अजब तस्वीरों का गजब खेल


कहते है की तलवार की धार कई बार इतना गहरा घाव नहीं देती जितना की जुबान से निकली बोली चोट मार देती है. ऐसा ही कुछ तस्वीरों के साथ भी संभव है. कभी-कभी इतना कुछ हो जाता है की कलम नहीं लिख पाती लेकिन एक छोटी सी तस्वीर सब कुछ बयान कर जाती है. जैसा की आपको पता है की आज कल गुफ्तगू रोचक जानकारिय आप तक पहुंचा रहा है वैसे-वैसे इसके पाठक भी बहुत सी जानकारियों के साथ मेल करने लगे है. हाल ही में मुझे एक मेल मिली थी. मेल का शीर्षक था असमंजस में कलम . पढ़ कर कुछ अजीब सा लगा लेकिन जब मेल खोल कर कवि की सोच और भाव पढ़े तो उंगलिया अपने आप चलने लगी और यह मेल गुफ्तगू पर प्रकाशित हो गई. प्रकाशित भी क्या हुई आदरणीय रूप चन्द्र शास्त्री जी मयंक ने इसको अपने चर्चा मंच में स्थान दिया. जिसके लिए कविता का लेखक और शास्त्री जी दोनों ही बधाई के पात्र है. अब भाई जिसकी कविता उसी को मुबारक और यह मेरे लिए अच्छी बात है की किसी अच्छे कवि की वजह से मेरी गुफ्तगू को चर्चा मंच में स्थान मिला. अब देखो ना हम बात कर रहे थे अजब तस्वीरों के गजब खेल की. तो हाल ही में मुझे एक और मेल मिली. मेल में कुछ तस्वीरे थी जिन्हें देख हँसी भी आ रही थी तो कुछ ऐसा भी लग रहा था की क्या वाकई ऐसा हो सकता है. यह तस्वीरे मैं आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ. आशा है आपको भी उतनी ही रोचक लगेगी जितनी की मुझे लगी है.









ठंडी में भी पसीना आये


लगभग पूरे उत्तर भारत में इन दिनों ठण्ड अपने पूरे यौवन पर है. कहीं बर्फ़बारी हो रही है तो कहीं शीत लहर चल रही है. जहां तक पढ़ा और सुना है तो पारा भी अपना कमाल दिखा रहा है. अब हरियाणा को ही देख लो. कई जिलो में तो पारा शून्य से नीचे तक पहुँच गया है तो कहीं पहुँचने वाला है. कुल मिलकर ठिठुरन के आगे सब कुछ ठहर सा गया है. उस पर भी सूरज देवता मेहरबान नजर आ रहे है. दिखे तो दिखे नहीं तो कौन कुछ कहने वाला है. ऐसे में हर बाजार व् गली-मौहल्ले में सुबह से लेकर एक ही काम नजर आता है, आग सेकना.
इतनी ठण्ड में काम-धधे तो वैसे ही चौपट है उस पर जिन्हें आग की तपत नसीब नहीं हो रही वो कहीं ना कहीं किसी ना किसी गर्म चीज में दुबका नजर आ रहा है. वो चाह कर भी हीटर नहीं लगा सकता. इसका मुख्य कारण है की हाल ही में हरियाणा सरकार ने बिजली के बिलों में बेतहाशा बढ़ोतरी जो कर दी है. अगर किसी ने ठण्ड के चलते हीटर लगाया भी हुआ है तो बिजली बिल की सोच कर वैसे ही पसीना आ रहा है. लेकिन कहते है ना की मरता क्या ना करता. गर्मी भी जरुरी है. चलो जी सबकी अपनी-अपनी जिंदगी और अपनी-अपनी सोच है.
लेकिन यहाँ गुफ्तगू यह है की इस कडकडाती ठण्ड में अगर चल रहा है तो सिर्फ हीटर का धंधा. आज बिजली की कोई दुकान ऐसी नहीं होगी जहां दिन में 10 - 20 ग्राहक हीटर मांगने नहीं आते होंगे. इस कडकडाती ठण्ड में हीटर की जितनी बिक्री निकल रही है उतनी तो शायद किसी ने सोची भी नहीं थी. ऐसे में आज आम आदमी को हीटर मिलना तो दूर देखना भी नसीब नहीं हो रहा है. दिल्ली तक में हीटरों की इतनी कमी बताई जा रही है की जनवरी तक लागत पूरी नहीं हो सकती. इसका मुख्य कारण है की चाइना से अब कोई माल नहीं आ रहा.
बताते है की दिल्ली में चाइना से माल मंगवाने वाले जीतने लोग है उनका स्टाक ख़त्म हो चुका है. जिसके पास थोडा बहुत माल पड़ा है उसने हीटरों की कीमतों में इतनी वृद्धि कर दी है की अब हीटर खरीदना आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गया है. क्योंकि अबकी बार भारत में जितना हीटर बिका है उसमे चाइना के हीटर का 80 प्रतिशत हिस्सा है. यही कारण रहा की सर्दी शुरू होने से पहले जिस हीटर की कीमत 300 थी वो अब 800 में बिक रहा है. इसके साथ ही जो घुमने वाला हीटर 800 में बिक चुका है दुकानदार उसके आज 1600 रूपए मांग रहा है.
ऐसे में जहां दिल्ली के होलसेल विक्रेता चांदी कूट रहे है वही स्थानीय दुकानदारों की भी बल्ले-बल्ले हो रही है. जबकि आम आदमी चाइना के आगे अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है. उसको तो हीटर और बिजली बिल के नाम से ठंडी में भी पसीने आ रहे है.


आओ बच्चो तुम्हे दिखाए....



नाटक कैसे बनता है. कैसे इसको तैयार किया जाता है. कौन तैयार करता है जैसे कई सवाल जहाँ कभी-कभी बच्चो के जेहन में दौड़ते है वही यही सवाल हमको भी सोने नहीं देते. यही करण है की नाटक के बारे में सीखना तो दूर बच्चे सही से जान भी नहीं पाते. आज के बच्चे सिर्फ और सिर्फ किताबी कीड़े बन कर रह गए है. यही करण है की हिसार के रंगकर्मियों ने बच्चो के दिल से नाटक, पर्दा और रंगमंच के प्रति डर निकालने के उद्देश्य से एक म्यूजियम बना कर जनता को समर्पित किया है. इसमें 6 साल से लेकर 16 साल तक के बच्चे वह सब कुछ जान पाएंगे जो एक नाटक या फिल्म देख कर उनके दिल में जिज्ञासा जागती है.
यह तो सभी जानते है की हिसार का रंगमंच बहुत पुराना है और हिसार ने बहुत से कलाकार इस देश को दिए है. इसके पीछे भी यह रंगमंच ही है जो एक बहुत लम्बे अरसे से कलाकारों की कर्मभूमि रहा है. ओपेरा नाम से बनाये गए इस म्यूजियम के बारे में बताते हुए निर्देशक गुलशन भूटानी ने कहा की विजिट टू ओपेरा में हमारा मकसद उन बच्चो में से झिझक और डर को दूर करना है जो यहाँ आयेंगे. साथ ही उन्होंने कहा की अगर किसी बच्चे को अपनी पढ़ाई के किसी विषय में कोई परेशानी है तो यहाँ उसकी परेशानी को प्ले के माध्यम से दूर किया जायेगा. ऐसा करने से ही बच्चे की प्रतिभा को तराशा जा सकता है.

एन.एस.डी. की छात्रा रही सुनीता तिवारी नागपाल ने बताया की एन.एस.डी के मंजे हुए कलाकार समय-समय पर अपने अनुभव और जानकारिय बच्चो के साथ सांझा करेंगे. ओपेरा थियेटर की जानकारी देते हुए डा. कश्यप ने बताया की इस तरह के विश्व में तीन थियेटर है. जिसमे से ओपेरा का नंबर तीसरा है जबकि एक डेनमार्क और दूसरा हालैंड में है. डा. कश्यप ने बताया की थियेटर को चार भागो में बांटा गया है जिससे बच्चो को सिखने में आसानी होगी. उन्होंने कहा की एक थियेटर लन्दन में बना था लेकिन वह आर्थिक संकट के चलते बंद हो गया. उन्होंने माना की भारत के रंगमंच की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है लेकिन वो किसी तरह इसको चला रहे है.


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तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

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आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

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भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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