जब भाजपा का उपवास..., उपहास सा लगने लगा


अधिकतर पदाधिकारी रहे दूर, आए वो कुछ देर में चलते बने, कुछ पहुंचे मात्र औपचारिकता निभाने


हिसार। कांग्रेस पर संसद न चलने देने का आरोप लगाते हुए देशभर में भाजपा के आह्वान पर किये गए उपवास का भाजपाइयों ने ही मजाक बना डाला। उपवास कार्यक्रम से पार्टी के अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे वहीं अधिकतर नेता मौके
पर आकर औपचारिकता निभाकर जाते रहे। यही नहीं, जिले में विभिन्न विभागों, बोर्डों व निगमों के सात चेयरमैनों में से केवल एक चेयरमैन ही उपवास में नजर आए वहीं अन्य बड़े नेता भी कन्नी काटते नजर आए।
भाजपा के राष्ट्रीय आह्वान पर उपवास कार्यक्रम रखा गया था। हिसार में अग्रसेन चौक के उसी पार्क को भाजपा ने उपवास स्थल चुना, जिसमें कांग्रेसियों ने उपवास किया था। भाजपाइयों का उपवास कार्यक्रम भी कांग्रेसियों से कम नहीं रहा। जिस तरह कांग्रेसियों का उपवास कार्यक्रम मजाक बनकर रह गया वहीं भाजपा भी इससे अछूती नहीं रही। भाजपा के अधिकतर पदाधिकारी ही इस कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, एक प्रदेशस्तरीय नेता लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उक्त नेता के बारे में प्रसिद्ध है कि वह हर कार्यक्रम में देरी से पहुंचकर केवल बैठने के लिए सीट हथियाने के प्रयास में रहता है। बताया जाता है कि उक्त नेताजी को उपवास कार्यक्रम की जानकारी भी नहीं थी और उन्हें अपने मीडिया प्रभारी के माध्यम से उपवास कार्यक्रम की जानकारी मिली थी। हुआ यूं कि उक्त नेताजी के मीडिया प्रभारी किसी तरह पत्रकारों को मिल गये और जब पत्रकारों ने उससे पूछा की नेताजी उपवास में हैं क्या, तो मीडिया प्रभारी का कहना था कि किस बात का उपवास, आज पार्टी का कोई कार्यक्रम है क्या? इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से पूरी जानकारी लेकर अपने आका को फोन किया और उपवास कार्यक्रम में जाने की सलाह दी, जिस पर उक्त नेताजी लगभग दो बजे इस कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी हाजिरी लगवाई। 
पार्टी के इस उपवास कार्यक्रम से कुछेक को छोड़कर अधिकतर पदाधिकारी ही दूर रहे। पार्टी आए दिन नई नियुक्तियों की घोषणा करती है लेकिन नई नियुक्तियों वाले तो दूर, पुराने पदाधिकारी व कार्यकर्ता भी पार्टी जुटा नहीं पाई और हालत यह हो गई कि निर्धारित पार्क भरना तो दूर, चौथाई हिस्से में बैठकर सत्तारूढ़ भाजपाइयों को कांग्रेस पर हमले करने पड़े।


साला मै तो साब बन गया


कुछ भी लिखने से पहले मै ब्लागस्पाट का शुक्रिया करना चाहूँगा जिसने मुझे एक मंच दिया कुछ लिखने का, अपनी बात कहने का और उससे भी ज्यादा गुफ्तगू करने का. शायद मेरे जैसे एक पाक्षिक पत्रिका में काम करने वाले रिपोर्टर को अपने सभी समाचार पाठको तक पहुँचाने का इससे अच्छा जरिया कुछ मिल भी नहीं सकता था.
इसके बाद बारी आती है सुधि पाठको की, फोलोअर की और उन पाठको की जो मेल के जरिये गुफ्तगू पढ़ते और करते है. बावजूद इसके जब एक अधिकारी ने मुझे यह कहा की ब्लॉग भी कोई पढने की चीज है तो मैंने गुफ्तगू का डोमेन ले लिया और इसको एक साईट की तरह चलाने लगा. इसलिए मै .को.एनआर का भी शुक्रिया अदा करता हूँ.
अब आपको मै यह बताना चाहता हूँ की बतौर पत्रिका का रिपोर्टर होने के नाते मुझे हिसार प्रेस क्लब में स्थाई सदस्यता नहीं मिल रही थी. लगभग एक साल मुझे क्लब का साधारण सदस्य रहना पड़ा. लेकिन उस समय तक मैंने अपना ब्लॉग बना लिया था और गुफ्तगू करने के लिए मै सक्रिय भी हो गया था. यही कारण था की कुछ साथियों ने मेरा साथ दिया और अध्यक्ष को कहा की जो सूर्य गोयल सप्ताह के सात दिन में से आठ दिन फिल्ड में दिखाई देता हो उसको साधारण सदस्य क्यों रखा गया है. साथी सदस्यों का विरोध देख कर मुझे पिछले वर्ष हिसार प्रेस क्लब का स्थाई सदस्य बना दिया गया और इसके साथ ही मुझे वोट देने का अधिकार मिल गया.
अब बारी आई क्लब की गतिविधियों में भी सक्रिय होने की. इसके लिए बीते वर्ष हुए चुनाव में मैंने क्लब का कोषाध्यक्ष बनने पर विचार किया. कुछ साथी भी मेरे पक्ष में थे लेकिन चुनाव अधिकारी के पास समय पर नहीं पहुँच पाने के कारण मै चुनाव लड़ने से रह गया लेकिन हमारे पैनल का अन्य साथी चुनाव जीत गया. इसके बाद मैंने अपने स्तर पर क्लब के लिए जो करना चाहिए था वो तो किया ही साथ ही उन सभी गतिविधियों में क्लब का साथ दिया जो क्लब द्वारा शुरू की गई. इसके लिए क्लब और साथी पत्रकारों का भी मुझे पूर्ण सहयोग मिला. जैसे-तैसे कर एक साल गुजर गया. अब बारी थी इस चुनाव की. अबकी बार मै मै कुछ साथियो के सहयोग से उपप्रधान पद की दौड़ में था. विचार था की अगर चुनाव होता है तो सूर्य गोयल हमारे पैनल का उपप्रधान पद का दावेदार है.
अफ़सोस की रविवार को हुई बैठक में सर्वसम्मति बन गई. यह एक ख़ुशी की बात भी थी की लगभग 80 सदस्यों ने एक मत से क्लब के पूर्व प्रधान व् दैनिक भास्कर के ब्यूरो चीफ राकेश क्रांति को पुनः प्रधान, पंजाब केसरी के ब्यूरो चीफ पवन राठी को सचिव, धर्मपाल बिश्नोई व् आज तक के भूपेन्द्र मोर को उपप्रधान, सच कहूँ के सुशिक कुमार व् पंजाब केसरी के महेंद्र सप्र को सह सचिव व् हरी भूमि के शमशेर को पुनः कोषाध्यक्ष चुन लिया गया. सूर्य गोयल और संयम जैन की क्लब के कार्यो में सक्रियता को देखते हुए प्रेस प्रभारी का पद दिया गया. इसके साथ ही यह घोषणा भी की गई की क्लब की कोई भी नई गतिविधि को शुरू करने से लेकर अंतिम चरण तक सूर्य गोयल और संयम जैन की देखरेख में पूरा किया जायेगा.
बात जहां से शुरू हुई थी
यही कारण है की मै ब्लागस्पाट, .को.एनआर सहित मेरे सभी पाठको और फोलोअर का शुक्रिया अदा करता हूँ की अगर उनका इतना स्नेह, साथ और प्यार ना मिलता तो मै आज तक गुफ्तगू नहीं कर पाता. अगर गुफ्तगू ही नहीं कर पाता तो पत्रकारिता की फिल्ड में सक्रिय कैसे होता. और अगर सक्रिय ही नहीं होता तो प्रेस क्लब का स्थाई सदस्य कैसे बनता. स्थाई सदस्य नहीं होता तो आज आपका यह ब्लॉगर साथी क्लब के मुख्य पद पर बैठ कर यह कैसे गता की साला मै तो साब बन गया.


पहले दिल्ली सजा फिर दिल और अब....


अभी कल (शनिवार) की ही तो बात है. हम दो लोगो में गुफ्तगू चल रही थी की महात्मा गाँधी अहिंसावादी थे. वो कहते थे की अगर कोई आपके एक गाल पर एक तमाचा जड़ दें तो दूसरा गाल आगे कर देना चाहिए. एक बालक के साथ ऐसा हो भी गया. किसी ने उसको एक तमाचा जड़ दिया तो उसने दूसरा गाल भी आगे कर दिया. सामने वाले ने दूसरे गाल पर भी तमाचा जड़ दिया. बालक सोचने लगा की अब क्या करें. वो भाग कर दीवार के पीछे गया और अपने पिता की बन्दुक निकाल कर लाया और तमाचा जड़ने वाले पर तान दी. यह देख वो सकपकाया और बोला की अभी तो तुम बोल रहे थे की तुम अहिंसावादी हो तो उसने तपाक से जवाब दिया की मैंने महात्मा गाँधी जी की पार्टी बदल ली है और अब मै सुभाष चन्द्र बोश की पार्टी का सदस्य हूँ. लेकिन पता नहीं क्यों आज भी मेरा देश अपनी पुरानी नीतियों पर ही चल रहा है. ना वो पार्टी बदल रहा है और ना ही कुछ कर रहा है. यहाँ यह गुफ्तगू इसलिए जरुरी थी की अभी हाल ही में अमेरिका के राष्ट्र्पाती बराक ओबामा भारत यात्रा पर आये थे. भारत के लिए वो जैसे आये थे वैसे ही वापिस भी चल दिए, और भारत के हाथ कुछ नहीं लगा.
अमेरिका के राष्ट्रपति की यह कोई पहली भारत यात्रा नहीं थी. इससे पहले भी भारत को अमेरिका और पकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपतियों द्वारा तमाचे पड़ चुके है. लेकिन मेरे देश के नेता है की दोनों गाल पर खाने के पश्चात भी पार्टी नहीं बदल रहे है. अब देखो ना कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए पहले दिल्ली को सजाया गया. माना की यह देश की आन-बान-शान का सवाल था. भले ही नेताओ ने खेलो के आयोजन में जम कर चांदी कुटी हो लेकिन जैसे-तैसे कर कॉमनवेल्थ गेम्स का समापन कर दिया गया. दिल्ली को दुल्हन की तरह सजाया गया. हर उस चीज को नया रूप दिया गया जिससे आज तक दिल्ली का आम आदमी महरूम था. दिल्ली की साज-सज्जा, आवभगत और खेलो के आयोजन से खुश हो कर विदेशी मेहमान हमसे रुखसत हो गए. लेकिन एक दर्द आज भी राजधानी वाशियों के दिल में है की अरबो रूपए खर्च कर जैसा दिल्ली को मेहमानों के लिए बनाया गया था क्या वैसा उनके लिए बना नहीं रह सकता. लेकिन यहाँ सब अपने और मेहमानों के लिए किया जाता है जनता की भलाई की किस को पड़ी है. दिल्ली के बाद बारी थी दिल सजने की.
अभी नेताओ ने कॉमनवेल्थ गेम्स समाप्त होने पर राहत की सांस ही ली थी की अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा का समय नजदीक आने लगा. इससे पहले भी बिल क्लिंटन और जार्ज बुश भारत यात्रा पर आ चुके है. जैसे ही यह समाचार देश के नेताओ को मिला वो भ्रष्टाचार और घोटालो से ऊपर उठ कर अपने दिल को सजाने में जुट गए. देश की संस्कृति के अनुरूप भारत में मेहमानों को भगवान् का दर्जा दिया जाता है कुछ उसी पद्धति पर चलते हुए पूर्व राष्ट्रपतियों की तरह बराक ओबामा का भी भव्य स्वागत किया गया. बराक ओबामा दो पार्टियों के सदस्य की भांति भारत में आये लेकिन भारतीय नेता सिर्फ उनके आगे-पीछे ही रहे. प्रधानमन्त्री, सोनिया गाँधी से लेकर विपक्ष तक सिर्फ उनकी बाते सुनने में मशगूल रहा वही ओबामा समय-समय पर अपनी रणनीति दिखाते रहे. एक बारगी ऐसा लगा जैसे वो एक व्यापारी की भांति भारत में आये और अपना काम साध कर वापिस हो लिए. कुल मिला कर भारतीय नेताओ ने भले ही अपने दिल को कितना ही सजाया हो लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा. पाकिस्तान पर जो थोडा बहुत वो बोले थे वापिस जाकर उस पर भी सफाई आ गई.
अब बारी फिर एक विदेशी मेहमान के भारत आने की थी. मिडिया से लेकर आम जनता फिर पलके बिछाए खड़ी हो गई. आखिर कार उनके हाथ क्या लगा. मिडिया वालो ने अपने कैमरे तुडवाये सो तुडवाये जनता ने पुलिस के डंडे खाए वो अलग से. शायद अब तक आप समझ गए होंगे की यहाँ किसकी बात हो रही है. जी हां आप सही समझ रहे है. पामेला एंडरसन की. लाखो रुपया देकर तो उनको भारत बुलाया गया उस पर भी देशवाशियो को उनकी एक झलक तक नहीं मिली. अब तो ऐसा लगने लगा है की हम सिर्फ सजने के लिए ही रह गए है. लेकिन यहाँ फिर एक बात याद आती है की सजती तो दुल्हन भी लेकिन उसकी जिंदगी में वो समय जरुर आता है जब उसका सजना साकार हो जाता है. तो क्या कभी हमारा सजना साकार होगा या फिर हम हमेशा ऐसे ही किन्नरों की तरह सजते रहेंगे.


देश की इज्जत का सवाल है













कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने में अब कुछ चंद दिन ही बाकी बचे है. पूरे देश सहित विश्व की निगाहें इस बात पर टिकी है की खेलो का आगाज जहां भले ही फीका रहा हो लेकिन समापन तक अब कोई परेशानी ना आये. हर भारतवाशी भी यही कामना करता है. और तो और शासन-प्रशासन ने भी अपनी गलतियों और खामियों को छुपाने के लिए देशवाशियो और मिडिया को यह दुहाई देनी शुरू कर दी है की अब बहुत हो चुका लेकिन अब ऐसा कुछ ना दिखाए और ना बोले जिससे इन खेलो पर कोई संकट आये. मजेदार बात तो यह है की सब कुछ करने के बाद अब उन्हें यह खेल देश की इज्जत का सवाल नजर आने लगे है. गुफ्तगू मानता है इस बात को की यह देश की इजात का सवाल है लेकिन क्या इसमें देश की इज्जत बढ़ रही है की जहा चहुँ ओर इन खेलो को लेकर भारत की किरकिरी हो रही है वही देश के तख्तो-ताज पर बैठे देश के सिर मोर अब तक चुप है. जी हां यहाँ पहलू पर गौर करे तो अब तक प्रधानमन्त्री ने कुछ चीजो पर आयोजको की नाममात्र की खिंचाई तो जरुर की है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ओर महासचिव राहुल गाँधी अब तक चुप क्यों है. क्या उनका इन खेलो से कोई लेनादेना नहीं है या इतना लेनादेना है की वो चुप रहने में ही भलाई समझते है. जो भी हो लेकिन गुफ्तगू आपके समक्ष समाचार का दूसरा पहलू रखते हुए कुछ कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार हुए स्टेडियम की कुछ तस्वीरे पेश कर रही है जिनमे कारीगरों की मेहनत साफ़ झलक रही है. गुफ्तगू के हाथ लगी इन तस्वीरों को आप तक पहुँचाना गुफ्तगू अपना कर्तव्य समझता है क्योंकि यह देश की इज्जत का सवाल है.


हिसार जलता रहा और नेता....


जाट आरक्षण को लेकर हिसार सहित पूरे प्रदेश में क्या कुछ घटित हुआ वो आप देख भी चुके होगे और सुना भी होगा. रही बात समझ में आने की तो इतना ही जान पाए होगे की आरक्षण के नाम पर एक बार फिर देश में हिंसा हुई और कुछ लोगो को काल का ग्रास बनना पड़ा. हिसार में क्या कुछ घटित हुआ शायद आप मेरी पिछली दो पोस्टो में पढ़ चुके होगे. इसके साथ-साथ इतना जरुर बताना चाहूँगा की पूरी हिंसात्मक कार्यवाही को जिन्होंने अंजाम दिया उनमे से अधिकतर वो थे जिन्हें देश का भविष्य कहा जाता है.
जी हां हम बात कर रहे है बच्चो और छात्रो की. पूरे घटनाक्रम के दौरान जितनी भागीदारी युवाओं की रही उतनी किसी की नहीं थी. हम यहाँ फोटो तो प्रदर्शित नहीं कर रहे है लेकिन इतना जरुर है की जो बच्चे स्कूल जाते तो पढने के लिए है लेकिन असामाजिक तत्वों द्वारा गुमराह होकर यही बच्चे किसी भी हद तक गुजर जाते है. जो फोटो गुफ्तगू को मिली उसमे ऐसा ही कुछ दिखाया गया है. एक स्कूल की वर्दी पहने और कंधो पर स्कूल का बैग उठाये जब ये बच्चे एक पुलिस चौकी को आग लगा रहे हो तो आप क्या कहेंगे.
यह फोटो और बच्चो के भविष्य को लेकर अन्य फोटो पर जल्द ही गुफ्तगू की जाएगी लेकिन वीरवार को एक पत्रकारवार्ता के दौरान जब अखिल भारतीय जाट महासभा के राष्ट्रीय महासचिव युद्धवीर सिंह से ऐसे आंदोलनों में युवाओं की भागेदारी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा की ऐसे आन्दोलन युवाओं के दम पर ही किये जाते है. चलो जी यह तो इनका मानना हो सकता है लेकिन इतना जरुर है की हिसार जलता रहा और किसी ने इन युवाओं को रोकने की कोशिश नहीं की. रही बात नेताओ की तो वो या तो हिंसा भड़कने से पहले दिखे या फिर हिंसा के बाद सिर्फ पत्रकारवार्ता में.
अब बात नेताओ की 
यहाँ लेख की हैड लाइन शुरू की गई थी हिसार जलने से और ख़त्म किये बिना ही नेताओ पर रोक दी गई. इसका मुख्य कारण था की हिसार जलता रहा और नेता सिर्फ बयानबाजी तक सिमित रहे. ना आन्दोलन करने वाले नेताओ को किसी से मतलब था तो ना किसी राजनितिक पार्टी के नेता को. उन्हें मतलब था तो सिर्फ बयानबाजी कर अपनी नेतागिरी चमकाने से. यह बात उस समय साबित हो गई जब एक तरफ हिसार धू-धू कर जल रहा था और कांग्रेसी विधायक संपत सिंह, विधायक रामनिवास घोड़ेला, हिसार जिलाध्यक्ष जयप्रकाश, कान्फेड अध्यक्ष बजरंग दास गर्ग सहित अनेको कांग्रेसी नेता रेस्टहॉउस में पत्रकारों से रु-ब-रु थे लेकिन कही भी मौके पर जाकर आंदोलनकारियो से बात तक करनी उन्होंने उचित नहीं समझी.
स्कूल बंद और बच्चे स्कूल में
एक तरफ जहाँ ग्रामीण स्कूली बच्चे हिंसात्मक कार्यवाही को अंजाम दे रहे थे वही कई स्कूलों के बच्चो को स्कूल बंद होने के पश्चात भी स्कूल में बैठ कर दिन काटना पड़ा. उस समय इन नन्हे-मुन्ने बच्चो को देश के भविष्य की नहीं अपितु यह चिंता खाए जा रही थी की इस आन्दोलन का क्या भविष्य होगा. उल्लेखनीय है की नगर के कई नए स्कूलों को शहर से बाहर स्थापित किया गया है. आन्दोलन की चिंगारी जैसे ही भड़की उसी समय ग्रामीणों ने शहर में प्रवेश करने वाले सभी रास्तो को जाम कर दिया. ऐसे में जो स्कूली बच्चे जहा थे वही रह गए. स्कूल प्रशासन ने बच्चो के अभिभावकों से फोन पर संपर्क साध कर उन्हें तसल्ली दी.


आजाद भारत की आजाद तरक्की


मेरी गुफ्तगू के सभी साथियो व् पाठको सहित पूरे देशवाशियों को स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाये. आओ आज के दिन हम सब मिल कर यह दुआ करे की हमारा देश दिन दोगुनी और रात चोगुनी तरक्की करे. अक्सर देखा और सूना जाता है की जब भी भारत और पकिस्तान की बात होती है तो अमेरिका या उसका कोई भी राष्ट्रपति दोहरी भूमिका अदा करता है लेकिन फिर भी मेरी भगवान् से प्रार्थना है की वो अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा की बात सच करे और मेरा भारत सदैव दुनिया भर के लिए उम्मीद की किरण बना रहे. 
लेकिन इन दिनों तरक्की के नाम पर जो कुछ देश में हो रहा है उसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. अगर तरक्की इसी को कहते है तो मेरा देश ऐसा ही ठीक है. क्योंकि हर किसी को उम्मीद तो रहेगी की हम तरक्की करेंगे. लगता है अब कुछ तो मुझे कोसने लगे होंगे और कुछ के मेरी बात शायद समझ में नहीं आई होगी. जी हां मै उसी तरक्की की बात कर रहा हूँ जो कभी तो हमको अच्छी लगने लगती है और कभी अभिशाप. वही तरक्की जिसको हम प्रतिदिन देखते और मौजूदा जिंदगी में एहसास करते है. लेकिन फिर भी हम उसे अनसुना और अनदेखा कर देते है.
आज स्वतंत्रता दिवस है. सुबह से मोबाइल पर संदेशो का आवागमन शुरू हो गया था. कुछ में सिर्फ बधाई थी तो कुछ हट कर सन्देश दे रहे थे. उनमे से एक सन्देश ऐसा था की आप लोगो से गुफ्तगू करने का मन किया. इस सन्देश में वो सब कुछ था जिसका हम जिंदगी में निर्वहन करते है. लेकिन कभी उसका दूसरा पहलू नहीं समझ पाए. अब देखो ना आजाद भारत में आज हर कोई होम डिलीवरी देने की बात करता है. लेकिन फिर भी आम जनता किसी भी सरकारी काम की होम डिलीवरी से मरहूम है. बात हो रही थी देश की आजादी और तरक्की की. 
तो आज मेरे देश में पिजा व् बर्गर सहित अनेको सामान बेचने वाली गैर सरकारी कंपनिया एम्बुलेंस और पुलिस के मुकाबले जल्दी सर्विस दे रही है. जबकि देश का आजाद सरकारी तंत्र आज भी पुरानी लकीर पीट रहा है. 
आज मेरे देश में कार लेने वाले को 8 प्रतिशत पर लोन मिल रहा है जबकि साक्षरता की दुहाई दे रही सरकार आज भी शिक्षा के नाम पर 12 प्रतिशत पर लोन दे रही है. 
यह मेरे देश के लिए बड़े शर्म की बात है की देश का सारा मिडिया शोएब और सानिया मिर्जा की शादी की कवरेज करने में जुटा था और उधर 76 पुलिस कर्मी एक गरीब को मार रहे थे. तथा बाद में उसकी मौत हो गई. 
आज देश में अनाज के नाम पर एक गरीब को एक दाना तक नसीब नहीं हो रहा और कहीं किसी के नेता के गोदाम में तो कही सरकार की अनदेखी के कारण हजारो टन अनाज खराब हो रहा है. 
ऐसा मेरे देश में ही होता है की जहा दाल, चावल व् चीनी के भाव आसमान छु रहे है और मोबाइल कंपनिया सिम कार्ड फ्री में लुटा रही है. और उस समय हम इसको देश की तरक्की मान रहे होते है.
क्रिकेट तो आज पूरी दुनिया में खेला और देखा जाता है लेकिन ऐसा सिर्फ आजाद भारत में होता है की एक अरबपति कोई दान-धर्म ना करके अपना करोडो रुपया एक क्रिकेट टीम खरीदने में लगा देता है. 
देश को स्वतंत्रता दिलाने वाले ना जाने कितने ही वीर पूर्व सेनानियों का अनुसरण करते हुए देश को आजादी दिला गए लेकिन आज यहाँ हर कोई प्रसिद्धी तो पाना चाहता है लेकिन कोई प्रसिद्ध व्यक्तित्व का अनुसरण नहीं करना चाहता. 
मेरे देश में सुबह उठने के साथ ही अनेक मुद्दों पर विचार-विमर्श शुरू हो जाता है. कभी नेताओ पर तो कभी उनकी गन्दी राजनीति पर. यहाँ तक की अपराध और देश की तरककी पर भी बात कर ली जाती है. ऐसी ही एक सुबह बात हो रही थी बालश्रम पर. कुछ लोग सुबह की सैर के समय बात कर रहे थे की बालश्रम कराने वालो को तो फांसी पर लटका देना चाहिए. कुछ समय ऐसे ही बात करते-करते निकल गया. तभी उनमे से एक ने आवाज लगाईं, छोटू चार चाय ला.

अब तो ऐसा लगने लगा की वो समय आ गया है जब हम सबको अपने दिल पर हाथ रख कर अपनी अंतरात्मा से यह पूछना पड़ेगा की अब तू बता की क्या हम वाकई आजाद भारत में जी रहे है या हम कोई अविश्वसनीय सपना देख रहे है.


क्राइम स्टेटमेंट रोको तो रुकेगा क्राइम


हिसार जिले में अपराध इस समय अपने चरम पर है. कभी कहीं गोलीकाण्ड को अंजाम दिया जा रहा है तो कही फिरौती की एवज में व्यापारियों की हत्या हो रही है. जबकि लोग लूटपाट की वारदातों से सहमे हुए है. उधर पुलिस की नाकामी यह है की वो किसी भी मामले में अपराधी को पकड़ने में अपने को असहज महसूस कर रही है. अपनी इस नाकामी को जनता से छुपाने के लिए पुलिस ने एक नया तरीका इजाद किया है. अभी तक जो पुलिस विभाग अपनी पीठ थपथपाने के लिए मिडिया को क्राइम स्टेटमेंट जारी किया करता, वो बंद कर दी गई है. उल्लेखनीय है की पुलिस अधीक्षक कार्यालय से मिडिया के लिए प्रतिदिन एक क्राइम स्टेटमेंट जारी हुआ करता. जिसमे प्रतिदिन का लेखा-जोखा हुआ करता की आज पुलिस ने कितने मामले दर्ज किये और कितने अपराधी पुलिस की गिरफ्त में आये. लेकिन बीते कुछ अरसे से एकाएक अपराधो में हुई बढ़ोतरी के कारण पुलिस अधीक्षक ने यह क्राइम स्टेटमेंट जारी करने पर रोक लगा दी है. उनका कहना है की अगर पुलिस विभाग कोई जरुरत समझेगा तो पत्रकारों को कार्यालय में ही बुला लिया जायेगा या प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी जाएगी.
इसका एक कारण यह भी माना जा रहा है की आज जिले में अपराध तो दिन के तापमान की तरह बढ़ता जा रहा है लेकिन अपराधी शाम के तापमान की तरह कम नहीं हो रहे है. बढ़ते अपराध पर पुलिस अधीक्षक की झुंझलाहट इस बात से साफ़ झलकती है की जब हांसी में देवराज लोहिया की हत्या के एक सप्ताह बाद ही हिसार के एक व्यापारी से 10 लाख की फिरौती मांगने के मामले पुलिस अधीक्षक मौके पर पहुंचे तो फोन पर साहब ने पत्रकारों को बताया की मैं तो यहाँ रूटीन दौरे पर आया हूँ. मुझे नहीं पता था की यहाँ किसी से फिरौती मांगी गई है.
पूरे लाव-लश्कर के साथ मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक के मुहं से यह बात सुन लोग अचरज में पड़ गए. उधर पुलिस अधीक्षक ने सभी पुलिस अधिकारियो को सख्त आदेश जारी किये है की पत्रकारों को अपराध व् अपराधियों के बारे में किसी भी तरह की कोई जानकारी नहीं दी जाएगी. साथ ही उन्होंने कहा है की अगर ऐसा किया गया तो पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही भी की जा सकती है. लेकिन यह सोचने वाली बात अवश्य है की क्या क्राइम स्टेटमेंट रोकने से जिले में अपराध रुक जायेगा.


आखिर कौन लेगा ख़बर देने वालों की ख़बर


वैसे तो भारत में मिडिया को चौथे स्तम्भ का दर्जा दिया गया है। लेकिन बीते कुछ समय से मिडिया पर जिस तरह से उंगलिया उठ रही है उसे देख लगता है की या तो मिडिया पर आजकल अनायास ही उंगलिया उठाई जाने लगी है या फिर कुछ तो मिडिया ऐसा ग़लत कर ही रहा है जिसके कारण आज उसे समय-समय पर कटघडे में खड़ा होना पड़ रहा है। मुंबई ब्लास्ट, मुंबई के ताज होटल में आतंकियों द्वारा की गई गोलीबारी, स्वाइन फ्लू, राखी का स्वयंवर व् और न जाने ऐसी कितनी ही कवरेज़ है जिसे मिडिया को बहुत कम एहमियत देनी चाहिए थी। या फ़िर यह कहा जाए की यह सब कुछ दिखाना ही नही चाहिए था तो भी मेरी सोच ग़लत नही होगी। लेकिन आज कल मिडिया द्वारा जो कुछ परोसा जा रहा है वो सिर्फ़ टी. आर. पी. बढ़ने के लिए। ऐसे में आज जनता यह समझ पाने में असक्षम की उन्हें क्या देखना पसंद है और क्या नही। फ़िर भले ही समाचारों में आतंक की खबरे हो या स्वाइन फ्लू की न्यूज़ दिखा कर देश में आतंक फैलाया जा रहा हो। अक्सर यह सवाल उठते है की मिडिया को यह नही दिखाना चाहिए ऐसा नही करना चाहिए लेकिन आज ख़बर देने वालो की ख़बर लेने वाला कोई नही है।
अब हरियाणा सरकार को ही देख लो। न. वन हरियाणा के प्रचार के लिए 144 गाडिया लगाई सो लगाई लेकिन होने वाले विधानसभा चुनावो में मिडिया का मुह बंद रखने के लिए हरियाणा का ऐसा कोई समाचार पत्र नही होगा जिसमे हरियाणा सरकार की वाह-वाह की खबरे नही छप रही हो। दिन की शुरुवात होने के साथ जैसे ही कोई भी समाचार पत्र हाथ में उठाया तो सबसे ऊपर प्रतिदिन हरियाणा सरकार के विज्ञापन के दर्शन जरुर होते है। फ़िर भले ही वह समाचार पत्र कितना ही बड़ा हो या कितना ही छोटा हो हरियाणा में जरुर आना चाहिए। ऐसा कर जहा प्रत्येक समाचार पत्र चांदी कूट रहा है वही हरियाणा सरकार सरकारी खजाने को जम कर खाली करने पर तुली है वही आने वाले विधानसभा चुनावो में समाचार पत्रों का मुंह बंद रखने का यह सबसे अच्छा तरीका है। मुद्दा यह नही की सरकार ऐसा क्यो कर रही है या समाचार पत्र ये विज्ञापन क्यो छाप रहे है लेकिन यहाँ पहलु यह है की क्या हम यह मान ले की इतना सब कुछ होने के बाद भी विधानसभा चुनावो के समय ये समाचार पत्र सरकार की नाकामिया हम तक पहुंचाएंगे। क्या ये पत्र अब ऐसा कोई राज खोलेंगे जिसमे सरकार की भूमिका नकारात्मक रही हो।
मुझे नही लगता की ऐसा कुछ होने वाला है लेकिन इतना अवश्य है की अब हमको ही नींद से जागना होगा और कुछ सोचना होगा की आखिर जिस सरकार ने अपने 5 साल के कार्यकाल के समय इतने विज्ञापन नही दिए तो अब क्या जरुरत पड़ गई। कही सरकार वाकई तो अपनी कोई नाकामिया छुपाने के लिए ऐसा नही कर रही। अगर ऐसा कुछ है तो क्या अब हमको ही ख़बर देने वालो की ख़बर लेनी होगी।
इस विषय पर अभी मेरी गुफ्तगू यही खत्म नही हुई इन ख़बर देने वालो का आगे का हाल अभी देता रहूँगा। कुछ और है मेरे पास जो अभी जारी है।


अंग्रेजी से हिन्दी में लिखिए

तड़का मार के

* महिलायें गायब
तीन दिन तक लगातार हुई रैलियों को तीन-तीन महिला नेत्रियों ने संबोधित किया. वोट की खातिर जहाँ आम जनता से जुड़ा कोई मुद्दा नहीं छोड़ा वहीँ कमी रही तो महिलाओं से जुड़े मुद्दों की.

* शायद जनता बेवकूफ है
यह विडम्बना ही है की कोई किसी को भ्रष्ट बता रह है तो कोई दूसरे को भ्रष्टाचार का जनक. कोई अपने को पाक-साफ़ बता रहे है तो कोई कांग्रेस शासन को कुशासन ...

* जिंदगी के कुछ अच्छे पल
चुनाव की आड़ में जनता शुकून से सांस ले पा रही है. वो जनता जो बीते कुछ समय में नगर हुई चोरी, हत्याएं, हत्या प्रयास, गोलीबारी और तोड़फोड़ से सहमी हुई थी.

* अन्ना की क्लास में झूठों का जमावाडा
आज कल हर तरफ एक ही शोर सुनाई दे रहा है, हर कोई यही कह रहा है की मैं अन्ना के साथ हूँ या फिर मैं ही अन्ना हूँ. गलत, झूठ बोल रहे है सभी.

* अगड़म-तिगड़म... देख तमाशा...
भारत देश तमाशबीनों का देश है. जनता अन्ना के साथ इसलिए जुड़ी, क्योंकि उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आन्दोलन एक बहुत बड़ा तमाशा नजर आया.
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