आओ प्यार करें



आज का दिन प्यार करने वालो का दिन. तो क्या अब यह मान लें की अब हम को पश्चिमी सभ्यता के अनुरूप प्यार करने का दिन भी मुक़र्रर करना पड़ेगा. अगर ऐसा हुआ तो देश प्रेम की खातिर सीमा पर खड़े जवानों के लिए यह पश्चिमी सभ्यता क्या कहेंगी. क्या उनको सीमा पर नहीं खड़े होना चाहिए या देश प्रेम की खातिर सिर्फ 14 फरवरी को ही सीमा पर जाना चाहिए. अगर ऐसा हुआ या यह कहा जाएँ की प्यार करने का दिन भी मुक़र्रर किया जाने लगा तो हम वैलेंटाइन डे तो क्या कोई भी डे नहीं मना पाएंगे. रही बात युवाओं की तो उनके लिए सारी उम्र पड़ी है प्यार करने की.
चलो जी हमको क्या फर्क पड़ता है कोई किसी भी दिन प्यार करे. लेकिन तकलीफ इस बात की है की कौन किस से ज्यादा प्यार करता है. कहने और दिखावे के लिए तो हर कोई प्यार करता है, लेकिन सवाल यह उठता है की कितना. अब देखो ना हिन्दुस्तान धर्मनिरपेक्ष देश है. यहाँ हर धर्म और जाति के लोग बड़ी ही सदभावना और प्यार के साथ रहते है. लेकिन क्या आप जानते है की हम को एक विलक्षण चीज आपस में जोड़े हुए है. यह शायद इतिफाक ही है की TEMPLE में छः अक्षर होते है जबकि CHURCH भी छः अक्षरों से मिलकर बना है. इसके साथ MOSQUE में भी छः ही अक्षर होते है.
यह भी मजेदार बात है की GEETA में जहाँ पांच अक्षर होते है वही BIBLE भी पाँच ही अक्षरों से मिलकर बना है. जबकि QURAN में भी पाँच अक्षर ही होते है. यह एकता और शब्दों के जरिये भगवान् का दिया वो प्यार है जिसको आज हम भूलते जा रहे है. हम तो भूलते जा ही रहे है लेकिन आज का युवा तो इस बारे में जानता ही नहीं. आज इस बारे में ना सिर्फ सोचना होगा बल्कि इसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार भी करना होगा. तभी शायद हम पश्चिमी सभ्यता को भूल कर भारतीय संस्कृति को आने वाली पीढ़ी के समक्ष रख सकेंगे. और यहीं आज की जरुरत है.
बात प्रेम की चल रही है तो क्यों ना थोड़ी सी बात देश प्रेम की ही कर ली जाएँ. अब देखो ना पंजाब फाइटिंग के लिए जाना जाता है तो बंगाल राइटिंग के लिए. राजस्थान का नाम इतिहास के पन्नो में दर्ज है तो महाराष्ट्र जीत के लिए मशहूर है. कर्णाटक का सिल्क तो हरियाणा का मिल्क पूरे विश्व में विख्यात है. केरला के लोगो का दिमाग तो उत्तरप्रदेश के गेंहू का कोई सानी नहीं है. इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश सेब तो उड़ीसा मंदिरों के लिए लोकप्रिय है. मध्यप्रदेश आदिवासी और जनजाति के लिए जाना जाता है तो बिहार संगीत के लिए. जब हिन्दुस्तान में इतना सब कुछ है तो हम को प्यार करने के लिए किसी दूसरी संस्कृति व् दिन की क्या आवश्यकता है. आज जरुरत है तो अपने अन्दर के इंसान और प्यार को जगाने की.
14 फरवरी को वैलेंटाइन डे है कह कर सभी प्यार करने की बात करते है. जबकि सच्चाई यह है की आज कौन किस से प्यार करता है. आज भाई भाई का नहीं है और संतान माँ-बाप की बात सुनती तक नहीं. ऐसे में हम 14 फरवरी को कौन से प्यार की दुहाई देते है. उस प्यार की जो हम न कभी देख सकते है ना समझ सकते है. ऐसा मै इसलिए बोल रहा हूँ की जिस प्यार को हमने देखा और समझा है उसके बारे में तो हम जानते ही नहीं की 14 फरवरी 1931 की सुबह लाहोर में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटकाया गया था. यह प्यार नहीं तो क्या था की देश के तीन महान सपूत हँसते-हँसते फांसी पर झूल गए और हमारे मनाने के लिए वैलेंटाइन डे छोड़ गए.
क्या यही प्यार है ?
1. माँ-बाप कहते की बेटा पढ़-लिख कर कुछ बन जाओ तो बुरा लगता है लेकिन अगर यहीं बात गर्लफ्रेंड कहें तो लगता है की केयर करती है.
2. गर्लफ्रेंड के लिए हमेशा माँ-बाप से झूठ बोला जाता है जबकि कभी भी माँ-बाप के लिए गर्लफ्रेंड से झूठ नहीं बोला जाता.
3. यह आज दुर्भाग्य ही है की गर्लफ्रेंड से शादी करने के नाम पर हम माँ-बाप को छोड़ तक देते है लेकिन कभी माँ-बाप के लिए गर्लफ्रेंड को नहीं छोड़ सकते.
4. गर्लफ्रेंड से रोज रात को बात भी करते है और पूछते भी है की खाना खाया क्या लेकिन माँ-बाप के पास बैठने में शर्म आती है और माँ-बाप से कभी नहीं पूछते की खाना खाया की नहीं.
अंत में में इतना ही कहूँगा की प्यार भगवान् है ना की कोई प्यारा. अगर प्यार ही करना है तो अपने माता-पिता से करो. फिर भी कोई गलती हो जाये तो उसको सुधारों क्योंकि माता-पिता ही सब कुछ है.


फिर मै दोषी क्यों


पिछले दिनों जो कुछ घटित हुआ उससे सिर्फ हिसार ही नहीं अपितु हरियाणा भी पूरे देश-विदेश में सुर्ख़ियों में रहा. कभी जाट समुदाय तो कभी बाल्मीकि समुदाय. इन्ही मामलों पर कभी नेता कोई ब्यान दे रहे थे तो कभी न्यायालय कोई ऐसा कदम उठा रही थी की हर कोई चर्चा में था. ऐसे में जो सबसे अधिक आवाज उठा रहे थे वो थे जाट समुदाय के लोग. कभी वो आरक्षण मांग रहे थे तो कभी मिर्चपुर प्रकरण पर रेल और रास्ता जाम कर रहे थे. आम आदमी के लिए सबसे बड़ी समस्या यह थी की जगह-जगह चार लोग ही रास्ते जाम कर बैठे थे और पुलिस थी की बिलकुल मौन. ऐसे में अगर मैंने समाचार के साथ-साथ अपना ध्येय पूरा करते हुए दूसरे पहलू पर गुफ्तगू की तो क्या गलत किया. अगर किसी समुदाय के विरोध प्रदर्शन से किसी आम इंसान को परेशानी हो रही हो और मै गुफ्तगू ना करूँ मै दोषी, लेकिन अगर गुफ्तगू कर रहा हूँ तो मै दोषी क्यों.
कहते है की लेखक कभी कर्मो से छोटा नहीं होता लेखनी से जरुर छोटा हो सकता है. फिर भी मै गुफ्तगू की शुरुआत में सबसे पहले उनसे क्षमा मांगता हूँ जो मुझे जाट समुदाय पर गुफ्तगू करने का दोषी मानते है. बात कुछ ऐसी है की बीते दिनों हिसार सहित हरियाणा में क्या कुछ घटित हुआ वो आपने ना सिर्फ सुना होगा अपितु देखा भी होगा. इस पर मैंने भी समय-समय पर गुफ्तगू की. वो सब कुछ लिखा जो घटित हुआ. एक समय ऐसा आया जब गुफ्तगू के मुख्य पृष्ठ पर सिर्फ आरक्षण और मिर्चपुर प्रकरण को लेकर ही गुफ्तगू दिखाई दी. ऐसे में एक महिला पाठक ने किसी भी गुफ्तगू पर तो कोई कोमेंट नहीं दिया की यह गलत लिखा गया या ऐसा कैसे लिख दिया, बदले में मुझे एक मेल मिली की आपकी गुफ्तगू यह दर्शाती है की आप जाट समुदाय के प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया अपना रहा हूँ और सिर्फ उनके खिलाफ लिख रहा हूँ. क्या यह सही है.
जब मैंने यह मेल पढ़ी तो कुछ अचरज भी हुआ और दुःख भी. ना तो मेरी कभी यह सोच रही की मै किसी के खिलाफ लिखूं और ना ही मैंने इन पोस्टो में ऐसा कुछ लिखा था जो गलत हो. मैंने सिर्फ वहीँ लिखा जो मैंने देखा या वो लिखने का प्रयास किया जो समाचार पत्रों में नहीं छप सकता लेकिन ऐसे कुछ मुद्दों पर गुफ्तगू की जा सकती है. इसके साथ ही मुख्य पृष्ठ पर आजादी, गणतंत्र दिवस, अपराध, क्रिसमस, नववर्ष, युवा, फैशन सहित माँ और उसकी ममता पर ढेरो गुफ्तगू प्रकाशित की गई है. जबकि अन्य गुफ्तगू का यहाँ अम्बार है. ऐसे में मुझे दोष देना कहाँ तक उचित है की मेरी सभी पोस्ट सिर्फ जाट समुदाय के खिलाफ है. यह सब मै उनको मेल के द्वारा भी कह सकता था लेकिन मै इस विषय पर आपके साथ गुफ्तगू करना चाहता था. बावजूद इसके अगर आप भी मुझे दोषी मानते है तो मै जाट समुदाय पर लिखने के लिए उनसे और आप से क्षमा मांगता हूँ.


फिर भी हम गणतंत्र है


सबसे पहले आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेरो शुभकामनाये और बधाई.
सदियों से राजा रानी वाली राजतंत्र की प्रशासन व्यवस्था में  रह चुकी जनता ने लगभग साठ साल के गणतांत्रिक देश हिन्दुस्तान में हाल  तक भी सभी भारतीयों की मानसिकता लोकतंत्र के लिए परिपक्व नहीं हो पायी है  तभी तो सता पर पकड़ बनाये रखने के लिए नेहरू के वारिसों ने कांग्रेस के नाम  से छद्म लोकतंत्र पर पूरे देश में अपने परिवार तंत्र का राज किया। जनता से  राजगदृदी अपनाने के लिए राजनीति में जाति धर्म का कार्ड खेला। यह खेल इतने  शातिर तरीके से खेला गया कि दूर-दूर तक की सोच रखने वालों से भी कभी यह पकड़ा नहीं जा सका।
हाल के बिहार विघानसभा चुनाव पर अगर सर्वो की खबर को यकीनी माने तो यह लगभग सच  है कि मूल रूप से मुसलमानों ने वंशवाली कांग्रेस और राजद को वोट दिया  क्योंकि कई कारणें के अलावा वो हिन्दु विरोधी भाषणों से खुश किये जाते रहे।  सुन्नी मुसलमानों को आज तक देश के नागरिक के कर्तव्य और अधिकार दोनों को  इमामों के हवाले कर दिया गया। मानों उपर वाले ने हिन्दुस्तान के इमामों को  स्पेशल पोस्टींग करके भेजा है। लम्बें समय तक इमामों के फतवे पर सुन्नी  मताधिकार का प्रयोग करते थे, पर इसमें कोई शक नहीं कि मदरसे की पढ़ाई और  विज्ञान की भूमिका धीमे-धीमे इमामों के मकडजाल से डॉ अब्दुल कलाम जैसे पढ़  लिखे कईयों को बाहर कर चुकी।
अगर आस्था के नाम पर मूर्ख बनाये जाने वाले  लोग जरा सी सोच और तर्क से दिमाग का इस्तेमाल करें तो वे समझ सकते है कि  जहाँ बनाने वाले खुदा के लिए इबादतगाह के नाम पर दकियानुसी सोच का जाल  फैलाना क्यों जारी रहा? जलन और नफरत का माहौल फैला, फूट डाल कर सता कब्जायी  गयी ताकि देश की गरीब जनता की दौलत को लूट कर विदेशों में केवल अपनी  औलादों के ऐशो आराम के लिए रकम जमा करा दी जाए। आज आधे से कम को समझ आया है  कल सबको समझ में आ जाएगा कि राज चलाने की जगह राज पर काबिज रहने के काम बडी ही  सूझबूझ से किये जाते रहे।
भ्रष्टाचार जब तक सौ करोड़ के खून में ना आ जाए तब  तक काम नहीं किया जाता। जब तक हवलदार और सिपाही घूस ना लेने लगे तब तक  तंख्वाह ना बढ़ाई। गरीबों को गरीबी हटाने के नाम पर लूटा गया। नियम कानून  ऐसे बनाये कि एक ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह हजार विदेशी कंपनीया आज हमारे  देश में आकर मजदूर और किसान का खून चूस रही है। ईमानदार व्यवसायी को तंग  कर करके मिट्टी में मिला दिया गया। हालात ऐसी बनायी गयी कि लोग कहें आजादी  से अच्छी गुलामी।
आरक्षण के कार्ड को खेल कर सता पर पकड के लिए दलित मुसलमान, दलित इसाई जैसे  शब्दो को जन्म देने वाली कांग्रेस सरकार का बस चला तो कल राजपूत मुसलमान  और ब्राहमण ईसाई शब्दों की भी रचना कर देगी। वैसे इन दिनों दिख रहा है की समाज  खत्म कर चुकी कांग्रेस सरकार अब परिवार खत्म करने के लिए सात जन्म के रिश्तो को महज समझौता बना कर छोड देगी।
हद तो तब है जब दो दिन के राजनैतिक कद वाले युवराज कहे जाते जनाब मीडीया  के सामने दलितों के यहां नहाने खाने का नाटक करेगें जबकि अगर कोई दलित 10  जनपथ पर आ जाऐ तो डंडे खाये। नमाजी टोपी पहने नाटक बस अपने लिए वोट लेने तक  के लिए है। चार बीबी और चालीस बच्चे की छूट इसीलिये तो है कि वो बस कैटल  क्लास वाला वोटर बन कर जिन्दा रहे फिर गटर में या किनारे घिसट घिसट कर जीते  हुए गरीब ने मर ही तो जाना है।
लेकिन वो दिन दूर नहीं जब एक एक करके  मुसलमान जान लेगा कि एक बीबी एक बच्चा करके ही वो अपनी औलाद को आदमी की  जिन्दगी देगा तब हिन्दुओं का वोट पूरी तरह खो चुकी कांग्रेस को एक वोट भी  नहीं मिलेगा। बापू के सम्मान पर जब पटेल जी की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री  बना देना ही इतिहास की एक गलती हो गयी लेकिन सुधार की जिम्मेदारी आज के  नौजवानों की है और बिहार के चुनाव के नतीजों ने विकास के वास्ते बदलाव का  बिगुल बजा दिया। लालू को परिवार वाली कांग्रेस के विरूद्ध सता लाने के बाद  जब लालू भी परिवार तंत्र का राज करने लगे तो कांग्रेस के साथ वह भी आज  हाशिये पर चले गये। जनता जनार्दन ने माना तो भगवान भी बन सका भगवान है।
किसी तंत्र के प्रशासन सफलता जनता के स्वीकारने पर है और यही सच है। फिर  नेताओं की बिसात क्या है। जनता के हित में काम करने के लिए अगर चुना है तो  उसे जिम्मेदारी से करना होगा। वर्ना अंजाम के कई उदाहरणों से दुनिया के  इतिहास भरे है।
साभार- मेरे ई-मेल बाक्स से


कितना अजीब है ना


सभी को पता है की फरवरी आने को है. आप कहेंगे की यह तो प्रतिवर्ष आती है. तो यह भी पता होगा की फरवरी आते ही युवा मचलने लगते है. इन दिनों में लड़के-लड़कियों के बीच गुफ्तगू बढ़ने लगती है. अब गुफ्तगू होगी तो उसे आप तक पहुँचाना मेरा फर्ज बन जाता है. अब देखो ना फरवरी के मद्देनजर आज कल मोबाइल पर जोक्स या अन्य मैसेज कम और वैलेंटाइन डे, रोज डे व् चोकलेट डे सहित और ना जाने कौन-कौन से डे के मैसेज आने शुरू हो गए है.
आज कल इंग्लिश त्यौहारों खासकर डे का प्रचलन कुछ ज्यादा हो गया है. समय-समय पर मै इन त्यौहारों के प्रति गुफ्तगू करता रहता हूँ. कुछ दिनों से आने वाले मैसेज को पढ़ कर आज भी मै सुबह से ऐसी ही एक गुफ्तगू के बारे में सोच रहा था. इन मैसेज से पहले तो मैंने एक डेट सीट तैयार की फिर दूसरे मैसेज से गुफ्तगू तैयार की. उम्मीद है आपको मेरी यह गुफ्तगू पसंद आएगी. पहले मैसेज की पहली गुफ्तगू.

युवाओं के लिए फरवरी की डेट सीट आ गई है. कुछ तैयार हो गए है तो कुछ ने तैयारी शुरू कर दी है.
7 फरवरी- रोज डे
8 फरवरी-प्रपोज डे
9 फरवरी- चोकलेट डे
10 फरवरी- टेडी डे
11 फरवरी- प्रोमिश डे
12 फरवरी- हग डे
13 फरवरी- किस डे
14 फरवरी- वैलेंटाइन डे
अब जिन युवाओं के कंधो पर हम भारत जैसे संस्कारिक देश के बोझ होने का दावा करते है अगर वो ही आज यह डे मनाने लगे तो आप किस से आशा करोगे की भारत की सभ्यता जीवित रह सकती है. अब युवाओं के हाल पर यह गुफ्तगू भी पढ़ लो.

100 रूपए का नोट बहुत ज्यादा लगता है जब एक गरीब को देना हो,
लेकिन जब दो दोस्त होटल में बैठे हो तो यही बहुत कम लगता है.
3 मिनट भगवान् को याद करना बहुत मुश्किल काम लगता है,
लेकिन दो दोस्त बैठे हो तो 3 घंटे की फिल्म भी छोटी लगने लगती है.
पूरे दिन मेहनत के बाद जिम जाना नहीं थकाता,
लेकिन जब अपने ही माँ-बाप के पैर दबाने पड़ जाये तो हम तंग आ जाते है.
वैलेंटाइन डे पर गर्लफ्रैंड के लिए 200 रूपए के बूके ले जाना याद रहता है,
लेकिन मदर्स डे पर अपनी जननी को एक गुलाब का फूल भी नहीं दिया जाता.
इस मैसेज को फोरवर्ड करना बहुत मुश्किल काम लगता है,
लेकिन फिजूल जोक्स को फोरवर्ड करना हमारा फर्ज बन जाता है.


कमाई और शिक्षा में पिसता बच्चो का भविष्य


एक समय था जब कोई स्कूल खोलता था तो उसकी बड़ी वाह-वाह की जाती थी. कहा जाता था की यह स्कूल जनता की भलाई के लिए खोला गया है. बच्चे इसमें पढ़-लिख कर बड़े होंगे और अपना भविष्य सवारेंगे. धीरे-धीरे यह प्रचलन ही बन गया और जहा देखो वहा स्कूल खुलने लगे. फर्क मात्र इतना है की कहीं आज भी स्कूल यह कह कर खोले जाते है की इन स्कूलों में गरीब बच्चे पढ़ सकेंगे. तो कहीं हाई-प्रोफाइल स्कूल खोल कर यह दिखाने का प्रयास किया जाता है की इस स्कूल में बच्चो को सभी सुख-सुविधाए मुहैया करवाई जाएगी. माता-पिता भी आज यही चाहते है की उनके बच्चो को स्कूल में कोई परेशानी ना हो. लेकिन उस समय कोई यह नहीं देखता की आखिर यह स्कूल किस उद्देश्य को लेकर खोला गया था. आज स्कूल संचालको के लिए सभी मापदंड समाप्त हो गए है. अब उनका एक ही मकसद है की स्कूल के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा पैसा कैसे कमाया जा सकता है. यही कारण है की आज शिक्षा भी व्यापार की तरह बिकने लगी है. क्योंकि जिस तरह व्यापार में जो चीज दिखावे पर बिकती है उसी तरह आज स्कूल भी वही चलता है तो दिखता है. रही बात सस्ती शिक्षा की तो वो सिर्फ सरकारी स्कूलों के नाम ही रह गई है. अब सरकारी स्कूलों में बच्चे रह ही कितने गए है.
आज शहर हो या गाँव. गली-गली में स्कूलों और कोचिंग सैंटरो की भरमार हो गई है. जो सुख-सुविधाए एक कार्यालय में होती है आज वो स्कूल के क्लास रूम में मिलने लगी है. ऐसी क्लासों में प्रवेश पाने के लिए जहा अभिभावकों को अपनी जेबे ढीली करनी पड़ती है वही बच्चे भी स्कूल का नाम, डिग्री और भविष्य को ध्यान में रख कर ऐसे स्थानों पर प्रवेश पाने की जिद करते है. लेकिन ऐसे शिक्षण संस्थानों का क्या हश्र होता है वो आप सभी समय-समय पर पढ़ते और सुनते रहते होगे. ऐसा नहीं है की यहाँ मै सभी संस्थानों के बारे में यही कहना चाहता हूँ लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते है जिनके बारे में सुन कर दुःख भी होता है और हँसी भी आती है की आज हम कहा जा रहे है. इससे पहले भी मैंने एक कोचिंग सेंटर के लिए गुफ्तगू की थी की किस तरह उसने बच्चो के भविष्य से खिलवाड़ किया. उसने ना सिर्फ बच्चो की मोटी रकम हड़प ली बल्कि कोचिंग के बाद नौकरी दिलवाने का जो झांसा दिया दिया था उसे भी पूरा नहीं किया. पोस्ट पढ़े:- बच्चो के भविष्य से खिलवाड़ करते कोचिंग सेंटर. आज जो गुफ्तगू मै आपके लिए लाया हूँ उसमे भी ऐसा ही कुछ है.
हिसार के उपमंडल बरवाला में चल रहे अम्बिका कालेज के बच्चे स्कूल संचालक की कारगुजारियो और धमकी से इतना परेशान हो गए की उन्होंने हिसार के उपायुक्त को ज्ञापन तक दे डाला. कालेज संचालक संजय भारद्वाज पैसे के पीछे इस कदर अँधा हो गया की उसने एक दिन कालेज में नहीं आने का जुर्माना 30 रूपए रख दिया और लेट आने का 15 रूपए. जब बच्चो ने इस जुर्माने की रसीद मांगी तो कहा की जुर्माने की कैसी रसीद. इसके अतिरिक्त पीरियड कम लगाने का भी जुर्माना लिया जाता है. जब बच्चो ने इसकी शिकायत करने की बात कही तो उनको धमकी दी गई की ऐसा करने पर उनको स्कूल में प्रवेश नहीं करने दिया जायेगा. जब कालेज के बच्चो से बात की गई तो उनका कहना था की कालेज द्वारा पूरी फ़ीस पहले ही ले ली जाती है तथा जुर्माना लगा कर उन पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है की वो कालेज में ना आये. मजेदार बात तो यह है की कुछ बच्चो द्वारा जुर्माना नहीं देने पर कुछ दिन पूर्व 2 - 3 बच्चो के नाम भी काट दिए गए. तो क्या यह मान लिया जाये की आज के बच्चो का भविष्य कमाई और शिक्षा के बीच पिस रहा है.


गलत संस्कृति या गलत परम्परा


भारत की संस्कृति गलत है मै यह नहीं कहना चाह रहा लेकिन यह मै आपसे पूछना चाह रहा हूँ की कहीं आज के युवा को यह संस्कृति गलत तो नहीं लगने लगी है. मेरे नजरिये में शायद ऐसा ही कुछ है की आज का युवा वर्ग विश्व विख्यात भारत की संस्कृति से मुंह मोड़ कर पाश्चात्य संस्कृति की और रुख करने लगा है. यही कारण है की नवरात्रों के दौरान जिस सोच को लेकर डांडिया खेला जाता था उस सोच को आज युवाओं ने बदल दिया है. आज डांडिया सिर्फ मौज-मस्ती के लिए रह गया है जबकि रामलीला में आज कलाकार किस तरह की कला का प्रदर्शन करते है उसके मैंने कल भी आपको दर्शन करवाए थे और आज भी कुछ फोटो प्रस्तुत कर रहा हूँ. ऐसे में युवाओं के लिए यह कहना गलत नहीं होगा की हम आज गलत संस्कृति में जी रहे है. जबकि सही मायने में आज हम गलत परम्परा का निर्वाह कर रहे है.
डांडिया और रामलीला हिसार में भी प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है. इनमे से कुछ भगवान् राम के चरित्र पर जीवंत होती है तो कुछ में भीड़ जुटाने के लिए भौंडा प्रदर्शन. जबकि डांडिया में आज युवाओं की मानसिकता क्या होती है यह बताने की जरुरत नहीं है. लडको की आवारागर्दी जहा ऐसे कार्यक्रम बिगाड़ने में अहम् भूमिका निभाती है तो लडकियों द्वारा पहनी जाने वाली पोशाक भी मुख्य रोल अदा करती है. इसके अतिरिक्त लड़के-लडकियों को भी डांडिया और रामलीला में मिलने का मौका मिल जाता है वो अलग से. इस बात का खुलासा इससे होता है की देश के एक प्रमुख समाचार चैनल ने दावा किया है की इस तरह के आयोजन युवाओं के लिए मौका मात्र है. ऐसा नहीं है की इस बात का पता माँ-बाप को नहीं होता. लेकिन उस समय युवा यह बात भूल जाते है की माँ-बाप ने उन्हें जन्म दिया है ना की उन्होंने उनको.
जासूसी ही एक मात्र उपाय
समाचार चैनल का कहना था की ऐसे आयोजनों को लेकर अब अभिभावक भी सतर्क होने लगे है. वो अपने बच्चो को इन कार्यक्रम में जाने से तो नहीं रोकते लेकिन बच्चे किसी गलत राह पर ना जा रहे हो उसे देखने के लिए बच्चो की जासूसी जरुर करवाई जा रही है. ऐसे में एक जासूसी कंपनी के संचालक का कहना था की इन दिनों बच्चो की जासूसी के कारण उन्हें जासूसों की कमी से दो-चार होना पड़ता है. अब आप ही बताये की अगर देश की संस्कृति को चलाये रखने के लिए गलत परम्परा का उपयोग किया जाने लगे तो उसको आप क्या कहोगे. गलत संस्कृति या गलत परम्परा


हिसार जलता रहा और नेता....


जाट आरक्षण को लेकर हिसार सहित पूरे प्रदेश में क्या कुछ घटित हुआ वो आप देख भी चुके होगे और सुना भी होगा. रही बात समझ में आने की तो इतना ही जान पाए होगे की आरक्षण के नाम पर एक बार फिर देश में हिंसा हुई और कुछ लोगो को काल का ग्रास बनना पड़ा. हिसार में क्या कुछ घटित हुआ शायद आप मेरी पिछली दो पोस्टो में पढ़ चुके होगे. इसके साथ-साथ इतना जरुर बताना चाहूँगा की पूरी हिंसात्मक कार्यवाही को जिन्होंने अंजाम दिया उनमे से अधिकतर वो थे जिन्हें देश का भविष्य कहा जाता है.
जी हां हम बात कर रहे है बच्चो और छात्रो की. पूरे घटनाक्रम के दौरान जितनी भागीदारी युवाओं की रही उतनी किसी की नहीं थी. हम यहाँ फोटो तो प्रदर्शित नहीं कर रहे है लेकिन इतना जरुर है की जो बच्चे स्कूल जाते तो पढने के लिए है लेकिन असामाजिक तत्वों द्वारा गुमराह होकर यही बच्चे किसी भी हद तक गुजर जाते है. जो फोटो गुफ्तगू को मिली उसमे ऐसा ही कुछ दिखाया गया है. एक स्कूल की वर्दी पहने और कंधो पर स्कूल का बैग उठाये जब ये बच्चे एक पुलिस चौकी को आग लगा रहे हो तो आप क्या कहेंगे.
यह फोटो और बच्चो के भविष्य को लेकर अन्य फोटो पर जल्द ही गुफ्तगू की जाएगी लेकिन वीरवार को एक पत्रकारवार्ता के दौरान जब अखिल भारतीय जाट महासभा के राष्ट्रीय महासचिव युद्धवीर सिंह से ऐसे आंदोलनों में युवाओं की भागेदारी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा की ऐसे आन्दोलन युवाओं के दम पर ही किये जाते है. चलो जी यह तो इनका मानना हो सकता है लेकिन इतना जरुर है की हिसार जलता रहा और किसी ने इन युवाओं को रोकने की कोशिश नहीं की. रही बात नेताओ की तो वो या तो हिंसा भड़कने से पहले दिखे या फिर हिंसा के बाद सिर्फ पत्रकारवार्ता में.
अब बात नेताओ की 
यहाँ लेख की हैड लाइन शुरू की गई थी हिसार जलने से और ख़त्म किये बिना ही नेताओ पर रोक दी गई. इसका मुख्य कारण था की हिसार जलता रहा और नेता सिर्फ बयानबाजी तक सिमित रहे. ना आन्दोलन करने वाले नेताओ को किसी से मतलब था तो ना किसी राजनितिक पार्टी के नेता को. उन्हें मतलब था तो सिर्फ बयानबाजी कर अपनी नेतागिरी चमकाने से. यह बात उस समय साबित हो गई जब एक तरफ हिसार धू-धू कर जल रहा था और कांग्रेसी विधायक संपत सिंह, विधायक रामनिवास घोड़ेला, हिसार जिलाध्यक्ष जयप्रकाश, कान्फेड अध्यक्ष बजरंग दास गर्ग सहित अनेको कांग्रेसी नेता रेस्टहॉउस में पत्रकारों से रु-ब-रु थे लेकिन कही भी मौके पर जाकर आंदोलनकारियो से बात तक करनी उन्होंने उचित नहीं समझी.
स्कूल बंद और बच्चे स्कूल में
एक तरफ जहाँ ग्रामीण स्कूली बच्चे हिंसात्मक कार्यवाही को अंजाम दे रहे थे वही कई स्कूलों के बच्चो को स्कूल बंद होने के पश्चात भी स्कूल में बैठ कर दिन काटना पड़ा. उस समय इन नन्हे-मुन्ने बच्चो को देश के भविष्य की नहीं अपितु यह चिंता खाए जा रही थी की इस आन्दोलन का क्या भविष्य होगा. उल्लेखनीय है की नगर के कई नए स्कूलों को शहर से बाहर स्थापित किया गया है. आन्दोलन की चिंगारी जैसे ही भड़की उसी समय ग्रामीणों ने शहर में प्रवेश करने वाले सभी रास्तो को जाम कर दिया. ऐसे में जो स्कूली बच्चे जहा थे वही रह गए. स्कूल प्रशासन ने बच्चो के अभिभावकों से फोन पर संपर्क साध कर उन्हें तसल्ली दी.


अब तो श्री कृष्ण को ही आना पड़ेगा




पूरे देश में जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया गया. रात जैसे ही 12 बजे, हर जगह भगवान् श्री कृष्ण का जन्मदिन हर्षोउल्लास से मनाया गया. इसके साथ ही मंदिरों में भगवान् श्री कृष्ण की जय जयकार होने लगी. गुफ्तगू ने भी भगवान् के जन्मदिन पर खुशिया मनाई. हिसार के बहुत से मंदिरों में घूम-घूम कर भगवान् के अनेको रूपों को अपने कैमरे में कैद किया. जैसा की जनमाष्टमी के दिन आपसे वादा किया गया था की हिसार के मंदिरों की फोटो आपको दिखाई जाएगी. गुफ्तगू ने उसे पूरा किया. वैसे तो शाम होते-होते एक समय भगवान् इंद्र देव

जम कर बरसे और एक बार जनमष्टमी का मजा किरकिरा होता हुआ नजर आया लेकिन लगभग एक घंटा बरसने के बाद नगर में फिर से चहल-पहल नजर आने लगी. श्री कृष्ण के भक्तो पर बरसात का असर कम ही दिखाई दिया तथा भक्तो ने भीगते हुए मंदिरों में झाँकियो के दर्शन किये. गुफ्तगू ने भी 10 फोटो अपने पाठको के लिए कैमरे में कैद की है. शायद आपको अच्छी लगे. आप फोटो पर क्लिक कर बड़ा कर सकते हो. इस बीच जहाँ सारी दुनिया श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रंग में रंगी हुई थी वही कुछ बदमाश अपनी योजनाओ को अंजाम देने की फिराक में
थे.
इसी के चलते एक युवा को काल का ग्रास बनना पड़ा. कल भी गुफ्तगू की गई थी की मेरे देश में मनाये जाने वाले कुछ त्योहारों पर अब आवारागर्द, बदमाश व् मनचले युवक अपनी मानसिकता को अंजाम देने लगे है. यही कारण है की जनता में ऐसे कुछ त्योहारों के प्रति रुझान घटने लगा है. अगर यहाँ और त्योहारों का जिक्र छोड़ सिर्फ जन्माष्टमी की बात की जाये तो यह कहना गलत नहीं होगा की आज के परिवेश में इस त्यौहार पर लडकियों का निकलना सुरक्षित नहीं रहा गया है वही कुछ लोग इन त्योहारों पर अपनी पुरानी रंजिश निकालने का अवसर ढूंढते है. या फिर यह कहा जाये की दिन-प्रतिदिन बढती बदमाशी के चलते आज जनता घर से निकलने में कतराने लगी है. इसी का नतीजा था की हिसार में 21 वर्षीय एक युवक की तेज धारदार हथियार से हत्या कर दी गई. पुलिस के अनुसार अभी तक यह हत्या आवारागर्दो द्वारा की गई लगती है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की इस हत्या के पीछे पुरानी रंजिश भी हो सकती है. मृतक की नवंबर में शादी तय थी.
यह घटना आवारागर्दो का काम इसलिए लगती है की मृतक के साथी ने बताया की वो दोनों एक मंदिर देख अपने घर को लौट रहे थे की बीच रास्ते में 10 - 12 युवक खड़े मिले. उन्होंने उनसे माचिस मांगी. उन्होंने जैसे ही माचिस के लिए माना किया तो एक युवक ने तेज धारदार हथियार निकाला और मृतक सुनील पर हमला कर दिया. जल्द ही सुनील को सामान्य अस्पताल ले जाया गया जहा उसने दम तोड़ दिया. इसके पीछे पुरानी रंजिस भी हो सकती
है क्योंकि सुनील हिसार के एक मल्टीप्लेक्स में टिकट विन्डो पर कार्यरत्त है. हो सकता है की कभी इन लडको के साथ टिकट को लेकर सुनील का कोई झगडा हुआ हो. कुछ भी हुआ हो लेकिन इतना जरुर है की अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन भारतीय त्योहारों की परम्परा टूटने लगेगी.यह भी हो सकता है की एक दिन हमारे बच्चे हम से यह पूछने लगे की भारत में जनमाष्टमी कैसे मनाई जाती थी.


कामनवेल्थ में दमखम दिखायेगा हिसार का छोरा


पहले कामनवेल्थ खेलो को लेकर तैयारियों में देरी और उसके बाद उसी तैयारोयो में लगने वाले पैसो को लेकर गोलमाल. रही सही कसर बरसात पूरी कर रही है. कभी खेलो को लेकर बनने वाले मैदानों पर उंगली उठ रही है तो कभी बरसात में मुख्य स्डेडियम की छत टपक रही है. कुछ दिनों से दिल्ली में बरसात ने जिस कदर कहर ढाया है उसे देख अभी भी संशय के बदल छाए हुए है की क्या भारत में यह खेल हो पाएंगे. कहने का अर्थ यह है की शुरू से ही इन खेलो को लेकर विभिन प्रकार की चर्चाओं का बाजार गर्म था और जब तक यह खेल संपन्न नहीं हो जाते यह बाजार ऐसे ही गर्म रहेगा.
लेकिन हिसार की जनता के लिए एक ख़ुशी की बात है की इन खेलो में हिसार का छोरा अपना दमखम दिखायेगा. वैसे तो दलबीर सिंह का पुत्र राजेन्द्र भिवानी के सच्चा खेडा का रहने वाला है लेकिन खेलो का अभ्यास उसने शुरू से ही हिसार के महावीर स्डेडियम विंग से किया है. अभी दो दिन पूर्व ही उसका चयन पटियाला में किया गया. राजेन्द्र एथलेटिक का खिलाडी है और आल इंडिया में स्वर्ण पदक हासिल कर चुका है. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर की सीनियर प्रतियोगिता में उसने दूसरा स्थान हासिल किया है. नेता व् अधिकारी इन खेलो को लेकर क्या खेल खेल रहे है यह तो पता नहीं लेकिन इतना जरुर है की अब हिसार की जनता को राजेन्द्र के खेल से अवश्य उम्मीद रहेगी.


काश ज़मीं से बंदूके पैदा हो गई होती


मात्र तीन साल का एक छोटा सा बालक अपने पिता के साथ खेतो में सिर्फ इसलिए जाता था की देश गुलाम था. जब उसने पिता को जमीन में बीज बोते देखा तो उसने अपने पिता से कहा की बापू आप यह क्या कर रहे हो. इस पर पिता ने कहा की बेटा जमीन में बीज बो रहा हूँ. कुछ समय बाद यहाँ फसल पैदा होगी जिससे हमको अनाज मिलेगा. वो छोटा सा बालक चुपचाप सुनता रहा और कुछ समय बाद वो खेत के एक कोने में गया और अपने छोटे-छोटे हाथो से जमीन खोदने लगा. बेटे को अकेले कुछ करता देख जब पिता वहा गया तो देखा की उनका तीन साल का बेटा जमीन में खड्डे खोद कर पेड़ की पत्तिया दबा रहा है. लालसा लिए पिता ने पूछा की बेटा क्या कर रहे हो तो बेटे ने कहा की बापू जमीन में पत्तिया दबा रहा हूँ कुछ समय बाद यहाँ बन्दूको का पेड़ लगेगा. उन बन्दूको से मैं अंग्रेजो को मार भगाऊँगा.
आप शायद अब तक समझ ही गए होंगे की कौन था वो भारत की आजादी की दीवाना जिसका मैं यहाँ जिक्र कर रहा हूँ. अगर आप हरियाणा के रहने वाले है और सरकारी कार्यालय में कार्यरत्त है तो शायद अभी तक नहीं याद आया होगा क्योंकि हरियाणा सरकार उस दीवाने को याद करना भूल गई. यही कारण रहा की जहा देश में आजादी के हर उस परवाने को याद किया जाता है जिसने देश को आजाद करवाने में अपना योगदान दिया लेकिन 23 मार्च को जो देश भक्त अपने देश को आजाद करवाने के लिए फांसी पर झूल गया उसको हरियाणा सरकार कैसे भूल गई. सरकारी छुट्टी करना तो दूर उसकी याद में कोई सरकारी कार्यक्रम तक आयोजित नहीं किया गया. क्या हम यह मान ले की ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वो किसी राजनितिक पार्टी विशेष से सम्बंधित नहीं थे.
जिस माता के सपूत ने अपनी जंग के लिए शादी तक नहीं की, जिसने अपना सारा जीवन देश को आजाद करवाने में लगा दिया. यहाँ तक की एस्म्बली में हथगोला फेंकने के बाद जो वीर सपूत मौके से भाग सकता था. लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं भागा की अगर वो भाग गया तो देश के नौजवान युवको में हिम्मत नाम की चीज ख़त्म हो जाएगी. इसलिए उन्होंने गिरफ्तार होना ही मुनासिब समझा और हँसी-हँसी फांसी पर झूल गए. जी हां हम बात कर रहे है शहीद भगत सिंह की. जिन्होंने अपने दो साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ मिल कर इस घटना को अंजाम दिया और अंग्रेज पुलिस के हाथो गिरफ्तार होकर 23 मार्च को देश की आजादी के लिए शहीद हो गए. उनकी शहादत पर मैं जाने माने कवि लाजपत राय विकत की कुछ पंक्तिया प्रस्तुत कर रहा हूँ. शायद आपको पसंद आएगी.

यह विजय गाथा है आक्रोश के अंगारे की,
पैदा तूफ़ान के प्रचंड के उस धारे की,
प्रचंड धारे की इन्कलाब नारे की,
सिंहनी के सपूत देश के दुलारे की,
पाया जो कुछ भी था वो पाया सिर्फ खोने को,
हुआ था पैदा वो सिर्फ शैदा होने को,
शमा जलाई थी खुद उसी में जल जाने को,
ऐसे परवाने को आजादी के दीवाने को,
क्या डराती कोई गोली क्या तोप का गोला,
गया था जिसने माँ मेरा रंग दे बसंती चोला.

शहीद भगत सिंह की शहादत को शत-शत नमन !


डर सा जो लगने लगा है


अभी कुछ दिनों पहले तक की बात है. मैं रात को अपने कार्यालय में बैठा गुफ्तगू किया करता था. मेरे अपने व् मिलने वाले इस बात को लेकर अक्सर मुझे टोकते की आज कल रात को सुनसान सड़क पर अकेले बैठ कर काम करने का समय नहीं है. कल को कोई अनहोनी हो गई तो किसी को क्या जवाब देगा की रात को 10 बजे तक अपने कार्यालय में बैठ कर क्या किया करता. फ्री में ब्लोगिंग ही करनी है तो समय से काम निपटा लिया करो और घर चले जाया करो. मैं उन्हें अक्सर कहता की कोई मुझ से क्या लेकर जायेगा और मुझे भला क्या कहेगा. आखिर पत्रकार हूँ और चलता सड़क है और समय भी 10 ही तो बजते है. इसलिए डरने की कोई बात नहीं है.
शहर में होने वाली छोटी-छोटी वारदातों को


वैलंटाइंस डे, प्यार, इजहार और देशभक्त


पहले लिखी हुई बात दोहराना नहीं चाहता लेकिन इतना बताना चाहता हूँ की रविवार को सुबह जल्दी उठ गया. अजीब सी बेचैनी थी की आज वैलंटाइंस डे भी है रविवार भी. स्कूल-कालेज तो बंद होंगे तो पता नहीं आज अपने प्यार का इजहार करने वाले युवा कैसे मिलेंगे. पुलिस की क्या भूमिका होगी और इस दिन का विरोध करने वाले आखिर क्या कर रहे होंगे. ऐसा ही कुछ सोच कर घर से जल्दी निकल पड़ा और बाजार की चकरी काटने लगा. कुछ पार्को में भी गया और फूल की दुकानों पर भी मेरी नजर थी. कुछ इक्का-दुक्का लड़के-लडकिया फूल की दुकान से फूल खरीद रहे थे तो कुछ सज-धज कर


और आज गणतंत्र दिवस है


आज मेरे देश का 61वा गणतंत्र था यह मैं भलीभांति जानता था. लेकिन मुझे यह कहते कोई संकोच नहीं की आज कितने ही भारतीयों को यह बात पता थी. कारण एक की आज सभी या तो अपने में व्यस्त है या फिर वो देश को आजादी दिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को भूल गए है. आज सुबह मुझे उस समय बहुत अफ़सोस हुआ जब किसी ने मुझे फोन कर पूछा की आज बैंक की छुट्टी


कौन बदलेगा! सरकार, समाज, प्रशासन या हम


हरियाणा के रुचिका प्रकरण को लेकर जो कुछ चल रहा है वो आप सभी टीवी व् समाचार पत्रों में पढ़ रहे है लेकिन जो नहीं चल रहा वो सिर्फ प्रबुद्ध नागरिको के लिए गुफ्तगू का विषय बना हुआ है. अभी तक यही समझ में नहीं आ रहा है की इस मामले में क्या हुआ है और अभी क्या होना बाकी है. अगर यह कहा जाये की दोषी अभी भी अपनी सजा को लेकर निश्चिन्त है तो गलत नहीं होगा. क्योंकि अभी तक जो समाचार पत्रों में पढ़ा है और टीवी पर देखा है वो ह्रदय को झकझोर कर


मत छेड़ो जख्म की दर्द बहुत है


मेरी आवाज अगर आज भी दबा दी गई, मेरी रूकती हुई सांसो की महक बोलेगी
तुम मेरे बोलते हुए होंठो को तो सी सकते हो, दिल की आवाज मगर दूर तक जाएँगी

ये पंक्तिया किसी कवि द्वारा रचयित नहीं है लेकिन मेरे दिल की उपज ये दो लाइन स्कूलों में पढने वाले बच्चो वो भाव मात्र है जो अभी पैन या पेन्सिल ही पकड़ पा रहे थे. लेकिन जैसे ही उन्हें रॉकेट लांचर, स्टेनगन, तोप और टैंक दिखे तो लगा की अगर इन बच्चो के हाथो में अगर ये सब दे दिए जाये तो भारत के दुश्मनों की


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तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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