अब हाथी पहनेगा चश्मा, गठबंधन की घोषणा


हरियाणा मे नये समीकरण : इनेलो ने बसपा से मिलाया हाथ


चंडीगढ़ : इनेलो-बसपा के गठबंधन की चर्चा कुछ महीनों से प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चल रही थी और इनेलो के नेता इस बारे में इशारा भी कर रहे थे। बीते महीने बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर अभय चौटाला ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर शुभकामनाएं दी थी जिसके बाद चर्चाएं और ज्यादा तेज हो गई थी। इस विषय पर पूछे गए एक सवाल पर अभय चौटाला ने कहा था कि बसपा संस्थापक कांशी राम जी के साथ चौधरी देवीलाल के घनिष्ठ संबंध थे और अगर वे गठबंधन करेंगे तो डंके की चोट पर घोषणा के साथ करेंगे।
शायद यही कारण रहा की प्रदेश की राजनीति में नये सियासी समीकरणों को हवा देते हुए प्रमुख विपक्षी दल इनेलो व बहुजन समाज पार्टी ने आगामी चुनावों के लिए हाथ मिलाया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता अभय सिंह चौटाला, बसपा उत्तर भारत प्रभारी डा. मेघराज एवं प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश भारतीय ने यहां आयोजित पत्रकार सम्मेलन में समझौते की घोषणा की। फिलहाल समझौते की घोषणा की गई है लेकिन कौन दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, यह बाद में दोनों दलों के नेता बैठक करके तय करेंगे।
अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद इनेलो बसपा की बैसाखी के सहारे लोकसभा चुनाव में उतरने जा रही है। अभय चौटाला ने इस गठबंधन को तीसरे मोर्चे की नई शुरुआत बताया। उन्होंने कहा इस गठबंधन का अर्थ है कि अब किसान, दलित, पिछड़े और कमेरे वर्ग मिलकर नई पहचान बनायेंगे। गठबंधन के ऐलान के साथ ही उन्होंने 'हरियाणा की बनायेंगे नई पहचान-अब समय बदलाव का' नारा दिया।
बसपा का इनेलो से दूसरी बार गठबंधन हुआ है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा में इनेलो व बसपा के बीच गठबंधन की बात कोई नई नहीं है। दोनों दलों के बीच 1998 में भी गठबंधन हुआ था और तब इनेलो-बसपा के बीच क्रमश: 6-4 लोकसभा सीटों पर समझौता हुआ था, यानि छह सीटों पर इनेलो व चार सीटों पर बसपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनेलो ने छह में से चार सीटें जीतीं थी, जबकि बसपा को चार में से सिर्फ एक सीट पर ही विजय हासिल हुई थी। इनेलो व बीजेपी में गठबंधन होने पर 1999 में इनेलो ने बीएसपी से किनारा कर लिया था।


जब भाजपा का उपवास..., उपहास सा लगने लगा


अधिकतर पदाधिकारी रहे दूर, आए वो कुछ देर में चलते बने, कुछ पहुंचे मात्र औपचारिकता निभाने


हिसार। कांग्रेस पर संसद न चलने देने का आरोप लगाते हुए देशभर में भाजपा के आह्वान पर किये गए उपवास का भाजपाइयों ने ही मजाक बना डाला। उपवास कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे वहीं अधिकतर नेता मौके
पर आकर औपचारिकता निभाकर जाते रहे। यही नहीं, जिले में विभिन्न विभागों, बोर्डों व निगमों के सात चेयरमैनों में से केवल एक चेयरमैन ही उपवास में नजर आए वहीं अन्य बड़े नेता भी कन्नी काटते नजर आए।
भाजपा के राष्ट्रीय आह्वान पर उपवास कार्यक्रम रखा गया था। हिसार में अग्रसेन चौक के उसी पार्क को भाजपा ने उपवास स्थल चुना, जिसमें कांग्रेसियों ने उपवास किया था। भाजपाइयों का उपवास कार्यक्रम भी कांग्रेसियों से कम नहीं रहा। जिस तरह कांग्रेसियों का उपवास कार्यक्रम मजाक बनकर रह गया वहीं भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। भाजपा के अधिकतर पदाधिकारी ही इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, एक प्रदेशस्तरीय नेता लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उक्त नेता के बारे में प्रसिद्ध है कि वह हर कार्यक्रम में देरी से पहुंचकर केवल बैठने के लिए सीट हथियाने के प्रयास में रहता है। बताया जाता है कि उक्त नेताजी को उपवास कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं थी और उन्हें अपने मीडिया प्रभारी के माध्यम से उपवास कार्यक्रम की जानकारी मिली थी। हुआ यूं कि उक्त नेताजी के मीडिया प्रभारी किसी तरह पत्रकारों को मिल गये और जब पत्रकारों ने उससे पूछा की नेताजी उपवास में हैं क्या, तो मीडिया प्रभारी का कहना था कि किस बात का उपवास, आज पार्टी का कोई कार्यक्रम है क्या? इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से पूरी जानकारी लेकर अपने आका को फोन किया और उपवास कार्यक्रम में जाने की सलाह दी, जिस पर उक्त नेताजी लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी हाजिरी लगवाई। 
पार्टी के इस उपवास कार्यक्रम से कुछेक को छोड़कर अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे। पार्टी आए दिन नई नियुक्तियों की घोषणा करती है लेकिन नई नियुक्तियों वाले तो दूर, पुराने पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी पार्टी जुटा नहीं पाई और हालत यह हो गई कि निर्धारित पार्क भरना तो दूर, चौथाई हिस्से में बैठकर सत्तारूढ़ भाजपाइयों को कांग्रेस पर हमले करने पड़े।


मुदृदा तो बस एक बहाना है


मुद्दा तो बस एक बहाना है, लक्ष्य तो राजनीति चमकाना है. आज के नेताओ की यहीं सोच जनता के गले की हड्डी बनी हुई है. किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा की क्या तो वो खुद करें और और क्या उनके लिए नेता कर रहे है. क्योंकि राजनितिक पार्टियां और उनके नेता जनहित की बात कर जो भी मुद्दे उठाते है वो जनहित के कम और राजनीती करने के लिए ज्यादा नजर आते है. अगर यहाँ बात देश-प्रदेश की करें तो ऐसे बहुत से मुद्दे नजर आयेंगे जिनको लेकर राजनितिक पार्टियों और नेताओ ने हो-हल्ला तो बहुत किया लेकिन नतीजा शुन्य मात्र ही रहा. इनमे से ही एक मुद्दा है परमाणु उर्जा संयंत्र का. इन दिनों यह मुद्दा सभी राजनीतक दल उठाये हुए है. फर्क मात्र इतना है की जिस प्रदेश में जो दल सत्ता में है सिर्फ वो चुप है बाकि सभी परमाणु उर्जा संयंत्र के लगाने का विरोध कर रहे है. इन दिनों देश में बहस छिड़ी हुई है कि यह ऊर्जा विकासकारी है या विनाशकारी। जापान में आए भूकंप व सूनामी के बाद फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में मची तबाही ने इस बहस को तेज कर दिया है। जहां-जहां परमाणु संयंत्र लगने प्रस्तावित हैं, वहां पर परमाणु ऊर्जा का विरोध करने वाले पहले से अधिक सक्रिय हो चुके हैं और ऐसे ही राजनीतिक पार्टियां भी इस अवसर को भूनाने से पीछे नहीं हैं। अगर जनता है तो धरना-प्रदर्शन व् नेता है तो पत्रकारवार्ता कर अपना विरोध जाता रहे है. ऐसी राजनीतिक पार्टियां इस वक्त परमाणु ऊर्जा का विरोध तो कर रही हैं, लेकिन सत्ता में आने पर परमाणु संयंत्र हटाने की बात करने या संसद में परमाणु ऊर्जा के खिलाफ आवाज उठाने की बात पर केवल विचार कर रही हैं।
ऐसा ही एक वाक्या पिछले दिनों हिसार में हुआ। हिसार के पड़ोसी जिले फतेहाबाद में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र का प्रदेश में सभी पार्टियां विरोध कर रही हैं। विरोध कर रहे किसानों का साथ देने में भला भारतीय जनता पार्टी कैसे पीछे रह सकती थी। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव कैप्टन अभिमन्यु ने पिछले पखवाड़े हिसार में अपने निवास पर पत्रकारवार्ता आयोजित की. पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने जोरशोर से परमाणु संयंत्र का विरोध किया। मगर, जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी परमाणु संयंत्र स्थापित करने के खिलाफ संसंद में आवाज उठाएगी तो पहले उन्होंने कहा कि वह सांसद नहीं हैं, जो संसद में आवाज उठाएं। फिर जब उनसे पूछा गया कि यहां बात उनकी नहीं बल्कि उनकी पार्टी की हो रही है तो उन्होंने कहा कि विचार किया जाएगा। एक अन्य पत्रकार ने पूछा कि क्या उनकी पार्टी केंद्र की सत्ता में आने पर परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बंद कर देगी, तो इस पर भी वह कुछ खास नहीं कह पाए और कहा कि पार्टी विचार करेगी।
अब ऐसे राजनीतिक नेताओं से कोई ये पूछे कि क्या ये पार्टियां केवल राजनीतिक फायदा लेने के लिए ही किसी मुद्दे का विरोध या समर्थन करती हैं। जब उनकी पार्टी फतेहाबाद में लगने वाले परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध कर रही है और परमाणु ऊर्जा को मानवता के लिए खतरा मानती है तो उनकी पार्टी को यह मुद्दा संसद में उठाने या सरकार आने पर परमाणु संयंत्र बंद करने के लिए विचार करने की जरूरत क्यों है। जब केवल बातें या धरने-प्रदर्शन न करके व्यावहारिक कदम उठाने की बात आती है तो क्यों पार्टी विचार करने की बात कहती है। क्यों इस मुद्दे का विरोध कर रही राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि ईद के चांद की तरह संयंत्र का विरोध कर रहे किसानों के समर्थन में कभी-कभार ही नजर आते हैं।


वो बिजली-पानी का खेल


अक्सर देखने में आता है की बिजली और पानी दोनो ऐसी चीजे है जो राजनेताओ सहित राजनीति को भी अपने इर्द-गिर्द चक्कर काटने पर मजबूर रखती है. कहने का अर्थ यह है की आज देश का राजनेता बिजली और पानी की राजनीति में ही उलझ कर रह गया है या यह कहे की वो जनता को उलझाये रखता है. यही कारण है की आज देश का कोई भी प्रदेश हो बिजली और पानी जैसे मुद्दे सिर उठाये खड़े है. ऐसा नहीं है की इन मुद्दों को ख़त्म नहीं किया जा सकता लेकिन मुश्किल तो यह है की इन दोनों ही मुद्दों को राजनेता ख़त्म ही नहीं करना चाहते. कारण वही की करनी है तो सिर्फ राजनीति. फिर अगर इन्ही मुद्दों को सुलझा लिया गया तो उनके पास यह बताने के लिए कुछ मिलेगा ही नहीं की उनकी सरकार ने क्या किया और क्या करना अभी बाकी है. यही कारण है की लगभग दो दशक से सतलुज-यमुना लिंक नहर के पानी की हरियाणा का किसान अभी तक मुंह बाए बाट जोह रहा है. इतना जरुर है की किसान को पानी तो नहीं मिला लेकिन एसवाईएल को लेकर पंजाब और हरियाणा की राज्य सरकारे समय-समय पर अपनी राजनीति चमकाती रही है. मजेदार बात तो यह है की जब पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की सरकार थी तो हरियाणा में औमप्रकाश चौटाला की. उल्लेखनीय है की दोनों ही नेता अपने को पगड़ी बदल भाई कहते है. लेकिन ना तो बादल ने पानी देने की हां भरी तो ना चौटाला ने ही कहा की हरियाणा को उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए. उधर कांग्रेस हरियाणा में शोर मचाती रही की चौटाला एसवाईएल मुद्दे पर चुप बैठे है. इस मुद्दे को लेकर अभी दोनों ही प्रदेश की राजनीति अपने चरम पर थी की पंजाब व् हरियाणा में कांग्रेस की सरकारों ने गद्दी संभाल ली. लेकिन तब भी स्थिति जस की तस रही. आज फिर पंजाब में बादल सत्ता में है तो हरियाणा में कांग्रेस. लेकिन पानी है की मुद्दा बन कर ही रह गया है. ऐसा ही कुछ हाल बिजली का है. जहा तक मुझे याद आ रहा है की हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. बंसीलाल अपने शासन के अंतिम समय में यही कह गए थे की अब हरियाणा को बिजली के लिए किसी अन्य राज्य पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा. उस समय उन्होंने पानीपत थर्मल प्लांट की नींव रखी थी. उसके बाद गर्मी बीती सर्दी का मौसम आया लेकिन कोई भी सरकार बिजली के मामले में जनता के इरादों पर खरा नहीं उतर सकी. जब भी किसी नेता से बात की गई तो उनका कहना था जनता की बिजली की जरुरत बढ़ गई है इसलिए बिजली की पूर्ति करना बहुत मुश्किल है. जब कभी राजनीति करने की जरुरत पड़ी तो फिर वही राग अलापा जाता की अब खेदड़ प्लांट शुरू होने को है अब हरियाणा में बिजली की कोई कमी नहीं होगी. लेकिन आज हिसार के खेदड़ प्लांट की इकाई भी शुरू हो चुकी है लेकिन बिजली समस्या है की ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही है. अब तो ऐसा लगने लगा है की भले ही जनता बिजली-पानी के लिए त्राहि-त्राहि करती रहे नेताओ को क्या फर्क पड़ता है. उन्हें तो सत्ता और सत्ता सुख से मतलब है.इसी सत्ता सुख के चलते आज बिजली और पानी नेताओं के लिए महज एक खेल बन कर रह गया है.


सरकार में घोटाले या घोटालो में सरकार


आज हर जगह कांग्रेस सरकार में हुए घोटालो की चर्चा है. सुना था की पैसो में गर्मी कुछ ज्यादा होती है शायद यही कारण है की नोटों की गर्मी के आगे जहां बिहार की चुनावी तपत फीकी लग रही है वही संघ-कांग्रेस भी अपनी लड़ाई भूल गई है. नेता तो नेता जनता भी सोच रही है जब नेताओ ने घोटालो के पैसो की इतनी गर्मी खाई है तो हम भी कुछ हाथ सेंक ले. भले ही जनता के हाथ कुछ ना लगे लेकिन मुद्दा तो मुद्दा है. खबरिया चैनल भी कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले को भूल गए तो कांग्रेस भी संघ के पूर्व सरसंघ चालक सुदर्शन द्वारा सोनिया गाँधी को सीआईए का एजेंट कहे जाने को भूलती नजर आ रही है. इससे पहले जहां संघ नेताओ का आतंकवादी घटनाओं में हाथ बताने को लेकर कांग्रेस चर्चा में थी तो वही सुदर्शन द्वारा सोनिया गांधी को सीआईए एजेंट कहने पर कांग्रेस ने खूब बवाल मचाया. दोनों ही तरफ से धरने-प्रदर्शनों का दौर चला. जनता ने भी सभी समाचार खूब दिल से सुने और पढ़े. लेकिन एक के बाद एक घोटालो के उजागर होने से आज कांग्रेस चुप्पी साधे हुए है वही भाजपा को भी बड़ा मुद्दा मिलने से संघ भी चुप हो गया है.
रही बात घोटालो की तो जिस तरह से पहले कॉमनवेल्थ गेम्स फिर महाराष्ट्र के आदर्श हाउसिंग सोसाईटी और अब 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले में सरकार घिरी नजर आ रही है उसे देख तो यही लगता है की यह सभी घोटाले कांग्रेस सरकार में नहीं अपितु घोटालो में कांग्रेस सरकार है. कहने का भाव यह है की यह सभी घोटाले कांग्रेस सरकार में नहीं हुए. अगर ऐसा होता तो किसी भी एक घोटाले के पश्चात सरकार नहीं तो उसका कोई मंत्री-संतरी तो अवश्य कुछ बोलता लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले में दिल्ली सरकार की चुप्पी जहां चिंताजनक रही वही केंद्र और सोनिया गाँधी का मौन देश के लिए दुखदायी था. उसके पश्चात महाराष्ट्र जमीन घोटाले के पश्चात मुख्यमंत्री अशोक चव्हान की छुट्टी करने में हुई देरी में भी कहीं ना कहीं कांग्रेस सरकार ही दोषी थी. इन सब के पश्चात बात शुरू हुई 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले की तो देश और राजनितिक पार्टियों में घमासान ही मच गया. रही सही कसर सर्वोच्च न्यालय ने प्रधानमन्त्री से जवाब मांग कर पूरी कर दी. देश के आला नेता प्रधानमन्त्री से जवाब मांगने को शर्म की बात बोल कर राजनीति कर रहे है.
कहते है की नेताओ को तो राजनितिक रोटिया सेंकने का मौका चाहिए. तो भला इससे अच्छा मौका कब और कैसे मिल सकता है. अब तो केंद्र सरकार के साथ रहने वाले लालू-मुलायम भी 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले में प्रधानमंत्री से जवाब मांगने लगे है. अब सबकी नजर देश के युवराज राहुल गाँधी पर टिकी थी की कब वो कुछ बोले और यह मुद्दा किसी तरफ शांत हो जाएँ. अक्सर राहुल गाँधी कांग्रेस के लिए भगवान् साबित हुए है. तो आखिरकार यह मौका भी आ गया लेकिन अबकी बार वो जो कुछ भी बोले वो मेरी समझ में नहीं आया. इसके कई कारण है लेकिन अगर मै एक पत्रकार की नजर से देखूं तो यह ब्यान सिर्फ प्रधानमन्त्री के बचाव में था ना की देश हित में. उन्होंने कहा की अदालत द्वारा प्रधानमन्त्री से जवाब माँगना कोई शर्म की बात नहीं है. शायद सही कहा उन्होंने. जब नेता बेशर्म हो कर देश का अरबो-खरबों रुपया खा सकते है तो जवाब देने में शर्म कैसी. फिर भले ही इससे पहले ऐसा हुआ हो या नहीं. लेकिन उनकी यह टिप्पणी इतना जरुर स्पष्ट कर गई की वाकई आज किसी नेता को जनता के हितो से कोई सरोकार नहीं है.
इन सभी घोटालो में सरकार ही है इससे अच्छा उदहारण और क्या हो सकता है की सरकार शुरू से ही अपने लोगो का बचाव करती रही. चाहे वो कलमाड़ी हो या फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हान. जबकि राजा के मुद्दे पर क्या कुछ हुआ वो सभी ने देखा और सुना. अभी हाल ही में राजस्थान के भाजपा नेताओ ने सरकारी दस्तावेजो के साथ यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है की कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए राजस्थान के पूर्व राज्यपाल के पुत्र को 2000 करोड़ रूपए की राशी बेवजह दी गई. इससे पहले भी जो नाम उजागर हुए है वो सभी सरकार के ही नुमाइंदे है. कुल मिला कर अगर यह कहा जाये की कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटाले में हर स्तर के नेताओ का मुहं बंद करने के लिए मोटी रकम दी गई थी तो गलत नहीं होगा. जबकि प्रतिदिन लाखों रुपया खर्च कर चलने वाली संसद की कार्यवाही भी भ्रष्टाचार और घोटालो की भेंट चढ़ रही है. लेकिन कांग्रेस व् सरकार के कानो पर जूं तक नहीं रेंग रही. जब नेताओ की ही नहीं सूनी जा रही तो भले ही जनता कुछ भी बोलती रहे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि जब नेताओ का पेट भरा हो तो जनता की सुनता कौन है.


जब खिलाडियों के सिर्फ निराशा ही हाथ लगी


वैसे तो आज कॉमनवेल्थ गेम्स देशवाशियो के लिए निराशा का सबब बने हुए है. शुरू से लेकर अब तक कभी मैदानों पर तो कभी तैयारियों को लेकर इन गेम्स पर उंगली उठती रही है. लेकिन इन सब के बीच हिसार की जनता के लिए यह ख़ुशी का समय है की एक साथ चार-चार खिलाडी कॉमनवेल्थ गेम्स में हिसार का प्रतिनिधित्व कर रहे है. इतना ही नहीं हिसार ने देश को अनेको खिलाडी दिए है जिन्होंने समय-समय पर देश-विदेश में अपना परचम लहराया है. लेकिन एक समय ऐसा आया जब इन खिलाडियों के हाथ सिर्फ निराशा ही लगी. मौका था क्वींस बैटन रिले का.सबसे पहले हरियाणा में हिसार को ही क्वींस बैटन रिले की मेजबानी करने का मौका मिला था लेकिन शायद यह खिलाडियों की बदकिस्मती ही थी की भारी राजनीति के चलते क्वींस बैटन हिसार के बाहरी इलाको में आई भी और मात्र 15 मिनट में ओझल भी हो गई. फतेहाबाद से हिसार जिले के गाँव शंकरपुरा में जब बैटन ने प्रवेश किया तो लोगो ने ढोल-नगाडो से इसका स्वागत किया लेकिन यह देख उनको निराशा हुई की बैटन एक गाडी में थी. भारी सुरक्षा इंतजाम होने के कारण जहाँ जनता को पता ही नहीं लगा की बैटन कौन सी गाडी ने है वही खिलाडी भी बैटन को तांकते रह गए.
उल्लेखनीय है की हिसार के राजेन्द्र भाला फैंक कर तो जोगिन्द्र सिंह बाक्सिंग में अपना दमखम दिखायेंगे. महिला खिलाडियों में निर्मला बूरा कुश्ती के जरिये गोल्ड मैडल पाने के लिए मैदान में उतारेगी तो पूनम मालिक की चाह है की हाकी में वो अपे प्रतिद्वंदियों के दांत खट्टे करे.


ना बिमारी का पता लगा ना दवा ही मिली


गुफ्तगू ने समाचार के माध्यम से हिसार में जाट आरक्षण के नाम पर जो कुछ घटित हुआ उसकी विस्तार से जानकारी आपको दी. लेकिन कुछ जानकारिया अभी आप तक पहुंचानी बाकी रह गई. यह वो जानकारिय थी जो समाचारों से उठ कर जनता के लिए गुफ्तगू बन गई. यही गुफ्तगू आप तक पहुंचा रहा हूँ. शायद आपको समाचार का वो पहलू समझ में आ सके जिसके लिए गुफ्तगू प्रयासरत्त है. अब तक की सभी गुफ्तगू में आपको बताया गया की कैसे दो नेताओ ने आरक्षण की आग को हवा दी. पुलिस फायरिंग में एक छात्र की मौत के पश्चात किस तरह से ग्रामीणों ने आगजनी व् लूटपाट की वारदातों को अंजाम दिया. नेताओ ने भी अपना पक्ष रखा और हिंसा को रोकने की बजाये बयानबाजी तक ही वो कैसे सिमित रहे.
किसी को कुछ नहीं मिला और आखिरकार दोनों बाहरी नेताओ को अपनी-अपनी गाडियों से हाथ तक धोना पड़ा. शुक्र है की उन्होंने भाग कर अपनी जान तो बचा ली. लेकिन सोचने वाली बात यह है की चरम तक पहुंची हिंसा के पीछे ना बिमारी का पता लगा और ना दवा ही मिली. जी हां, दोनों जाट नेता हिंसा के पश्चात वापिस हो लिए लेकिन आरक्षण को लेकर आज भी वो चुप्पी साधे हुए है. क्यों उन्होंने उत्तरप्रदेश से आकर बिना किसी प्रदेश के नेता को साथ लिए यह मुद्दा उठाया, केंद्र से आरक्षण की मांग की बात कर बिना किसी केंद्र के प्रतिनिधि की मौजूदगी के प्रदेश सरकार से समझौता करना, क्या समझौता हुआ किसी को इसकी जानकारी नहीं होना व् प्रदेश स्तर पर जाट आरक्षण के लिए कुछ नहीं बोलना जैसी कई बाते आज जनता के लिए गुफ्तगू का सबब बन गई है.
आखिर यह जाट नेता क्या करना चाहते थे, इनका मकसद क्या था, यह जानना और समझना तो राजनितिक दलों का काम है लेकिन इससे भी बड़ी गुफ्तगू यह है की जिस आरक्षण के लिए यह लड़ाई लड़ी गई वो तो अभी तक मिला ही नहीं. फिर क्यों तो यह लड़ाई लड़ी गई और क्यों दो जानो को काल का ग्रास बनाया गया. कोई इसको राजस्थान की तर्ज पर कांग्रेस का खेल बता रहा है तो कोई इसको सत्ता से दूर इनलो का किया धरा कह रहा है. राजस्थान की तर्ज का जिक्र इसलिए किया गया क्योंकि जो किरोड़ी सिंह बैंसला भाजपा सरकार के समय गुर्जर आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे बाद में वो भाजपा में ही शामिल हो गए. इतना ही नहीं भाजपा की टिकट पर चुनाव तक उन्हें लड़ाया गया.
तो क्या यह मान ले की प्रदेश में बढ़ते इनलो के ग्राफ को देखते हुए यह भी कोई साजिश की गई है या फिर दोनों नेताओ पर किसी राजनितिक पार्टी का हाथ था. रही बात इनलो की तो गुफ्तगू यह भी है की आतंक का ऐसा तांडव रचने से कभी भी विपक्षी पार्टी को कुछ हासिल नहीं होता. अगर ऐसा होता तो दिल्ली में सीलिंग के पश्चात मची हाय-तौबा से कांग्रेस को सत्ता गवानी पड़ती और राजस्थान में भाजपा को शायद इतनी साईट भी नहीं मिलती. आरक्षण के नाम पर जो कुछ भी हुआ बहुत ही दुखद रहा लेकिन इतना जरुर है की जो दो जिन्दगिया यह दुनिया छोड़ गई उनकी पूर्ति 20 - 20 लाख रूपए से पूरी नहीं की जा सकती.


मंत्रियो पर तो सिर्फ कर्जा होता है


यह महज इतिफाक है या इस बात में कुछ सच्चाई भी है की मंत्रियो पर तो सिर्फ कर्जा ही होता है. यह मै तो नहीं जानता लेकिन नामांकन के दौरान अक्सर देखने में यही आता है की नेताओ के पास जमा पूंजी के नाम पर बैंको में नाम मात्र ही पैसे होते है और गाडी-घोडा तो दूर की बात है नामांकन के समय देनदारी ही दिखाई जाती है. उस पर अगर कोई मंत्री सच्चाई से बचने के लिए यह कहे की फला गाडी उसके नाम से हुई तो वो मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे यह बात मजाक सी लगती है. जबकि होना यह चाहिए की मामले की गंभीरता और अपने पद की एहमियत को देखते हुए उन्हें मामले की तह तक जाना चाहिए. मामला कुछ ऐसा है की बीते दिनों गुडगाँव में एक कार पकड़ी गई थी जिसमे एक लड़की से बलात्कार किया गया था. अगर हरियाणा में विपक्ष के नेता व् इनलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला की माने तो यह कार प्रदेश के गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा की है. यह मुद्दा आज हरियाणा विधानसभा में खूब जोर-शोर से उठाया गया. इस पर कांडा का कहना था की अगर पकड़ी गई कार उनके नाम से हुई तो वो अपने पद से इस्तीफा दे देंगे वरना चौटाला इस्तीफा दे दे. इस राजनितिक बहस का तो कोई नतीजा नहीं निकला लेकिन आम जनता की आवाज उठाने वाले नेताओ ने इतनी जहमत भी नहीं उठाई की मामले की तह तक जाया जाये.
अब बात पाते की
पकड़ी गई कार किसकी है और कौन उसको चला रहा था यह पता लगाना तो पुलिस का काम है. हो सकता है की कुछ समय के बाद शायद यह मुद्दा गौण भी हो जाये लेकिन इतना पता लगना जरुरी है की जिस लड़की के साथ यह घटना घटी वो कौन थी. आखिर किस ने इस घिनौने काम को अंजाम दिया. अगर यह कार मंत्री की नहीं भी है तो कार को किस बूते पर वी.वी.आई.पी. नंबर मिला. आपकी जानकारी के लिए बता दे की कार का न. 9 है.
अब इनका क्या करे
अगर आपका भी पेट्रोल पम्प है तो सावधान हो जाइये. एक कार जिसका न. आरजे 31 - 1966 है और इस पर पूर्व उप प्रधानमन्त्री ताऊ देवीलाल का पोस्टर लगा हुआ है. अगर आपके पम्प पर आती है तो पहले पैसे ले लेना फिर पेट्रोल भरना. कंही ऐसा ना हो की यह कार तेल डलवाने के बाद फुर्र हो जाये. और आप हाथ मलते रह जाये. नेताओ के लिए तो यह भी राजनीतक मुद्दा हो सकता है लेकिन इस घटना से लोग सकपकाए हुए है.


नेता तो व्यापरी- हो गए सरकारी


हरियाणा में कोई भी सरकार आने से पहले सरकारी आकाओ को यह अंदेशा होता था की प्रदेश में एक व्यापारी नेता है जो व्यापारियों के लिए हाथो हाथ सड़क पर उतर जाता है. व्यापारियों के साथ कोई अनहोनी हुई नहीं की वो जिला प्रशासन मुर्दाबाद, हरियाणा सरकार हाय-हाय के नारे लगाते अक्सर दिखा करते. जब बात व्यापारी के जान-माल तक पहुँच जाती तो वो नगर बंद करवाने से भी नहीं चुकते थे. और अगर गलती से सरकार से कोई गलती हो जाती तो मान लो प्रदेश बंद. उनके लिए तो यहाँ तक कहा जाने लगा था की स्वयं के पास कोई व्यापार नहीं है इसलिए बजरंग दास गर्ग हर रोज सरकार के खिलाफ किसी ना किसी बात को लेकर आन्दोलन छेड़े रखते है. अब तो आप समझ ही गए होंगे की यहाँ बात हो रही है हरियाणा प्रदेश व्यापार मंडल के प्रदेशाध्यक्ष व् कान्फेड के चेयरमैन बजरंग दास गर्ग की. जीं हां वही बजरंग दास गर्ग जो कभी व्यापारियों के हितो के लिए जीं-जान लगा देने की बात करते थे. भले ही सरकार व्यापारियों के हितो के लिए कुछ करे या उनके खिलाफ लेकिन उनकी आवाज हमेशा सरकार के विपरीत ही रहती थी. लेकिन आजकल आवाज तो आवाज स्वयं बजरंग दास गर्ग व्यापारी नेता होते हुए सरकारी लगने लगे है. आज उन्हें सरकार के हर फैसले व्यापारी हित में दिखने लगे है तो दिन-प्रतिदिन प्रदेश में बिगड़ रही कानून व्यवस्था के लिए विपक्ष दोषी नजर आने लगा है.
भले ही प्रदेश सरकार कर में बढ़ोतरी करे या उनके गृह क्षेत्र हिसार सहित आसपास के क्षेत्रो में अपराधियों ने आतंक फैला रखा हो आज उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. प्रदेश सरकार द्वारा वैट चार प्रतिशत से बढ़ा कर पांच प्रतिशत और उस पर भी अधिशुल्क लगाना आज व्यापारी नेता को जनहित में दिखाई देता है तो हिसार जिले के हांसी में बढ़ रहे अपराध पर उनकी चुप्पी सरकारी नजर आती है.


वो रही कुर्सी झप लो


27 अप्रैल को विभिन्न राजनितिक दलों ने भारत बंद का एलान किया है. मुद्दा है महंगाई, बिजली, पानी और बिगडती कानून व्यबस्था. अगर आप व्यापारी है या आम नागरिक तो क्या आप को लगता है की इस बंद से यह सभी समस्याए ख़त्म हो जाएगी. चलो माना की ख़त्म नहीं हो सकती तो क्या केंद्र सरकार सहित सभी राज्यों में राज कर रही विभिन्न राजनितिक पार्टियों की सरकारों की नींद इस बंद से खुल जाएगी. तो मेरा मानना है की ऐसा कुछ नहीं होगा. क्योंकि इनमे से कुछ सरकारे ऐसी है जो कभी बंद करने वाले राजनितिक दलों के शासन के समय स्वयं बंद किया करती. जब उस समय वो इनकी नींद नहीं खोल पाई तो अब ऐसा क्या हो गया है की ये सरकारे जनता की भलाई की बात सोचेगी.
कोई नहीं सोचता जनता की भलाई के बारे में. अगर सोचता तो आज जनता ना इन मुद्दों को लेकर परेशान होती और ना ही इस बंद की नौबत आती. तो क्या हम यह मान ले की ये राजनितिक दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए बंद कर रहे है. या सब को कुर्सी दिख रही है. यहाँ आप को यह बता दे की इस बंद का समर्थन वो ही दल कर रहे है जिनको इन लोकसभा व् विधानसभा चुनावो में जनता ने घास नहीं डाली. इनमे से इनलो, सीपीएम, सीपीआई, समाजवादी पार्टी, लोकजनशक्ति पार्टी व् जनता दल यूनाईटीड मुख्य है. क्या यह कह ले की तीसरा मोर्चा इस बंद को समर्थन कर रहा है. इस बंद को लेकर इन राजनितिक दलों का क्या मकसद है यह समझना बहुत मुश्किल है.
लेकिन इतना समझ में आता है की इस बंद को सफल बनाने के लिए जिस तरह इन पार्टियों ने जोर लगा रखा है उससे यह साफ़ होता है की सभी अपनी-अपनी मजबूती दर्शा रहे है. मृतप्राय ये राजनितिक दल जहाँ अपने कार्यकर्ताओ में इस बंद के माध्यम से नया रक्त संचार करने की कोशिश करेंगे वही सफल बंद के पश्चात जनता को यह दिखाने का प्रयास भी किया जायेगा की उन्होंने जनता की भलाई के लिए बंद किया जिसमे जनता ने उनका भरपूर साथ दिया. हो सकता है की 28 तारीख के समाचार पत्रों में जनता के नाम लम्बे-लम्बे बधाई सन्देश भी छपे हो. तो क्या यह मान लिया जाये की इस बंद को जनता की जरुरत समझ कर किया गया था या जनता के कहने पर.
हम सभी भली-भांति जानते है की ऐसा कुछ नहीं है. फिर जनता के साथ यह ढकोसला क्यों. क्या यह राजनितिक दल हमको बहकाने की कोशश कर रहे है या हम इनके बहकावे में आ रहे है. इनलो को लगता है इस बंद से हरियाणा की कुर्सी उसको मिल जाएगी तो सीपीआई और सीपीएम को लगता है की केंद्र सरकार दोबारा उससे समर्थन मांगेगी. जबकि लोकजनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी पुनः वजूद में आने के लिए जद्दोजहद कर रही है. जबकि सभी जानते है की ना तो पांच साल तक केंद्र सरकार हिलने वाली है और ना ही हरियाणा की हुड्डा सरकार. बावजूद इसके पता नहीं इन राजनितिक दलों को ऐसा क्यों लगता है की वो रही कुर्सी झप लो.
एक बार सोच कर देखो
धरने-प्रदर्शन व् हड़ताल करने वाले यह क्यों नहीं सोचते उनके ऐसा करने से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं है. आम आदमी चाहे वो व्यापारी हो, नौकरी पेशा हो या भले ही मजदूरी करता हो कोई नहीं चाहता की कोई ऐसा करे. फिर ये राजनितिक दल ऐसा कर क्यों काम-धंधा कर दो वक्त की रोटी कमाने वाले की रोटी छिनना चाहते है. बंद से किसको फर्क नहीं पड़ता. चाहे वो व्यापारी हो या नौकरी वाला. या फिर देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने वाला बैंक. सभी बंद से प्रभावित होते है. लेकिन राजनितिक दलों की तानाशाही के आगे सभी चुप रहते है. तो क्या इससे जनता की समस्याए ख़त्म हो जाएगी या इन राजनितिक दलों को कुर्सी मिल जाएगी.


कुर्सी बड़ी की पद


कभी-कभी कुछ अनहोनी सी बाते हो जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता. एक लम्बे अरसे के बाद अगर उस विषय पर गौर किया भी जाये तो लगता है की या तो हम ठगे गए या तकलीफ हो कर रह जाती है. लेकिन आम जनता है की कुछ नहीं कर पाती. करे भी तो क्या कर लेगी जनता. जनता की सुनने वाला है की कौन. हमारे देश में या तो साधु-संतो की सुनी जाती है या फिर नेताओ का राज चलता है. अब उनकी मर्जी की वो जो कुछ करे वो ठीक.
अब देखो ना किसी को पद की लालसा होती है तो किसी को कुर्सी की. फर्क सिर्फ इतना है की पद किसी को कहीं भी मिल सकता है लेकिन देश में कुर्सी तो सिर्फ नेताओ के भाग्य में ही लिखी है. लेकिन अगर किसी नेता को यह दोनों चीज मिल जाये तो सोने पर सुहागा. लेकिन आम जनता यही सोचती है की अब इस नेता के लिए कुर्सी बड़ी है की पद. तो भाई जब तक कुर्सी है तब तक ही पद की गरिमा है. वरना कैसा पद और कौन सी जनता.
अब हरियाणा के एक पूर्व विधायक को ही देख लो. जब तक कुर्सी थी तब तक ही वो कांग्रेस के हिसार हलके के ग्रामीण जिलाध्यक्ष थे. बीते विधानसभा चुनाव में कुर्सी क्या छीन गई वो तो भूल ही गए की वो जिलाध्यक्ष भी है या थे. कहने का भाव यह है की जब वो कांग्रेस के विधायक थे उस समय भी प्रदेश में कांग्रेस राज था और आज भी कांग्रेस की सरकार है. फर्क मात्र इतना है की आज वो विधायक नहीं है लेकिन जिलाध्यक्ष जरुर है.
मजे की बात तो यह है की पिछली सरकार के समय प्रत्येक सोमवार को ग्रामीण जिलाध्यक्ष के नाते वो जनता की समस्याए तो सुना ही करते साथ ही साथ पत्रकारों से भी रूबरू हुआ करते. जहा वो सरकार की वाहवाही किया करते वही जनता के भी दुःख-दर्द दूर करने का भरपूर प्रयास किया करते. यही कारण था की उन्हें पूरा विश्वास था की वो दोबारा भी विधायक बनेंगे. लेकिन जहा उन्हें मन मुताबिक सीट नहीं मिली वही हार का सामना भी करना पड़ा.
जनता तो जनता अब तो पत्रकार भी सोचने लगे है की जो छत्रपाल जिलाध्यक्ष होने के नाते चुनाव नहीं लड़ने की बाते किया करते आज वो कहीं दिखाई क्यों नहीं पड़ रहे है. क्या उन्हें इस बात का मलाल है की वो चुनाव हार कर विधायक नहीं बन पाए या इस बात को भूल गए की वो हिसार ग्रामीण जिलाध्यक्ष भी थे. कुछ भी हो इतना जरुर है की यहाँ तो नेताओ की चलती है जनता की किसको पड़ी है. इसलिए लगता है की आज नेताओ के लिए पद नहीं कुर्सी बड़ी है.
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हरियाणा की राजनीति के ये फर्जी प्रोफ़ेसर


काश ज़मीं से बंदूके पैदा हो गई होती


मात्र तीन साल का एक छोटा सा बालक अपने पिता के साथ खेतो में सिर्फ इसलिए जाता था की देश गुलाम था. जब उसने पिता को जमीन में बीज बोते देखा तो उसने अपने पिता से कहा की बापू आप यह क्या कर रहे हो. इस पर पिता ने कहा की बेटा जमीन में बीज बो रहा हूँ. कुछ समय बाद यहाँ फसल पैदा होगी जिससे हमको अनाज मिलेगा. वो छोटा सा बालक चुपचाप सुनता रहा और कुछ समय बाद वो खेत के एक कोने में गया और अपने छोटे-छोटे हाथो से जमीन खोदने लगा. बेटे को अकेले कुछ करता देख जब पिता वहा गया तो देखा की उनका तीन साल का बेटा जमीन में खड्डे खोद कर पेड़ की पत्तिया दबा रहा है. लालसा लिए पिता ने पूछा की बेटा क्या कर रहे हो तो बेटे ने कहा की बापू जमीन में पत्तिया दबा रहा हूँ कुछ समय बाद यहाँ बन्दूको का पेड़ लगेगा. उन बन्दूको से मैं अंग्रेजो को मार भगाऊँगा.
आप शायद अब तक समझ ही गए होंगे की कौन था वो भारत की आजादी की दीवाना जिसका मैं यहाँ जिक्र कर रहा हूँ. अगर आप हरियाणा के रहने वाले है और सरकारी कार्यालय में कार्यरत्त है तो शायद अभी तक नहीं याद आया होगा क्योंकि हरियाणा सरकार उस दीवाने को याद करना भूल गई. यही कारण रहा की जहा देश में आजादी के हर उस परवाने को याद किया जाता है जिसने देश को आजाद करवाने में अपना योगदान दिया लेकिन 23 मार्च को जो देश भक्त अपने देश को आजाद करवाने के लिए फांसी पर झूल गया उसको हरियाणा सरकार कैसे भूल गई. सरकारी छुट्टी करना तो दूर उसकी याद में कोई सरकारी कार्यक्रम तक आयोजित नहीं किया गया. क्या हम यह मान ले की ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वो किसी राजनितिक पार्टी विशेष से सम्बंधित नहीं थे.
जिस माता के सपूत ने अपनी जंग के लिए शादी तक नहीं की, जिसने अपना सारा जीवन देश को आजाद करवाने में लगा दिया. यहाँ तक की एस्म्बली में हथगोला फेंकने के बाद जो वीर सपूत मौके से भाग सकता था. लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं भागा की अगर वो भाग गया तो देश के नौजवान युवको में हिम्मत नाम की चीज ख़त्म हो जाएगी. इसलिए उन्होंने गिरफ्तार होना ही मुनासिब समझा और हँसी-हँसी फांसी पर झूल गए. जी हां हम बात कर रहे है शहीद भगत सिंह की. जिन्होंने अपने दो साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ मिल कर इस घटना को अंजाम दिया और अंग्रेज पुलिस के हाथो गिरफ्तार होकर 23 मार्च को देश की आजादी के लिए शहीद हो गए. उनकी शहादत पर मैं जाने माने कवि लाजपत राय विकत की कुछ पंक्तिया प्रस्तुत कर रहा हूँ. शायद आपको पसंद आएगी.

यह विजय गाथा है आक्रोश के अंगारे की,
पैदा तूफ़ान के प्रचंड के उस धारे की,
प्रचंड धारे की इन्कलाब नारे की,
सिंहनी के सपूत देश के दुलारे की,
पाया जो कुछ भी था वो पाया सिर्फ खोने को,
हुआ था पैदा वो सिर्फ शैदा होने को,
शमा जलाई थी खुद उसी में जल जाने को,
ऐसे परवाने को आजादी के दीवाने को,
क्या डराती कोई गोली क्या तोप का गोला,
गया था जिसने माँ मेरा रंग दे बसंती चोला.

शहीद भगत सिंह की शहादत को शत-शत नमन !


टिकट के लिए नेताओ की कब्बडी शुरू


हरियाणा में अभी तक विधानसभा चुनावो की कोई औपचारिक घोषणा तो नही हुई है लेकिन लोकसभा चुनावो में कसरत कर चुके प्रदेश के प्रत्येक नेता अब एक बार फ़िर से लाइन में है। ये वो नेता है जिन्होंने या तो अपने नेता को जिताने के लिए कसरत की थी या फिर लोकसभा चुनाव की टिकट पाने के लिए। अब आप सोच रहे होंगे की ये लाइन में क्यो है तो सीधी सी बात है की कसरत की थी तो अब इनको भी कुछ न कुछ चाहिए। इसलिए जिसे देखो वो विधानसभा चुनाव की टिकट मांग रहा है। कोई भाजपा से तो कोई कांग्रेस से। यहाँ तक की हजंका व् इनलो में भी टिकट मांगने वालो की लम्बी लाइन लगी है। फिलहाल हरियाणा में कांग्रेस की सरकार है तो लाजमी है की सबसे लम्बी लाइन उसके नेताओ की ही होगी टिकट मांगने वालो में। अगर यहाँ हिसार की बात की जाए तो यहाँ के सभी 9 हलको में जितने कांग्रेस कार्यकर्ता है उन सभी के नाम टिकट मांगने वालो की सूची में शामिल है। भले ही वो ब्लाक प्रधान हो या फ़िर चाहे कार्यकर्ता मात्र हो। भाजपा, इनलो व् हजंका जैसी पार्टिया भी इसी उधेड़बुन में है की किस सीट से किसको टिकट दी जाए। मजेदार बात तो यह है की कोई नेता टिकट मेरी है बोल कर जनसंपर्क अभियान शुरू किए हुए है तो कोई जनसभा कर कह रहा है की बस अब आपके आर्शीवाद की जरुरत है टिकट तो मेरी पक्की है। कोई भी पार्टी टिकट किसी को भी दे वो उसके ऊपर निर्भर है लेकिन यहाँ मेरी इस गुफ्तगू का पहलु यह है की आख़िर नेताओ ने टिकट के लिए यह कब्बडी क्यो शुरू कर रखी है। इससे वो जनता को क्या संदेश देना चाहते है और क्या दिखाना चाहते है। अगर ये नेता ऐसा कर यह संदेश देना चाहते है की उनको टिकट मिलने से उनकी पार्टी जीत गई तो हार के बाद वो क्या करेंगे। इसके अतिरिक्त अगर कोई नेता अन्य नेता को पछाड़ टिकट ले भी आए तो क्या वो यह दिखाएगा की उसकी पार्टी में कितनी फूट है।
जितने नेता उतनी पार्टिया
दिल्ली पास होने के कारण हरियाणा का राजनितिक माहौल कोई आज से ख़राब नही है। जिसे देखो वो दिल्ली दरबार में हाजरी लगाने की बात करता है। चाहे वो कांग्रेस नेता हो या भाजपा नेता। इसीलिए कांग्रेस प्रभारी पृथ्वी राज चौहान ने हाल ही में कांग्रेस नेताओ को आगाह किया था की टिकट की चाह रखने वाले नेता दिल्ली न जाए। क्योंकि अबकी बार टिकट दिल्ली दरबार से नही अपितु जिला स्तर पर दी जाएँगी। साथ ही साथ हरियाणा में कांग्रेस का हाल तो उससे भी बुरा है। इसका मुख्य कारण है की यहाँ कांग्रेसी नेता नही नेता कांग्रेस है। कहने का अर्थ यह है की हरियाणा में यहाँ जितने नेता उतनी कांग्रेस है। यही कारण है की यहाँ टिकट मांगने वालो की लाइन हर बार अन्य प्रदेशो से अधिक होती जा रही है। यहाँ कोई मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडा का करीबी दोस्त टिकट मांग रहा है तो कही प्रदेश के वित्तमंत्री वीरेंद्र सिंह का नजदीकी। केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा का रिश्तेदारी में भाई भी कांग्रेस की टिकट मांगने वालो की लाइन में है तो नलवा विधानसभा सीट से सांसद नवीन जिंदल अपने मित्र को टिकट दिलवाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है।
ये तो राजनीति में बने रहने का मूल मन्त्र है
ऐसा नही है की अभी तक ये नेता सिर्फ़ टिकट पाने के लिए लाइन में ही लगे है। कुछ नेताओ ने तो टिकट पाने और चुनाव में जीत हासिल करने के लिए राजनीति के मूल मन्त्र को अपनाना भी शुरू कर दिया है। भले ही प्रदेश में चुनाव की घोषणा नही हुई हो उनको कोई फर्क नही पड़ता। लेकिन राजनीति में बने रहना है तो उसके मूल मन्त्र को तो आजमाना ही होगा। कुछ ऐसा ही सोच कर ये नेता दिन रात दौड़ धुप किए हुए है। जो जैसा नेता वैसे ही मन्त्र अपना रहा है। कोई जनसंपर्क अभियान के तहत दौरे कर रहा है तो कोई सभा कर जनता से आर्शीवाद मांग रहा है। अगर किसी ऐसे नेता की बात की जाए जो अपनी पार्टी में या फ़िर पैसे का दम रखता है तो वो बड़ी जनसभा कर जनता को अपने नेता की दुहाई दे रहा है की उसके नेता आपके लिए ये किया वो किया। अगर बात इससे ऊपर कि की जाए तो बात आती है पत्रकारों की। हिसार में कई ऐसे नेता है जो चाहे किसी पार्टी से जुडा हो या निर्दलीय चुनाव लड़ने की इच्छा रखता हो सभी को पत्रकारों का समर्थन तो चाहिए ही। कुछ ऐसा ही सोच कर आज कल ये नेता पत्रकारों को भोज देने में जुटे है। साथ ही इनको पता है की यह भी आज कल राजनीति का मूल मन्त्र है।


आखिर किसको दे वोट और क्यो


शायद यह मेरा भारत के पूर्व राष्ट्रपति ऐ पी जे अब्दुल कलाम के प्रति अपार प्रेम ही था की आज जब मेरी नज़र सड़क किनारे लगे एक होर्डिंग पर पड़ी तो सहसा रुक गया और होर्डिंग पर लिखे कुछ शब्द पढने लगा लेकिन मैं पढ़ते पढ़ते गंभीर हो गया । बोर्ड पर लिखा था की वोट जरुर डालिए पर दिल से नही दिमाग से । लेकिन मैं विनम्र हो कर श्री कलाम से यह पूछना चाहता हूँ की भारत में आप ही एक ऐसा राजनितिक दल या नेता बता दे जिसको मैं अपना कीमती वोट दे सकूँ । मैं उनके कहे अनुसार वोट तो जरुर डालूँगा लेकिन अगर उनकी बात मान भी लूँ की दिमाग से डालो तो सबसे पहले तो मैं यह देंखू की मेरे वोट डालने से देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा । वह जो सोनिया गाँधी के हाथ की कठपुतली है या वह जिसको चुनाव के समीप आते ही भगवन राम की याद सताने लगी या फिर वो जो कुर्सी प्रेम में इतने अंधे हो गए है की जनता की सुध भूल कर आपस में लड़ रहे है । एक बार तो मैं यह बात न भी मानू की देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस अध्यक्ष के हाथो की कठपुतली है लेकिन मैं बड़ों की कही उस बात से भी किनारा नही कर सकता की जहा से धुआ उठता है आग तो जरुर लगी होती है । जबकि कांग्रेस के साथियों सहित अन्य राजनितिक दलों का हाल तो हाल ही में सब ने देखा ।
अब तो दिल ही काम आएगा
अब आप ही बताये जब दिमाग काम करना छोड़ दे तो क्या किया जाए । दिल की बात मान ली जाए या नेताओ से यह पूछा जाए की आखिर अब आप ही बता दे की हम आपको वोट क्यो दे । आज जो नेता गली गली, घर घर वोट मांगता दिखाई दे रहा है वो जीतने के बाद 5 साल कहा रहता है । कहने का अर्थ यह है की सभी नेता एक ही थाली के चट्टे बट्टे दिखाई देते है । किसी ने विकास के नाम पर कुछ नही किया तो कोई विकास कर नही सकता । तो कोई विकास करना ही नही चाहता । अगर वो विकास ही करवा देंगे तो आने चुनाव में मुद्दा क्या होगा ।
किल बनोगे या हथोडा
अब तो आपको ही विचार करना होगा की कलाम के कहे अनुसार आप दिल की सुनोगे या दिमाग से काम लोगे क्योकि दिल से काम लिया तो हो सकता है की आप को किल के रूप में इस्तेमाल किया जाए। क्योकि फिर तो आप नेताओ की बातो में आकर जहा वो कहेंगे बटन दबा देंगे । लेकिन अगर आपने दिमाग से काम किया तो आप द्वारा दबाया गया बटन हथोडे का काम करेगा ।


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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