की हम उन चीजों के लिए आपस में गुफ्तगू तो करते है लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर हुए आन्दोलन के बाद अब इन्तजार कर रहे है की कौन इन चीजों के लिए हमारे लिए आवाज उठाएगा. 
अगर अपनी परेशानियों को लेकर रोज होने वाली उन गुफ्तगू का मैं यहाँ कुछ जिक्र करूँ तो सबसे पहले बात आती है महंगाई की. इसके साथ-साथ लुप्त होती भारतीय संस्कृति, सुरक्षा व्यवस्था, कानून व्यवस्था, ट्रैफिक व्यवस्था, आज की युवा पीढ़ी व् बदन दिखाती युवतियाँ भी शामिल है. ये सभी वो समस्याएं है जिनको हमें भ्रष्टाचार की तरह कभी-कभी नहीं अपितु प्रतिदिन झेलना पड़ता है. लेकिन मजे की बात यह है की इन सभी के खिलाफ हमने आज तक कुछ नहीं किया और ना ही कर सकते है. तो इसका मतलब अगर हम जन लोकपाल बिल के बारे में भी ऐसा सोच लेते तो क्या सरकार संसद में बहस को तैयार हो पाती. अगर आप ऐसा सोच रहे है तो फिर यही कहूँगा की आप गलत है. 
अब समझा मैं की आप अब तक चुप क्यों है. क्योंकि आप यहीं सोच रहे है अब फिर कोई अन्ना बन कर आपकी जिंदगी में आये और आपकी इन समस्याओं के लिए लड़े. एक आन्दोलन खड़ा हो और आप गर्व से कह सके की अन्ना तुम आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है. जैसे आपने तो ठान लिया है की कभी खुद कुछ नहीं करना. छी, शर्म आती है मुझे आपकी यह सोच देख कर. फिर क्यों एक खद्दर की टोपी पहन कर जिस पर लिखा था की मैं अन्ना हूँ कुछ दिन पहले तक आप अपने को अन्ना बता रहे थे. अगर आपकी हर समस्या के समाधान के लिए आपको अन्ना चाहिए तो इतना ही कहूँगा की इतने अन्ना कहा से आयेंगे. अब उठो, जागो और आगे बढ़ो जिससे आपको भी अन्ना हजारे की तरह एक भारतीय कहलाने में गर्व महसूस हो.


आग पश्चिम की, धुँआ भारत का


मंगलवार को विश्व तम्बाकू दिवस था. बहुत से साथियों ने तम्बाकू पर बहुत कुछ लिखा और कुछ मेरे जैसे भी थे जो लिखने से रह गए. लेकिन कहते है की देर आये दरुस्त आयें. कुछ इसी सोच के साथ आज लिखने बैठ गया. लेकिन आज एक अजब सा इतिफाक हुआ. जहाँ आज मैं यह सोच रहा था की भारत में सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करने पर रोक लगी हुई है वहीँ पुलिस अभिनेता सलमान को सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करने के दोष में पकड़ने पहुँच गई. गुफ्तगू हुई की आखिर पुलिस सलमान खान को ही पकड़ने क्यों गई जबकि आज हम प्रतिदिन सैकड़ों लोगो को धुम्रपान करते देख लेते है. तो पता लगा की सलमान को मिडिया वालों ने फिल्म की शूटिंग के दौरान धुम्रपान करते दिखाया था. समाचार का पहलु यह है की सड़क पर चलते, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सरकारी कार्यालय व् अस्पतालों सहित विभिन्न सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान करते लोग आज प्रशासन को नजर नहीं आते लेकिन समाचारों में सार्वजानिक स्थान पर धुम्रपान करते सलमान खान अधिकारियों को जरुर दिखाई दे गए.
अब आप ही देख लो की आज जिन पर हमें गर्व है, जिन्होंने भारत का नाम दुनिया में रोशन किया है उन मुट्ठीभर भारतीय युवक-युवतियों को छोड़ दीजिए, लेकिन भारत की सडक़ों पर, पब में, वाइन शॉप में, सिनेमा हॉल में, धार्मिक उत्सवों में और साइबर कैफे  में जिन युवाओं की जमात देखने को मिल रही है उस पर कतई गर्व नहीं किया जा सकता। क्योंकि इस तरह के युवा ना सिर्फ पथ भ्रष्ट हो चुके है बल्कि देश की संस्कृति के लिए सबसे खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। ये हमारे समाज का कल्चर और देश का माहौल बदल रहे हैं। इनकी सोच न तो भारतीय है और न ही इन्होंने खुद की कोई मौलिक सोच डेवलप की है। ना ही उसे किसी विदेशी संस्कृति में ढाला है। ये सभी एक शहरी कोलाहल और पश्चिमी चकाचौंध के बीच अँधी दौड़ के अनुसरणकर्ता हैं।
इन्हें देख यहीं लगता है की यह आग तो पश्चिम की है लेकिन फर्क मात्र इतना है की उस आग का धुंआ जरुर भारत से निकल रहा है. क्या आप जानते है की आखिर आज के युवाओं का ये मूढ क्या गुल खिला रहा है. शायद इसमें इनका कोई दोष भी नहीं है। नकलचियों की ये जमात वर्तमान युग की कई खोखली चीजों से प्रभावित होती है। पहली ब्लयू फिल्मों से, दूसरी पब संस्कृति से और तीसरी इंटरनेट से। इन तीनों का ही कल्चर कुछ इस तरह का है कि ये युवाओं में एक नई सोच के बजाय एक घातक सोच को विकसित कर रहे हैं।
मोबाइल और इंटरनेट:- इंटरनेट की दुनिया में जितनी जानकारियों का संग्रह है, उतना जंजाल भी है। युवा इंटरनेट से ज्ञानवर्धक सामग्री ये ज्यादा कुछ ऐसी बातें खोजते हैं, जो उनके नैतिक पतन का रास्ता तैयार करती है। जैसे कि वेब पोर्टलों पर सुरक्षित यौन संबंध के उपाय क्या-क्या हैं, हार्ड कोर पोर्न साइट, वीडियो, ब्लॉग पर यौन स्टोरिज ऐसे कई टॉपिक हैं, जिन्हें युवा इंटरनेट पर देखने/पढऩे के लिए हर समय बेताव रहते हैं। इंटरनेट पर सोशलनेटवर्किंग साइट्स के जरिए नए दोस्त बनाना बेहद आसान है और फिर इन दोस्तों के साथ सारी हदे पार करने की सीख और प्रोत्साहन भी इंटरनेट से ही मिलता है।
पब कल्चर का प्यार:- बड़े शहरों में बढ़ते पब कल्चर ने लडक़ों-लड़कियों का काम और भी आसान कर दिया है। डिस्को और काम करके खिसको के कल्चर ने सब लचर-पचर कर दिया है। पब ने लडक़ों के साथ लड़कियों को भी नशे में झूमने की सुविधा उपलब्ध करा दी है। यह सब चलता है एडवांस एज और मॉर्डनसिटी के नाम पर। सुनने में यहाँ तक आ रहा है कि कुछ कामकाजी लड़कियों के अलावा नाइट कॉलेज की लड़कियाँ, काल सेंटर या ग्लैरम से जुड़ी लड़कियाँ और माँ-बाप द्वारा खुली छोड़ दी गई लड़कियाँ शराब के अलावा गालियाँ बकना भी सीख गई हैं और देर रात तक घर आना तो अब आम चलन हो चला है।
विज्ञान की मेहरबानी:- विज्ञान की मेहरबानी से अब कुछ ऐसे साधन भी हैं जैसे गर्भनिरोधक गोलियां और बाजार में उपलब्ध दूसरी तरह के गर्भनिरोधक साधनों जिन्होंने अब काम और भी आसान कर दिया है।
आफत में ऑफिस :- काल सेंटर, फैशन, एड, ग्लैमर वर्ल्ड, बैंकिंग, आई-टी सेक्टर या फिर कोई भी प्राईवेट कंपनियों में अब लडक़े और लड़कियों का अनुपात लगभग समान हो चला है। इसमें से कुछ नवविवाहित हैं तो कुछ नहीं भी, लेकिन हैं सभी युवा। सभी उस कल्चर का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जहाँ काम से ज्यादा लोग चापलूसी, दिखावा, रणनीति और प्रेम संबंधों में ज्यादा रत रहते हैं और इनकी आड़ में अपना-अपना मतलब साधने की फिराक में रहते हैं।
शीशा लाऊँज:- इस शीशा लाऊँज से दम मारो दम की तर्ज पर ग्रुप में मजा लिया जाता है। यह धुआँ सिगरेट और अन्य नशे से ज्यादा घातक है क्योंकि पानी के जरिए पहुँचा निकोटिन फेफड़ों में स्थाई रुप से जम जाता है। उससे कहीं  अधिक घातक लगता है किसी भी शीशा लाऊँज का वह माहौल जिसमें लडक़े-लड़कियाँ बेसुध से नशीली हालत में एक-दूसरे को घुरते रहते हैं।
आखिर क्यों अखरता है:- खुली संस्कृति की वकालत करने वाले और इसकी मुखालिफत करने वाले दोनों ही उस तूफान में बह रहे हैं जोकि पश्चिम से उठा है। पश्चिम तो उस तूफान से निजात पाने के तरीके ढूँढ रहा है, लेकिन भारत को अभी तूफान का मजा चखना है। पाश्चात्य कल्चर की वकालत करने वाले कह सकते हैं कि आखिर आपको अखरता क्यों हैं, हमारी मर्जी चाहे हम निर्वस्त्र नाचें।
दिशाहीन युवा:- पश्चिम को मालूम है कि हम कहाँ जा रहे हैं और हमें कहाँ जाना है। चीन जानता है कि उसकी दिशा क्या है। लेकिन भारत के युवा किसी चौराहें पर खड़े नजर आते हैं। उक्त बातों के खिलाफ लोग हाथ खड़े कर सकते हैं- लेकिन बहुसंस्कृति, बहुधर्मी और दुष्ट राजनीतिज्ञों के इस देश में वही होता है जो विदेशी चाहते हैं.


आओ पैसा-पैसा खेंले


आओ पैसा-पैसा खेलते है. लगता है आपको भी बात समझ में नहीं आई. पहले मुझे भी समझ में नहीं आई थी. लेकिन जब इस पहेली का राज खुला तो मै हैरान-परेशान था. लगा की आज जिंदगी जुआ और काम मैच हो गया है. जिसको देखो सिर्फ मैच की बात ही कर रहा है. सिर्फ इसलिए नहीं की वो क्रिकेट का शौकीन है लेकिन इसलिए की जहाँ वर्ल्ड कप और इसके बाद होने वाले आईपीएल के कारण लोगो को काम मिल गया है वहीँ सट्टा बाजार पूरे उफान पर है. माना जा रहा है की एक तो भारत में वर्ल्ड कप होना और दूसरा भारतीय टीम के बीते दिनों के अच्छे प्रदर्शन के कारण वर्ल्ड कप में अरबो रूपये का सट्टा लगने का अनुमान है.
भारत की जीत के साथ वर्ल्ड कप का आक्रामक आगाज हुआ. शाम होते होते जैसे-जैसे वीरेंद्र सहवाग एक-एक बाल पर रन जुटा रहे थे वैसे-वैसे बाजारों से रौनक ख़त्म होती जा रही थी. एक समय वो आया जब बाजार बिलकुल सुने नजर आने लगे थे. अगर वर्ल्ड कप तक ऐसे ही रहा तो ग्राहकों के भरोसे दो वक्त की रोटी जुटाने वाले दुकानदारों का क्या होगा. अगर पहले मैच में यह हाल था तो आने वाले चार-पांच महीनो में क्या होगा यह सोच-सोच कर मै परेशान था. कुछ यही सोच कर आपसे गुफ्तगू करने बैठ गया. सोचा की शायद आपको ही पता हो की अगर ऐसे ही क्रिकेट पर सट्टा लगता रहा तो आज की युवा पीढ़ी का भविष्य क्या होगा.
अब राज है तो खुलेगा भी और खुलेगा तो गुफ्तगू भी होगी. अब पहलू यह है की जब बाजारों से काम ही ख़त्म हो जायेगा तो पैसा कैसे आएगा. जब पैसा ही नहीं आएगा तो काम कैसे चलेगा. इसका जवाब मुझे तब मिला जब मुझे किसी ने बताया की अब पांच महीनो के लिए लोगो को तो ऐसा काम मिल गया की कोई और काम करने की जरुरत ही नहीं है. शुरू में तो मै नहीं समझ पाया तो किसी ने बताया की वर्ल्ड कप शुरू हो गए है न. मैंने कहा की यह तो लगभग दो महीने ही चलेंगे. उसने फट से कहा की वर्ल्ड कप ख़त्म होते ही आईपीएल शुरू हो रहे है. बात कुछ समझ में आई लेकिन यह नहीं समझ पाया की मैचो से काम और घर कैसे चलेगा.
क्रिकेट, मैच और सट्टे के साथ आज इनको खेलने का अंदाज भी बदल गया है. आज वो समय नहीं है जब सिर्फ जुआ एक टीम की हार-जीत का लगता था. समय के साथ-साथ आज हर बाल, खिलाडी, ओवर, पावर प्ले, क्वार्टर फ़ाइनल, सिमी फ़ाइनल और यहाँ तक की फ़ाइनल मैच में भी कौन सी टीम पहुंचेगी इस तक का सट्टा लगता है. एक समय वो भी आता है जब एक ही बाल पर या तो हजारों आने की उम्मीद होती है या लाखों लगने की नौबत तक आ जाती है. कुछ भी हो लेकिन इतना जरुर है की सट्टा बाजार के चलते पहले वर्ल्ड कप और इसके बाद होने वाले आईपीएल से लोगो खासकर कर युवाओं को बहुत सी उम्मीदे है.
पुलिस को भी मिला काम
क्रिकेट मैचो के दौरान एक और जहाँ पुलिस विभाग का काम भी बढ़ जाता है वहीँ यह कहने में भी कोई अतिश्योक्ति नहीं की पुलिस भी इन मैचो का पूरा फायेदा उठाते हुए पैसा-पैसा खेलती है. मैचो के दौरान समाचार पत्रों में यह समाचार आम होता है की पुलिस ने आज छापा मार कर इतने की नगदी पकड़ी और कितने जुआरी पकडे गए. लेकिन यह किसी को नहीं पता होता की इस बीच पुलिसकर्मी कितने ही पैसे डकार जाते है. ऐसा नहीं होता की पुलिस विभाग को नहीं पता हो की सटोरिये कहाँ से अपना नेटवर्क चला रहे है. लेकिन कमी होती है तो सिर्फ सतर्कता की, और जब पैसा हो तो कैसी सतर्कता. सटोरिये भी पुलिस द्वारा की जाने वाली किसी भी कार्यवाही से बचने के लिए मोटी रकम देकर उन्हें पहले ही खुश कर देते है. 
इनका रखना होगा ख्याल 
वर्ल्ड कप के मद्देनजर भले ही सट्टा बाजार सक्रिय हो गया हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं की सट्टे की मालामाल दुनिया से दूर क्रिकेट का जूनून पूरे यौवन पर है. बूढ़े हो या जवान या भले ही हो लडकियां, क्रिकेट का भूत सबके सर चढ़ कर बोल रहा है. इन सबमे वो बच्चे भी शामिल है जो शायद क्रिकेट में ही अपना भविष्य खोज रहे है. ऐसे में अगर सट्टे के कारण भारत यह वर्ल्ड कप अपनी ही धरती पर खेलते हुए नहीं जीत सका तो इन मासूमो के दिल पर क्या बीतेगी यह कोई भी नहीं जानता, लेकिन सोचना और समझना जरुरी हो जाता है की पैसा-पैसा खेलने के साथ-साथ सरकार, प्रशासन, खिलाडी और क्रिकेट बोर्ड खेल और जनता की भावना को जाने.


आखिर बिकता क्या है



बहुत दिनों से कुछ सोच रहा था लेकिन साथ ही उस सोच के एक सोच और चल रही थी. सोच सोच में सोचना मुश्किल सा लग रहा था की जो मै सोच रहा हूँ उसको शब्द कैसे दूँ. यही कारण था की मैंने सोचने में ही लगभग एक सप्ताह निकाल दिया. आज जाकर उस सोच को कुछ शब्द दे पाया हूँ. मुद्दा ही कुछ ऐसा था की सोचना भी जरुरी था और आपको बताना भी जरुरी. वैसे तो बात बड़ी छोटी सी है लेकिन जब कोई बात समझ में नहीं आये तो वो गुफ्तगू बन जाती है. अब देखो ना मेरी समझ में यह नहीं आ रहा की आज बाजार में बिकता क्या है.
अब आप भी सोच में पड़ गए होंगे की यह मै क्या पूछ रहा हूँ. जी हां आज कल के विज्ञापनों, भले ही वो कोई पोस्टर, कैलेण्डर या फिर कोई होर्डिंग हो उन्हें देख यह समझ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगता है की आखिर आज बिकता क्या है. क्योंकि प्रचार की इन सब चीजों में उत्पाद व् उत्पादन करने वाली कंपनी का नाम कम और एक मॉडल के देह का प्रचार कुछ ज्यादा ही नजर आता है. ऐसा कोई सिर्फ एक-आधी कंपनी ही नहीं करती अपितु आज हर कंपनी इस दौड़ में कूद पड़ी है. भले ही वो कंपनी किसी भी चीज का उत्पादन कर रही हो.
अब देखो ना किंग फिशर ने हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 2011 का कैलेण्डर जारी किया है. जैसी की उम्मीद जताई जा रही थी कुछ उसी अंदाज में धूम-धड़ाके के साथ यह रंगीन कैलेण्डर निकाला गया. मेरी जब भी कभी किसी वाइन शाप पर नजर पड़ती तो उस कंपनी के नाम से पहले अर्ध नग्न लड़कियों की फोटो पहले दिखाई देती. मै अक्सर सोचता की एक वाइन के बोर्ड पर आखिर इस लड़की का क्या काम. मेरे लिए यह सोचना मुश्किल था की वाइन लड़के ज्यादा पीते है या लडकियां वाइन की ज्यादा आदि होती है.
अगर वाइन पीने वालो में आदमियों की तादाद ज्यादा है तो लड़कियों की देह को क्यों दिखाया जाता है. क्या शराब कम्पनियां शराब के साथ-साथ शबाब परोसना चाहती है या फिर मॉडलों अर्ध नग्न देह दिखा कर अपनी बिक्री बढ़ाना चाहती है.


कहीं यह भेडचाल तो नहीं









पूरे विश्व में क्रिसमस का त्यौहार जोश और हर्षौल्लास के साथ मनाया गया. किसी ने चर्च में मोमबती जला कर इसे मनाया तो किसी ने प्रार्थना कर इस त्यौहार में अपनी आहुति दी. इसाई समाज के लोगो ने जहां क्रिसमस को अपने अंदाज में मनाया वहीँ हिन्दू संस्कृति के लोगो में इस त्यौहार के प्रति भेडचाल ही दिखाई दी. जिसमे युवाओं की संख्या अधिक देखने को मिली. बात हिसार की कि जाएँ तो यहाँ इस धर्म के कुछ ही परिवार रहते है लेकिन चर्च में जो नजारा देखने को मिला उसे देख यह ज्ञात होना स्वाभाविक ही था की आज का युवा भारतीय परम्परा और संस्कृति से ऊपर उठ कर कुछ नया करने और पाने की फिराक में है. इन युवाओं में जहां लड़कियों की अधिकता थी वहीँ लड़के भी इनके पीछे-पीछे नजर आये.
तो क्या यह मान लिया जाएँ कि आज युवा भारतीय संस्कृति कि रुढीवादिता से ऊपर उठाना चाहता है. सुबह से ही हिसार के सेंट थॉमस चर्च में भीड़ लगनी आरम्भ हो गई थी. इस भीड़ में जवानो और बुजुर्गो की संख्या नाम मात्र थी तो युवाओं कि भागीदारी उम्मीद से कहीं ज्यादा थी. युवाओं की यह संख्या कम होने कि बजाय सुबह से दोपहर, शाम और रात होने तक स्थिर ही रही जबकि शाम ढलते-ढलते कुछ सपरिवार लोग आते दिखाई दिए. कोई गुलाब का फूल भगवान् यीशु को चढ़ा रहा था तो कोई मोमबती जला कर प्रार्थना कर रहा था. कुछ युवा चर्च के किसी कोने खड़े होकर बतिया रहे थे तो कुछ लड़के-लड़कियां हाथ में हाथ डाल कर मोमबती जला रहे थे.
कुल मिला कर सब कुछ पश्चिमी लग रहा था. कुछ ऐसे भी थे कि गालो से गाल मिला कर एक दूसरे को क्रिसमस की बधाई दे रहे थे. ऐसा नहीं है की यह गुफ्तगू क्रिसमस के विरोध में है, लेकिन अपनी सभ्यता को भूल कर कोई अन्य त्यौहार मानना कहाँ कि संस्कृति है. जबकि मजे की बात यह थी की अक्सर मंदिरों में लगने वाली लाइनों में जहां धक्का-मुक्की देखी जाती है वही चर्च में लगने वाली लाइन शांतिप्रिय ढंग से आगे बढ़ रही थी. जूते उतारने पर भी कोई पाबन्दी नहीं थी, हाथ धोना भी कोई जरुरी नहीं था. सबकी अपनी-अपनी परम्परा और त्यौहार मनाने के तरीके है. भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा त्यौहार मनाये जाते है लेकिन आज हिन्दुओ का ध्यान ही इन त्यौहारों से उचट रहा है.
यहाँ यह सोचने की जरुरत है की ऐसी कौन सी बात हो गई या हमारे त्यौहारों में क्या कमी आ गई की आज की पीढ़ी इन्हें भूलती जा रही है. क्यों हर वर्ष क्रिसमस पर चर्च में हिन्दुओ की संख्या बढती जा रही है. क्यों आज का युवा इस त्यौहार के प्रति जागरूक दिखाई दे रहा है. हमको ही कुछ सोचना होगा और सोच कर कुछ करना होगा. और अगर सिर्फ यह भेडचाल है तो हमको इसे रोकना होगा.


बस सिर्फ एक भारत ही दिखा


एक स्कूल का एक मंच लेकिन यहाँ सैकड़ो बच्चो जब विभिन्न पारंपरिक वेशभूषा में घूमते देखा तो एक बारगी तो लगा की पूरा भारत यहाँ एकत्रित हो गया हो. फिर भले ही इन बच्चो की भाषा अलग हो या रंग रूप. इन सभी का मकसद एक था की जिस देश की माटी में उन्होंने जन्म लिया है, इस स्कूल में बने मंच पर गीत के माध्यम से उसी माटी का गुणगान करना. मौका था भारत विकास परिषद् की राष्ट्रीय स्तर की समूहगान प्रतियोगिता का. 13 - 14 नवम्बर को हिसार में होने वाली इस समूहगान प्रतियोगिता का समापन रविवार को हो गया. पूरे देश के 41 प्रान्तों से आये लगभग 500 बच्चो ने रविवार को हिसार को अलविदा कहा. 13 नवम्बर को बड़े ही धूमधाम से प्रतियोगिता का आगाज हुआ. यह बात अलग है की कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्दू नहीं आ पाए लेकिन अपने देश भक्ति के गीतों से बच्चो ने जो समां बांधा हिसारवाशियों ने कभी उसकी कल्पना भी नहीं की थी.
प्रतियोगिता के रीजनल राउंड में भले ही बच्चो ने तमिल, उड़िया, गुजराती या फिर पंजाबी में गीत गाये हो लेकिन उनके परिधान और देश भक्ति से ओत प्रोत गीत यह बताने के लिए काफी थे की यह सभी भारतवाशी है. राष्ट्रीयता की भावना, देश की मान मर्यादा पर मर मिटने का आह्वान, आजादी की अनुभूति और स्वस्थ, समर्थन एवं संस्कृति पर बच्चो ने जिस कदर गीत प्रस्तुत किये उससे पंडाल में उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए. जैसे तैसे कर शनिवार का दिन इन बच्चो के लिए अच्छा बीत गया. लेकिन इनको नहीं पता था की रविवार को विदाई का दिन है. सभी बच्चे जहा अपनी-अपनी जीत को लेकर आश्वस्त होकर सोये थे वही दूर राज्यों से आये बच्चो की आँखे नम दिखाई दी. आयोजक भी अपने को नहीं रोक पाए. कहते है ना की बच्चे तो भगवान् का रूप होते है. और जब एक साथ इतनी तादात में बच्चो का समागम हो तो आँखे नम होना स्वाभाविक ही है.
बच्चे भी ऐसे की जो अपनी प्रस्तुति से लोगो के दिल में घर कर गए हो. फिर भले ही वो प्रतियोगिता में कोई स्थान हासिल कर पाए हो या नहीं. रविवार को जैसी की उम्मीद जताई जा रही थी नवजोत सिंह सिद्दू समापन समारोह में अवश्य आयेंगे वो तो नहीं आये लेकिन इस अवसर पर शिरकत करने वाली भाजपा नेत्री स्मृति इरानी भी शामिल नहीं हो पाई. राष्ट्रीय समूहगान प्रतियोगिता के रीजनल राउंड में दक्षिण कर्नाटक को पांचवा, उत्तर हरियाणा को चौथा, पश्चिम बंगाल को तीसरा, आसाम को दूसरा और दक्षिण पंजाब ने पहला स्थान प्राप्त किया. हिंदी फाग में आसाम को पांचवा, महाराष्ट्र - II को चौथा, दक्षिण हरियाणा को तीसरा, पश्चिम हरियाणा को दूसरा और दक्षिण दिल्ली को पहला स्थान मिला.


जब हर नजर बलात्कार करती है


मेरे द्वारा की गई इस गुफ्तगू को मैं नाम देना चाहता था मेरी एक अनचाही पोस्ट. बहुत सोचा की मैं यह पोस्ट ना लिखू. क्योंकि कोई कहेगा की आज समय परिवर्तनशील है तो कोई मुझे ही दोष देगा की आखिर मुझे क्या पड़ी है. जैसा चल रहा चलने दो. लेकिन आखिरकार मैं अपने दिल को नहीं समझा पाया और पोस्ट लिख दी. इसका एक कारण था की मेरी यह गुफ्तगू सहज होने वाली उन बातो का हिस्सा नहीं है जिन बातो को आज की युवा पीढ़ी ने चिंताजनक बना दिया है. शायद इसीलिए मुझे इस गुफ्तगू को बलात्कार जैसे घिनौने अपराध से जोड़ना पड़ा. मैं भी क्या करता आज का माहौल देख कर मजबूर था. इसके अतिरिक्त लड़के-लडकियों सहित प्रत्येक माता-पिता को मेरी इस गुफ्तगू का हिस्सा बनाना चाहता था. अब कोई मुझे यह बताये की क्या आज हम यह मान ले की हमारे बच्चे आज सुरक्षित है. अगर लड़का है तो मारपीट का डर और अगर लड़की है तो लडको की कुदृष्टि का डर. शायद आज पूरे देश में यही माहौल है और नाम दिया जाता है की हम पश्चिमी सभ्यता में जी रहे है.
फिर ऐसी सभ्यता में साँसे लेकर क्या फायेदा जब आज कोई माता-पिता अपने बच्चो को सुरक्षित ही नहीं समझ रहा हो. भले ही वो आज कितना ही होनहार क्यों ना हो या पढ़ाई में अव्वल आता हो. बावजूद इसके अगर बच्चे घर-परिवार में समय से नहीं पहुँचता तो डर सताने लगता है. लेकिन फिर भी आज हम अपने बच्चो की तरह कोई ध्यान नहीं दे पा रहे है क्योंकि समय नहीं है. समय क्यों नहीं है इसके बारे में मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जिक्र किया था की समय बलवान है. लेकिन यंहा बात है तो सिर्फ फैशन की. गर्मी को हम सभी देख ही रहे है की इस भीषण गर्मी ने किस कदर लोगो का जीना मुहाल किया हुआ है लेकिन सबसे चिंताजनक जो बात है वो यह की गर्मी के बहाने फैशन ने युवाओं को किस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया है. या यह कहा जाये की नाम गर्मी का और बोलबाला फैशन का. यही कारण है की आज लडकिया आधे-अधूरे कपडे पहन रही है. अगर यहाँ खूबसूरती का जिक्र ना कर सिर्फ पहनावे की बात की जाये तो आज साधारण से साधारण लड़की भी अगर स्लीवलेस है तो भी लड़के आहे भरने से नहीं चुकते. अगर इस पहनावे से ऊपर की बात की जाये तो जींस-टॉप, स्कर्ट या लैगिंग-टॉप तो मैं यही कहूँगा की वाकई मेरे देश के युवाओं का भविष्य  उज्व्वल नहीं है. इसका मुख्य कारण यह है की ऐसे कपडे पहने हर लड़की पर लडको की कुदृष्टि सदा रहती है. लड़की कितनी ही कोशिश कर ले लडको की नजरो से बचने की लेकिन लड़के है की घूरने से नहीं चुकते. क्योंकि आज लडकियों की जींस निक्कर हो गई है तो टॉप बनियान. लडको द्वारा घूरने का सिलसिला जब तक चलता है तब तक तो ठीक है लेकिन एक समय ऐसा आता जब लड़के नजरो ही नजरो में लडकियों का बलात्कार करने पर आमदा हो जाते है. उस समय लडकिया कभी अपना टॉप संभालती नजर आती है तो कभी शरीर को ढकने की कोशिश करती है.
आप मुझ से ज्यादा समझदार है. अब आप ही बताएं की क्या वाकई हमारे युवाओ का भविष्य उज्जवल है या आने वाले समय में हर नजर ऐसे ही लडकियों का बलात्कार करती रहेंगी.


मुबारक हो, आज नववर्ष है


आज सुबह से ही दोस्तों और परिचितों के एसएम्एस आने लगे थे. हर रोज की तरह कोई अच्छे दिन की बधाई दे रहा था तो कोई गुड मोर्निंग विश कर रहा था. कुछ मित्रो ने नवरात्रे की भी बधाई दी तो लगा की चलो किसी युवा को तो नवरात्र के बारे में ज्ञान है. घर में नवरात्र की पूजा होनी थी तो जल्दी उठाना था. मैं आज प्रतिदिन से लगभग एक घंटा जल्दी तैयार हो गया था. कार्यालय पहुँचते-पहुँचते 10 बज चुके थे और तब तक मेरे पास पांच से छः एसएम्एस आ चुके थे. जैसा की मैंने ऊपर बताया की हर प्रकार के एसएम्एस थे लेकिन यह देख बड़ा दुःख हुआ की किसी ने भी मुझे हर वर्ष की भांति नववर्ष की मुबारकबाद नहीं दी.
तभी मुझे याद आया की आज का युवा विक्रमी संवत को कैसे याद रख सकता है क्योंकि उसको तो डे मनाने की आदत जो लग गई है. आज वो बर्थ डे, क्रिसमस डे, न्यू ईयर, वेलनटाइन डे सहित मदर्स डे जैसे त्यौहार ही


मिशन भारतीय त्यौहार बचाओ


होली, दीवाली वो भारतीय त्यौहार है जो त्यौहार के साथ-साथ भारत की परम्परा और संस्कृति के अनेको रंग अपने अन्दर समेटे हुए है. यही कारण है की स्कूल के समय से ही बच्चो को इन त्योहारों और इनसे जुडी भावनाओ के बारे में बताया जाता है. आज से कुछ समय पहले तक इन त्योहारों को कैसे मनाया जाता था यहाँ यह बताने की जरुरत नहीं है लेकिन यह सोचने की आवश्यकता जरुर है की क्या आज ये त्यौहार अपने सही रूप में मनाये जा रहे है या नहीं. तो जवाब में सिर हिलेगा की नहीं.
अभी कुछ दिनों पहले तक खबर छप रही थी की देश में बाघों की कमी है और बहुत जल्द भारत में बचे 1411 बाघ ख़त्म हो जायेंगे. समीर जी ने अपनी पोस्ट में लिखा की बाघ की नहीं देश की सोचो. अगर देश में जंगल ही नहीं बचेंगे तो बाघ का क्या करोगे. सच लिखा है. अब देखो ना स्कूल के दिनों में पढाया जाता था की होली


भारतीय संस्कृति के रूप में मने वैलंटाइंस डे


आज कल मैं एक अजीब सी गफलत में रहता हूँ. पता नहीं क्यों कही भी दिल नहीं लगता. सारा दिन कुछ ना कुछ सोचता रहता हूँ. सोचने के साथ-साथ अगर कोई काम लग गया और कुछ समय बाद अगर उस सोचे हुए को याद करना चाँहू तो याद नहीं आता. कहने का भाव यह है की फिर से दिमाग के 12 बजाने बैठ जाओ. सुबह घर से यह सोच कर निकलता हूँ की आज कोई अच्छी सी स्टोरी पर काम करेंगे. उसमे से कुछ मैटर अपनी पत्रिका के लिए सहेज कर रखूँगा और कुछ से गुफ्तगू करूँगा. बस मेरी यही सोच मुझे सारा दिन परेशान करे रखती है. अब और हम कर भी क्या सकते है. सारा दिन पत्रकारिता करो और जो समय बचे


फैशन में खो गई भारतीय संस्कृति


फैशन क्या हुआ की आज हर किसी के सिर चढ़ कर बोल रहा है. बुजुर्ग हो या जवान भले ही फिर हो युवा. हर कोई फैशन की और खींचा चला जा रहा है. माना की आज युवा भारतीय संस्कृति में फल-फूल रहा है लेकिन आज वो साँसे फैशन की दुनिया में ले रहा है. मैं यहाँ यह नहीं कहना चाहता की फैशन को छोड़ देना चाहिए लेकिन अपनी संस्कृति को देखते हुए यह एक हद तक ही जायज है. कही ऐसा ना हो की एक दिन फैशन मेरे द्वारा कुछ दिनों पूर्व की गई गई मेरी गुफ्तगू को सच कर दे की फैशन की आड़ में मेरे देश की बहु-बेटिया लोगो की आँखों की किरकिरी बन जाये. वो गुफ्तगू पढने के लिए यहाँ क्लिक करे. तो यहाँ बात चल रही थी


बीमारियों को आमंत्रण देती सैक्स दवाये


सैक्स: यह शब्द सुनते ही युवा हो या बुजुर्ग, एकबारगी तो सबके कान खड़े हो ही जाते हैं। मुद्दा यह नहीं कि ऐसा क्यों होता है, जबकि यह बात अवश्य विचारणीय है कि आज सैक्स के लिए लोग क्या नहीं कर गुजरना चाहते। और अगर ऊपर से सर्दी का मौसम हो तो सुभानअल्लाह। यही कारण है कि आजकल हर समाचार-पत्र में सैक्स से सम्बन्धित विज्ञापनों की भरमार है। इन विज्ञापनों में कोई कम्पनी पावर को बढ़ाने का दावा करती है तो कोई सैक्स की सभी बीमारियों


युवाओ के सिर चढ़ कर बोलने लगा क्रिसमस का जादू


गुफ्तगू के सभी पाठको को क्रिसमस कि हर्दिक शुभकामनाये. कभी-कभी यह सुनकर बहुत अच्छा लगता है कि मेरा भारत देश अपने भीतर अनेक संस्कृतियों को समेटे हुए है. इसीलिए हमको समय-समय पर भारत में मनाये जाने वाले विभिन्न त्योहारों का आंनंद उठाने का अवसर भी मिलता है. हम यहाँ जितनी ख़ुशी से होली व् दीवाली को मनाते है उतनी ही ख़ुशी हर भारतवासी को ईद व् क्रिसमस मनाने में भी होती है. यही कारण है कि प्रत्येक हिन्दुस्तानी देश में मनाये जाने वाले हर त्यौहार में बराबर का हिस्सेदार बनता है. लेकिन पता नहीं क्यों फिर भी मेरा दिल कहता है कि कही ना कही हमारे त्योहारों में ही कमी है की आज देश का युवा होली व् दीवाली को कम


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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